Showing posts with label जी विश्वनाथ. Show all posts
Showing posts with label जी विश्वनाथ. Show all posts

Thursday, November 4, 2010

भाग ७ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की कैलीफोर्निया प्रवास पर सातवीं अतिथि पोस्ट है।


इस बार भी तसवीरों के माध्यम से आप को अपनी बात बताना चाहता हूँ।

यहाँ तसवीरें छोटी आकार में दिखेंगी। यहां तसवीरों को resize करके यहाँ पेश रहे हैं ताकि पन्ना जल्द ही लोड हो जाए। साथ ही पिकासा स्लाइड-शो का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे पन्ना भी ज्यादा स्क्रॉल न करना पड़े।

आपकी यदि मूल तसवीर में रुचि है तो पोस्ट के अंत में दी हुई कडी पर जाकर पूरी तसवीर देख लीजिए। पिछले पोस्ट पर कुछ मित्रों ने टिप्प्णी की थी के चित्र बहुत छोटे हैं, इस लिये इस बार हमने यह तरीका अपनाया।

Friday, October 22, 2010

भाग ६ - कैलीफिर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अमरीकी/कैलीफोर्निया प्रवास पर छठी अतिथि पोस्ट है।


इस बार बातें कम करेंगे और केवल चित्रों के माध्यम से आप से संप्रेषण करेंगे।

शॉपिंग:
=========
एक जमाना था, जब हम विदेश से चीजें खरीदकर लाने में गर्व महसूस करते थे। अब भूल जाइए इस बात को। कुछ चीज़ों को छोडकर, हम भारतीयों के लिए वहाँ से कुछ खरीदना मूर्खता ही लगता है।

सब कुछ यहाँ भारत में उपलब्ध है और बहुत ही कम दामों में।
कई सारी चीज़ें तो भारत, चीन, बंगला देश से वहाँ भेजी जाती हैं जहाँ तीन या चार गुना दामों पर बिकती हैं।

Sunday, October 3, 2010

भाग ४ – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यदि आपको गाडियों का शौक है तो अवश्य एक बार वहाँ (कैलीफोर्निया) हो आइए।

कारों की विविधता, गति, शक्ति और अन्दर की जगह और सुविधाएं देखकर मैं तो दंग रह गया।
शायद ही कोई है जिसके पास अपनी खुद की कार न हो।

औसत मध्यवर्गीय परिवार के तो एक नहीं बल्कि दो कारें थी। एक मियाँ के लिए, एक बीवी के लिए।

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की उनकी कैलीफोर्निया यात्रा के दौरान हुये ऑब्जर्वेशन्स पर आर्धारित चौथी अतिथि पोस्ट है।

गैराज तो इतने बडे कि कम से काम दो कारें अगल बगल इसमें आसानी से खड़ी की जा सकती हैं।

गैराज के अन्दर जगह इतनी कि भारत में तो इतनी जगह में एक पूरा घर बन सकता था।

Thursday, September 23, 2010

भाग तीन – कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की उनकी कैलीफोर्निया यात्रा के दौरान हुये ऑब्जर्वेशन्स पर आर्धारित तीसरी अतिथि पोस्ट है:


Saturday, September 18, 2010

भाग दो - कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है:

एक और बात मैंने नोट की और वह है ये अमरीकी लोग अपनी प्राइवेसी (privacy) पर कुछ ज्यादा ही जोर देते हैं।  अमरीकी नागरिक खुलकर  बातें नहीं करते थे हम लोगों से। हम जैसे कम्यूनिकेटिव (communicative) नहीं होते। शायद मेरा यह अनुमान गलत है और सिर्फ़ मेरे साथ ऐसा हुआ। या फ़िर मैं ही कुछ ज्यादा बोलता हूँ!

रास्ते में टहलते समय, अजनबी लोग भी भले  "Hi" या "Hello there" या "Good morning" कहते, पर उसके बाद झट से निकल जाते थे।

Sunday, September 12, 2010

कैलीफोर्निया में श्री विश्वनाथ

यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी की अतिथि पोस्ट है।


हाल ही में पत्नी के साथ कैलिफ़ोर्निया गया था। अपने बेटी और दामाद के यहाँ कुछ समय बिताकर वापस लौटा हूँ।

P1000905s बेटी और दामाद पिछले १० साल से वहीं रह रहे हैं और कई बार हमें आमंत्रित किए थे पर पारिवारिक और व्यवसाय संबन्धी मजबूरियों के कारण मैं जा न सका।

