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Thursday, January 27, 2011

मुटापा किसके लिये फायदेमन्द?


मेकिंजे (McKinsey) क्वार्टरली ने चार्ट-फोकस न्यूज लैटर ई-मेल किया है, जिसमें मोटापे की विश्वमारी (महामारी का वैश्विक संस्करण – pandemic) पर किये जा रहे खर्चों के बारे में बताया गया है। मसलन ब्रिटेन में मोटापे से सम्बन्धित रोगों पर दवाइयों का खर्च £4,000,000.000 है। एक दशक पहले यह इसका आधा था। और यह रकम 2018 तक आठ हजार पाउण्ड हो सकती है।

पर जैसा यह न्यूजलैटर कहता है - खर्चा केवल दवाओं का नहीं है। दवाओं से इतर खर्चे दवाओं पर होने वाले खर्चे से तिगुने हैं। मसलन अमेरिका $450बिलियन खर्च करता है मुटापे पर दवाओं से इतर!

इस विषय में पोस्ट आप मेरी मानसिक हलचल पर पढ़ें:
मोटल्ले लोगों की दुनियाँ

Monday, June 7, 2010

एपिलेप्सी-रोधी दवाओं के साथ वापसी

DSC02400 (Small)काफी समय पहले मैने वैतरणी नाले के पानी से कछार में खेती करते श्री अर्जुन प्रसाद पटेल की मड़ई और उनके क्रियाकलाप पर लिखा था। मैं उनकी मेहनत से काफी प्रभावित था। कल पुन: उनकी मड़ई का दूर से अवलोकन किया। उस नाले में पर्याप्त सूअर घूमते हैं। अत: उनकी क्यारियों की सब्जी में न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस (NEUROCYSTICERCOSIS) के मामले बनाने की क्षमता होगी!
खैर, मेरी पत्नी और मैने, बावजूद इस बीमारी के, हरी सब्जियां खाना बन्द न करने का फैसला किया है!

चौबीस मई को शाम नौ बजे मुझे बायें हाथ में अनियंत्रित दौरे जैसा कुछ हुआ। तेजी से बिना नियंत्रण के हिलते हाथ को दायां हाथ पूरे प्रयास से भी नहीं रोक पा रहा था। लगभग चार मिनट तक यह चला। उसके बाद कलाई के आगे का हाथ मानसिक नियंत्रण में नहीं रहा।

मैने दो फोन किये। एक अपने बॉस को आपात अवस्था बताते हुये और दूसरा अपने रिश्ते में आनेवाले आजमगढ़ के सी.एम.ओ. ड़ा. एस.के. उपाध्याय को। बॉस श्री उपेन्द्र कुमार सिंह ने अस्पताल ले जाने की तुरन्त व्यवस्था की। ड़ा. उपाध्याय ने यह स्पष्ट किया कि मामला किसी अंग विशेष/तंत्रिकातन्त्र में स्पॉडिलाइटिस का भी नहीं, वरन मस्तिष्क से सम्बन्धित है। मस्तिष्क की समस्या जानकर मैं और व्यग्र हो गया।

Friday, June 12, 2009

बरसात, सांप और सावधानी


snake_simple बरसात का मौसम बस अब दस्तक देने ही वाला है। नाना प्रकार के साँपो के दस्तक देने का समय भी पास आ रहा है। शहरी कालोनियाँ जो खेतो को पाटकर बनी हैं या जंगल से सटे गाँवो में साँप घरो के अन्दर अक्सर आ जाते है। वैसे तो बिलों मे पानी भरने और उमस से बैचेन साँपो का आगमन कहीं भी हो सकता है। मुझे मालूम है कि आम लोगो को इसके बारे मे कितनी भी जानकारी दे दो, कि सभी साँप हानिकारक नही होते, पर फिर भी वे घर मे साँप देखते ही बन्दरो की तरह उछल-कूद करने लगते है। आनन-फानन मे डंडे उठा लेते हैं या बाहर जा रहे व्यक्ति को बुलवाकर साँपो को मार कर ही चैन लेते हैं।

Pankaj A
यह अतिथि पोस्ट श्री पंकज अवधिया की है। पंकज अवधिया जी के कुछ सांप विषयक लेखों के लिंक:

पन्द्रह मे से वे दो नाग जिनके सानिध्य मे हम बैठे थे।

नागिन बेल जिसे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

नागिन बेल के तनो को भी साँप भगाने वाला कहा जाता है।

ये असली नही बल्कि जडो को छिल कर बनाये गये साँप है। इन्हे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

ऐसा काटता है क्रोधित नाग|

दंश के तुरंत बाद|

नाग दंश से अपनी अंगुली खो चुके उडीसा के पारम्परिक चिकित्सक

साँपो पर कुछ शोध आलेख – एक और दो

साँपो पर मेरे कुछ हिन्दी लेख

भारत के कुछ विषैले और विषहीन सर्प

आम लोगो के इस भय का लाभ जडी-बूटी के व्यापारी उठाते हैं। साँप की तरह दिखने वाली बहुत सी वनस्पतियों को यह बताकर बेचा जाता है कि इन्हे घर मे रखने से साँप नही आता है। आम लोग उनकी बातो मे आ जाते हैं। मीडिया भी इस भयादोहन मे साथ होता है। जंगलो से बहुत सी दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ इसी माँग के कारण खत्म होती जा रही हैं। साँप घर मे रखी इन जड़ी-बूटियों के बावजूद मजे से आते हैं। यहाँ तक कि इन्हे साँप के सामने रख दो तो भी वे इनके ऊपर से निकल जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जडी-बूटियाँ व्यर्थ जाती हैं। केवल भयादोहन करके व्यापारी लाभ कमाते हैं।

बरसात के शुरु होते ही कुछ सुरक्षात्मक उपाय अपनाकर आप साँपो के अवाँछित प्रवेश पर अंकुश लगा सकते हैं। उन सम्भावित प्रवेश द्वारों पर जहाँ से साँप के अन्दर आने की सम्भावना है, दिन मे एक बार फिनाइल का पोछा लगा दें। साँप वहाँ फटकेंगे भी नहीं। कैरोसीन का भी प्रयोग लाभकारी है। यदि आपके घर के सामने लान है तो बरसात के दौरान इसे बेतरतीब ढंग से उगने न दें।

यदि साँप विशेषकर नाग जैसे जहरीले साँप आ भी जायें तो अनावश्यक उछल-कूद न मचायें। उन्हे उत्तेजित न करें। आप उनके सामने खूब जोर से बात भले करें पर हिले-डुले नहीं। वह आपको काटने नही आया है। यदि वह फन काढ़ ले तो आप स्थिर रहें। थोडी देर मे वह दुबक कर कोने या आड मे चला जायेगा। फिर उसे बाहर का रास्ता दिखा दें। कमरे मे जिस ओर आप उसे नही जाने देना चाहते हैं उस ओर फिनायल डाल दें। यदि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाये तो आस-पास पडे कपड़े नाग के ऊपर डाल दें। ताकि गुस्से मे दो से तीन बार वह कपडो को डंस ले। ऐसा करने से आप सम्भावित खतरे से बच जायेंगे। आमतौर पर कपडे डालने से वह शांत भी हो जायेगा। कोशिश करें कि आप इस बार एक भी साँप न मारें। साँप को दूर छोडने पर वह फिर वहीं नही आयेगा।

कुछ वर्ष पहले तक दुनियां मे शायद ही कोई व्यक्ति रहा हो जो साँप से मेरी तरह घबराता रहा हो। पिछले साल कुछ घंटो पहले पकड़े गये पन्द्रह से अधिक नागों के बीच एक कमरे मे हम पाँच लोग बैठे रहे। किसी का भी जहर नही निकाला गया था। निकटतम अस्पताल चार घंटे की दूरी पर था। एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ से हम सर्प प्रबन्धन के गुर सीख रहे थे। हमे हिलने-डुलने से मना किया गया था। हम बोल सकते थे पर हिल नही सकते थे। जरा-सा भी हिलने से साँप हमारी ओर का रुख कर लेते थे। उन्हे खतरा लगता था। जब वे शांत हो गये तो हमारे स्थिर शरीर के ऊपर से होकर कोने मे चले गये। नंगे बदन पर साँपो का चलना सचमुच रोमांचक अनुभव रहा। पर इससे साँपो को समझने का अवसर मिला। फिल्मो में साँपो की जो खलनायकीय छवि बना दी गयी है, वह साँपो की अकाल मौत के लिये काफी हद तक जिम्मेदार है।

पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है। 


Friday, May 8, 2009

क्वैकायुर्वेद


कठवैद्यों की कमी नहीं है आर्यावर्त में। अंगरेजी में कहें तो क्वैक (quack – नीम हकीम)। हिमालयी जड़ीबूटी वालों के सड़क के किनारे तम्बू और पास में बंधा एक जर्मन शेफर्ड कुकुर बहुधा दीख जाते हैं। शिलाजीत और सांण्डे का तेल बेचते अजीबोगरीब पोशाक में लोग जो न आदिवासी लगते हैं, न आधुनिक, भी शहरी माहौल में पाये जाते हैं। नामर्दी और शीघ्रपतन का इलाज करने वाले अखबार में विज्ञापन तक देते हैं। बवासीर – भगन्दर का इलाज कोई सही साट अस्पताल में नहीं कराता होगा। सब दायें – बांयें इलाज सुविधा तलाशते हैं।

क्वैक+आयुर्वेद=क्वैकायुर्वेद।


जब क्वैकायुर्वेदीय वातावरण चहुंओर व्याप्त है तो उसे चरक या सुश्रुत संहिता की तरह कोडीफाई क्यों नहीं किया गया? और नहीं किया गया तो अब करने में क्या परेशानी है? कौन कहता है कि यह कोडीफिकेशन केवल वैदिक काल में ही हो सकता था। अब भी देर नहीं हुई है। पर अभी भी यह नहीं हुआ तो यह वेदांग विलुप्तीफाई हो सकता है।

Pilesमुझे तो इस विषय में जानकारी नहीं है। अन्यथा मैं ही पहल करता कोडीफिकेशन की। पर मन में सिंसियर हलचल अवश्य होती है – जब भी मैं पास की एक तथाकथित डाक्टर साहब की दुकान के पास से गुजरता हूं। ये डाक्टर द्वय किसी क्षार-सूत्र विधि से बवासीर-भगन्दर का इलाज करते हैं। बाकायदा डाक्टरी का लाल क्रॉस का निशान भी लगा है – क्वैकायुर्वेद को आधुनिक जामा पहनाने को।

मोतियाबिन्द के मास-ऑपरेशन क्वैकाचार्यों द्वारा बहुधा किये जाते हैं। हड्डी बिठाने और फ्रैक्चर का इलाज करते जर्राह अब भी ऑर्थोपेडिक डाक्टर की टक्कर का कमाते हैं। दांतों की डाक्टरी बहुत समय तक चीनी डाक्टर बिना डिग्री के अपने मोंगोलाइड चेहरों की ख्याति के बल पर करते रहे हैं। आज भी डेंटिस्ट की डिग्री की परवाह नहीं करते लोग।

डाक्टरों की संख्या कम है, या उनकी बजाय क्वैकाचार्यों पर भरोसा ज्यादा है लोगों का – पता नहीं। शायद यह है कि भारत में स्वास्थ्य के मद में लोग पैसा कम ही खर्चना चाहते हैं। लिहाजा क्वैकायुर्वेद का डंका बजता है। Jarrah    


१. वैसे बवासीर और भगन्दर में क्या अन्तर है - यह मुझे नहीं मालुम। दोनो मल निकासी से सम्बन्धित हैं - ऐसा प्रतीत होता है। आपको अन्तर मालुम हो और न बतायें तो भी चलेगा! smiley-laughing[4]


Wednesday, May 6, 2009

गाज किसपर गिरेगी?


कुछ समय पहले मै खुडमुडी गाँव के श्री नगेसर से बात कर रहा था। उसे हम लोग बचपन ही से जानते हैं। मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वाला नगेसर अपने गठीले बदन के कारण गाँव मे लोकप्रिय रहा। इस बार वह एकदम बदल गया था। दो साल पहले जब वह बरसात के दिनो मे अपने दो साथियो खेत से लौट रहा था तभी बिजली गिर गयी। उसके दो साथी वहीं पर मर गये। नगेसर को ज्यादा शारीरिक क्षति नही हुयी पर मन से वह पूरी तरह खोखला हो गया।

ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता है। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।
Pankaj A श्री पंकज अवधिया का लेख। आप उनके लेख पंकज अवधिया लेबल सर्च में देख सकते हैं।
शरीर का कुछ भाग काला पड गया। मुझसे उसे जडी-बूटी की उम्मीद थी। मैने उसे परसा (पलाश) की लकडी दी और उसका पानी पीने को कहा। मैने उसे कुछ हर्बल मालाएँ भी दी। मुझे मालूम है कि ये जडी-बूटियाँ उसे बाहर से ठीक कर देंगी लेकिन मन की पीडा को वह आजीवन भोगता रहेगा।

बचपन मे घर के पास एक नीम के पेड़ पर बिजली (गाज) गिरी थी। उस चमक से डरकर मै कुछ समय के लिये बेसुध हो गया था। तब से मुझे आसमानी बिजली के कड़कने के समय बहुत भय लगता है। होम्योपैथी मे फास्फोरिकम नामक दवा के मरीज को तूफानो से बहुत डर लगता है मेरी तरह।

शहरो मे विभिन्न उपाय अपना कर हम आसमानी बिजली से काफी हद तक बच जाते है पर हमारे किसान बरसात मे खुले मे खेतों मे काम करते है। पानी से भरे धान के खेत आसमानी बिजली को आमंत्रित करने मे कोई कसर नही छोडते हैं। हर साल अनगिनत किसान और खेतीहर मजदूर आसमानी बिजली के गिरने से बेमौत मारे जाते हैं। उनके पास सुरक्षा के कोई कारगर उपाय नही है।

Farmer_in_Vietnamइस वियतनामी किसान को देखें। जो सिर पर बांस की छीलन से बनी दउरी पहने है, वह खुमरी सा है। उसके दोनो हाथ काम करने को मुक्त हैं। फोटो विकीमेडिया से

लोहे की डंडी वाले छाते आसमानी बिजली को आमंत्रित कर सकते हैं। पर यह संतोष की बात है कि ज्यादातर किसान अभी भी बाँस से बनी खुमरी (यह लिंक देखें) का प्रयोग करते हैं। खुमरी के कारण उनके दोनो हाथ काम करने के लिये स्वतंत्र होते हैं। किसान पेड़ों की शरण लेते हैं। यह जानते हुये भी कि बरसात के दिनो मे पेड़ों की शरण घातक सिद्ध हो सकती है।

क्या कोई विशेष पेड है जिस पर बिजली ज्यादा गिरती है? आप भले ही इस प्रश्न पर हँसे पर छत्तीसगढ के लोग महुआ, अर्जुन और मुनगा (सहजन) का नाम लेते है। उनका यह अनुभव विज्ञान सम्मत भी है। वैज्ञानिक शोध सन्दर्भ बताते है कि ऐसे बडे पेड़ जिनकी जड़ें भूमिगत जल तक पहुँचती हैं, उन पर बिजली गिरने की सम्भावना अधिक होती है। हमारे यहाँ 50-60 फीट गहरा कुँआ खोदने वाले कुछ तमिलनाडु के लोग हैं। वे उन पेड़ों के पास कुँआ खोदने के लिये तैयार हो जाते है जिन पर बिजली गिरी होती है। ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता हैं। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।

यदि आप खुली जगह मे हैं तो मौसम खराब होते ही झुककर बैठ जायें। झुककर बैठने का उद्देश्य सतह पर दूसरी चीजो की तुलना मे अपनी ऊँचाई कम करना है ताकि बिजली आप पर गिरने की बजाय ऊँची चीज पर गिरे। फैराडे के किसी नियम के अनुसार बन्द बक्सों मे बिजली नही गिरती है। यही कारण है कि गाड़ियों मे बिजली नही गिरती। पर किसान के लिये झुककर बैठना सम्भव नही है। आखिर वह कब तक बैठा रहेगा। खेतो के पास यदि सस्ते मे बन्द बाक्स बना दिये जाये तो भी किसान अन्दर नही बैठ सकता। यह व्यवहारिक उपाय नही है।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ कहते है कि तुलसी की माला बिजली से शरीर की रक्षा करती है। यह भी कि जिस पर बिजली गिरी हो उसे तुलसी की माला पहननी चाहिये। दूसरी बात मुझे सही लगती है। मै ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ। तुलसी की माला पहनने से बिजली नही गिरेगी - इसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे परखना जरुरी लगता है।

पारम्परिक चिकित्सको के लिये जंगली पेडो पर बिजली गिरना किसी वरदान से कम नही है। जितनी जल्दी हो सके वे प्रभावित पेड तक पहुँचते है और लकडी एकत्र कर लेते है। इस लकडी का प्रयोग असाध्य रोगों की चिकित्सा मे होता है। इस पर आधारित एक लेख आप यहाँ पढ सकते है।

