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Friday, June 12, 2009

बरसात, सांप और सावधानी


snake_simple बरसात का मौसम बस अब दस्तक देने ही वाला है। नाना प्रकार के साँपो के दस्तक देने का समय भी पास आ रहा है। शहरी कालोनियाँ जो खेतो को पाटकर बनी हैं या जंगल से सटे गाँवो में साँप घरो के अन्दर अक्सर आ जाते है। वैसे तो बिलों मे पानी भरने और उमस से बैचेन साँपो का आगमन कहीं भी हो सकता है। मुझे मालूम है कि आम लोगो को इसके बारे मे कितनी भी जानकारी दे दो, कि सभी साँप हानिकारक नही होते, पर फिर भी वे घर मे साँप देखते ही बन्दरो की तरह उछल-कूद करने लगते है। आनन-फानन मे डंडे उठा लेते हैं या बाहर जा रहे व्यक्ति को बुलवाकर साँपो को मार कर ही चैन लेते हैं।

Pankaj A
यह अतिथि पोस्ट श्री पंकज अवधिया की है। पंकज अवधिया जी के कुछ सांप विषयक लेखों के लिंक:

पन्द्रह मे से वे दो नाग जिनके सानिध्य मे हम बैठे थे।

नागिन बेल जिसे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

नागिन बेल के तनो को भी साँप भगाने वाला कहा जाता है।

ये असली नही बल्कि जडो को छिल कर बनाये गये साँप है। इन्हे घर मे रखने के लिये कहा जाता है।

ऐसा काटता है क्रोधित नाग|

दंश के तुरंत बाद|

नाग दंश से अपनी अंगुली खो चुके उडीसा के पारम्परिक चिकित्सक

साँपो पर कुछ शोध आलेख – एक और दो

साँपो पर मेरे कुछ हिन्दी लेख

भारत के कुछ विषैले और विषहीन सर्प

आम लोगो के इस भय का लाभ जडी-बूटी के व्यापारी उठाते हैं। साँप की तरह दिखने वाली बहुत सी वनस्पतियों को यह बताकर बेचा जाता है कि इन्हे घर मे रखने से साँप नही आता है। आम लोग उनकी बातो मे आ जाते हैं। मीडिया भी इस भयादोहन मे साथ होता है। जंगलो से बहुत सी दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ इसी माँग के कारण खत्म होती जा रही हैं। साँप घर मे रखी इन जड़ी-बूटियों के बावजूद मजे से आते हैं। यहाँ तक कि इन्हे साँप के सामने रख दो तो भी वे इनके ऊपर से निकल जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जडी-बूटियाँ व्यर्थ जाती हैं। केवल भयादोहन करके व्यापारी लाभ कमाते हैं।

बरसात के शुरु होते ही कुछ सुरक्षात्मक उपाय अपनाकर आप साँपो के अवाँछित प्रवेश पर अंकुश लगा सकते हैं। उन सम्भावित प्रवेश द्वारों पर जहाँ से साँप के अन्दर आने की सम्भावना है, दिन मे एक बार फिनाइल का पोछा लगा दें। साँप वहाँ फटकेंगे भी नहीं। कैरोसीन का भी प्रयोग लाभकारी है। यदि आपके घर के सामने लान है तो बरसात के दौरान इसे बेतरतीब ढंग से उगने न दें।

यदि साँप विशेषकर नाग जैसे जहरीले साँप आ भी जायें तो अनावश्यक उछल-कूद न मचायें। उन्हे उत्तेजित न करें। आप उनके सामने खूब जोर से बात भले करें पर हिले-डुले नहीं। वह आपको काटने नही आया है। यदि वह फन काढ़ ले तो आप स्थिर रहें। थोडी देर मे वह दुबक कर कोने या आड मे चला जायेगा। फिर उसे बाहर का रास्ता दिखा दें। कमरे मे जिस ओर आप उसे नही जाने देना चाहते हैं उस ओर फिनायल डाल दें। यदि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाये तो आस-पास पडे कपड़े नाग के ऊपर डाल दें। ताकि गुस्से मे दो से तीन बार वह कपडो को डंस ले। ऐसा करने से आप सम्भावित खतरे से बच जायेंगे। आमतौर पर कपडे डालने से वह शांत भी हो जायेगा। कोशिश करें कि आप इस बार एक भी साँप न मारें। साँप को दूर छोडने पर वह फिर वहीं नही आयेगा।

कुछ वर्ष पहले तक दुनियां मे शायद ही कोई व्यक्ति रहा हो जो साँप से मेरी तरह घबराता रहा हो। पिछले साल कुछ घंटो पहले पकड़े गये पन्द्रह से अधिक नागों के बीच एक कमरे मे हम पाँच लोग बैठे रहे। किसी का भी जहर नही निकाला गया था। निकटतम अस्पताल चार घंटे की दूरी पर था। एक पारम्परिक सर्प विशेषज्ञ से हम सर्प प्रबन्धन के गुर सीख रहे थे। हमे हिलने-डुलने से मना किया गया था। हम बोल सकते थे पर हिल नही सकते थे। जरा-सा भी हिलने से साँप हमारी ओर का रुख कर लेते थे। उन्हे खतरा लगता था। जब वे शांत हो गये तो हमारे स्थिर शरीर के ऊपर से होकर कोने मे चले गये। नंगे बदन पर साँपो का चलना सचमुच रोमांचक अनुभव रहा। पर इससे साँपो को समझने का अवसर मिला। फिल्मो में साँपो की जो खलनायकीय छवि बना दी गयी है, वह साँपो की अकाल मौत के लिये काफी हद तक जिम्मेदार है।

पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है। 


Wednesday, May 6, 2009

गाज किसपर गिरेगी?


कुछ समय पहले मै खुडमुडी गाँव के श्री नगेसर से बात कर रहा था। उसे हम लोग बचपन ही से जानते हैं। मेहनत-मजदूरी कर पेट पालने वाला नगेसर अपने गठीले बदन के कारण गाँव मे लोकप्रिय रहा। इस बार वह एकदम बदल गया था। दो साल पहले जब वह बरसात के दिनो मे अपने दो साथियो खेत से लौट रहा था तभी बिजली गिर गयी। उसके दो साथी वहीं पर मर गये। नगेसर को ज्यादा शारीरिक क्षति नही हुयी पर मन से वह पूरी तरह खोखला हो गया।

ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता है। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।
Pankaj A श्री पंकज अवधिया का लेख। आप उनके लेख पंकज अवधिया लेबल सर्च में देख सकते हैं।
शरीर का कुछ भाग काला पड गया। मुझसे उसे जडी-बूटी की उम्मीद थी। मैने उसे परसा (पलाश) की लकडी दी और उसका पानी पीने को कहा। मैने उसे कुछ हर्बल मालाएँ भी दी। मुझे मालूम है कि ये जडी-बूटियाँ उसे बाहर से ठीक कर देंगी लेकिन मन की पीडा को वह आजीवन भोगता रहेगा।

बचपन मे घर के पास एक नीम के पेड़ पर बिजली (गाज) गिरी थी। उस चमक से डरकर मै कुछ समय के लिये बेसुध हो गया था। तब से मुझे आसमानी बिजली के कड़कने के समय बहुत भय लगता है। होम्योपैथी मे फास्फोरिकम नामक दवा के मरीज को तूफानो से बहुत डर लगता है मेरी तरह।

शहरो मे विभिन्न उपाय अपना कर हम आसमानी बिजली से काफी हद तक बच जाते है पर हमारे किसान बरसात मे खुले मे खेतों मे काम करते है। पानी से भरे धान के खेत आसमानी बिजली को आमंत्रित करने मे कोई कसर नही छोडते हैं। हर साल अनगिनत किसान और खेतीहर मजदूर आसमानी बिजली के गिरने से बेमौत मारे जाते हैं। उनके पास सुरक्षा के कोई कारगर उपाय नही है।

Farmer_in_Vietnamइस वियतनामी किसान को देखें। जो सिर पर बांस की छीलन से बनी दउरी पहने है, वह खुमरी सा है। उसके दोनो हाथ काम करने को मुक्त हैं। फोटो विकीमेडिया से

लोहे की डंडी वाले छाते आसमानी बिजली को आमंत्रित कर सकते हैं। पर यह संतोष की बात है कि ज्यादातर किसान अभी भी बाँस से बनी खुमरी (यह लिंक देखें) का प्रयोग करते हैं। खुमरी के कारण उनके दोनो हाथ काम करने के लिये स्वतंत्र होते हैं। किसान पेड़ों की शरण लेते हैं। यह जानते हुये भी कि बरसात के दिनो मे पेड़ों की शरण घातक सिद्ध हो सकती है।

क्या कोई विशेष पेड है जिस पर बिजली ज्यादा गिरती है? आप भले ही इस प्रश्न पर हँसे पर छत्तीसगढ के लोग महुआ, अर्जुन और मुनगा (सहजन) का नाम लेते है। उनका यह अनुभव विज्ञान सम्मत भी है। वैज्ञानिक शोध सन्दर्भ बताते है कि ऐसे बडे पेड़ जिनकी जड़ें भूमिगत जल तक पहुँचती हैं, उन पर बिजली गिरने की सम्भावना अधिक होती है। हमारे यहाँ 50-60 फीट गहरा कुँआ खोदने वाले कुछ तमिलनाडु के लोग हैं। वे उन पेड़ों के पास कुँआ खोदने के लिये तैयार हो जाते है जिन पर बिजली गिरी होती है। ऐसे पेड़ जिनकी मूसला जड़ें अधिक गहरी नही जाती और दूसरी जड़ें सतह के पास फैली होती है बिजली से इंसानो की रक्षा कर सकते है। वैज्ञानिक कहते है कि जड़ों का मकडजाल चार्ज को डिफ्यूज कर देता हैं। इसलिये बिजली से बचने के लिये घर के आस-पास सागौन के पेड लगाने की सलाह दी जाती है।