Wednesday, July 28, 2010

गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी का स्वास्थ्य

परसों प्राप्त ई-मेल से श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी के स्वास्थ्य के विषय में पता चला:


GV attempting rowing ज्ञानजी,

इस लंबी अवधि की चुप्पी के लिए क्षमा चाहता हूँ।

कई महीनों से ब्लॉग जगत से दूर रहा था। जाल जगत से भी संपर्क सीमित था।

व्यवसाय संबन्धी कठिनाइयों के कारण और स्वास्थ्य अचानक बिगडने के कारण कई अच्छे मित्रों से भी ई मेल संपर्क टूट गया था।

Sunday, December 27, 2009

नारायण दत्त तिवारी का इस्तीफा

ND Tiwari यह नाराण दत्त तिवारी का मामला मेरी समझ के परे है।

ताजा समाचार के अनुसार, उन्होंने अपना त्यागपत्र दे दिया है।

८६ की आयु में क्या कोई मर्द ऐसी मर्दानगी का प्रदर्शन कर सकता है?

एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन तीन महिलाओं के साथ बिस्तर पर लेटे लेटे रति-क्रीडा करने की क्षमता रख सकता है?

क्या ये महिलाएं उनकी पोतियाँ के बराबर नहीं होंगी?

Friday, July 17, 2009

ऑक्सफोर्ड स्कॉलर नकुल


यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है:

हाल ही प्राप्त एक खुश खबरी चिट्ठा जगत के सभी मित्रों को देना चाहता हूँ।

Nakul4 मेरे २३ वर्षीय बेटे नकुल कृष्ण ने ( जो २००७ में भारत के पाँच रोड्स स्कॉलर में से एक था) , अपनी बी ए की पढ़ाई पूरी कर ली है। वह ऑक्स्फ़र्ड विश्वविद्यालय से "डिस्टिंक्शन" के साथ उत्तीर्ण हुआ है। परिणाम दो दिन पूर्व ही घोषित हुए।

रोड्स चयन समिति के सदस्यों का उसपर जो विश्वास था, उसकी पुष्टि उसने करके दिखाई है। समिति ने उसे हज़ारों श्रेष्ठ विद्यार्थियों में से चुना था जो सब इस छात्रवृत्ति के लिए प्रतिस्पर्धा में लगे हुए थे।

नकुल का रोड्स स्कॉलर के रूप में चयन पढ़ाई में सर्वश्रेष्ठ होने, संगीत में उसकी प्रतिभा (कर्नाटक शैली मे वह एक कुशल गायक है) अंग्रेज़ी रंगमंच  में राष्टीय स्तर पर सफ़लता , अंग्रेज़ी गद्य और पद्य और वाद-विवाद में निपुणता और सामाजिक और पर्यावरण संबन्धी मामलों में उसके योगदान के आधार पर हुआ था।

 Vishwanath
श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट
ह्युमैनिटीज़ विषयों में ऑक्स्फ़ोर्ड विश्वविद्यालय में "डिस्टिंक्शन" पाना प्रशंसा दिलाने वाली उपलब्धि मानी जाती है। अब अपने आप को वह एक पक्का "ऑक्स्फ़र्ड स्कॉलर" कह सकता है।

उसे स्नातकोत्तर पढाई के लिए वहीं ऑक्स्फ़र्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल गया है। दर्शनशास्त्र में उँची पढाई करने की इच्छा है उसकी।

पढाइ के लिए उसे क्लैरन्डन छात्रवृत्ति और साथ साथ ब्रिटिश सरकार की तरफ़ से भी छात्रवृत्ति मिलेगी।
मेरा बेटा पीएचडी पाने तक अपनी पढाई जारी रखना चाहता है।

दो साल के बाद अभी अभी घर लौटा था और तुरंत घर से हज़ारों मील दूर अरुणाचल प्रदेश रवाना हो गया है वह, एक विशेष अभियान के संबन्ध में।

रॉयल जोग्राफ़िक सोसाइटी द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम के तहद वह अपने कुछ विदेशी सहपाठी छात्रों के साथ तवंग (अरुणाचल प्रदेश) में है इस समय।

इस विषय में अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखिए।

संक्षिप्त में मेरे बेटे और उसके साथियों के बारे में एक लेख भी उपर दी गई कडी पर उपलब्ध है।

मान्यवर,आप सब को मैं अपने विस्तृत परिवार का सदस्य मानने लगा हूँ, और यह पोस्ट लिख कर अपनी खुशी आप सब से बाँटना चाहता हूँ।

सादर,
गोपालकृष्ण विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

तवांग, अरुणांचल प्रदेश, भारत

मैं कुछ कहूं?

