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Thursday, January 27, 2011

मुटापा किसके लिये फायदेमन्द?


मेकिंजे (McKinsey) क्वार्टरली ने चार्ट-फोकस न्यूज लैटर ई-मेल किया है, जिसमें मोटापे की विश्वमारी (महामारी का वैश्विक संस्करण – pandemic) पर किये जा रहे खर्चों के बारे में बताया गया है। मसलन ब्रिटेन में मोटापे से सम्बन्धित रोगों पर दवाइयों का खर्च £4,000,000.000 है। एक दशक पहले यह इसका आधा था। और यह रकम 2018 तक आठ हजार पाउण्ड हो सकती है।

पर जैसा यह न्यूजलैटर कहता है - खर्चा केवल दवाओं का नहीं है। दवाओं से इतर खर्चे दवाओं पर होने वाले खर्चे से तिगुने हैं। मसलन अमेरिका $450बिलियन खर्च करता है मुटापे पर दवाओं से इतर!

इस विषय में पोस्ट आप मेरी मानसिक हलचल पर पढ़ें:
मोटल्ले लोगों की दुनियाँ

Saturday, January 15, 2011

लोकोपकार और विकास

redtape
रेड टेप निराकरण जरूरी है!
लोकोपकार – फिलेंथ्रॉपी एक ग्लैमरस मुद्दा है। जब मैने पिछली पोस्ट लिखी थी, तब इस कोण पर नहीं सोचा था।  लोकोपकार में निहित है कि अभावों के अंतिम छोर पर लोग हों और हम - मध्यमवर्गीय लोग अपने अर्जन का एक हिस्सा - एक या दो प्रतिशत - दान या जकात के रूप में दें। वह दान किस तरह से सही तरीके से निवेशित हो, उसकी सोचें।

इस दान से कोई सिने स्टार, कोई राजनेता, कोई धर्माचार्य सहज जुड़ सकता है। इस मुद्दे की बहुत इमोशनल वैल्यू है। कोई भी अपनी छपास दूर कर सकता है किसी बड़े दिन कम्बल-कटोरी दान कर। अगर आप नेकी कर दरिया में डालने वाले हैं तो फिर कोई कहने की बात ही नहीं!

Sunday, December 12, 2010

कुछ उभर रही शंकायें

पिछले चार-पांच महीनों में सोच में कुछ शंकायें जन्म ले रही हैं:

    1. लौकी के नीचे दबा सिर अगर मुक्त होती अर्थव्यवस्था सही है, तो छत्तीसगढ़-झारखण्ड-ओडिसा के आदिवासियों की (कम या नगण्य) मुआवजे पर जमीन से बेदखली को सही कहा जा सकता है? माओवादियों या लाइमलाइट तलाशती उन देवियों की तरफदारी को नकारा जाये, तब भी।
    2. मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर यत्न करते भारत के डेढ़ दशक से ज्यादा हो गया। आठ-नौ परसेण्ट की ग्रोथ रेट आने लगी है। पर न करप्शन कम हो रहा है न क्राइम। बढ़ता ही नजर आ रहा है। गड़बड़ कहां है?
    3. प्राइवेट सेक्टर प्रॉडक्ट बेचने में बहुत तत्पर रहता है। पर जब सेवायें देने की बात आती है, तो लड़खड़ाने लगता है। चाहे वह प्रॉडक्ट सम्बन्धित सेवायें हों या फिर विशुद्ध सेवायें - सफाई, प्रॉजेट के ठेके, खानपान।
    4. कम्प्यूटरों पर सरकारी दफ्तरों में बेशुमार खर्च है। पर कर्मचारियों की भरमार में काम करने वाले कर्मचारी दीखते ही नहीं। कम्प्यूटर भी मेण्टेन नहीं - न ढंग के एण्टीवाइरस, न स्तरीय प्रोग्राम।

Saturday, November 27, 2010

महिलाओं से धुनाई खेलकूद?!