यदि आप खुली जगह मे हैं तो मौसम खराब होते ही झुककर बैठ जायें। झुककर बैठने का उद्देश्य सतह पर दूसरी चीजो की तुलना मे अपनी ऊँचाई कम करना है ताकि बिजली आप पर गिरने की बजाय ऊँची चीज पर गिरे। फैराडे के किसी नियम के अनुसार बन्द बक्सों मे बिजली नही गिरती है। यही कारण है कि गाड़ियों मे बिजली नही गिरती। पर किसान के लिये झुककर बैठना सम्भव नही है। आखिर वह कब तक बैठा रहेगा। खेतो के पास यदि सस्ते मे बन्द बाक्स बना दिये जाये तो भी किसान अन्दर नही बैठ सकता। यह व्यवहारिक उपाय नही है।

प्राचीन भारतीय ग्रंथ कहते है कि तुलसी की माला बिजली से शरीर की रक्षा करती है। यह भी कि जिस पर बिजली गिरी हो उसे तुलसी की माला पहननी चाहिये। दूसरी बात मुझे सही लगती है। मै ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ। तुलसी की माला पहनने से बिजली नही गिरेगी - इसे आधुनिक विज्ञान की कसौटी मे परखना जरुरी लगता है।

पारम्परिक चिकित्सको के लिये जंगली पेडो पर बिजली गिरना किसी वरदान से कम नही है। जितनी जल्दी हो सके वे प्रभावित पेड तक पहुँचते है और लकडी एकत्र कर लेते है। इस लकडी का प्रयोग असाध्य रोगों की चिकित्सा मे होता है। इस पर आधारित एक लेख आप यहाँ पढ सकते है।

Lightening is beneficial too. By Pankaj Oudhia

ज्ञानदत्त जी के ब्लाग में किसान से जुडी इस महत्वपूर्ण समस्या पर चर्चा का मुख्य उद्देश्य ब्लाग पर आने वाले प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना है। मुझे विश्वास है कि किसानों को आसमानी बिजली के कहर से बचाने के लिये कारगर उपायों पर आपके विचारो से हम किसी ठोस निष्क़र्ष तक जरुर पहुँच पायेंगे। वैसे पारम्परिक चिकित्सक कहते हैं कि किसानो से ज्यादा खतरनाक परिस्थितियो मे खराब मौसम के दौरान बन्दर रहते हैं। पानी से भीगे पेड़ों मे वे मजे से रहते है। क्या कभी बन्दरो को आसमानी बिजली से मरते देखा है या सुना है? बन्दरों के पास समाधान छुपा है। मुझे उनकी बात जँचती है। यहाँ सारा मानव जगत सर्दी से त्रस्त होता रहता है वहीं दूसरी ओर यह वैज्ञानिक सत्य है कि बन्दरो को सर्दी नही होती।

पंकज अवधिया

(इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया के पास है)


Friday, April 24, 2009

गर्मियों की तैयारी पर पंकज अवधिया


Pankaj A
श्री पंकज अवधिया ने पिछली साल पोस्ट लिखी थी - छत पर चूने की परत लगाने के विषय में। अपने उस प्रयोग पर आगे का अपडेट दे रहे हैं इस पोस्ट में। आप पायेंगे कि अनेक वनस्पतियां गर्मियों से राहत देने में प्रयोग की जा सकती हैं। आप पंकज जी के लेख पंकज अवधिया लेबल पर सर्च कर भी देख सकते हैं।
पिछली गर्मियो मे आपने छत मे चूने के प्रयोग के विषय मे पढा था। अब समय आ गया है कि इस विषय मे प्रगति के विषय मे मै आपको बताऊँ।

पिछले वर्ष गर्मियों में यह प्रयोग सफल रहा। पर बरसात मे पूरा चूना पानी के साथ घुलकर बह गया। शायद गोन्द की मात्रा कम हो गयी थी। इस बार फिर से चूना लगाने की तैयारियाँ जब शुरु हुयी तो एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ मित्र ने डरा दिया। आप जानते ही है कि मधुमेह की वैज्ञानिक रपट पर काम चल रहा है। 500 जीबी की आठ बाहरी हार्ड डिस्क कमरे मे रहती है जिनमे से दो कम्प्यूटर से जुडी रहती है। कमरे मे सैकडों डीवीडी भी हैं। एक हजार जीबी के आँकडो से भरे सामान को चूने के हवाले छोडने पर विशेषज्ञ मित्र ने नाराजगी दिखायी। कहा कि रायपुर की गर्मी मे हार्ड डिस्क और डीवीडी दोनो को खतरा है। मन मारकर एक एसी लेना पडा।

mahanadi मेरे कमरे मे एसी होने से काफी ठंडक हो जाती है पर एक मंजिला घर होने के कारण बाकी कमरे बहुत तपते हैं। रात तक धमक रहती है। इस बार नये-पुराने दोनो प्रयोग किये हैं। एक कमरे के ऊपर चूना लगाया है। दूसरे के ऊपर अरहर की फसल के अवशेष जिन्हे काडी कह देते हैं, को बिछाया है। तीसरे के ऊपर चितावर नामक स्थानीय जलीय वनस्पति को बिछाया है। चौथे कमरे मे वन तुलसा को बिछाया है।

वन तुलसा और चितावर दोनो के अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। चितावर का प्रयोग छत्तीसगढ मे आमतौर पर होता है। यह घर को ठंडा रखता है। जहाँ कही भी पानी भरा होता है चितावर अपने आप उग जाता है। लोग मुफ्त की इस वनस्पति को ले आते हैं और साल भर प्रयोग करते हैं। इस वनस्पति के औषधीय उपयोग तो हैं ही साथ ही औद्योगिक इकाईयो से निकलने वाले प्रदूषित जल के उपचार में भी इसका प्रयोग होता है।

वन तुलसा नामक वनस्पति बेकार जमीन मे उगती है खरपतवार के रुप में। छत्तीसगढ के किसानो ने देखा कि जहाँ यह वनस्पति उगती है वहाँ गाजर घास नही उगती है। यदि उग भी जाये तो पौधा जल्दी मर जाता है। माँ प्रकृति के इस प्रयोग से अभिभूत होकर वे अपने खेतों के आस-पास इस वनस्पति की सहायता से गाजर घास के फैलाव पर अंकुश लगाये हुये हैं। अरहर की जगह छत को ठण्डा रखने के लिये इसके प्रयोग का सुझाव किसानो ने ही दिया। उनका सुझाव था कि छत मे इसकी मोटी परत बिछाकर ऊपर से काली मिट्टी की एक परत लगा देने से घर ठंडा रहेगा। एक पशु पालक ने एस्बेस्टस की छत के नीचे रखी गयी गायों को गर्मी से बचाने के लिये कूलर की जगह इसी वनस्पति का प्रयोग किया है। आप चितावर और वन तुलसा के चित्र इन कडियो पर देख सकते है।

चितावर

वन तुलसा

मेरे गाँव के निवासी चितावर का प्रयोग करते रहे हैं। इस बार गाँव मे बन्दरों का अधिक उत्पात होने के कारण अब खपरैल वाले घरों मे टिन की छत लग रही है। टिन के नीचे दिन काटना कठिन है। वे टिन की छत पर चितावर की मोटी परत बिछा रहे है पर बन्दरो का उत्पात किये कराये पर पानी फेर रहा है। गाँव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी है कि सीताफल की कुछ शाखाए यदि चितावर के साथ मिला दी जायें तो बन्दर दूर रहेंगे। आपने शायद यह देखा होगा कि बन्दर सभी प्रकार की वनस्पतियो को नुकसान पहुँचाते हैं पर सीताफल से दूर रहते हैं। इस प्रयोग की प्रगति पर मै आगे लिखूंगा।

शायद यह मन का वहम हो पर इन दिनों जंगल मे धूप मे ज्यादा खडे रहना कम बर्दाश्त होता है। मुझे यह एसी का दुष्प्रभाव लगता है। इसमे माननीय बी.एस.पाबला साहब के सुपुत्र बडी मदद करने वाले हैं। उनकी सहायता से एक हजार जीबी के आँकडो को एक डेटाबेस के रुप मे आन-लाइन करने की योजना पर चर्चा हो रही है। जैसे ही यह आन-लाइन होगा सबसे पहले मै एसी से मुक्त होना चाहूँगा।

पंकज अवधिया

(इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।)


हमने इस साल, पंकज अवधिया जी के पिछली साल के लेख के अनुसार, अपने एक मंजिले मकान की छत पर चूने और फेवीकोल की परत लगाई है। उससे लगता है कि गर्मी कुछ कम है कमरों में।

पंकज जी की उक्त लेख में बताई वनस्पतियों की स्थानीय रूप से उपलब्धता में दिक्कत हो सकती है, पर अगर प्रयोग करने हों तो हर स्थान पर अनेक प्रकार की वनस्पति नजर आती है। यहां कुछ लोगों ने घर की छतों पर लौकी-नेनुआ की बेलें बिछा रखी हैं। वह भी तापक्रम कम करती होगी।   

Wednesday, June 18, 2008

चलो बुलावा आया है, जंगल ने बुलाया है!


Plants 1 "पास के जंगल मे चमकने वाले पौधे का पता चला है। आप जल्दी आ जाइये।" ज्यों ही बरसात का मौसम आरम्भ होता है प्रदेश भर से ऐसे फोन आने शुरु हो जाते हैं। फोन आते ही बिना विलम्ब किराये की गाडी लेकर उस स्थान पर पहुँचना होता है। कभी दो घंटे का सफर होता है तो कभी रात भर का। मैं दस से भी अधिक वर्षो से विचित्र मानी जाने वाली वनस्पतियों की तलाश मे इस तरह भाग-दौड कर रहा हूँ। ज्यादातर मामलो मे निराशा ही हाथ लगती है पर हर यात्रा से नया सीखने को मिलता है।

Wednesday, June 11, 2008

बंदर नहीं बनाते घर - क्या किया जाये?