जब मैने यशस्वी भव! नकुल! प्रस्तुत की थी, तो मेरे मन में था कि श्री विश्वनाथ फालो-अप पोस्ट जरूर देंगे। और मैं श्रीमती और श्री विश्वनाथ की प्रसन्नता में सहभागी हूं।

आप श्री विश्वनाथ की सुझाई ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के उत्तरपूर्व भारत के अभियान की साइट देखें। उसमें नकुल का ब्लॉग भी है। उसमें यह भी है कि नकुल कृष्ण हिन्दी-अंग्रेजी में प्रवीण है और वर्तमान में तिब्बती भाषा सीख रहा है। कर्णाटक संगीत में दक्षता और तिब्बती म्यूजिकॉलॉजी में रुचि भी है उसे।

मैने देश का वह हिस्सा – तवांग – अरुणांचल देखा नहीं है। गूगल अर्थ पर लगे कुछ चित्र देखता हूं। पर पूरी दृढ़ता से मानता हूं कि वह मेरा देश है। नियंत्रण रेखा के इस पार और उस पार भी। 

मैं अपने को भीषण अंतर्मुखी मानता हूं, पर यह लगता है कि इस नौजवान से मिलने पर बहुत कुछ बात करूंगा।

बधाई नकुल!  

Monday, June 15, 2009

क्या “लेफ्ट”, “राइट” नहीं है?


मैं घर से बाहर जा रहा था। मेरे दायें हाथ में ब्रीफ केस था। अचानक याद आया कि मैने पर्स नहीं लिया है। मैने हमेशा की तरह जोर से बोला – पर्स देना। मेरी ३४ साल की निष्ठा से बंधी पत्नी तेजी से बेडरूम की तरफ गयीं और पर्स ले आयीं।
GV and Jyoti 2008
श्री जी विश्वनाथ और उनकी पत्नी श्रीमती ज्योति। यह पोस्ट श्री विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है।
यह उनके लिये बारम्बार का पुराना रुटीन था – कभी रुमाल, कभी मोबाइल और कभी कार की चाभियां मैं पॉकेट में डालना भूल जाता था। पूरे निस्पृह भाव से वे मुझे थमाने ही जा रही थीं मेरा पर्स।

मेरा दायां हाथ ब्रीफ केस पकड़े फंसा था। सो मैने बायां हाथ बढ़ाया पर्स लेने के लिये। एक झटके में मेरी गृहलक्षी ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। जैसे कोई स्प्रिंग लगी हो। खैर, मुझे तुरंत समझ में आ गया – मैं “लक्ष्मी” को गलत हाथ से ले रहा था। इस महान महिला से विवाहित जीवन के दशकों के अनुभव ने मुझे यह सिखा दिया था कि कोई तर्क करना बेकार है। 

एक सांस खींच कर मैने अपना ब्रीफकेस नीचे रखा। दायें हाथ से अपने पुराने मुड़े-तुड़े पर्स को लिया, जेब में डाला और फिर ब्रीफकेस उठाया और रवाना हुआ।

मेरा बायां हाथ परम्परावादियों को क्यों गलत लगता है जी? क्यों मैं इसे कई प्रकार के कार्यों को करने से प्रतिबन्धित किया जाता हूं? यह बराबर के साइज और लम्बाई का है|

अगर मैने इस हाथ को दायें हाथ की तरह काम में लाने के लिये अपने को प्रशिक्षित कर लिया होता तो यह पूरा काम करता लिखने में भी। की-बोर्ड पर यह दायें हाथ की दक्षता को उंगली दर उंगली बराबरी करता है। (वैसे मैं लगभग ७० शब्द प्रतिमिनट की दर से टाइप कर लेता हूं।)

वायलिन वादक और वैनिक अपने बायें हाथ का प्रयोग सुर (नोट्स) निकालने में करते हैं। दायें हाथ से तो केवल ध्वनि निकालते हैं। उनकी दक्षता बायें हाथ में होती है, दायें में नहीं। बांसुरीवादक श्री हरिप्रसाद चौरसिया “उल्टे” तरीके से बांसुरी बजाते हैं। इसके बावजूद और बावजूद इसके कि हाथ धोते समय मैं अपने बायें हाथ को भी उतने ध्यान से धोता हूं, जितने से दांये को; मेरा बायां हाथ “अस्वच्छ” “प्रदूषित” “अभद्र” और “खुरदरा” क्यों माना जाता है?