गूगल महान है। मैं गूगल न्यूज का हिन्दी संस्करण अपने होमपेज की तरह प्रयोग करता हूं। कल यह नभाटा की खबर गूगल ने पकड़ी - मेट्रो के महिला कोच में घुसे युवक को महिलाओं ने धुना|

Sunday, October 31, 2010

पर्यटन क्या है?

मैं पर्यटन पर नैनीताल नहीं आया। अगर आया होता तो यहां की भीड़ और शानेपंजाब/शेरेपंजाब होटल की रोशनी, झील में तैरती बतख नुमा नावें, कचरा और कुछ न कुछ खरीदने/खाने की संस्कृति को देख पर्यटन का मायने खो बैठता।

Friday, October 22, 2010

भाग ६ - कैलीफिर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अमरीकी/कैलीफोर्निया प्रवास पर छठी अतिथि पोस्ट है।


इस बार बातें कम करेंगे और केवल चित्रों के माध्यम से आप से संप्रेषण करेंगे।

शॉपिंग:
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एक जमाना था, जब हम विदेश से चीजें खरीदकर लाने में गर्व महसूस करते थे। अब भूल जाइए इस बात को। कुछ चीज़ों को छोडकर, हम भारतीयों के लिए वहाँ से कुछ खरीदना मूर्खता ही लगता है।

सब कुछ यहाँ भारत में उपलब्ध है और बहुत ही कम दामों में।
कई सारी चीज़ें तो भारत, चीन, बंगला देश से वहाँ भेजी जाती हैं जहाँ तीन या चार गुना दामों पर बिकती हैं।

Sunday, October 17, 2010

अपने आप से झूठ

Devid Law पता नहीं यह यहां स्वीकार या अस्वीकार करने से फर्क पड़ता है मैं झूठ भी बोलता हूं। झूठ बोलना मानव स्वभाव का बहुत स्वाभाविक अंग है। यह इससे भी सही लगता है कि सदाचार की पुस्तकों और पत्रिकाओं में बहुत कुछ बल इस बात पर होता है कि सच बोला जाये। पर मूल बात यह है कि आदमी अपने आप से कितना झूठ बोलता है।

Tuesday, August 31, 2010

ललही छठ

कल ललही छठ थी। हल छठ – हलधर (बलराम) का जन्म दिन। कभी यह प्रांत (उत्तरप्रदेश) मातृ-शक्ति पूजक हो गया होगा, या स्त्रियां संस्कृति को जिन्दा रखने वाली रह गई होंगी तो उसे ललही माता से जोड़ दिया उन्होने।

स्त्रियां इस दिन हल चला कर उपजाया अन्न नहीं खातीं व्रत में। लिहाजा प्रयोग करती हैं – तिन्नी का धान। तिन्नी का धान तालाब में छींटा जाता है और यूं ही उपज जाता है। मेरी बुआ यह व्रत कर रही थीं – उनसे मांगा मैने तिन्नी का चावल। देखने में सामान्य पर पक जाने पर लालिमा युक्त।

Sunday, August 29, 2010

ट्विट ट्विट ट्वीट!

दीपक बाबा जी कहते हैं - 

ज्ञानदत्त जी, आपके ब्लॉग पर तो ट्वीट चल रहा है ..... चार लाइन आप लिख देते हो बाकी ३०-४० टिप्पणियाँ जगह पूरी कर देती हैं. कुल मिला कर हो गया एक लेख पूरा.
शायद बुरा मान जाओ ......... पर मत मानना ....... इत्ता तो कह सकते हैं.

दीपक जी ने मेरी सन २००७-२००८ की पोस्टें नहीं देखीं; टिप्पणी के हिसाब से मरघटीय पोस्टें!