बन्दरों के उत्पात से परेशान कुछ बड़े किसानों ने बिजली के हल्के झटके वाली बाड लगाने की योजना बनायी। तब वे खुश थे कि जब बन्दर इस पर से कूदेंगे तो उनकी पूँछ बाड़ से टकरायेगी और उन्हे झटका लगेगा। बाड़ लगा दी गयी। कुछ दिनों तक बन्दर झटके खाते रहे पर जल्दी उन्होने नया तरीका निकाला। अब कूदते समय वे हाथ से अपनी पूँछ पकड़ लेते हैं और फिर बिना दिक्कत के बाड़ पार!

Wednesday, June 4, 2008

छत पर चूने की परत - घर रखें ठण्डा ठण्डा कूल कूल


एक मंजिला घर होने और एयर कण्डीशनर से परहेज के चलते हम (पंकज अवधिया उवाच) लोगों को गर्मियो में बडी परेशानी होती है। एक बडा सा कूलर है जो पूरे घर को ठंडा रखने का प्रयास करता है। मई-जून मे तो उसकी हालत भी ढीली हो जाती है। गर्मियो मे अक्सर बिजली गुल हो जाती है। खैर, इस बार चुनावी वर्ष होने के कारण बिजली की समस्या नहीं है। हमारे घर को प्राकृतिक उपायो से ठंडा रखने के लिये समय-समय पर कुछ उपाय अपनाये गये। इसी से सम्बन्धित आज की पोस्ट है।

तुअर, राहर या अरहर की फल्लियों को तोड़ने के बाद बचा हुआ भाग जिसे आम भाषा मे काड़ी कह देते हैं आम तौर पर बेकार पडा रहता है। इस काड़ी को एकत्रकर गाँव से शहर लाकर इसकी मोटी परत छत के ऊपर बिछा देने से काफी हद तक घर ठंडा रहता है। शुरु में जब इसमें नमी रहती है तो कूलर की जरुरत नही पड़ती। पर जून के आरम्भ मे ही इसे हटाना पड़ता है। अन्यथा छिट-पुट वर्षा के कारण सड़न आरम्भ हो जाती है। साथ ही अन्धड़ मे इसके उडने से पडोसियो को परेशानी हो जाती है।

Wednesday, May 28, 2008

"भगवान की बुढ़िया" खतम होने के कगार पर


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बीरबहूटी, रेड वेलवेट माइट या भगवान जी की बुढ़िया

ग्रामीण परिवेश से जुडे पाठको ने तो चित्र देखकर ही इसे पहचान लिया होगा पर शहरी पाठकों के लिये इस जीव को जान पाना मुश्किल है। अभी जैसे ही मानसूनी फुहार आरम्भ होगी नदियों के आस-पास नरम मिट्टी मे लाल मखमली चादर फैल जायेगी। असंख्य छोटे-छोटे जीव जमीन के अन्दर से प्रगट हो जायेंगे। आमतौर पर इस जीव को बीरबहूटी कहा जाता है। इसे रेन इंसेक्ट भी कहा जाता है। तकनीकी रुप से इंसेक्ट या कीट कहलाने के लिये छै पैरो का होना जरुरी है। इसके आठ पैर होते है इसलिये इसे मकोडा या माइट कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम रेड वेलवेट माइट है। मध्य भारत मे इसे रानी कीड़ा कहा जाता है। बच्चो का यह पसन्दीदा जीव है। वे इसे एकत्रकर डिबियो मे रख लेते हैं फिर उससे खेलते हैं। इसे छूने पर आत्म रक्षा मे यह पैरो को सिकोड लेता है। बच्चे पैर सिकोड़े जीवो को एक घेरे मे रख देते हैं और फिर उनके बीच प्रतियोगिता करवाते हैं। जो पहले पैर बाहर निकालकर भागता है उसे विजेता माना जाता है और उसके मालिक बच्चे को भी यही खिताब मिलता है।

Wednesday, May 21, 2008

मच्छरों से बचाव में प्रभावी वनस्पतियां


आज की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया मच्छरों से बचाव के लिये अनेक जैविक विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं। ये जैविक विकल्प बहुत आकर्षक लगते हैं। मुझे अपनी ओर से कुछ जोड़ना हो तो बस यही कि आदमी सफाई पसन्द बने तथा पानी को आस-पास सड़ने न दे। बाकी आप अवधिया जी का लेख पढ़ें।   

Wednesday, May 14, 2008

जंगली वृक्षों से शहरी पर्यावरण सुधार का नियोजन करें


यह है श्री पंकज अवधिया का बुधवासरीय अतिथि लेख। आप पहले के लेख पंकज अवधिया पर लेबल सर्च से देख सकते हैं। इस पोस्ट में पंकज जी शहरों के पर्यावरण सुधार के लिये भारतीय जंगली वृक्षों के नियोजित रोपण की बात कर रहे हैं।

Wednesday, May 7, 2008

वनस्पतियों के सामरिक महत्व की सम्भवनायें


यह है पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट। और यह पढ़कर मुझे लगा कि वनस्पति जगत तिलस्म से कमतर नहीं है! जरा आप पढ़ कर तो देखें।

पंकज जी की पहले की पोस्टों के लिये पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक करें।

Wednesday, April 30, 2008

हृदय रोगों की चिकित्सा में फूलों का प्रयोग


panj_image श्री पंकज अवधिया का बुधवासरीय अतिथि लेख। फूल और तनाव दूर करने को मैं जोड़ कर देखता था। पर यहां फूल और हृदय रोगों की चिकित्सा को जोड़ रहे हैं अवधिया जी। पिछले सप्ताह एक विवाद (वाकई?) बना था लेख का शीर्षक देने के विषय में। लेख के शीर्षक देने का काम अवधिया जी मुझ पर ही छोड़ देते हैं। पर शीर्षक का क्या; यह मान लें कि एक असामाजिक ब्लॉगर शीर्षक में तो अपना न्यून कोण ही दर्शायेगा!

आप तो लेख पढ़ें:

Wednesday, April 23, 2008

विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिये


मैने हैं कहीं बोधिसत्त्व में बात की थी वन के पशु-पक्षियों पर करुणा के विषय में। श्री पंकज अवधिया अपनी बुधवासरीय पोस्ट में आज बात कर रहे हैं लगभग उसी प्रकार की सोच वृक्षों के विषय में रखने के लिये। इसमें एक तर्क और भी है - वृक्ष कितने कीमती हैं। उन्हे बचाने के लिये निश्चय ही कुछ सार्थक किया जाना चाहिये। आप पोस्ट पढ़ें:



पारम्परिक चिकित्सा मे विभिन्न पेड़ों की छालों का उपयोग किया जाता है। छालों का एकत्रण पेड़ों के लिये अभिशाप बन जाता है। धीरे-धीरे पेड़ सूखने लगते हैं और अंतत: उनकी मृत्यु हो जाती है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस बात को जानते हैं। उन्हे पता है कि पुराने पेड़ दिव्य औषधीय गुणो से युक्त होते है और उन्हे खोना बहुत बडी क्षति है। इसलिये जब छाल का एकत्रण करना होता है तो वे अलग-अलग पेड़ों से थोडी-थोडी मात्रा मे छाल का एकत्रण करते हैं। इसे आज की वैज्ञानिक भाषा मे रोटेशनल हार्वेस्टिंग कहते है।

पर जब पेड़ विशेष की छाल एकत्र करनी होती है और वे पेड़ कम संख्या मे होते हैं तो वे एक विशेष प्रक्रिया अपनाते हैं। वे इन्हे उपचारित करते हैं। उपचार पन्द्रह दिन पहले से शुरु होता है। दसों वनस्पतियो को एकत्रकर घोल बनाया जाता है और फिर इससे पेड़ों को सींचा जाता है। इस सिंचाई का उद्देश्य पेड़ों को चोट सहने के लिये तैयार करना है। रोज उनकी पूजा की जाती है और कहा जाता है कि अमुक दिन हम एकत्रण के लिये आयेंगे, छाल को दिव्य गुणों से परिपूर्ण कर देना।

साथ ही हमे इस कार्य के लिये क्षमा करना। फिर एकत्रण वाले दिन अलग घोल से सिंचाई की जाती है। एकत्रण के बाद भी एक सप्ताह तक चोटग्रस्त भागों पर तीसरे प्रकार के घोल को डाला जाता है ताकि चोट ठीक हो जाये। यह प्रक्रिया अलग-अलग पेड़ों के लिये अलग-अलग है और हमारे देश मे इस विषय मे वृहत ज्ञान उपलब्ध है। क्या इस अनोखे पारम्परिक ज्ञान का आधुनिक मनुष्य के लिये कोई उपयोग है? इसका जवाब है- हाँ।


आधुनिक विकास पुराने वृक्षो के लिये अभिशाप बना हुआ है। हमारे योजनाकार पेड़ों की कीमत कुछ सौ रुपये लगाते हैं। जबकि एक पेड़ की असली कीमत लाखों में है।


सडकों या नये भवनो के निर्माण में बाधक बनने वाले पेड़ों को बेहरमी से काट दिया जाता है। चिपको आन्दोलन का पाठ पढने के बाद भी कोई सामने नही आता। कुछ अखबार इस पर लिखते भी हैं पर फिर भी ज्यादा फर्क नही पड़ता। पुराने वृक्ष सघन बस्तियों के लिये फेफड़ो का काम करते हैं और इनका बचा रहना जरुरी है। पर यदि इन्हे हटाना ही है तो फिर इन्हे जीने का एक और मौका दिया जाना चाहिये। यह असम्भव लगता है पर वर्षो पुराने वृक्षों को एक स्थान से उखाडकर दूसरे सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया जा सकता है। यह दूरी कुछ मीटर से लेकर दसों

किलोमीटर तक की हो सकती है।


जिस पारम्परिक ज्ञान की बात हमने ऊपर की है उसके उपयोग से पुराने वृक्षो को जीवित रखा जा सकता है। उन्हे चोट से उबरने मे मदद की जा सकती है। विदर्भ मे कुछ प्रयोग हम लोगो ने किये पर चूँकि पारम्परिक चिकित्सक हमारे साथ नहीं थे इसलिये सफलता का प्रतिशत बहुत कम रहा। आमतौर पर पीपल और बरगद के पेड़ों को ही हटाना होता है। इस विषय मे पारम्परिक चिकित्सक गहरा ज्ञान रखते है और अपनी सेवाएं देने को तैयार है। उनके साथ मिलकर प्रयोग किये जा सकते हैं और मानक विधि विकसित की जा सकती है। इससे देश भर मे उन पुराने पेड़ो को बचाया जा सकेगा जो आधुनिक विकास के लिये तथाकथित बाधा बन रहे हैं।