अगर कोई सबके सामने बायें हाथ से खाता है तो आस-पास के लोग घूरती निगाह से देखते हैं। एक पेटू सूअर की तरह ठूंस-ठूंस कर खाये, वह स्वीकार्य है पर एक सभ्य आदमी का साफ बायें हाथ से खाना जायज नहीं! क्यों नहीं? आपने शिशुओं को देखा है। वे अपनी फीड बोतल दोनो हाथ से पकड़ते हैं। केवल दायें हाथ से नहीं। मां के बायें स्तन से भी उतना और वैसा ही दूध निकलता है, जैसा दायें स्तन से।

“लेफ्ट” को निम्न स्तर का क्यों माना गया है? हिन्दू ही नहीं, नॉन-हिन्दू भी बायें को उपेक्षित करते हैं। बायें हाथ से हाथ मिलाना अशिष्टता माना जाता है। हम “लेफ्ट हैण्डेड कॉम्प्लीमेण्ट” (left handed compliment -  प्रशंसा की चाशनी में डूबी कटु-आलोचना) क्यों देते हैं? क्या हम साम्यवादियों को लेफ्टिस्ट इस लिये कहते हैं कि हम उनसे अरुचि रखते हैं? मैला उठाने का काम बायें हाथ को क्यों सौंपा जाता है? सवेरे शौच के बाद धोने के लिये बायां हाथ ही नामित है! एक बच्चा जो बायें हाथ का प्रयोग करता है, को हतोत्साहित कर दायें हाथ का प्रयोग करने पर जोर डाला जाता है।

क्या इसका बच्चे पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है? क्या खब्बू जीवन में अपने को सिद्ध नहीं कर पाते? कई महान क्रिकेटर बायें हाथ से खेलने वाले हुये हैं। बिल क्लिंटन, गैरी सोबर्स, सचिन तेंदुलकर आदि कई महान खब्बू हैं। 

 GV and wife at marriage
विवाह के समय श्री और श्रीमती विश्वनाथ
आरती करते समय दांया हाथ जलते कपूर वाले दीपक को लिये रहता है और बांया हाथ घण्टी बजाता है। कल्पना करें कि कोई इसका उलट करे।

वह तो स्केण्डल हो जायेगा! पुजारी हमेशा दायां हाथ प्रसाद देने के लिये करता है। हम भी दायें हाथ से प्रसाद लेते हैं। बायें से कभी नहीं। हाथ दोनो बराबर बनाये हैं भगवान ने। 

हम अपने दायें हाथ से बहुत काम कराते हैं और बायें को अण्डर यूटिलाइज करते हैं। शास्त्र क्या कहते हैं इस पर? मैने जाति-वर्ण-धर्म के आधार पर भेद-भाव सुना है। पर हम क्या शरीर के दिशात्मक भेदभाव के दोषी नहीं हैं?

मेरा जब विवाह हुआ, तब मेरी पत्नी मेरे दायें खड़ी थीं। क्या इसी कारण से वे “बैटर-हाफ” हैं? बस यूं ही सोच रहा हूं!

सादर,
जी विश्वनाथ
जे.पी. नगर, बेंगळूरु
प्रवीण पाण्डेय की टिप्पणियां काफी दमदार होती हैं। उनसे मैं कह भी चुका हूं कि अपना निजी ब्लॉग न प्रारम्भ कर रहे हों, तो भी विश्वनाथ जी की तरह अतिथि पोस्ट इस ब्लॉग पर ठेल सकते हैं। देखते हैं, क्या मंशा है।  

Thursday, April 9, 2009

यशस्वी भव! नकुल!


श्री सिसिल रोड्स की प्रतिमा, विकीपेडिया से। Rhodes'_portrait_bust

सम्भव है आपने सिसिल जॉन रोड्स (१८५३-१९०२) के बारे में पढ़ रखा हो। वे किम्बर्ले, दक्षिण अफ्रीका के हीरा व्यापारी थे और रोडेशिया (जिम्बाब्वे) नामक देश उन्ही का स्थापित है। शादी न करने वाले श्री रोड्स के नाम पर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कॉमनवेल्थ देशों और अमेरिका के विद्यार्थियों के लिये छात्रवृत्ति है और उस छात्रवृत्ति को पाने वाले को रोड्स स्कॉलर कहा जाता है। हमारे श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ के सुपुत्र नकुल रोड्स स्कॉलर हैं।