और फिर दिव्या कहती हैं -

Friday, August 20, 2010

इतिहास में घूमना

सवेरे मैं अपने काम का खटराग छेडने से पहले थोडा आस-पास घूमता हूं। मेरा लड़का साथ में रहता है - शैडो की तरह। वह इस लिये कि (तथाकथित रूप से) बीमार उसका पिता अगर लड़खड़ा कर गिरे तो वह संभाल ले। कभी जरूरत नहीं पड़ी; पर क्या पता पड़ ही जाये!

वैसे घूमना सड़क पर कम होता है, मन में ज्यादा। गंगा आकर्षित करती हैं पर घाट पर उतरना वर्जित है मेरे लिये। यूं भी नदी के बारे में बहुत लिख चुका। कि नहीं?

Wednesday, July 7, 2010

उम्र की फिसलपट्टी उतरता सीनियरत्व

मैने यह पोस्ट पोस्ट न की होती अगर मुझे प्रवीण की एक नई पोस्ट के बारे में सूचना देने की कवायद न करनी होती। यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। और अब तो काफी घटनायें गुजर चुकी हैं। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड के लिये बापी महतो को पकड़ा जा चुका है (अच्छा हुआ, पकड़ गया, नहीं तो उसके कामरेड लोग समाप्त कर देते!)


प्रवीण पाण्डेय ने अपने ब्लॉग पर नई पोस्ट लिखी है – २८ घण्टे उसे पढ़ने के लिये आप उनके ब्लॉग पर जायें। यह पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा जैसे नव विवाहित कवि हृदय गद्य में कविता लिख रहा हो -

Wednesday, June 30, 2010

बिज्जू

paws स्वप्न, बीमार हो तो बहुत आते हैं। स्वप्न में हल्की रोशनी में दीखता है मुझे बिज्जू। जंगली बिलाव सा कोई जन्तु। वह भी मुझे देख चुका है। आत्म रक्षा में अपनी जगह बैठे गुर्राहट के साथ दांत बाहर निकाल रहा है।

मुझे प्रतिक्रिया करने की जरूरत नहीं है। अपने रास्ते निकल सकता हूं। पर आशंकित हूं कि कहीं वह आक्रमण कर बैठा तो? मैं अपने पैर का चप्पल निकाल चला देता हूं। कितने बड़े चप्पल! बाइबल की कहानियों के गोलायथ जैसे का चप्पल!

पर वह निशाने पर नहीं लगता। पहला वार खाली। युद्ध में पहले वार की महत्ता है युद्ध का दोष तय करने को। पहला वार, पहला तीर, पहली गोली! पहला शंख किसने बजाया था महाभारत में?!

Saturday, June 19, 2010

मधुगिरि के चित्र

यह स्लाइड-शो है मधुगिरि के चित्रों का। पिकासा पर अप-लोड करना, चित्रों पर कैप्शन देना और पोस्ट बनाना काफी उबाऊ काम है। पर मैने पूरा कर ही लिया!

ललकारती-गरियाती पोस्टें लिखना सबसे सरल ब्लॉगिंग है। परिवेश का वैल्यू-बढ़ाती पोस्टें लिखना कठिन, और मोनोटोनी वाला काम कर पोस्ट करना उससे भी कठिन! :-)

Wednesday, June 16, 2010

मधुगिरि

Master Plan विश्व के द्वितीय व एशिया के सर्वाधिक बड़े शिलाखण्ड की विशालकाया को जब अपने सम्मुख पाया तो प्रकृति की महत्ता का अनुभव होने लगा। जमीन के बाहर 400 मी की ऊँचाई व 1500 मी की चौड़ाई की चट्टान के शिखर पर बना किला देखा तो प्रकृति की श्रेष्ठ सन्तान मानव की जीवटता का भाव व सन्निहित भय भी दृष्टिगोचर होने लगा।

