आप चर्चा करें, पर आप एक वाद की तरफदारी करें तो हम जैसे क्या टिपेरें? एक सज्जन नृशंस माओवादी नक्सली हत्यारों के समर्थक/सहायक हैं। एक कोर्ट उन्हे दण्डित करती है तो बहुत पांय पांय मचती है। वैसे भी आजकल समझ का उलटफेर चल रहा है। हम जिसे गद्दार समझते हैं, वह बुद्धिजीवियों की समझ में महान देश भक्त या मानवता भक्त निकलता है। जिसे बुद्धिवादी महान समाजवादी समझते हैं, वह वह देश बेच-खाने वाला निकलता है। जिसे राजनेता समझते हैं वह … लिहाजा बिनायक सेन के मामले में हम जजमेण्टल कैसे बनें? कुछ हिन्दूवादी थामे गये हैं, उनके बारे में भी जजमेण्टल नहीं हैं।
पर यह देखते आये हैं कि यह नक्सलवाद कोई क्रान्ति फ्रान्ति करने वाला नहीं। शुद्ध माफिया है। रंगदारी वसूलक। तरह तरह के असुर इससे जुड़े हैं। कुछ सिद्धान्तवादी भी शायद होंगे। पर वे चीन के इशारे पर तीस साल से खुरपेंच कर रहे हैं। वे अदरवाइज रिकेटी डेमोक्रेसी का रक्त निकाल रहे हैं। साथ साथ जनता का भी। और इनसे आदिवासी का चवन्नी अठन्नी भर भी कल्याण हुआ हो, लगता नहीं।