Lightening is beneficial too. By Pankaj Oudhia

ज्ञानदत्त जी के ब्लाग में किसान से जुडी इस महत्वपूर्ण समस्या पर चर्चा का मुख्य उद्देश्य ब्लाग पर आने वाले प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना है। मुझे विश्वास है कि किसानों को आसमानी बिजली के कहर से बचाने के लिये कारगर उपायों पर आपके विचारो से हम किसी ठोस निष्क़र्ष तक जरुर पहुँच पायेंगे। वैसे पारम्परिक चिकित्सक कहते हैं कि किसानो से ज्यादा खतरनाक परिस्थितियो मे खराब मौसम के दौरान बन्दर रहते हैं। पानी से भीगे पेड़ों मे वे मजे से रहते है। क्या कभी बन्दरो को आसमानी बिजली से मरते देखा है या सुना है? बन्दरों के पास समाधान छुपा है। मुझे उनकी बात जँचती है। यहाँ सारा मानव जगत सर्दी से त्रस्त होता रहता है वहीं दूसरी ओर यह वैज्ञानिक सत्य है कि बन्दरो को सर्दी नही होती।

पंकज अवधिया

(इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया के पास है)


Sunday, May 3, 2009

कीचड़ उछाल स्पर्धा


जब मुद्दे नहीं होते उछालने को तो कीचड़ उछाली जाती है। हाथ काट डालने से यह सिलसिला शुरू हुआ था। लेटेस्ट है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्याभिचारियों की जमात है।

मेरी पुरानी पोस्ट से:
मैं हिन्दू हूं - जन्म से और विचारों से। मुझे जो बात सबसे ज्यादा पसन्द है वह है कि यह धर्म मुझे नियमों से बंधता नहीं है। यह मुझे नास्तिक की सीमा तक तर्क करने की आजादी देता है। ईश्वर के साथ दास्यभाव से लेकर एकात्मक होने की फ्रीडम है - द्वैत-विशिष्टाद्वैत-अद्वैत का वाइड स्पैक्ट्रम है। मैं हिंदू होते हुये भी क्राइस्ट या हजरत मुहम्मद के प्रति श्रद्धा रख-व्यक्त कर सकता हूं।
अब यह तो है कि सर्वाधिक त्याग और फ्र्यूगॉलिटी का जीवन मैने कमिटेड काडर वाले लोगों में पाया है – भले ही वे धुर दक्षिणपन्थी संघ वाले हों या अपने आदर्श को समर्पित साम्यवादी।

इन दोनो से सहमति न पायेगी वैचारिक धरातल पर। दोनो ही आपकी वैयक्तिक फ्री-थॉट पर कोबरा की तरह आक्रमण करते हैं। यही कारण है कि मुझे उदात्त हिन्दुत्व भाता है। उदग्र हिन्दुत्व से भय लगता है।

पर वैचारिक असहमति के माने यह हो कि कीचड़ उछाल किसी को व्याभिचारी कहूं – तो न केवल ज्यादा हो जायेगा, वरन हाइपर थेथराइडिज्म (इसे हाइपर थायराइडिज्म से कन्फ्यूज न करें) की बीमारी का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होगा।

ओह, यह चुनाव कब खत्म होंगे? 

बापू के तथाकथित कृष्ण-पक्ष पर लिखा जा रहा है। एक पक्ष यह भी:

गांधीजी रेल से यात्रा कर रहे थे कि एक जगह उनका एक पैर का जूता फिसल कर ट्रैक के पास गिर गया। उन्होने अपना जूता वापस लेने की कोशिश की पर ट्रेन तब तक गति पकड़ चुकी थी। सह यात्रियों के लिये तब आश्चर्य तब हुआ जब बड़ी शान्ति से बापू ने अपने दूसरे पैर का जूता उतारा और उस स्थान पर फैंक दिया जहां पहला जूता गिरा था। जब एक सह यात्री ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो बापू ने जवाब दिया - “जब कोई गरीब आदमी मेरे एक पैर का जूता पायेगा तो शायद वह पूरा जोड़ा चाहे जिससे कि वह पहन सके।”

गांधी एक पैर का जूता खो कर गरीब नहीं बने वरन वे गरीब के साथ अपने को जोड़ कर कितने ऊंचे उठ गये।

Friday, April 24, 2009

गर्मियों की तैयारी पर पंकज अवधिया


Pankaj A
श्री पंकज अवधिया ने पिछली साल पोस्ट लिखी थी - छत पर चूने की परत लगाने के विषय में। अपने उस प्रयोग पर आगे का अपडेट दे रहे हैं इस पोस्ट में। आप पायेंगे कि अनेक वनस्पतियां गर्मियों से राहत देने में प्रयोग की जा सकती हैं। आप पंकज जी के लेख पंकज अवधिया लेबल पर सर्च कर भी देख सकते हैं।
पिछली गर्मियो मे आपने छत मे चूने के प्रयोग के विषय मे पढा था। अब समय आ गया है कि इस विषय मे प्रगति के विषय मे मै आपको बताऊँ।

पिछले वर्ष गर्मियों में यह प्रयोग सफल रहा। पर बरसात मे पूरा चूना पानी के साथ घुलकर बह गया। शायद गोन्द की मात्रा कम हो गयी थी। इस बार फिर से चूना लगाने की तैयारियाँ जब शुरु हुयी तो एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ मित्र ने डरा दिया। आप जानते ही है कि मधुमेह की वैज्ञानिक रपट पर काम चल रहा है। 500 जीबी की आठ बाहरी हार्ड डिस्क कमरे मे रहती है जिनमे से दो कम्प्यूटर से जुडी रहती है। कमरे मे सैकडों डीवीडी भी हैं। एक हजार जीबी के आँकडो से भरे सामान को चूने के हवाले छोडने पर विशेषज्ञ मित्र ने नाराजगी दिखायी। कहा कि रायपुर की गर्मी मे हार्ड डिस्क और डीवीडी दोनो को खतरा है। मन मारकर एक एसी लेना पडा।

mahanadi मेरे कमरे मे एसी होने से काफी ठंडक हो जाती है पर एक मंजिला घर होने के कारण बाकी कमरे बहुत तपते हैं। रात तक धमक रहती है। इस बार नये-पुराने दोनो प्रयोग किये हैं। एक कमरे के ऊपर चूना लगाया है। दूसरे के ऊपर अरहर की फसल के अवशेष जिन्हे काडी कह देते हैं, को बिछाया है। तीसरे के ऊपर चितावर नामक स्थानीय जलीय वनस्पति को बिछाया है। चौथे कमरे मे वन तुलसा को बिछाया है।

वन तुलसा और चितावर दोनो के अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। चितावर का प्रयोग छत्तीसगढ मे आमतौर पर होता है। यह घर को ठंडा रखता है। जहाँ कही भी पानी भरा होता है चितावर अपने आप उग जाता है। लोग मुफ्त की इस वनस्पति को ले आते हैं और साल भर प्रयोग करते हैं। इस वनस्पति के औषधीय उपयोग तो हैं ही साथ ही औद्योगिक इकाईयो से निकलने वाले प्रदूषित जल के उपचार में भी इसका प्रयोग होता है।

वन तुलसा नामक वनस्पति बेकार जमीन मे उगती है खरपतवार के रुप में। छत्तीसगढ के किसानो ने देखा कि जहाँ यह वनस्पति उगती है वहाँ गाजर घास नही उगती है। यदि उग भी जाये तो पौधा जल्दी मर जाता है। माँ प्रकृति के इस प्रयोग से अभिभूत होकर वे अपने खेतों के आस-पास इस वनस्पति की सहायता से गाजर घास के फैलाव पर अंकुश लगाये हुये हैं। अरहर की जगह छत को ठण्डा रखने के लिये इसके प्रयोग का सुझाव किसानो ने ही दिया। उनका सुझाव था कि छत मे इसकी मोटी परत बिछाकर ऊपर से काली मिट्टी की एक परत लगा देने से घर ठंडा रहेगा। एक पशु पालक ने एस्बेस्टस की छत के नीचे रखी गयी गायों को गर्मी से बचाने के लिये कूलर की जगह इसी वनस्पति का प्रयोग किया है। आप चितावर और वन तुलसा के चित्र इन कडियो पर देख सकते है।

चितावर

वन तुलसा

मेरे गाँव के निवासी चितावर का प्रयोग करते रहे हैं। इस बार गाँव मे बन्दरों का अधिक उत्पात होने के कारण अब खपरैल वाले घरों मे टिन की छत लग रही है। टिन के नीचे दिन काटना कठिन है। वे टिन की छत पर चितावर की मोटी परत बिछा रहे है पर बन्दरो का उत्पात किये कराये पर पानी फेर रहा है। गाँव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी है कि सीताफल की कुछ शाखाए यदि चितावर के साथ मिला दी जायें तो बन्दर दूर रहेंगे। आपने शायद यह देखा होगा कि बन्दर सभी प्रकार की वनस्पतियो को नुकसान पहुँचाते हैं पर सीताफल से दूर रहते हैं। इस प्रयोग की प्रगति पर मै आगे लिखूंगा।