मैने इस पारम्परिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है। तीन सौ से अधिक वृक्ष प्रजातियो के विषय मे जानकारी एकत्र की जा चुकी है। पर जमीनी स्तर पर सफलता के लिये सभी को मिलकर काम करने की जरुरत है।


पंकज अवधिया

© इस पोस्ट पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


पिछले गुरुवार को अवधिया जी पर जंगल में फोटो खींचते समय मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। बावजूद इसके, उन्होने समय पर अपना लेख भेज दिया। उनकी हिम्मत और लगन की दाद देनी चाहिये।

Wednesday, April 16, 2008

गुबरैला एक समर्पित सफाई कर्मी है


अपने ब्लॉग पर जिस विविधता की मैं आशा रखता हूं, वह बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया पूरी कर रहे हैं। पिछली पोस्ट में जल-सुराही-प्याऊ-पानी के पाउच को लेकर उन्होने एक रोचक सामाजिक/आर्थिक परिवर्तन पर वर्तनी चलाई थी। आज वे अपशिष्ट पदार्थ के बायो डीग्रेडेशन और उसमें गुबरैले की महत्वपूर्ण भूमिका का विषय हमें स्पष्ट कर रहे हैं। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं। आप लेख पढ़ें:

पिछले दिनों मै मुम्बई के सितारा होटल मे ठहरा। रात तीन बजे तेज बदबू से मेरी नींद खुल गयी। कारण जानना चाहा तो मुझे बताया गया कि ड्रेनेज की समस्या है। आपके कमरे मे रूम फ्रेशनर डलवा देता हूँ - मैनेजर ने कहा। रुम फ्रेशनर से कुछ ही समय मे गंध दब गयी। पर दिन भर इसका उपयोग करना पड़ा। यह दुर्गन्ध नयी नहीं है। पूरे भारतवर्ष मे इसे सूंघा जा सकता है। चाहे वो साधारण बस्ती हो या बडी हवेली के पिछवाडे हों। रायपुर में तो रात को नाक पर रुमाल रखे बिना कई आधुनिक कालोनियों से गुजरना मुश्किल है। बरसात मे जब नालियाँ भर जाती है तो यही पानी सड़को में आ जाता है और आम लोगों को मजबूरीवश उससे होकर गुजरना पड़ता है। बच्चे भी उसमे खेलते रहते हैं। मानव आबादी जैसे - जैसे बढ़ती जा रही है, यह समस्या भी बढ़ती जा रही है। मानव अपशिष्टों की दुर्गन्ध सहने की आदत अब लोग डालते जा रहे हैं। अब वे नाक पर रुमाल भी नही रखते। हल्ला भी नही मचाते और रुम फ्रेशनर डालकर सो जाते हैं। ये समस्या बहुत तेजी से बढ़ने वाली है। पर क्या इससे निपटने का कोई उपाय है ? देखिये अब सरकारों और योजनाकारों से उम्मीद करना बेकार है। उनके भरोसे तो अब तक हम हैं ही।

आपने गोबर की खाद का नाम तो सुना ही होगा। गोबर अपने आप सड़ता है धीरे
- धीरे और अंत मे पूरी तरह सड़कर गन्ध विहीन उपयोगी खाद मे परिवर्तित हो जाता है। यदि इस प्रक्रिया को तेज करना है तो इसमे कुछ ऐसे द्रव डाले जाते है जिनसे सड़ाने वाले सूक्षमजीवो की हलचल बढ जाती है। इससे कुछ ही समय मे सड़न की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। कुछ वर्षों पहले जापान के वैज्ञानिको ने ई . एम . ( इफेक्टीव माइक्रोआरगेनिज्म ) नामक तकनीक निकाली थी। उनका दावा था कि आप सूक्ष्मजीवो के घोल को किसी अपशिष्ट में डाल दें तो वह उसे कुछ ही दिनो मे पूरी तरह सड़ा देगा। मानव जनित अपशिष्टों के लिये यह वरदान लगा। पर जापानी सूक्ष्मजीव भारतीय परिस्थितियों मे ज्यादा कारगर नहीं साबित हुये। फिर इस पर भारत मे शोध नहीं हुये और यह तकनीक हाशिये में चली गयी। इस पर आधारित मैने कई प्रयोग किये।


हमारी बदबूदार नालियों मे सूक्ष्मजीव पहले से हैं पर उनकी संख्या इतनी नही है कि वे लगातार आ रहे अपशिष्ट को पूरी तरह सड़ा सकें। मैने बतौर प्रयोग छाछ से लेकर बहुत सी वनस्पतियाँ डालीं जो कि सूक्ष्मजीवों की हलचल को बढाने मे सक्षम थी। इससे उत्साहवर्धक परिणाम मिले। पहले दिन बदबू बहुत बढ गयी पर कुछ ही समय मे इससे निजात मिल गयी। वनस्पतियाँ आस - पास ही उगती हैं अत : उन्हे एकत्र करने मे दिक्कत नही होती है। प्रयोग तो अब भी जारी हैं पर इस लेख के माध्यम से इसे सामने रखकर मैं आप लोगो की राय जानना चाहता हूँ। यह प्रयोग बहुत सस्ता है और प्रभावी तो है ही। चोक हो चुकी नालियों मे यह अधिक उपयोगी है।

गुबरैले के चित्र, जानकारी, वीडियो और ई-कार्ड नेशनल ज्योग्राफिक पर यहां पायें।
मुझे पता नही आपमे से कितने लोगो ने गुबरैले का नाम सुना है या इन्हे देखा है। ये प्रकृति के सफाई कर्मचारी हैं। इनके बारे मे कहा जाता है कि यदि ये न होते तो अफ्रीका के जंगल अब तक जानवरों मे मल की कई परतों मे दब चुके होते। हमने अपने शहर से इन सफाई कर्मचारियों को भगा दिया है। हम इन्हे देखते ही चप्पल उठा लेते हैं और मारने मे देर नही करते हैं। ये गुबरैले ( डंग बीटल ) मल को गेंद की शक्ल देकर लुढ़काते हुये ले जाते हैं और अपनी प्रेमिका को दिखाते हैं। बडी गेंद लाने वाले प्रेमी को पसन्द किया जाता है। मादायें गेंद रुपी उपहार लेकर मिट्टी में दबा देती हैं, फिर उसी मे अंडे देती हैं ताकि बच्चो के बाहर निकलने पर भोजन की कमी न रहे। विश्व के बहुत से देशों मे मानव की गन्दगी से निपटने अब इन मुफ्त के सफाई कर्मचारियो को वापस बुलाया जा रहा है। भारत में भी इनकी जरुरत है। ये मनुष्यों को नुकसान नही पहुँचाते हैं और अपने आप बढ़ते रहते हैं। ये चौबीसों घंटे काम करते हैं - बिना अवकाश के। वेतन बढ़ाने की माँग भी नही करते हैं और किसी तरह की हडताल भी नहीं।

देश को इस बदबू से मुफ्त मे सेवा देने वाले सूक्ष्मजीव और गुबरैले ही मुक्त करा सकते है, ऐसा प्रतीत होता है।


आप गुबरैले का एक स्पष्ट चित्र ईकोपोर्ट पर यहां देख सकते हैं। गुबरैले का जीवन चक्र आपको चित्र के आधार पर ईकोपोर्ट में यहां समझाया गया मिलेगा।


पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


यू-ट्यूब पर उपलब्ध गुबरैले पर वीडियो:
इसे आप पूरा देखें तो पता चलता है कि कितना मेहनती है गुबरैला। और तब आप इस जीव को सम्मान से देखेंगे।


और प्रकृति में गुबरैले की महत्वपूर्ण भूमिका के विषय में क्वाजुलू, नटाल, दक्षिण अफ्रीका के हाथी अभयारण्य के सन 2002 में खींचे इस चित्र से बेहतर मुझे कोई प्रस्तुति नहीं लगती। यह चित्र एण्डी नामक सज्जन ने खींचा। मैने उन्हे ई-मेल किया चित्र को ब्लॉग पर दिखाने को, पर उत्तर नहीं मिला। सन 2002 के बाद शायद एण्डी मूव कर गये हों। चित्र अपने आप में पूरी बात कहता है। आप चित्र देखें: Dung Beetle
(चेतावनी - गुबरैलों को रास्ते पर पहला अधिकार है! )

Wednesday, April 9, 2008

पानी की सुराही बनाम पानी का माफिया


पानी के पुराने प्रबन्धन के तरीके विलुप्त होते जा रहे हैं। नये तरीकों में जल और जीवों के प्रति प्रेम कम; पैसा कमाने की प्रवृत्ति ज्यादा है। प्रकृति के यह स्रोत जैसे जैसे विरल होते जायेंगे, वैसे वैसे उनका व्यवसायीकरण बढ़ता जायेगा। आज पानी के साथ है; कल हवा के साथ होगा।

और जल पर यह चर्चा आज की श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट का विषय है। आप पोस्ट पढ़ें:

पिछले साल मेरे एक मित्र ने पहली बार हवाई यात्रा करने का मन बनाया। सामान लेकर हवाई अड्डे पहुँचे तो बखेडा खडा हो गया। सुरक्षा कर्मी आ गये। गर्मी के दिन थे इसलिये रेल यात्रा करने वाले मित्र ने सुराही रख ली थी। अब विमान कम्पनी वाले यात्री केबिन मे इसकी अनुमति दे तो कैसे दें। उनकी नियमावली मे भी सुराही का जिक्र नही था। मित्र ने पूछा ये भारत ही है न? यदि हाँ, तो सुराही मे पानी रखने मे भला क्या आपत्ति? सुरक्षा कर्मियो ने खूब जाँच की और विमर्श भी किया। आखिर उनसे उनकी सुराही ले ली गयी। मित्र बोतल का पानी नही पीते हैं। इसलिये उन्हे बडी परेशानी हुयी। यह बडा ही अजीबोगरीब वाक्या लगा सभी को। दूसरे यात्री उन्हे देहाती समझते रहे पर आप इस पर गहनता से विचार करेंगे तो इस तथाकथित देहाती को ही सही पायेंगे।