श्री विश्वनाथ इस पोस्ट के माध्यम से नकुल की आगे की पढ़ाई के बारे में बता रहे हैं।


पिछले साल, अनिता कुमारजी के ब्लॉग पर मैने अपने बेटे नकुल के बारे में लिखा था।

Nakul2 नकुल २००७ के, भारत के पाँच रोड्स स्कॉलर (Rhodes Scholars) में से एक है।
पिछले दो साल से ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) में पढ़ाई कर रहा है।

अगले महीने उसकी दो साल की पढ़ाई पूरी हो रही है और दो साल के बाद  छुट्टियों के लिए घर आ रहा है।

मुझे आप सब मित्रों को यह बताने में अत्यंत हर्ष हो रहा है कि, नकुल को आगे की पढ़ाई के लिए भी, वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ही प्रवेश मिल गया है। वह वहां मास्टर्स प्रोग्राम और पी.एच.डी. भी करना चाहता है और उसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की दी हुई Clarendon Scholarship भी हासिल हुई है। इसके साथ ब्रिटिश सरकार की दी जा रही  ORS (Overseas Student Scholarship) भी मिली है।


नकुल के फोटोग्राफ्स का स्लाइड-शो:

ट्यूशन फीस, कॉलेज फीस और रहने का खर्च (लिविंग अलाउंस) भी उसे प्राप्त हो जाएगा। अर्थात मुझे मेरी अपनी जेब से कोई खर्च की आवशयकता नहीं पढ़ेगी।

ये छात्रवृत्तियाँ उसे अपनी योग्यता के कारण मिली हैं और इसके लिए उसे दुनिया भर के उत्तम छात्रों से स्पर्धा करनी पढ़ी है।

मेरी चिंताएं अब दूर हो गई हैं। मेरे अपने करीयर का अंत अब सामने है। भविष्य अगली पीढ़ी का है। ईश्वर की बड़ी कृपा है हम पर कि हमें ऐसा बेटा मिला।

अपनी खुशी आप सब से बाँटना चाहता हूँ, ज्ञानजी के ब्लॉग के माध्यम से।

सबको मेरी शुभकामनाएं

Vishwanath in 2008
जी विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु


Thursday, March 12, 2009

जी विश्वनाथ: मंदी का मेरे व्यवसाय पर प्रभाव


मैं एक  स्ट्रक्चरल इन्जीनियर (structural engineer – संरचना अभियंता) हूँ। मेरा विशेष ज्ञान और अनुभव इस्पात के बने हुए औद्योगिक संरचनाओं के अभिकल्पन के क्षेत्र में (Design of steel structures in Industrial buildings ) है।

Vishwanath Smallश्री जी विश्वनाथ ने अपने मन्दी से सम्बन्धित अनुभव को इस अतिथि-पोस्ट में बखूबी व्यक्त किया है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे अपने ब्लॉग पर वह प्रस्तुत करने का मौका मिला है। क्या अच्छा हो कि इस माध्यम से मन्दी पर एक सार्थक चर्चा प्रारम्भ हो सके!

आप श्री जी विश्वनाथ विषयक पोस्टें लेबल सर्च से देखने का कष्ट करें।

मैने 26 साल तक एक सरकारी संस्थान में काम किया। फिर ढाई साल एक प्राइवेट कंपनी में महाप्रबन्धक (General Manager) की पोस्ट पर काम करने के बाद  2004 अप्रैल में, 55 साल की उम्र में हमने नौकरी छोड़कर अपना खुद का एक छोटा सा KPO (Knowledge process outsourcing) का व्यवसाय आरंभ किया था।

उस व्यवसाय में ९० प्रतिशत पूँजी लगाई थी अमरीका में बसे मेरे एक मित्र ने जो भारतीय था लेकिन अब अमरीका में बसकर अमरीकी नागरिक बन गया है। उनको मुझपर पूरा भरोसा था। मेरे लिए वही वेंचर केपिटलिस्ट (Venture Capitalist) थे। मैंने कोई खास रिस्क नहीं ली थी इस व्यवसाय में आने में। वैसे भी तीन साल में मुझे रिटायर होना था। मैंने सोचा यदि, कैरीयर की अंत से पहले कुछ करना/ कमाना है, तो यही मौका है। ऑउटसोर्सिंग के लिए यह बूम का समय था। मैने सोचा कि बहती गंगा में यदि हाथ धोना है, तो इससे बढ़िया अवसर कभी नहीं मिलेगा।