शायद यह मन का वहम हो पर इन दिनों जंगल मे धूप मे ज्यादा खडे रहना कम बर्दाश्त होता है। मुझे यह एसी का दुष्प्रभाव लगता है। इसमे माननीय बी.एस.पाबला साहब के सुपुत्र बडी मदद करने वाले हैं। उनकी सहायता से एक हजार जीबी के आँकडो को एक डेटाबेस के रुप मे आन-लाइन करने की योजना पर चर्चा हो रही है। जैसे ही यह आन-लाइन होगा सबसे पहले मै एसी से मुक्त होना चाहूँगा।

पंकज अवधिया

(इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।)


हमने इस साल, पंकज अवधिया जी के पिछली साल के लेख के अनुसार, अपने एक मंजिले मकान की छत पर चूने और फेवीकोल की परत लगाई है। उससे लगता है कि गर्मी कुछ कम है कमरों में।

पंकज जी की उक्त लेख में बताई वनस्पतियों की स्थानीय रूप से उपलब्धता में दिक्कत हो सकती है, पर अगर प्रयोग करने हों तो हर स्थान पर अनेक प्रकार की वनस्पति नजर आती है। यहां कुछ लोगों ने घर की छतों पर लौकी-नेनुआ की बेलें बिछा रखी हैं। वह भी तापक्रम कम करती होगी।   

Sunday, February 1, 2009

पोलियो प्रोग्राम कब तक?


pulsepolioमैने रेडियो में नई बैटरी डाली। सेट ऑन किया तो पहले पहल आवाज आई इलाहाबाद आकाशवाणी के कृषिजगत कार्यक्रम की। आपस की बातचीत में डाक्टर साहब पल्स-पोलियो कार्यक्रम के बारे में बता रहे थे और किसान एंकर सलाह दे रहे थे कि रविवार “के गदेलवन के पल्स-पोलियो की खुराक जरूर पिलवायेन”!

थोड़ी देर में वे सब राम-राम कर अपनी दुकान दऊरी समेट गये। तब आये फिल्म सुपर स्टार जी। वे दशकों से सब को नसीहत दे रहे हैं पल्स-पोलियो खुराक पिलाने की। पर यूपी-बिहार की नामाकूल जनता है कि इस कार्यक्रम को असफल करने पर तुली है।

$6350 लाख के खर्चे पर बिल और मेलिण्डा गेट्स फाउण्डेशन के अग्रगामी कदम से भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नाइजीरिया केन्द्रित पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जायेगा।
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डब्ल्यू.एच.ओ. और यूनीसेफ से जुड़ने में लाभ है?smile_regular

ले दे कर एक सवाल आता है – जो किसानी प्रोग्राम में डाक्टर साहब से भी पूछा गया। “इससे नामर्दी तो नहीं आती”। अब सन उन्यासी से यह कार्यक्रम बधिया किया जा रहा है। जाने कितना पैसा डाउन द ड्रेन गया। उसमें कौन सी मर्दानगी आई?

ये दो प्रान्त अपनी उजड्डता से पूरी दुनियां को छका रहे हैं। यहां जनसंख्या की खेप पजान है लेफ्ट-राइट-सेण्टर। सरकार है कि बारम्बार पल्स-पोलियो में पैसा फूंके जा रही है। और लोग हैं कि मानते नहीं।

भैया, ऐंह दाईं गदेलवन के पल्स पोलियो क खुराक पिलाइ लियाव। (भैया, इस बार बच्चों को पल्स पोलियो की खुराक पिलवा लाइये!)

नहीं पिला पाये? कोई बात नहीं। अगली बारी, अटल बिहारी।  


Monday, September 15, 2008

शुगर फ्री सच की दरकार


सच बोलो; मीठा बोलो।

बहुत सच बोला जाना लगा है। उदात्त सोच के लोग हैं। सच ठेले दे रहे हैं। वही सच दे रहे हैं जो उन्हें प्रिय हो। खूब मीठे की सरिता बह रही है। करुणा भी है तो मधु युक्त। डायबिटीज बढ़ती जा रही है देश में।

sugarfreegold
शुगर फ्री
ज्यादा बुद्धिवादी सच ठिला तो सारा देश डायबिटिक हो जायेगा। कड़वा बोला नहीं जा सकता। कड़वा माने आरएसएस ब्राण्ड मिर्च। लिहाजा शुगर फ्री सच की दरकार है।

हेहेहेहे करो। प्रशस्तिगायन करो बुद्धिमानी का। फट रहे हों सीरियल बम, पर सिमी का रोल क्वेश्चन न करो। कडुआहट न घोलो गंगी-जमुनी संस्कृति में। मत पूछो यह संस्कृति क्या है?!

Equalकौन है ये माणस जो आजमगढ़ से "निर्दोष" लोगों को पकड़ कर ले जा रहा है गुजरात, हवाई जहाज में? रोको भाई। ऐसे काम तो देश की हार्मोनी बिगाड़ देंगे। जल्दी लाओ शुगर फ्री का कंसाइनमेण्ट।

कोई पैसा नहीं आ रहा तेल का इन पुनीत कर्मों में। कोई फर्जी नोटों की पम्पिंग नहीं हो रही। हो भी रही है तो नगण्य। और कौन कर रहा है - क्या प्रमाण है? बस, आतंक का भूत बना कर प्रजातंत्र की मिठास कम करने का प्रयास हो रहा है

यह कौन अधम है जो अप्रिय बात कह अनवैरीफाइड पोटेन्सी की मिर्च झोंक रहा है भद्रजनों की आंखों में। जानता नहीं कि वे डायबिटीज के साथ साथ मायोपिया से भी पीड़ित हैं। चेहरे देखने से लगता है कि कोष्ठबद्धता भी है। इन साभ्रान्तों को शुगर फ्री की मिठास चाहिये। ईसबगोल की टेलीफोन ब्राण्ड पुड़िया या नेचर क्योर भी हैण्डी होनी चाहिये।

और यह कौन है जो लॉजिक, क्रूर रुक्षता और कड़वाहट ठेलने में रम रहा है। क्या ठेलने का यत्न कर रहा है यह, कैसी है इसकी प्रतिबद्धता! शुगरफ्री आधुनिक मकरध्वज (आयुर्वेदिक अमृत) है। शुगर फ्री वाला सच बांटो भाई। देसी लोगों में बांटना हो तो शुगर फ्री युक्त पंजीरी बांटो। राब-चोटा-गुड़-शक्कर के (अ)स्वास्थ्यकर और आमतौर पर जीभ पर चढ़े स्वाद से जनता को मुक्ति दिलाओ भाई! 

माना कि मधु है तो मधुमेह है। पर शुगर फ्री से रिप्लेस कर लो न!


cactus अनूप शुक्ल मेरे विषय में कहते हैं - ढाक के तीन पात। अरे ढाक के तीन पात को कबके पीतवर्ण हो कर भूंजे की भरसाइ में जा चुके। अब जो है उसे अन्य शब्द दें। चाहे तो कहें तीन शाख वाला कैक्टाई (नागफनी)!

Wednesday, June 18, 2008

चलो बुलावा आया है, जंगल ने बुलाया है!


Plants 1 "पास के जंगल मे चमकने वाले पौधे का पता चला है। आप जल्दी आ जाइये।" ज्यों ही बरसात का मौसम आरम्भ होता है प्रदेश भर से ऐसे फोन आने शुरु हो जाते हैं। फोन आते ही बिना विलम्ब किराये की गाडी लेकर उस स्थान पर पहुँचना होता है। कभी दो घंटे का सफर होता है तो कभी रात भर का। मैं दस से भी अधिक वर्षो से विचित्र मानी जाने वाली वनस्पतियों की तलाश मे इस तरह भाग-दौड कर रहा हूँ। ज्यादातर मामलो मे निराशा ही हाथ लगती है पर हर यात्रा से नया सीखने को मिलता है।

Wednesday, May 28, 2008

"भगवान की बुढ़िया" खतम होने के कगार पर


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बीरबहूटी, रेड वेलवेट माइट या भगवान जी की बुढ़िया