मैने बचपन मे सुराही के साथ यात्रा की, पर पता नही कब देखते-देखते यह हमारे बीच से गायब हो गयी। अब तो रेलो मे भी इक्का-दुक्का लोगो के पास ही यह दिखती है। गर्मी पहले भी पडती थी। तो क्या पहले हम मजबूत थे और अब नाजुक हो गये हैं? सुराही का पानी ठंडा होता था और प्यास को बुझाता था। एक पूरी पीढी हमारे सामने है जिसने घड़े और सुराही का पानी पीया है गर्मियो में। उनके अभी भी बाल हैं, वे अच्छी सेहत वाले हैं और बीमारियाँ उनसे दूर है पर युवा पीढी सुराही और घड़े से दूर होती जा रही है और नये-नये रोगो के पास।

अभी कुछ ही वर्षो पहले तक अखबारो मे छपता था कि फलाँ क्लब ने प्याऊ खुलवाया जिससे राहगीरो को सड़क चलते पानी मिल सके। पर अब ऐसी खबरे और प्याऊ दोनो ही कम होते जा रहे है। पिछले वर्ष जब हमने अपने घर के सामने प्याऊ खोलने का मन बनाया तो इसकी भनक लगते ही एक व्यक्ति आ धमका और कहा कि आप प्याऊ खोलेंगे तो हमसे पानी का पाउच कौन खरीदेगा? हम अपनी जिद पर अड़े रहे तो वह नगर निगम के कर्मचारियों को ले आया और वे नियम का हवाला देने लगे। यहाँ तक कह दिया कि यदि कोई पानी पीने से मर गया तो आप पर केस बनेगा। बाद मे पता चला कि पूरे शहर मे पानी माफिया का राज है और कहीं प्याऊ खोल पाना मुश्किल है। एक रास्ता है यदि आप प्याऊ मे घड़े की जगह उसके पाउच रखेंगे तो फिर कोई परेशानी नही है।

मै दूरस्थ क्षेत्रो मे जाता हूँ तो वनवासियो की सहृदयता देखकर अभिभूत हो जाता हूँ। पानी तो पिलाते ही हैं साथ ही पुदीने का शरबत भी पेश करते हैं। देखते हैं कि भरी दोपहरी मे जंगल जा रहे हैं तो तेन्दु के कुछ फल भी दे देते है ताकि प्यास न लगे। वे अपने घरों मे मिट्टी के बर्तन लटका कर उसमे पानी भर देते हैं। दिन भार नाना प्रकार के पंछी आकर पानी पीते रहते हैं। कुछ दाने चावल के भी डाल देते हैं। शहर के लोग टीवी वाले बाबाओं के पास जिन्दगी भर जाकर जो पुण्य कमाते हैं ग्रामीण उसे एक पल मे ही प्राप्त कर लेते हैं। गाँव के बुजुर्ग कहते हैं कि हम दूसरो को पानी देंगे तो संकट मे हमे भी पानी मिलेगा अपने आप। सही भी है। जो पंछी पानी पीकर जीवित रहते है वे ही फल खाकर बीजों को फैलाते हैं और फिर नये वन तैयार होते हैं। ये वन ही बादलो को बुलाते हैं और गाँव वालो के लिये पानी बरसाते हैं। शहर का आदमी तो अपने तक सीमित रह गया है। दूसरों को कुछ देता नही तो उसे दूसरो से भला क्या मिलेगा? कल ही पानी वाले व्यक्ति अपने बच्चे के साथ आया। बच्चे को कम उम्र में कैसर हो गया है। लाखो खर्च कर चुके है और कुछ भी करने को तैयार है वह। मुझसे पारम्परिक चिकित्सकों का पता पूछने आया था। मैने उसकी मदद की और यही सोचता रहा कि आम लोगो की दुआए साथ होती तो हो सकता है कि बच्चा बीमार ही नही होता। उसने खूब पैसे कमाये और साथ मे "आहें" भी। आज सब कुछ पाकर भी वह सबसे गरीब हो गया है।


मैने विश्व साहित्य खंगाला कि शायद कही ऐसा वैज्ञानिक शोध मिल जाये जो बताये कि सुराही और घड़े का पानी अच्छी सेहत के लिये जरुरी है पर निराशा ही हाथ लगी। किसी ने इस पर शोध करने के रुचि नही दिखायी। आज की युवा पीढ़ी को वैज्ञानिक अनुमोदन चाहिये किसी भी पुरानी चीज को अपनाने से पहले। घर के बुजुर्गों की बात उन्हे नही सुननी है। घडे और सुराही के पानी के साथ देशी औषधियों के सेवन पर मेरे शोध आलेखो को पढने के बाद अब कई विदेशी संस्थाओं ने इस मूल्यवान पानी के बारे मे विचारना शुरु किया है। हमारे वैज्ञानिक अभी भी सो रहे हैं। शायद वे तब जागे जब बाजार मे चीनी और अमेरिकी घड़े बिकने लगें।

पंकज अवधिया
© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।
इलाहाबाद में घड़े-सुराही के चित्र के लिये बाजार देखा तो अच्छा लगा कि बहुत स्थानों पर कुम्हार लोग इनका ढ़ेर लगाये सड़कों के किनारे उपलब्ध थे। इसके अलावा गर्मी के सामान - ककड़ी-खीरा, गन्ने के रस के ठेले आदि विधिवत अपनी अपनी जगहें बना चुके थे। हां, कोई प्याऊ नहीं लगती दिखी। शायद कुछ समय बाद लगें।

मुझे अपने रतलाम के दिनों की याद है - जहां गर्मियों में स्टेशनों पर प्याऊ लगाने के लिये 25-50 आवेदन आया करते थे। यहां, पूर्वांचल की दशा के बारे में पता करूंगा।

Wednesday, April 2, 2008

जल का क्लोरीनेशन और अन्य समस्याओं पर विचार


पिछली बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया ने भूमिगत जल और उसके प्रदूषण पर विस्तृत जानकारी दी थी। आज के उनके इस लेख में भी जल पर और कोणों से चर्चा है। विशेषत: उन्होने क्लोरीनेशन के विषय में आम अल्पज्ञता के बारे में प्रकाश डाला है।

उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।

आप लेख पढ़ें:

इस बार पिछली पोस्ट की चर्चा को आगे बढ़ाते हुये जल पर ही बात करेंगे। आम तौर पर जिस पेय जल की आपूर्ति की जाती है घरो में, उसे शुद्ध करने के लिये क्लोरीन का प्रयोग होता है। बरसात के दिनो मे क्लोरीन की मात्रा बढ़ा दी जाती है। स्वीमिंग पूल मे भी पानी को शुद्ध रखने के लिये क्लोरीन का प्रयोग होता है। क्या कभी आपके मन मे यह बात आयी कि क्लोरीन शरीर के लिये लाभप्रद है या नुकसानदायक? लगातार क्लोरीन का प्रयोग कहीं हमे बीमार तो नही कर रहा है? पिछ्ले दिनो नेट पर सर्फिंग के दौरान मेरी नजर इस चेतावनी पर पड़ी:


"Chlorine is the greatest crippler and killer of modern times. While it prevented epidemics of one disease, it was creating another. Two decades ago, after the start of chlorinating our drinking water in 1904, the epidemic of heart trouble, cancer and senility began."
(..... क्लोरीनेशन ने एक महामारी खतम की पर दूसरी सृजित कर दी। क्लोरीनेशन के १९०४ में प्रारम्भ करने के दो दशक बाद हृदय रोग, केंसर और जल्दी बुढ़ाने की महामरियां शुरू हो गयीं।)
SAGINAW HOSPITAL
J.M. Price, MD
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"Scientists found there was a higher incidence of cancer of the esophagus, rectum, breast, and larynx and of Hodgkins Disease among those drinking chlorinated surface waters."

"Volatile organics can evaporate from water in a shower or bath."
"Conservative calculations indicate that inhalation exposures can be as significant as exposure from drinking the water, that is, one can be exposed to just as much by inhalation during a shower as by drinking 2 liters of water a day."
"People who shower frequently could be exposed through ingestion, inhalation and/or dermal absorption."
IS YOUR WATER SAFE TO DRINK?
Consumer Reports Books

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Chlorinated Drinking Water Linked to Cancer

November 21, 1999 The Toronto Star
Task force to conduct tests in hundreds of communities
Ottawa (CP) - A new federal analysis concludes that chlorinated drinking water may pose a cancer risk to humans, particularly the risk of bladder cancer.

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One of the most effective ways to reduce concentrations of the chemicals is to use filtration.

But many communities, especially smaller ones, don't have up-to-date filtration systems.
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यदि आप विश्व में इस विषय पर उपलब्ध सामग्री को देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि बहुत से विशेषज्ञों ने पीने के पानी को क्लोरीन से उपचारित करने पर आपत्ति दर्ज की है। दुनिया भर मे इसकी चर्चा भी हो रही है। पर भारत मे कभी भी इस पर आम चर्चा नहीं हुयी। आज हमारे देश मे
भ्रष्टाचार का जहर सब जगह फैल रहा है। जिन लोगों पर पानी को साफ रखने का जिम्मा है क्या वे अपना कार्य सही तरीके से निभा रहे हैं? कहीं कमीशन के नाम पर घटिया क्लोरीन तो नही मिलायी जा रही? क्या सही मात्रा मे क्लोरीन मिलायी जा रही है? क्या उन्हे पता है कि अधिक क्लोरीन जानलेवा भी बन सकती है? पिछले दिनों मै क्लोरीन मिलाने का कार्य करने वाले लोगो से मिला तो उनके विचार सुनकर ढंग रह गया। उन्हे तो पता ही नही है कि अधिक मात्रा मे क्लोरीन नुकसानदायक है। वे कहते है जितनी अधिक क्लोरीन उतना अधिक शुद्ध पानी। पूरे देश मे यही स्थिति है।

क्लोरीन के प्रयोग से विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीव नष्ट होते है। दशकों से ऐसा माना जा रहा है। कहीं इसके नियमित प्रयोग से सूक्ष्मजीवो मे प्रतिरोध तो विकसित नहीं हो गया जैसा कि खेती के क्षेत्र मे हम देखते-सुनते रहते हैं? क्या क्लोरीन इन अधिक प्रतिरोधक क्षमता वाले सूक्ष्मजीवों को मार पा रहा है या फिर हम क्लोरीन भी पी रहे है सूक्ष्मजीवों के साथ?