हमारा नया व्यवसाय था अमरीकी फेब्रिकेटर्स के लिए अमरीकी वास्तुविद/इन्जीनियर्स  के डिजाइन/ड्रॉइंग्स पर आधारित, विस्तृत ढ़ांचागत ड्राइंग (Detailed fabrication drawings) तैयार करना। साथ में हम, Bill of materials, bolt list, CNC files (computer numerically controlled files), 3D models वगैरह भी supply करते थे।


industrial steel structureएक औद्योगिक स्टील अभिकल्पना
हमने कई लाख रुपये लाइसेंस युक्त सॉफ्टवेयर/हार्डवेयर खरीदने में लगा दिए थे। इसके अलावा केवल पाँच लाख का खर्च करने से, अपने घर में ही मैने अपना कार्यालय खोल दिया। शुरू में १७ ईंजिनियर/डिप्लोमा वाले काम पर लगा दिए थे। काम सीखने  के बाद एक एक करके यह लोग छोड़कर जाते थे। उनके बदले में हम नये लोगों की भर्ती करते रहते थे। अब दस लोग बचे हैं।

मेरे अमरीकी पार्टनर का जिम्मा था काम ढूँढना, मुझ तक पहुँचाना, ग्राहक के साथ संपर्क रखना, और पेमेण्ट उगाहना/प्राप्त करना। मेरा जिम्मा था कर्मियों का रिक्रूटमेण्ट, ट्रेनिंग, उत्पादन और उत्पाद सुपुर्दगी। आमदनी हम आपस में बाँटते थे (कर्ज के किस्तों को समायोजित करने के बाद)।


GV and his team Feb 2009श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ अपनी टीम के साथ

हमारी सफ़लता इसी में थी कि अमरीका में यही ड्राइंग बनाने में उन लोगों के लिए खर्च चार या पाँच गुना होता। हम यही काम यदि  देशी फेब्रिकेटर्स के लिए करते तो दाम एक चौथाई ही मिलता। यदि हम दुगुना भी माँगते तब भी अमरीका वालों के लिए आधे दाम पर हमारी सेवाएं उपलब्ध होती। यही विन-विन सिचयुयेशन (Win-Win situation) है – आउटसोर्सिंग धंधे की सफ़लता का राज़। इस व्यवसाय में हमारा आउटपुट ऐसा था  जो हम आसानी से, बिना पैसे खर्च किए, इंटरनेट के माध्यम से उन लोगों तक पहुँचा सकते थे। जब मैं सरकारी संस्थान में काम करता था तो कागज़ के फ़ाइलों को एक विभाग से, उसी इमारत में स्थित किसी दूसरे विभाग तक पहुंचाने में कभी कभी एक दिन भी लग  सकता था! वह पूर्णत चपरासी की कृपा पर निर्भर होता!  यहाँ हम एक फ़ईल केवल पाँच मिनट में हज़ारों मील दूर पहुँचाते थे।

समय भी अनुकूल था। जब वे (अमरीकी) सोते थे, हम यहाँ काम जारी रखते थे। हम जब सोते थे, उनका काम भी जारी रहता था। प्रोजेक्ट का काम कभी रुकता नहीं था। सुबह और शाम को हमारा संपर्क का समय रहता था (Skype/MSN Messenger/Yahoo Messenger के जरिये)। अंग्रेज़ी भाषा में हमारी दक्षता से वे काफ़ी प्रभावित होते थे।

यह व्यवसाय, बिना कोई रुकावट पाँच साल चला। इन पाँच सालों में हमने अमरीकी मित्र की पूँजी की वसूली भी की। हम कर्ज से मुक्त हुए। अच्छी कमाई भी हुई। औसत तौर पर, नेट आमदनी सरकारी तनख्वाह से तीन गुना ज्यादा थी और इस बीच हम बेंगळूरु में एक अपार्टमेण्ट भी खरीदने में कामयाब हुए, (मेरी Reva Car सो अलग!)। इन पाँच सालों में कम से कम ३० नए इंजिनियरों का हमारे कार्यालय में प्रशिक्षण भी हुआ। उन लोगों का वेतन दुगुना हुआ। और कई लोग हमसे विदा होकर अन्य बड़े कंपनियों में इससे भी अच्छी नौकरी पाने में सफ़ल हुए।