ग्रामीण परिवेश से जुडे पाठको ने तो चित्र देखकर ही इसे पहचान लिया होगा पर शहरी पाठकों के लिये इस जीव को जान पाना मुश्किल है। अभी जैसे ही मानसूनी फुहार आरम्भ होगी नदियों के आस-पास नरम मिट्टी मे लाल मखमली चादर फैल जायेगी। असंख्य छोटे-छोटे जीव जमीन के अन्दर से प्रगट हो जायेंगे। आमतौर पर इस जीव को बीरबहूटी कहा जाता है। इसे रेन इंसेक्ट भी कहा जाता है। तकनीकी रुप से इंसेक्ट या कीट कहलाने के लिये छै पैरो का होना जरुरी है। इसके आठ पैर होते है इसलिये इसे मकोडा या माइट कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम रेड वेलवेट माइट है। मध्य भारत मे इसे रानी कीड़ा कहा जाता है। बच्चो का यह पसन्दीदा जीव है। वे इसे एकत्रकर डिबियो मे रख लेते हैं फिर उससे खेलते हैं। इसे छूने पर आत्म रक्षा मे यह पैरो को सिकोड लेता है। बच्चे पैर सिकोड़े जीवो को एक घेरे मे रख देते हैं और फिर उनके बीच प्रतियोगिता करवाते हैं। जो पहले पैर बाहर निकालकर भागता है उसे विजेता माना जाता है और उसके मालिक बच्चे को भी यही खिताब मिलता है।

Wednesday, May 21, 2008

मच्छरों से बचाव में प्रभावी वनस्पतियां


आज की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया मच्छरों से बचाव के लिये अनेक जैविक विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं। ये जैविक विकल्प बहुत आकर्षक लगते हैं। मुझे अपनी ओर से कुछ जोड़ना हो तो बस यही कि आदमी सफाई पसन्द बने तथा पानी को आस-पास सड़ने न दे। बाकी आप अवधिया जी का लेख पढ़ें।   

Wednesday, May 7, 2008

वनस्पतियों के सामरिक महत्व की सम्भवनायें


यह है पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट। और यह पढ़कर मुझे लगा कि वनस्पति जगत तिलस्म से कमतर नहीं है! जरा आप पढ़ कर तो देखें।

पंकज जी की पहले की पोस्टों के लिये पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक करें।

Wednesday, April 30, 2008

हृदय रोगों की चिकित्सा में फूलों का प्रयोग


panj_image श्री पंकज अवधिया का बुधवासरीय अतिथि लेख। फूल और तनाव दूर करने को मैं जोड़ कर देखता था। पर यहां फूल और हृदय रोगों की चिकित्सा को जोड़ रहे हैं अवधिया जी। पिछले सप्ताह एक विवाद (वाकई?) बना था लेख का शीर्षक देने के विषय में। लेख के शीर्षक देने का काम अवधिया जी मुझ पर ही छोड़ देते हैं। पर शीर्षक का क्या; यह मान लें कि एक असामाजिक ब्लॉगर शीर्षक में तो अपना न्यून कोण ही दर्शायेगा!

आप तो लेख पढ़ें:

Wednesday, April 23, 2008

विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये


मैने हैं कहीं बोधिसत्त्व में बात की थी वन के पशु-पक्षियों पर करुणा के विषय में। श्री पंकज अवधिया अपनी बुधवासरीय पोस्ट में आज बात कर रहे हैं लगभग उसी प्रकार की सोच वृक्षों के विषय में रखने के लिये। इसमें एक तर्क और भी है - वृक्ष कितने कीमती हैं। उन्हे बचाने के लिये निश्चय ही कुछ सार्थक किया जाना चाहिये। आप पोस्ट पढ़ें:



पारम्परिक चिकित्सा मे विभिन्न पेड़ों की छालों का उपयोग किया जाता है। छालों का एकत्रण पेड़ों के लिये अभिशाप बन जाता है। धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं और अंतत: उनकी मृत्यु हो जाती है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस बात को जानते हैं। उन्हे पता है कि पुराने पेड़ दिव्य औषधीय गुणो से युक्त होते है और उन्हे खोना बहुत बडी क्षति है। इसलिये जब छाल का एकत्रण करना होता है तो वे अलग-अलग पेड़ों से थोडी-थोडी मात्रा मे छाल का एकत्रण करते हैं। इसे आज की वैज्ञानिक भाषा मे रोटेशनल हार्वेस्टिंग कहते है।

पर जब पेड़ विशेष की छाल एकत्र करनी होती है और वे पेड़ कम संख्या मे होते हैं तो वे एक विशेष प्रक्रिया अपनाते हैं। वे इन्हे उपचारित करते हैं। उपचार पन्द्रह दिन पहले से शुरु होता है। दसों वनस्पतियो को एकत्रकर घोल बनाया जाता है और फिर इससे पेड़ों को सींचा जाता है। इस सिंचाई का उद्देश्य पेड़ों को चोट सहने के लिये तैयार करना है। रोज उनकी पूजा की जाती है और कहा जाता है कि अमुक दिन हम एकत्रण के लिये आयेंगे, छाल को दिव्य गुणों से परिपूर्ण कर देना।

साथ ही हमे इस कार्य के लिये क्षमा करना। फिर एकत्रण वाले दिन अलग घोल से सिंचाई की जाती है। एकत्रण के बाद भी एक सप्ताह तक चोटग्रस्त भागों पर तीसरे प्रकार के घोल को डाला जाता है ताकि चोट ठीक हो जाये। यह प्रक्रिया अलग-अलग पेड़ों के लिये अलग-अलग है और हमारे देश मे इस विषय मे वृहत ज्ञान उपलब्ध है। क्या इस अनोखे पारम्परिक ज्ञान का आधुनिक मनुष्य के लिये कोई उपयोग है? इसका जवाब है- हाँ।


आधुनिक विकास पुराने वृक्षो के लिये अभिशाप बना हुआ है। हमारे योजनाकार पेड़ों की कीमत कुछ सौ रुपये लगाते हैं। जबकि एक पेड़ की असली कीमत लाखों में है।


सडकों या नये भवनो के निर्माण में बाधक बनने वाले पेड़ों को बेहरमी से काट दिया जाता है। चिपको आन्दोलन का पाठ पढने के बाद भी कोई सामने नही आता। कुछ अखबार इस पर लिखते भी हैं पर फिर भी ज्यादा फर्क नही पड़ता। पुराने वृक्ष सघन बस्तियों के लिये फेफड़ो का काम करते हैं और इनका बचा रहना जरुरी है। पर यदि इन्हे हटाना ही है तो फिर इन्हे जीने का एक और मौका दिया जाना चाहिये। यह असम्भव लगता है पर वर्षो पुराने वृक्षों को एक स्थान से उखाडकर दूसरे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया जा सकता है। यह दूरी कुछ मीटर से लेकर दसों

किलोमीटर तक की हो सकती है।


जिस पारम्परिक ज्ञान की बात हमने ऊपर की है उसके उपयोग से पुराने वृक्षो को जीवित रखा जा सकता है। उन्हे चोट से उबरने मे मदद की जा सकती है। विदर्भ मे कुछ प्रयोग हम लोगो ने किये पर चूँकि पारम्परिक चिकित्सक हमारे साथ नहीं थे इसलिये सफलता का प्रतिशत बहुत कम रहा। आमतौर पर पीपल और बरगद के पेड़ों को ही हटाना होता है। इस विषय मे पारम्परिक चिकित्सक गहरा ज्ञान रखते है और अपनी सेवाएं देने को तैयार है। उनके साथ मिलकर प्रयोग किये जा सकते हैं और मानक विधि विकसित की जा सकती है। इससे देश भर मे उन पुराने पेड़ो को बचाया जा सकेगा जो आधुनिक विकास के लिये तथाकथित बाधा बन रहे हैं।


मैने इस पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है। तीन सौ से अधिक वृक्ष प्रजातियो के विषय मे जानकारी एकत्र की जा चुकी है। पर जमीनी स्तर पर सफलता के लिये सभी को मिलकर काम करने की जरुरत है।


पंकज अवधिया

© इस पोस्ट पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


पिछले गुरुवार को अवधिया जी पर जंगल में फोटो खींचते समय मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। बावजूद इसके, उन्होने समय पर अपना लेख भेज दिया। उनकी हिम्मत और लगन की दाद देनी चाहिये।

Wednesday, March 5, 2008

तनाव और किडनी के रोगों में उपयोगी चटनियां


पंकज अवधिया जी ने बिल्कुल समय पर अपना आलेख भेज दिया। और मुझे लगा कि यह मुझे ध्यान में रख कर लिखा है उन्होंने। तनाव से मुक्ति कौन नहीं चाहता? और मैं तो इस समय कार्य-परिवर्तन के तनाव से गुजर ही रहा हूं। मैं अपने दफ्तर से १४ किलोमीटर दूर रहता हूं। अगर दफ्तर के पास रेलवे की अपनी संचार सुविधाओं से लैस होता तो शायद तनाव कुछ कम होता। पर बहुत सी चीजें हैं, जिन पर आपका अपना बस नहीं होता।