पिछले दशकों मे स्वास्थ्य सुविधाओं मे जबरदस्त इजाफा हुआ है पर रोग और रोगी कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। आयोडीन वाले नमक का ही उदाहरण लें। पहले सबको आयोडीन युक्त नमक खिलाया और अब जिसे देखो थायराइड की समस्या हो रही है। आज थाइराइड की दवाओं का जबरदस्त बाजार बन गया है भारत। किसी ने ठीक ही कहा है पहले दर्द दिया फिर दवा की।

मै एक छोटे से किट की उम्मीद वैज्ञानिकों से करता हूँ जिससे कि आम आदमी चन्द मिनटों मे जान सके कि पानी पीने लायक है या नहीं। यदि नही है तो वह इस किट के आधार पर शिकायत दर्ज करा सके। पर यह किट बनायेगा कौन? एक कम्प्यूटर प्रोग्राम बनाना है तो ढेरो लोग मिलेंगे आपको इस देश में। कम्प्यूटर के सिवा किसी और विषय मे विशेषज्ञ मुश्किल से मिलेंगे। आगे स्थिति और भयावह होने वाली है। होशियार बच्चे मैनेजमेंट और आई.टी. मे ही जाना चाहते हैं। भूजल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान जैसे विभाग सूने पडे हैं। कौन भूजल की चिंता करेगा? कौन वनस्पतियों को बचायेगा आने वाले दिनो में? फिर अपने देश के साधनो से पढकर विदेश चले जाना और वहाँ से देश के उत्थान की बात करने की गलत परम्परा चल पड़ी है।

जैसा पाठकों ने अपनी टिप्पणियों मे लिखा कि जल से जुडी समस्याओं का समाधान खोजना जरुरी है। यह आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्या है। खली पर लोगो का समय बर्बाद कर रहे टीवी चैनलो से इन समस्याओं पर पहल की उम्मीद बेमानी है। फिल्मी गाने मे मगन रेडियो चैनल की मदद भी नही मिल सकती। लेखक इस पर लिख कर अलख जगा सकते हैं। पर देश मे निष्पक्ष लेखकों का टोटा है। लेखक राजनीतिक पार्टियो की तरह खेमों मे बँटे है। वे केन्द्र की सरकार को दोषी बतायेंगे और जब सरकार बदलेगी तो विपक्ष के लेखक नयी सरकार को दोष देंगे। ये नही करेंगे समस्याओ का समाधान। गैर-सरकारी संगठनों के पास खुद का पैसा नही होता। जो पैसा देता है उसी का काम वे करते हैं। मुझे लगता है कि मुठ्ठी भर ही सही पर आम लोग ही यह कठिन कार्य कर सकने का बीड़ा उठा सकते हैं। आम लोगो को समस्या की विकरालता बताने की जरुरत है। उन्हे कुछ डराने की भी जरुरत है।

मै आपको नियमगिरि का उदाहरण देना चाहूंगा। यहाँ बाक्साइट का खनन होना है। जाहिर है जंगल बरबाद होंगे। लोगो ने खूब शोर मचाया पर असर नहीं हुआ फिर किसी विशेषज्ञ ने बताया कि इस पर्वत मे कई नदियों का उदगम है जो कि उडीसा और आन्ध्र प्रदेश की कई बड़ी नदियो मे जल के स्तर को बनाये रखती हैं। खनन से इन नदियों पर असर होगा। नदी पर असर मतलब पीने के पानी की कमी और फिर खेती के लिये पानी की कमी। आम लोगों और राजनेताओ के कान खड़े हो गये। इस सरल व्याख्या से वे भी खनन के विरोध मे आ खड़े हुये।

वनस्पतियो पर लिखते हुये मै पानी पर आ गया। यह तो ज्ञान जी का आशीर्वाद है कि पानी पर पिछली पोस्ट को उन्होने अच्छे से प्रस्तुत किया और मुझे एक और पोस्ट लिखने का साहस दिया। पाठको ने पिछले लेख को पसन्द किया। आशा है यह लेख भी आप लोगो को पसन्द आयेगा।

पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


क्लोरीन की अधिकता जल को अप्रिय बनाती है - यह अहसास मुझे था। पर वह हृदय रोग, केंसर और जल्दी बुढ़ाने की महामरियां प्रारम्भ करने में सक्षम है - यह मुझे नहीं ज्ञात था। वाराणसी में रेलवे अस्पताल के डॉक्टर कॉलोनी और मण्डल के अन्य स्टेशनों के जल के सेम्पल ले कर मेरे पास रिपोर्ट भेजते थे और यह प्रमाणित करने का प्रयास करते थे कि पेट के रोगों के मामले बढ़ने का मुख्य कारण क्लोरीनेशन का अभाव है। पर क्लोरीनेशन के कारण होने वाली समस्या पर उन्होने कभी ध्यान आकर्षित नहीं कराया।

यह पोस्ट मेरे अपने लिये एक न्यूज वैल्यू रखती है। मैं सामान्यत: यात्रा नहीं करता; पर कभी बरसात के महीने में यात्रा करते समय पानी की शुद्धता के लिये क्लोरीन टेबलेट/कंसंट्रेट ले कर चलने का विचार मन में अवश्य आया था। अब मैं दुबारा सोचूंगा। काफी समय तक टैप में जीरो-बी फिल्टर अटैचमेण्ट का प्रयोग किया था, जिसका कार्ट्रिज 10-12 महीने पर बदलते थे हम। अब तो घर में सादे दो कण्टेनर वाले फिल्टर का प्रयोग भर होता है, जिसके पोरस केण्डल समय समय पर साफ कर लेते हैं।

Wednesday, March 26, 2008

भूमिगत जल और उसका प्रदूषण


आज बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में आप श्री पंकज अवधिया द्वारा भूमिगत जल और उसके प्रदूषण पर विस्तृत जानकारी उनके नीचे दिये गये लेख में पढ़ें। इस लेख में जल प्रदूषण पर और कोणों से भी चर्चा है। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।


भूमिगत जल क्या हमेशा प्रदूषण से बचा रहता है? क्या हम बिना किसी जाँच के इसका उपयोग कर सकते हैं ? बहुत वर्ष पहले मैने एक भू-जल विशेषज्ञ से यह प्रश्न किया था। उनका जवाब वही था जो हमने पाठ्य पुस्तको मे प ढ़ा था। मतलब भूमिगत जल प्रदूषण से मुक्त रहता है। इसी विश्वास के साथ हम पानी का उपयोग करते रहे पर आज जब छत्तीसगढ के शहरों मे भूमिगत जल मे तरह-तरह की अशुद्धियाँ मिल रही हैं और लोग बीमार प रहे है तो अचानक ही हमे अपनी ग लती का अहसास हो रहा है कि हमने एक अधूरे विज्ञान पर विश्वास किया। राज्य मे चूने पर आधारित भू-रचना है। वर्षा का जल कार्बन डाई-आक्साइड के साथ मिलकर तनु अम्ल बनाता है। यह अम्लीय पानी चूने मे जगह बनाता जाता है और नीचे एकत्र हो जाता है। भूमि के अन्दर छोटे-छोटे पोखर होते है जिन्हे एक्वीफर कहा जाता है। यह आपस मे जुड़े होते है। आप इस चित्र को देखे तो आप को पता चलेगा कि कैसे प्रदूषक आपके साफ-सुथरे जल को दूषित कर सकते हैं


««« आप संलग्न थम्बनेल पर क्लिक कर "Living on Karst - A reference guide" नामक वेब पन्ने पर जायें। वहां पृष्ठ 4 के अंत मे बने रेखाचित्र को देखे कि भूमिगत पानी का प्रदूषण कैसे होता है।


सघन बस्तियों मे प्रदूषण की समस्या कई गुना ब जाती है। छत्तीसगढ मे बते शहरीकरण के कारण हजारों बोरवेल अमृत की जगह जहर दे रहे हैं । पूरे देश मे कमोबेश यही स्थिति है। नाँन पाइंट पाँल्यूशन की बात दुनिया भर में हो रही है। इस लिंक पर क्लिक कर आप उस विषय पर एक इण्टरेक्टिव फ्लेशप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन को भी देख सकते हैं।


पिछले एक दशक से भी अधिक समय से मै जल से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। मानसून की पहली वर्षा की प्रतीक्षा पारम्परिक चिकित्सक बेसब्री से करते रहते हैं । अलग-अलग वनस्पति से एकत्र की गयी पहली वर्षा का जल नाना प्रकार के रोगों की चिकित्सा में प्रयोग होता है। विशेष पात्रो में इस जल को एकत्र कर लिया जाता है फिर साल भर विभिन्न तरीकों से इसका उपयोग होता रहता है। आप इस कड़ी पर जाकर यह जानकारी पा सकते हैं कि कैसे अलग-अलग वनस्पति से एकत्र किया गया जल रोगों से मुक्ति दिलवाता है।


भारत में पहली मानसूनी वर्षा मे नहाने की परम्परा सदा से रही है। इससे गर्मी मे होने वाले फोडे-फुंसी से निजात मिलती है। मेरे एक जापानी मित्र भारत के इस ज्ञान से अभिभूत हैं। वे कहते हैं कि जापान मे तो पहली वर्षा होते ही हम शरीर को ढ़ंक लेते हैं कि कही अम्लीय वर्षा से नाना-प्रकार के रोग न हो जायें । औद्योगिक प्रदूषण जो बढ गया है। अब धीरे-धीरे भारत मे भी यही हाल हो रहा है।