अचानक यह मन्दी का दौर चलने लगा। पिछले साल से ही हमने इसका प्रभाव महसूस किया था पर शुरू में हम अधिक चिंतित नहीं हुए थे। हमने सोचा -

“हर व्यवसाय में उतार चढ़ाव तो होता ही है। बस कुछ महीने कमर कसकर जीना सीखो। खर्च कम करो। नए निवेश पर रोक लगा दो। कर्माचारियों की सालाना वेतन वृद्धि स्थगित कर दो। अब नुकसान तो नहीं होगा। कर्ज की वसूली तो हो गई है। बस जब तक आमदनी खर्च से कम नहीं हो जाता, हम यूँ ही व्यवसाय चलाते रहेंगे। दिन अवश्य बदलेंगे और  अब, जब कर्ज से मुक्त हो गए हैं तो आगे चलकर खूब मुनाफ़ा होगा।”

पर तकदीर ने हमारा साथ नहीं दिया। हालत बिगड़ती गई। नए प्रोजेक्ट आने बन्द हो गए या स्थगित होने लगे। अपने फेब्रिकेटर से पूछने पर मालूम हुआ के वह भी उतना ही परेशान है। वह जनरल कॉण्ट्रेक्टर (General Contractor – GC) को दोष देने लगा जिसने  पेमेण्ट रोक रखा था। GC ने ग्राहक की तरफ़ इशारा किया। ग्राहक ने बैंको को दोष दिया जहाँ से पैसा आना था।

कुछ छोटे मोटे प्रोजेक्ट आने लगे हमारे पास पर आमदनी घटती गई।

सन २००८ के अंत तक पानी चढ़कर नाक तक पहुँच गया और हमारा निर्णय लेने का समय आ गया। या तो डूब मरो, या अपने आप को किसी तरह बचा लो। चाहे आगे आमदनी न हो पर कम से कम घाटे से अपने आप को बचा लो। अपना घर गिरवी रखकर शायद एक और साल काम चला सकता था पर इस उम्र में इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए हम तैयार नहीं थे। क्या पता एक साल बाद घर भी बह जाए।

सही समय पर मुझे अपने आपको बचाने का अवसर मिल गया। मेरा तो धन्धा छोटे पैमाने पर चल रहा था। मुझे लोग छोटा पर अच्छा बन्दा (small but good fry) मानते थे। इस धन्धे में मेरा अच्छा नाम भी था। इसी धन्धे में चेन्नै में स्थित एक और कंपनी है जिसके सौ से भी ज्यादा कर्मचारी हैं और जिनका टर्नओवर मेरे से १५ गुना ज्यादा है। मेरी कंपनी खरीदने के लिए यह लोग राजी हो गए। मन्दी और हालात से परेशान होकर मुझे अपनी कंपनी की हिस्सेदारी (shares) को मूल्य पर (at par) बेचना पड़ा। मेरे कर्मचारियों की भलाई इसी में थी। और मैं दुखी नहीं हूँ।

आज, दिनचर्या पहले जैसी ही चल रही है। कंपनी को मैं ही चला रहा हूँ लेकिन अब मुझे तनख्वाह मिलती है। आगे जो होगा वह अब मेरी चिंता नहीं। यदि मन्दी से बचकर हम भविष्य में उन्नति करते हैं तो मुनाफ़ा मेरा नहीं होगा। यदि हालत और बिगड़ जाती है तो नुकसान भी मेरा नहीं। बस रिटायर होकर, ज्ञानजी के ब्लॉग पर जाकर शरण लेंगे और खूब टिप्पणी करेंगे!

--- गोपालकृष्ण विश्वनाथ, बेंगळूरु।


महेन की पिछली पोस्ट पर टिप्पणी:

mahenमंदी की चर्चा ब्लॉगजगत में न देखकर मुझे भी थोडी हैरानी हुई मगर मुझे लगा शायद अपने गायब रहने की वजह से मुझे पता नहीं चला होगा। मगर मुझे नहीं लगता कि जिन लोगों को मंदी की चपेट लगी है, या जो इससे बहुत प्रभावित हुए हैं, ऐसे लोगों की उपस्थिति हिंदी ब्लॉगजगत में ज्यादा है। जो हैं, मेरी तरह, उनकी सिट्टी-पिट्टी मेरी ही तरह गुम है और ब्लॉगजगत से गायब रहेने का सबब भी यही मंदी है। हो सकता है मेरा मत गलत हो।


Monday, October 13, 2008

यह सबसे बड़ी टिप्पणी है!