खैर मेरी छोड़ें, पंकज जी की पोस्ट पढ़ें। वे दो महत्वपूर्ण वनस्पतियों की बात कर रहे हैं जो तनाव और किड़नी में होने वाली पथरी की दशा में लाभप्रद हैं। आप उनकी पहले की पोस्टें पंकज अवधिया पर लेबल सर्च कर देख सकते हैं।


यह कहना गलत नही होगा कि हममे से ज्यादातर लोग तनाव में जी रहे हैं। क्या सचमुच तनाव इतने बढ गये हैं? या हमारी सहन शक्ति कम हो गयी है? क्या नींद का कम होना तनाव का कारण है या तनाव का अधिक होना कम नींद का? कारण जो भी हो पर अब ऐसी वनस्पतियो को अपनी दिनचर्या मे शामिल करना आवश्यक हो गया है जो कि हमारी क्षमता को इतना बढ़ा दें कि हर तरह की तकलीफ हम सहन कर लें।

 

Brahmi plant पिछले दिनो मै पारम्परिक चिकित्सको से इसी विषय पर चर्चा कर रहा था (चित्र इण्टरनेट से फ्री डोमेन सर्च से लिया गया »»»)। वे ब्राम्ही नामक जानी-पहचानी वनस्पति के प्रयोग के पक्षधर दिखे। इसे न तो दवा के रूप मे सुखाकर खाने की जरुरत है, न ही अन्य वनौषधियों के साथ मिलाकर। वे कहते हैं कि इसे आप अपने बागीचे मे स्थान दें। वह स्थान जहाँ पानी भरा रहता है या दलदली है ब्राम्ही के पौधे लगा दें। इसे गमले मे भी लगा सकते हैं। अधिक पानी देने से यह तुलसी और गुलाब के पौधो की तरह नाराज नही होगा। फिर खाने से पहले इसकी पत्तियो से चटनी बनाये और स्वादानुसार नमक वगैरह डालकर खाने के साथ खायें। चाहें तो इसे रोज खायी जाने वाली चटनी के साथ भी मिलाया जा सकता है। मुझे याद आता है कि कुछ वर्षों पहले मै कोलकाता मे अल्मोडा की एक महिला फिल्मकार से मिला था। उन्हे नर्वस सिस्टम से सम्बन्धित बीमारी थी। सब दवा कर जब हार गयीं तो पारम्परिक चिकित्सको की सलाह पर उन्होने इस चटनी को अपनाया। पहले एक गमले मे इसे लगाया और फिर तो दूसरे पौधो के लिये गमले नही बचे। दिन के खाने मे हमे भी इसकी स्वादिष्ट चटनी परोसी गयी। मैने महसूस किया है कि अच्छी नींद और दिमाग को राहत देने के लिये यह बडी कारगर है। बाकी तो इसके बहुत सारे लाभ है।

 

***


क्या आप यह महसूस करते है कि आजकल पथरी के मरीज कुछ ज्यादा ही बढ़ गये हैं। किडनी से सम्बन्धित बीमारियाँ अब आम हो रही हैं। इनमे से कई बीमारियो का तो कोई इलाज उपलब्ध नही है और मरीजों को यूँ ही मरने छोड दिया जाता है। क्राँनिक रीनल फेल्योर ऐसी ही बीमारी है। मै ऐसे दसों मरीजो को जानता हूँ जो डायलीसिस के सहारे जिन्दा हैं। पारम्परिक चिकित्सकों की माने तो वे शरीर के अन्य अंगो की तरह शुरु से किडनी की भी देखभाल की बात करते हैं। बहुत सी वनस्पतियाँ हैं हमारे आस-पास जो किडनी को सुचारु ढंग़ से काम करने मे मदद करती हैं। इन्हे भोजन मे शामिल करने की जरुरत है। इनमे से एक है पानफूटी जिसे हम ब्रायोफिलम या पत्थरचटा के नाम से भी जानते हैं। इसे उद्यानों मे लगाया जाता है। आप इसकी माँसल पत्तियो से इसे आसानी से पहचान सकते हैं। पत्तियों ही से नये पौधे तैयार हो जाते हैं। माँसल पत्तियों को चटनी के रुप मे खाना है। चिकित्सा साहित्यों मे पथरी के उपचार मे इसके प्रयोग की बात कही गयी है, पर पारम्परिक चिकित्सक इस जानकारी को अधूरी मानते हैं। वे किडनी के लिये इसे सम्पूर्ण वनस्पति मानते हैं। वे साल के किसी भी तीन महिने में इसके प्रयोग की सलाह देते हैं।

 

मुझसे पाठक अक्सर प्रश्न करते हैं कि आपके लेखो मे वर्णित वनस्पतियाँ कहाँ मिलेंगी? इसका आसान सा जवाब है आपके आस-पास। आप शहर से निकलकर गाँवो मे जायें और लोगो से पूछें तो वे आपको इसकी जानकारी देंगे। यदि आप अपने क्षेत्र का नाम बतायेंगे तो मै वहाँ वनस्पतियो को स्थानीय भाषा मे क्या बोला जाता है, यह बता दूंगा। ये स्थानीय नाम हर कोस में बदल जाते हैं। और अधिक जानकारी के लिये आप मुझे इसकी फोटो भेज सकते हैं। अब तो सब कुछ आसान हो गया है। आप अपने क्षेत्र के वनस्पति विशेषज्ञों से भी मिल सकते है। यह बात सभी क्षेत्रो के लिये लागू होती है। यहाँ तक कि मुम्बई की बोरीवली पहाड़ियों और करज़त के इलाको से मैने वनस्पतियाँ एकत्र की हैं। पिछले वर्ष मुझे सुबह के भ्रमण के दौरान आरे मिल्क कालोनी में कई दुर्लभ वनस्पतियाँ दिखीं। मुम्बई के इतने सन्दर्भ इसलिये दे रहा हूं, क्योकि ज्यादातर सन्देश ऐसे ही महानगरों से आते हैं।

 

इस लेख मे मै 15 प्रकार की चटनियों के विषय मे लिखना चाहता था पर यह लम्बा होता जा रहा है। मै आगे इस पर लिखता रहूंगा।



मेरे इस विषय से सम्बन्धित कुछ लिंक:

 

ब्राम्ही पर शोध आलेख

 

पानफूटी पर शोध आलेख

 

चटनी पर शोध आलेख

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


(अपडेट सवेरे सात बजे)

आज सवेरे की सैर के दौरान पाया कि नारायणी आश्रम के खेतों में गेहूं की फसल में बालियां लग गयी हैं। फसल अच्छी है और उसके बीच बीच में एक दो सरसों के पौधे भी हैं जिनमें पीले फूल लगे हैं। सवेरे सवेरे यह देखना बहुत मन भाया। आप मोबाइल से लिया खेत का चित्र देखें। मार्च का महीना होने पर भी हल्का कोहरा है! 



Wednesday, February 27, 2008

आम, आम नहीं, बहुत खास है!


आज पंकज जी अपनी अतिथि पोस्ट में आम के विषय में अनजाने तथ्यों पर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। आप आम के खास औषधीय गुणों के विषय में इस लेख के माध्यम से जान पायेंगे।
आप पढ़ें श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट। उनकी पहले की पोस्टें आप "पंकज अवधिया" लेबल/वर्ग पर क्लिक कर देख सकते हैं।
कृपया पोस्ट पढ़ें:

अब आम बौराने लगे हैं। आम के वृक्ष बचपन ही से हम सब के जीवन से जुडे रहे हैं। बचपन मे एक पुस्तक मे पढ़ा था कि आम की बौर के उचित उपयोग से एक अनोखा कार्य किया जा सकता है। पुस्तक मे लिखा था कि आम की बौर को लगातार हथेली मे रगडने के बाद जब आप किसी व्यक्ति के दर्द वाले भाग पर इसे रखेंगे तो उसे सुकून प्राप्त होगा। पुराने जमाने की कहानियों मे यह वर्णन मिलता है कि साधु ने जैसे ही दर्द वाले भाग को छुआ, दर्द गायब हो गया। यह दरअसल आम का बौर को रगडने के कारण हुआ होगा। बाद मे जब मैने वानस्पतिक सर्वेक्षण आरम्भ किये तो पारम्परिक चिकित्सकों ने यह बात दोहरायी। बौर को रोज सुबह आधे घंटे तक हथेली पर मलना होता है। एक सप्ताह मे ही ये गुण आ जाते हैं। अधिक समय तक ऐसा करने से अपने ही शरीर को लाभ होने लगता है। इस प्रयोग के दौरान मिट्टी ही से हाथ धोने की सलाह दी जाती है। शहरों मे रह कर हाथ को तेज रसायनो से बचा पाना सम्भव नही लगता है। आज भी सोंढूर-पैरी-महानदी पारम्परिक चिकित्सक इसे अपनाते हैं और रोगियों को आराम पहुँचाते हैं।