भारत मे नदियों का जाल फैला हुआ है। गंगा जल के औषधीय महत्व को तो हम सब जानते हैं । देश के पारम्परिक चिकित्सक प्रत्येक नदी के पानी के औषधीय गुणों के विषय मे जानते हैं वे रोग विशेष से प्रभावित रोगियों को विशेष नदी का पानी पीने की सलाह देते हैं । वे बताते हैं कि जिस प्रकार के वनो से बहकर नदी पहाड़ों से मैदानो मे आती है उसके औषधीय गुण भी वैसे ही हो जाते हैं । मुझे याद आता है कि बस्तर मे इन्द्रावती नदी के किनारे निर्मली नामक वृक्ष पहले बहुत होते थे। यह वही निर्मली है जिसका प्रयोग पी ढ़ि यों से आदिवासी गन्दे जल को साफ करने में करते रहे हैं। इस नदी के जल का उपयोग दवा के रुप मे होता था। आज निर्मली के वृक्ष काटे जा चुके हैं और नदी की स्थिति हम सभी जानते हैं । जैसा कि आप जानते हैं, मैं मधुमेह से सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर एक रपट तैया र कर रहा हूँ। इस रपट मे बीस से अधिक छोटी-बडी नदियों के जल के औषधीय उपयोग का वर्णन मैने किया है। यह अपने आप मे अदभुत ज्ञान है। उदाहरण के लिये पैरी नामक नदी का जल उन वनस्पतियों के साथ दिया जाता है जो कि श्वाँस और मधुमेह रोगों से प्रभावितों के लिये उपयोगी हैं


देश के पारम्परिक चिकित्सक कुँओं के पास पीपल प्रजाति के वृक्षो की उपस्थिति को अच्छा मानते है। गूलर के साये मे स्थिति कुँ ए के जल का सबसे अच्छा माना जाता है। तालाबों के आस-पास इन वृक्षों की उपस्थिति देखी जा सकती है। यह विडम्बना ही है कि इनके महत्व मे बारे में नयी पीढ़ी को बताने हेतु बहुत कम प्रयास हो रहे हैं मुझे नही लगता कि अपने पूर्वजो की दूरदर्शिता के कारण जी रहे हमारी पीढी के लोग कभी पीपल और गूलर जैसे नये वृक्षों को लगाने का पुण्य कार्य करेंगे। इसका खामियाजा वर्तमान और आने वाली पीढी को भुगतना होगा।


जल संरक्षण के नाम पर देश भर मे करोड़ों फूँके जा रहे हैं। पंचतंत्र के रट्टू तोते की तरह सब चिल्ला रहे हैं। शिकारी आता है, जाल फैलाता है, जाल मे नही फंसना चाहिये पर कोई भी शिकारी को देखकर भाग नही रहा है। हम खूब व्याख्यान दे रहे हैं कि जल को बचाना चाहिये। बीच-बीच मे सूखे गले को तर करने हम सत्व विहिन बोतल बन्द पानी भी पी लेते हैं पर कभी अपनी दिनचर्या से समय निकालकर विशेष प्रयास नहीं करते हैं। जल के नाम पर असंख्य संगठन कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। जितना पैसा आज तक इन्हे प्रचार के लिये दिया गया है उसका आधा भी जमीनी कार्य मे लगा दिया जाता तो आज देश की स्थिति कुछ बदली-बदली नजर आती।


निर्मली पर शोध आलेख

गूलर (डूमर) पर शोध आलेख


पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


पंकज अवधिया जी की उक्त पोस्ट ने मुझे चिंता में डाल दिया हैं। मेरे घर में पानी की सप्लाई के दो सोर्स हैं। एक तो म्यूनिसिपालिटी की पाइप की सप्लाई है, जो लोगों द्वारा टुल्लू पम्प लगा कर पानी खींचने की वृत्ति के कारण बहुत कम काम आती है। दूसरा सोर्स बोरवेल का है। उससे पानी तो पर्याप्त मिलता है, पर उसके स्थान और एक छोटे सेप्टिक टेंक में दूरी बहुत ज्यादा नहीं है। यद्यपि कभी समस्या जल प्रदूषण के कारण पेट आदि की तकलीफ की नहीं हुई, पर सम्भावना तो बन ही जाती है कि प्रदूषक जमीन के नीचे के जल तक पंहुच जायें।

हमारे घर में तो सेप्टिक टेंक को री-लोकेट करने के लिये स्थान उपलब्ध है; और एक योजना भी हम लोगों के मन में है। लेकिन शहरी रिहायश में बहुधा लोगों की जल-मल निकासी उनके पानी के सोर्स से गड्डमड्ड होती ही है और जल प्रदूषण से हैजा जैसी समस्यायें आम सुनने में आती हैं।
पता नहीं समाधान क्या है?

Wednesday, March 19, 2008

गाजर घास पर जानकारी


आज बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में आप श्री पंकज अवधिया द्वारा गाजर घास पर विभिन्न कोणों से दी गयी विस्तृत जानकारी उनके नीचे दिये गये लेख में पढ़ें। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।


गाजर घास (पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस) की समस्या जन-जन की समस्या बनती जा रही है। भारत में गाजर घास लगभग सभी क्षेत्रोँ में फैली है और जन-स्वास्थ्य के लिये खतरा बनी हुई है। यह विडंबना ही है कि आज भी भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गाजरघास के विषय में नहीं जानता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यापक जन-जागरण अभियान चलाकर न केवल व्यक्तिगत स्तर पर गाजर घास का उन्मूलन किया जाए बल्कि सरकार पर भी दबाव बनाया जाये। इस आलेख में प्रश्नोत्तरी के माध्यम से गाजर घास के विषयमें नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न:  गाजर घास क्या है और इसका नाम ''गाजर घास'' क्यों पड़ा?

उत्तर: गाजरघास एक साधारण सा दिखने वाला खरपतवार है जो कि पहले बेकार जमीन व मेड़ों तक ही सीमित था पर अब यह खेतों में प्रवेश कर फसलों से प्रतियोगिता कर रहा है। गाजर घास एस्टेरेसी परिवार का सदस्य है। देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रोँ में इसके अलग-अलग स्थानीय नाम हें। इन नामों के पीछे गाजर घास के पौधे की विशेषता छिपी हुई है। गाजरके समान पत्ती होने के कारण गाजर घास कहते हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं इसलिए इसे चटकचांदनी या व्हाइट टाप भी कहा जाता है। जबलपुर के आस-पास के लोग इसकी सर्वत्र उपलब्धता के आधार पर इसे रामफूल कहते हैं। चूंकि यह खरपतवार सामान्यत: समूहों में उगता है इसीलिए इसे कांग्रेस वीड कहा जाता है। पार्थेनियम की 15 जातियाँ विश्व में पाई जाती हैं। इनमें से पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस ही अधिक नुकसानदायक है। बहुत अधिक बीजोत्पादन क्षमता होने के कारण ही इसे पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस का नाम मिला। गाजरघास के पौधे वार्षिक होते हैं व इनकी ऊंचाई सामान्यतया 2 मीटर तक होती है। गाजर घासकी पत्तियों व तनों पर छोटे-छोटे रोम पाये जाते हैं जिन्हें ट्रायकोम्स कहा जाता है।

प्रश्न:  गाजरघास से क्या-क्या नुकसान हैं?

उत्तर:  गाजरघास संभवत: विश्व एक एकमात्र ऐसा खरपतवार है जो कि मनुष्यों, पशुओं, फसलों, वनों और वन्यप्राणियों सभी के लिये नुकसानदायक है। गाजर घास के फूलों से उत्सर्जित होनेवाले पराग-कण मनुष्य के श्वास तंत्र में प्रवेश करके अस्थायी दमा व एलर्जी उत्पन्न करते हैं। गाजर घास के एक फूल से असंख्य परागकण उत्सर्जित होते हैं। एक परागकण किसी मनुष्य को अस्वस्थ करने के लिये पर्याप्त है। ये परागकण हमारे आस-पास हवा में फैले रहते हैं व साधारण ऑंखों से दिखायी नहीं पड़ते हैं। देश के विभिन्न महानगरों व नगरों में किये गये सर्वेक्षणों से पता चला है कि वहाँ के वातावरण में गाजर घास के परागकण अन्य हानिकारक परागकणों की तुलना में बहुत अधिक हैं। पश्चिम बंगाल के मोहनपुर क्षेत्र में काली पूजा के समय गाजर घास के फूल आते हैं व परागकणों का उत्सर्जन होता है। इस समय यहाँ का प्रशासन लोगों की मदद के लिये दसों अस्थायी अस्पतालों की व्यवस्था करवाता है। फिर भी प्रभावित लोगों की संख्या में कमी नहीं आती है। गाजरघास के परागकण मनुष्यों के अलावा पशुओं व फसलों को भी नुकसान पहूँचाते हैं। हवा में उपस्थित असंख्य परागकण पर- परागित सब्जी की फसलों में पौधों के मादा जनन अंगों के ऊपर एकत्रित हो जाते हैं जिससे कि उनकी संवेदनशीलता खत्म हो जाती है और बीज नहीं बनने से फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। गाजर घास के निरंतर संपर्क में आने वाले मनुष्यों को त्वचा की एलर्जी का खतरा रहता है। अनुसंधानों से पता चला है कि गाजर घास के संपर्क में आने से एक विशेष प्रकार का एक्जीमा हो जाता है। आपका ये जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के कर्नाटक राज्य में गाजर घास जनित रोगों से प्रभावित होकर 7 से भी अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह विश्व में पहली घटना है जबकि किसी खरपतवार से परेशान होकर किसानों ने आत्महत्या की हो। गाजर घास के पौधे कुछ घातक एलिलो-रसायनों का स्त्राव करते हैं। ये एलिलो-रसायन आस-पास किसी अन्य पौधों को उगने नहीं देते हैं। भारतीय वन अपनी जैव-विविधता के कारण विश्व के मानचित्र में विशेष स्थान रखते हैं। भारतीय वनों में आज भी ऐसी सैकड़ों वनौषधियाँ उपलब्ध हैं जिनके दिव्य औषधिय गुणों का सही आकलन अभी तक नहीं हुआ है। भारतीय वनों में गाजर घास के अनियंत्रित फैलाव से बेशकीमती जड़ी-बूटियाँ नष्ट होती जा रही हैं। गाजर घास के दुष्प्रभाव से वन्य प्राणी भी अछूते नहीं रह गये हैं। आस्ट्रेलिया में प्रति वर्ष 165 अरब रूपयों का खाद्य/मांस गाजर घास के कारण अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद होता है।भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अनुसंधानों से पता चला है कि गाजर घास के प्रकोप से फसलों की उपज में 40 प्रतिशत तक कमी हो जाती है। गाजर घास के परागकण मक्के के पर-परागण में बाधा डालते हैं व इसकी उपज को 50 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। आस्ट्रेलिया में गाजर घास एक विशेष प्रकार के सूत्राकृमि को आश्रय देती है। यह सूत्राकृमि सूर्यमुखी के लिये नुकसानदायक है।

प्रश्न:  क्या गाजर घास का उत्पत्ति स्थान भारत है और क्या भारत में ही इसका प्रकोप हैं?