बंगलोर से लगभग 110 किमी की दूरी पर स्थित मधुगिरि तुमकुर जिले की एक सबडिवीज़न है। वहीं पर ही स्थित है यह विशाल शिलाखण्ड। एक ओर से मधुमक्खी के छत्ते जैसा, दूसरी ओर से हाथी की सूँड़ जैसा व अन्य दो दिशाओं से एक खड़ी दीवाल जैसा दिखता है यह शिलाखण्ड। गूगल मैप पर ऊपर से देखिये तो एक शिवलिंग के आकार का दिखेगा यही शिलाखण्ड।

Wednesday, May 19, 2010

होगेनेक्कल जलप्रपात

Station1 (Small) नीरज जाट जी, डॉ अरविन्द मिश्र जी व आशा जोगलेकर जी के यात्रा-वृत्तान्तों का प्रभाव, बच्चों की घर में ऊबने की अकुलाहट और रेलवे के मॉडल स्टेशन के निरीक्षण का उपक्रम मुझे तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले ले गये।


बंगलोर से 150 किमी रेलयात्रा पर है धर्मपुरी, वहाँ से 40 किमी की रोड यात्रा पर होगेनेक्कल है।

Sunday, May 9, 2010

बापीयॉटिक पोस्टों की दरकार है!

Baapi2 बापी ओडीसा जाने के बाद क्या कर रहा है? मैं सतीश पंचम जी से फॉलो-अप का अनुरोध करता हूं।

बापी वाली पोस्ट एक महत्वपूर्ण पोस्ट है हिन्दी ब्लॉगिंग की – भाषा और विषय वस्तु में नया प्रयोग। यह बिना फॉलो-अप के नहीं जाना चाहिये। अगर आपने सतीश जी की उक्त पोस्ट नहीं पढ़ी है तो कृपया पढ़ें। बापी मुम्बई की जिन्दगी की करमघसेटी को किन तर्कों के साथ तिलांजलि देता है, और किस भाषा में, वह पढ़ने की चीज है। 

रिवर्स माइग्रेशन एक स्वप्न की वस्तु नहीं है। अर्थव्यवस्था में अच्छी वृद्धि दर के साथ समृद्धि छोटे शहरों/गांवों/कस्बों में पसीजनी चाहिये। अन्यथा असमान विकास अपने को झेल नहीं पायेगा।

Sunday, April 18, 2010

नवान्न

वैशाखी बीत गई। नवान्न का इन्तजार है। नया गेहूं। बताते हैं अरहर अच्छी नहीं हुई। एक बेरियां की छीमी पुष्ट नहीं हुई कि फिर फूल आ गये। यूपोरियन अरहर तो चौपट, पता नहीं विदर्भ का क्या हाल है?

Wednesday, April 14, 2010

लैपटॉप का लीप-फार्वर्ड

कहीं बहुत पहले सुना था,

बाप मरा अँधियारे में, बेटा पॉवर हाउस ।

आज जब हमारे लैपटॉप महोदय कायाकल्प करा के लौटे और हमारी लैप पर आकर विराजित हुये तो यही उद्गार मुँह से निकल पड़े। अब इनकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स इस प्रकार हैं।

Tuesday, April 13, 2010

नाऊ - II

Bhairo Prasad Barbar भैरो प्रसाद का सैलून कार्ड-बोर्ड फेक्टरी (अब बन्द) की दीवार के सहारे फुटपाठ पर है। शाम के समय मैने देखा तो वह फुटपाथ पर झाड़ू से कटे बाल बटोर रहे थे। एक कुर्सी, शीशा, बाल बनाने के औजार, एक बेंच और एक स्टूल है उनकी दुकान में। छत के नाम पर बल्लियों के सहारे तानी गई एक चादर।

बताया कि एक हेयर कटिंग का १० रुपया [१] लेते हैं। मैने पूछा कि कितनी आमदनी हो जाती है, तो हां हूं में कुछ नॉन कमिटल कहा भैरो प्रसाद ने। पर बॉडी लेंग्वेज कह रही थी कि असंतुष्ट या निराश नहीं हैं वे।