चिकित्सा से सम्बन्धित प्राचीन ग्रंथ बताते है कि आम की सूखी पत्तियो को जलाने से पैदा हुआ धुँआ कई रोगो मे लाभ पहुँचाता है। कुछ वर्षो पहले जब मैने एक उद्यमी के लिये कई तरह की हर्बल सिगरेट तैयार की तो बवासिर (पाइल्स) के लिये उपयोगी सिगरेट मे अन्य वनस्पतियो के साथ आम की पत्तियो को भी मिलाया। यह हर्बल सिगरेट बवासिर मे राहत पहुँचाती है। अब उद्यमी इसका वैज्ञानिक परीक्षण कराने की तैयारी कर रहे हैं ताकि इसे उत्पाद के रूप मे बाजार में ला सकें। मैने कोशिश की कि शायद इसे पीकर सामान्य सिगरेट पीने वाले भी यह बुरी आदत छोड पायें पर सफल नही हुआ।

आम की छाँव तेज गरमी मे राहत पहुँचाती है। स्त्री रोगों की चिकित्सा मे महारत रखने वाले पारम्परिक चिकित्सक सुबह के समय इसकी छाँव मे बैठने की सलाह रोगियों को देते हैं। उनके अनुसार इसे रोगियों को अपनी दिनचर्या मे शामिल कर लेना चाहिये।

यदि आपने आम के पेड़ को ध्यान से देखा होगा तो आपने तनों पर गाँठ भी देखी होगी। पारम्परिक चिकित्सक इन गाँठो के प्रयोग से तेल बनाते हैं। यह तेल गठिया के रोगियों के लिये बहुत उपयोगी होता है। पारम्परिक चिकित्सकों से यह तेल लेकर मैने अपने मित्रो और परिवारजनों को दिया है।

आम के फल के विषय मे तो अक्सर लिखा जाता है। इसलिये मैने उन भागों के विषय मे इस लेख मे लिखने की कोशिश की जिनके उपयोगो के विषय मे आप कम जानते है। आम के जिन वृक्षो के विषय मे प्राचीन ग्रंथो मे लिखा है वे वृक्ष तो तेजी से कम होते जा रहे हैं। अब अधिक उत्पादन देने वाले बडे और स्वादिष्ट फलो से लदे वृक्ष सभी अपने आस-पास देखना चाहते है। क्या इन नयी जातियो मे भी वे ही औषधीय गुण हैं? बहुत से विषय विशेषज्ञ कह सकते है कि हाँ, बिल्कुल हैं पर वे अपने पक्ष मे वैज्ञानिक दस्तावेज नहीं प्रस्तुत कर पायेंगे क्योकि आम के औषधीय गुणों पर केन्द्रित विशेषकर इसके फल के अलावा अन्य भागों पर कम शोध हुये हैं। यदि यही प्रश्न पारम्परिक चिकित्सकों से पूछें तो वे साफ कहेंगे कि दवा के लिये पुराने देशी वृक्ष ही उपयोगी हैं। इस नजरिये से आज यह जरुरी हो गया है कि पुराने वृक्षों के अलावा पुराने बागीचों को भी बचाना जरुरी है। साथ ही आम के औषधीय गुणों के विषय मे जानकारी रखने वाले पारम्परिक और आधुनिक विशेषज्ञ मिलकर औषधीय गुणो मे धनी किस्मे विकसित करने का प्रयास करें।

प्रस्तुत चित्र हैदराबाद के खास सफेद आम के पेड का हैं। कहते है कि वहाँ के निजाम इसे पहरे मे रखते थे ताकि कोई फल न चुरा ले। आम पूरी तरह से सफेद होता है अन्दर भी बाहर भी पर स्वाद लाजवाब होता है। दिसम्बर 2007 मे डेक्कन डेव्हलपमेंट सोसायटी के आमंत्रण पर मै पास्तापुर गया था। यह पेड उन्ही के बागीचे मे लगा है। यह तस्वीर आप ज्ञान जी के ब्लाग पर ही देख पायेंगे।

आम पर लिखे मेरे शोध आलेखों की सूची का लिंक

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


कल मैं इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर श्रीमती और श्री समीर लाल जी से मिला। लगभग २५ मिनट - उनकी ट्रेन चलने तक। हम लोग प्रत्यक्ष मिल कर अपने लिंक और् मजबूत बना सके। इण्टरनेट के बॉण्ड आमने सामने गले मिल कर बना लिये समीर जी से। उनकी पत्नी जी भी अत्यन्त प्रभावी व्यक्तित्व हैं। दोनो से मिलने पर बहुत प्रसन्नता हुयी। मेरा फोटो तो बिना फ्लैश के मोबाइल कैमरे का है। ट्रेन के अन्दर कम रोशनी में। अच्छा फोटो तो श्रीमती लाल ने खींचा है जो समीर जी दिखा सकते हैं।
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कल अरविंद मिश्र जी ने यह आशंका व्यक्त की कि मेरा ब्लॉगिंग कम करना विभागीय अन्तर्विरोध का परिणाम न हो। वास्तव में न यह विभागीय अन्तर्विरोध है, न ब्लॉगीय। कल समीर जी से स्टेशन पर मिल कर आने के बाद जब मेरा पद परिवर्तन हुआ, तबसे मैं यह सोचने में लगा हूं कि अपना समय प्रबंधन कैसे किया जाये। अभी स्पष्टता नहीं है। ब्लॉग से आमदनी का टार्गेट तो मेरा बहुत मॉडेस्ट है - अगले ८-१० साल में लगभग सौ डॉलर आजकी रेट से महीने में कमा सकना, जिससे कि ब्लॉगिन्ग अपने में सेल्फ सस्टेनिंग हो सके। लेकिन पैसा कमाना प्रमुखता कतई नहीं रखता। कतई नहीं। हां, अरविन्द मिश्र जी की उलाहना भरी टिप्पणी बहुत अपनी लगी। वास्तव में सभी टिप्पणियां अपनत्व से भरी लगीं। क्या जादू हो गया है यह सम्बन्धों के रसायन में!

हां इस सप्ताह न लिख पाऊंगा, टिप्पणयां भी शायद ही दे पाऊं। नियमित ब्लॉग पढ़ने का यत्न अवश्य करूंगा। अगली पोस्ट सोमवार को।

Wednesday, February 20, 2008

धान की किस्में और उनसे रोगों की चिकित्सा


श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है यह। आज वे विभिन्न प्रकार के धान की किस्मों के औषधीय गुणों के विषय में एक विहंगम दृष्टि प्रस्तुत कर रहे हैं। आप उनके पहले के लेख पंकज अवधिया वर्ग सर्च के द्वारा इस ब्लॉग पर देख सकते हैं।


Paddy आप कौन सा चावल खाते हैं ? यदि आपसे यह पूछा जाये तो आप झट से बोलेंगे कि बासमती चावल। आप ज्यादा आधुनिक होंगे तो उसमे जोड देंगे कि हम आर्गेनिक चावल खाते हैं । पर क्या आपने कभी मेडीसिनल राइस (औषधीय धान) खाया है? तो आप चौंक पडेंगे। हमारे देश के उन क्षेत्रों मे जहाँ धान की उत्पत्ति हुयी है आज भी सैकड़ों किस्म के औषधीय धान किसानों के पास हैं। बहुत से पारम्परिक चिकित्सक आज भी साधारण और जटिल दोनो ही प्रकार के रोगों की चिकित्सा मे इसका प्रयोग कर रहे हैं। समुचित प्रचार-प्रसार के अभाव मे सारा देश बासमती को ही सब कुछ मान बैठा है।

देश के पारम्परिक चिकित्सक वात रोगों से प्रभावित रोगियो को गठुवन नामक औषधीय धान के उपयोग की सलाह देते हैं । वे कहते हैं कि जिन क्षेत्रों मे पहले इसे खाया जाता था वहाँ इस रोग का नामो-निशान नहीं था। श्वाँस रोगो की चिकित्सा मे सहायक उपचार के रूप मे रोगी को नागकेसर नामक औषधीय धान प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। आम तौर पर गरम भात के साथ जंगली हल्दी चूर्ण के रूप मे खाने को कहा जाता है।


करहनी नामक औषधीय धान का प्रयोग लकवा (पैरालीसिस) के रोगियो के लिये हितकर माना जाता है। नवजात शिशुओ को लाइचा नामक रोग से बचाने के लिये लाइचा नामक औषधीय धान के प्रयोग की सलाह माताओं को दी जाती है। इसी तरह नवजात शिशुओं मे छोटे फोड़ों को ठीक करने के लिये माताओ को आलचा