उत्तर:  नहीं। गाजर घास का उत्पत्ति स्थान भारत नहीं है। गाजर घास का उत्पत्ति स्थान है दक्षिणमध्य अमेरिका । भारत में गाजर घास को जानबूझकर 1951 में आयातित अन्न के साथ लाया गया। सबसे पहले भारत में इसे पूना में देखा गया। अब यह बात एकदम साफ हो गई है कि अमेरिका ने भारत को आयतित अन्न के साथ गाजर घास के बीज मिलाकर भेजे ताकि भारत जैसे विकासशील देश की सुदृढ़ कृषि व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया जा सके। आज गाजर घास का उत्पत्ति स्थान अमेरिका गाजर घास की समस्या से उतना अधिक प्रभावित नहीं है, जितना विश्व के अन्य क्षेत्र। यदि गाजर घास से प्रभावित देशों को मानचित्र में दर्शाया जाये तो सबसे ज्यादा प्रभावित देश भारत ही दिखेगा। गाजर घास से प्रभावित देशों में अफ्रीका गणतंत्र, मेडागास्कर, केन्या, मोजाम्बिक, मारिशस, इजरायल, भारत, बांग्लादेश, नेपाल, चीन, वियतनाम, ताइवान, आस्ट्रेलिया आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न:  गाजरघास के तेजी से फैलने के क्या-क्या कारण हैं?

उत्तर:  गाजरघास का पौधा कई विशिष्ट गुणों से युक्त होता है। इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण इसका फैलाव निर्बाध गति से हो रहा है। गाजर घास के एक पौधे से लगलग 25,000 बीज बनते हैं।इन बीजों में सुसुप्तावस्था नहीं पाई जाती है अर्थात ये सभी बीज तुरंत अंकुरण की क्षमता रखते हैं। गाजर घास के बीज हवा व जल के माध्यम से फैलते हैं। एक वर्ष में गाजर घास की तीन से चार पीढ़ियाँ होती हैं। गाजर घास सभी प्रकार की मिट्टियों में अच्छी वृद्धि करता है। यह विपरीत वातावरणीय परिस्थितियों, अधिक अम्लता या क्षारीयता वाली भूमि आदि में उग सकता है। इसके अलावा गाजर घास के पौधे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक एसिड आदि घातक एलिलोरसायनों का स्त्रवण करते हैं जो कि अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं व गाजर घास से कोई भी पौधा या फसल प्रतियोगिता नहीं कर पाती है। इन्हीं कारणों से गाजर घास का फैलाव अन्य पौधों की तुलना में तेजी से हो रहा है।

प्रश्न:  गाजरघास को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?

उत्तर:  गाजरघास को परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग विधियों से नियंत्रित किया जा सकता है। गाजर घास को हाथ से उखाड़कर नष्ट किया जा सकता है। यह कार्य फूल आने से पहले करना चाहिये ताकि गाजर घास का आगे फैलाव न हो। इस उपाय से गाजर घास को प्रभावी रूप से नियंत्रण के लिये विशेष सावधानी की आवश्यकता है। हाथों में दस्ताने पहनना व मुँह व कान को अच्छी तरह से कपड़े से बांधना आवश्यक है। बच्चों को तो हाथ से गाजर घास नहीं उखाड़ने देना चाहिये। नमक के 20 प्रतिशत घोल से भी गाजर घास को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। किसान भाई 5 गिलास पानी में एक गिलास साधारण नमक घोलकर पौधों पर छिड़काव कर सकते हैं। घरों के आस-पास सीमित स्थानों पर गाजर घास को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है पर बहुत बड़े क्षेत्र में इसके प्रयोग से भूमि की लवणता बढ़ सकती है। साथ ही बड़े क्षेत्र के लिये यह विधि खर्चीली भी है। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने कई ऐसे पौधे सुझायें हैं जो कि तेजी से बढ़ते हैं व उपयोगी हैं तथा गाजर घास की वृद्धि को कम करने में सहायक हैं। इन पौधों में गेंदा, चरोटा, क्रोटन आदि प्रमुख हैं। गेंदे के पौधे का निचोभी गाजर घास की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। कर्नाटर सरकार कैसिया सेरेसिया नामक पौधे के बीज किसानों को उपलब्ध करा रही है। ये पौधे गाजर घास से प्रतियोगिता करके उसे नष्ट कर देते हैं। कुछ मित्र कीट व रोग कारक भी गाजर घास के विरूद्ध उपयोगी पाये गये हैं। कीटों में जाइगोग्रामाबाइकलरेटा नामक कीट केवल गाजर घास को ही नष्ट करता है व भारतीय परिस्थितियों के लिये उपयुक्त पाया गया है। गाजर घास को उपलब्ध कृषि रसायनों की सहायता से भी नियंत्रिात किया जा सकता है। इन रसायनों में एट्राजीन, डाइकाम्बा, एट्राजीन+2, 4 डी, मेटसल्फ्यूरॉन, ग्लाइफोसेट आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न:   क्या गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण पर्यावरण के दृष्टिकोण से सुरक्षित है?

उत्तर:  गाजरघास को विदेशों से भारत लाया गया है। यह कटु सत्य है कि गाजर घास को नियंत्रित करने में सक्षम कृषि रसायन भी विदेशों की ही देन हैं। गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण पर्यावरण के दृष्टिकोण से बिल्कुल सही नहीं है। उपलब्ध रसायन न केवल मिट्टी बल्कि मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिये भी नुकसानदायक हैं। इसके अलावा ये रसायन भूमिगत जल को भी दूषित कर देते हैं। यदि यह कहा जाय कि गाजरघास को रासायनिक विधि से नियंत्रित करना एक समस्या को हटाकर दूसरी भयानक समस्या को आमंत्रण देना है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

प्रश्न:  क्या सरकारी स्तर पर किसी अभियान के तहत इसे उखाडा जा रहा है?

उत्तर:  नही सरकारी स्तर पर ऐसा कोई प्रयास नही हो रहा है। खरपरवार वैज्ञानिको की पहल पर प्रतिवर्ष 6 से 12 सितम्बर को गाजर घास जागरुकता सप्ताह मनाया जाता है। इसे हाल ही के वर्षो से आरम्भ किया गया है। इसके पीछे उद्देश्य सही है पर ज्यादातर आयोजन भाषणो तक सीमित होने लगे हैं। जिस गति से गाजर घास का फैलाव हो रहा है उसे देखकर यही लगता है कि एक दशक तक वृहत पैमाने पर अभियान की जरुरत है।

प्रश्न:  गाजर घास के विरुद्ध अभियान मे जुटी संस्थाए सोपाम और आई.पी.आर.एन.जी. को इस कार्य के लिये पैसे कहाँ से मिलते है?

उत्तर:  दोनो ही संस्थाए निज व्यय से चलती है। यहाँ तक की सदस्यो से सदस्यता शुल्क भी नही लिया जाता है। इन संस्थाओ का संचालन संस्थापक पंकज अवधिया करते है। सोपाम द्वारा अभी तक दस हजार से अधिक किसानो को पोस्टकार्ड के माध्यम से जानकारी दी जा चुकी है। आई.पी.आर.एन.जी. गाजर घास से जुडे किसानो और वैज्ञानिको का आन-लाइन ग्रुप है। इसकी अपनी वेबसाइट है जो गाजर घास पर विस्तार से जानकारी देने वाली दुनिया की एकमात्र वेबसाइट है। इसे भी निज व्यय से संचालित किया जाता है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से गाजर घास जागरुकता अभियान बिना किसी आर्थिक और तकनीकी सहायता से चल रहा है।     


गाजर घास पर इण्टरनेट पर उपलब्ध कुछ महत्वपूर्ण लिंक:

इंटरनेशनल पार्थेनियम रिसर्च न्यूज ग्रुप की वेबसाइट

गाजर घास के चित्र

गाजर घास पर हिन्दी आलेख और शोध पत्र

इकोपोर्ट पर उपलब्ध शोध आलेख

बाटेनिकल डाट काम पर उपलब्ध शोध आलेख

गाजर घास पर चर्चा हेतु याहू ग्रुप


पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


गाजर घास के चित्र लेने में देर कर दी हमने। कल धुंधलका होने पर याद आया। मैं और रीताजी घूमने निकले। टॉर्च, कैमरे के प्लैश और स्ट्रीट लाइट में यह चित्र लिये जो ऊपर लगाये हैं। रात में झाड़-झंखाड़ का फोटो लेते देखने वाले हमें निश्चय ही खब्ती समझ रहे होंगे! :-)

ब्लॉगिंग खब्तियाने का ही दूसरा नाम है शायद!