नामक औषधीय धान के उपयोग की राय दी जाती है।


प्रसव के बाद नयी ऊर्जा के लिये महराजी नामक धान माताओं के लिये उपयोगी होता है। आपको तो पता ही है कि मै इन दिनों मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ और एक विस्तृत रपट तैयार कर रहा हूँ। इस रपट में मैने एक अध्याय औषधीय धान पर रखा है। इसमे कंठी बाँको और उडन पखेरु जैसे नाना प्रकार के औषधीय धानों के मधुमेह मे प्रयोग की विधियाँ समझायी गयी हैं कैसर और हृदय रोगों पर आधारित रपटो में भी इ पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है।


चावल के अलावा धान के पौधो मे अन्य भागो मे भी औषधीय गुण होते हैं कालीमूंछ नामक औषधीय धान के पूरे पौधे से तैयार किया गया सत्व त्वचा रोगों को ठीक करता है। बायसूर नामक औषधीय धान की भूसी को जलाकर धुंए को सूंघने से माइग्रेन मे लाभ होता है।


पशु चिकित्सा मे भी औषधीय धान का प्रयोग देहाती इलाको मे होता है। गाय के जरायु (प्लेसेंटा) को बाहर निकलने से रोकने के लिये प्रसव के बाद अलसी और गु के साथ भेजरी नामक औषधीय धान खिलाया जाता है।


प्राचीन भारतीय चिकित्सा ग्रंथो मे साठिया नामक औषधीय धान का वर्णन मिलता है। साठिया माने साठ दिन मे पकने वाला धान। पूरे देश मे साठ दिन में पकने वाली बहुत सी औषधीय धान की किस्में है पर सही नाम न लिखे होने के कारण ग्रंथो पर आधारित चिकित्सा करने वाले विशेषज्ञो को परेशानी होती है। मैने अपने वानस्पतिक सर्वेक्षण के आधार पर जिन औषधीय धानों के विषय मे लिखा है उनका वर्णन प्राचीन चिकित्सा ग्रंथो मे नही मिलता है।


मैने औषधीय धान पर बहुत कुछ लिखा है और सम्भवत: विश्व मे इस पर सबसे अधिक शोध आलेख मैंने ही प्रकाशित किये हैं । पर अभी भी बहुत कुछ लिखना बाकी है। सबसे जरुरी तो यह है कि औषधीय धान को संरक्षित करने के कार्य शुरु हों और इसके विषय मे जानकारी रखने वालों को सम्मानित कर उनसे इन्हे बचाने के गुर सीखे जायें । आज रा सायनिक खेती के युग में हम चावल का स्वाद भूल चुके हैं । हमे पतले और सुगन्ध वाले चावल चाहियें , भले ही उसमे बिल्कुल भी औषधीय गुण न हों । आपने कभी अपने आप से पूछा है कि क्यो आपने चावल के लिये ऐसा नजरिया बना लिया है?


इतनी मूल्यवान निधि के होते हुये क्यों धान उत्पादक क्षेत्रो के किसान दुखी है? क्यों उनकी नयी पीढी पलायन के लिये मजबूर है? यह समझ से परे है। योजनाकारों को पहल कर अब औषधीय धान के विषय मे भी विचार-मंथन करना चाहिये।


औषधीय धान पर मेरे शोध आलेखो की कड़ियां:

1. गूगल सर्च की कडियां

2. ईकोपोर्ट की कड़ियां - 1

3. ईकोपोर्ट की कड़ियां – 2


पंकज अवधिया

© इस पोस्ट का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


श्री अवधिया निश्चय ही बहुत अच्छे समय प्रबंधक होंगे। बहुत समय से बहुत सुस्पष्ट तरीके से अपने लेख मुझे मेल कर देते हैं। मुझे बस उनकी पोस्ट पर लगाने के लिये चित्रों के विषय में यत्न करना होता है। फ्री डोमेन के क्लिपार्ट या चित्रों का प्रयोग अथवा स्वयम के कैमरे पर निर्भरता उनकी सतत दी गयी सज्जन सलाह का ही परिणाम है। मैं अपने व्यक्तित्व में कई सकारात्मक परिवर्तनों का श्रेय उन्हें दूंगा।
(चित्र - घर में उगा एक छोटा सा फूल!)

Wednesday, February 13, 2008

पत्तलों के औषधीय गुण

 


यह श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है - विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के पत्तलों में भोजन करने के लाभ के विषय में। पढ़ने के लिये आप सीधे पोस्ट पर जायें। यदि आप उनके पहले के लेख पढ़ना चाहें तो कृपया पंकज अवधिया वर्ग पर क्लिक करें।


  कुछ वर्षो पूर्व मैं कोलकाता से आये एक धन्ना सेठ के मन्दबुद्धि बालक के साथ पारम्परिक चिकित्सकों से मिलने गया। पारम्परिक चिकित्सकों ने पूरी जाँच के बाद दवाए दीं और साथ ही कहा कि हर रविवार को पीपल के पत्तो से तैयार पत्तल मे खाना परोसा जाये। सबसे पहले गरम भात परोसा जाये और बालक उसे खाये। पीपल के पुराने वृक्ष से पत्तियाँ एकत्र करने को कहा गया। यह भी हिदायत दी गयी कि तालाबों के पास उग रहे पीपल से पत्तियाँ न लें। हर सप्ताह ताजी पत्तियो से बने पत्तल के उपयोग की बात कही गयी। बाद मे पारम्परिक चिकित्सको ने बताया कि पुराने रोग में वे इस प्रयोग को सहायक उपचार के रूप मे उपयोग करते हैं जबकि नये रोग में यह मुख्य उपचार के रूप मे उपयोग होता है।

 

आम तौर पर केले की पत्तियो मे खाना परोसा जाता है। प्राचीन ग्रंथों मे केले की पत्तियो पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है। आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले की पत्तियो का यह प्रयोग होने लगा है। हाल ही मे मुम्बई के एक सात सितारा होटल मालिक के आमंत्रण पर मै वहाँ ठहरा। उन्होने बताया कि वे केला अपने फार्म मे उगाते हैं। सुबह-सुबह जब मै फार्म पहुँचा तो कर्मचारी कीटनाशक का छिडकाव कर रहे थे। मै दंग रह गया। इन्ही पत्तियो को कुछ दिनो मे भोजन परोसने के लिये उपयोग किया जाना था। मैने आपत्ति दर्ज करायी। आशा के विपरीत उन्होने गल्ती मानी और कीट नियंत्रण के लिये जैविक उपाय अपनाने का वचन दिया।

 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश मे 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय मे पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है पर मुश्किल से पाँच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या मे करते है। शहरों मे तो लोग सा लों तक पत्तल मे भोजन नही करते हैं।

 

पीपल के अलावा बहुत सी वनस्पतियाँ है जिनसे तैयार पत्तल मे गरम भात खाने से लाभ होता है। रक्त की अशुद्धता   के कारण होने वाली बीमारियों के लिये पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी इसका उपयोग होता है। आम तौर पर लाल फूलो वाले पलाश को हम जानते हैं पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है। इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासिर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है।

 

जोडो के दर्द के लिये करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है। पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना मे अधिक उपयोगी माना जाता है। लकवा (पैरालिसिस) होने पर अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलो को उपयोगी माना जाता है।

 

प्रतिवर्ष माहुल नामक वनस्पति से पत्तल बडे पैमाने पर वनवासियों द्वारा तैयार किये जाते है और फिर बड़ी मात्रा मे इसे दुनियां भर में बेचा जाता है। इस पत्तल की बडी माँग है। मेरा मानना है कि हम इस माँग का सही लाभ नही उठा पा रहे हैं। यदि पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के आधार पर तैयार किये गये पत्तलो को उनके औषधीय गुणों की जानकारी के साथ बाजार मे लाया जाये तो पारम्परिक चिकित्सकों के अलावा वनवासियों को भी सही मायने मे बहुत लाभ मिल पायेगा। इससे देश का पारम्परिक ज्ञान भी बच जायेगा। मैने इस ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है पर अभी भी बहुत कुछ लिखना बाकी है।

 

सम्बन्धित आलेख:

Convert your food into medicine by serving it in Pattal of Indian state Chhattisgarh.

 

पंकज अवधिया

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क्या साहब!!! लोग सिल्वर स्पून ले कर पैदा होते हैं। चांदी-सोने के बर्तन में भोजन करते हैं। छींक आने पर डाक्टर आता है और उसकी सलाह पसन्द न हो तो सेकेण्ड/थर्ड ओपीनियन की भी कवायद होती है। और यह अवधिया जी हैं कि पत्तल में खिलाये बिना मानेंगे नहीं!

यह तो धनी लोगों के खिलाफ साम्यवादी साजिश लगती है। कि नहीं?!

वैसे आप ऊपर अंग्रेजी वाले लेख ले लिंक पर क्लिक कर पढ़ने का जोर लगायें; वहां बहुत जानकारी है।