ज्ञानजी,
यह मैं क्या पढ़ रहा हूँ?
जब कोई विषय नहीं सूझता था तो आप मक्खियों पर, आलू पर और टिड्डे पर लिखते थे। चलो आज और कोई अच्छा विषय न मिलने पर मुझ पर एक और लेख लिख दिया। विनम्रता से अपना स्थान इन नाचीजों के बीच ले लेता हूँ !

Vishwanath Small
यह लेख श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी ने "कुछ और विश्वनाथ, और आप मानो तर गये!
" पर टिप्पणी के रूप में लिखा है। एक दक्षिण भारतीय की इतनी अच्छी हिन्दी में इतनी विस्तृत टिप्पणी! आप उसका अवलोकन करें।

चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं। मज़ाक मुझे बहुत पसन्द है (और जब और लोग मेरे साथ मज़ाक नहीं करते, तो स्वयं कर लेता हूँ!)

मुझे  आपने बहुत "लिफ़्ट" दे दिया। दिनेशरायजी और अनिल पुसाडकरजी ठीक कहते हैं। मैं अकेला नहीं हूँ। और भी लोग हैं जो आपके ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ते हैं। यदा कदा उनके बारे में भी कुछ लिखिए (तसवीर के साथ)। औरों के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूँ। अवश्य वे मुझसे ज्यादा सुन्दर दिखते होंगे। समीरजी से शुरुआत की जाए। देखने में पहलवाल लगते हैं और लिखने में भी पहलवान से कम नहीं)।

अच्छे ब्लॉग तो बहुत सारे लिखे जा रहे हैं। हर एक को पढ़ना हमारे लिए असंभव है। फ़िर भी, आपका ब्लॉग मैं नियमित रूप से पढ़ता हूँ। इसके कारण हैं:


एक ब्लॉगर का स्वप्न हैं विश्वनाथ जी जैसे पाठक। आप आधा दर्जन गोपालकृष्ण विश्वनाथ को पसन्द आ जायें तो आपकी जिन्दगी बन गयी! हम उनकी राह में ताकते हैं जो प्योर पाठक हैं। प्रबुद्ध पाठक। वे आपके लेखन का मानदण्ड भी स्थापित करते हैं। आप जबरी अण्ट-शण्ट नहीं ठेल सकते।
... "कुछ और विश्वनाथ, और आप मानो तर गये" से।

१) एक तरह का भाइचारा। हम दोनों बिट्स पिलानी के छात्र रहे हैं|

२) उम्र में ज्यादा अन्तर नहीं। उम्र में आपसे बडा हूं लेकिन सोच में कभी कभी आप हम से बडे नजर आते हैं।

३)आप विषय विशेषज्ञ नहीं हैं, आपके लेखों पर टिप्पणी करना मेरे लिए आसान है; और ज्यादा सोचना भी नहीं पढ़ता। तात्कालिक टिप्पणी  सहजता से कर पाता हूँ। ("इम्प्रोम्प्टु" और "स्पॉन्टेनियस" कहना चाहता था पर ऐन वक्त पर हिन्दी के उपयुक्त शब्द मिल गए!)

४)आप नियमित रूप से लिखते हैं। जब कभी यहाँ पधारता हूँ कुछ न कुछ नया पढ़ने को मिलता है और विषय हमेशा "सस्पेन्स" में रहता है।

५) आप कोई बडे साहित्यकार नहीं हैं जो हम आम लोगों के मन मे "कॉम्प्लेक्स" पैदा करते हैं। जब कोई बहुत ही ऊँचे दर्जे का लेख पढ़ता हूँ तो डर लगने लगता है। क्या हम जैसे साधारण लोग इन लेखों पर टिप्प्णी करने की जुर्रत कर सकते हैं?

६)आपको भी वही बीमारी है जो मुझे है, और यह की भाषा की शुद्धता पर आवश्यकता से अधिक जोर नहीं दिया जाता है। आप से सहमत हूँ कि ब्लॉग्गरी कोई साहित्य का मंच नहीं है। यहाँ हम पांडित्य प्रदर्शन करने नहीं आते। आपका  यहाँ-वहाँ अंग्रेज़ी के शब्दों का "इम्प्रोवाइसेशन" हमें बहुत भाता है चाहे अनूप शुक्लाजी और दिनेशरायजी को यह पसन्द न हो। यहाँ गप शप का माहौल रहता है जो मुझे आकर्षित करता है।

========

Vishwanath at workdesk at Bangaloreसमीरजी, आपका ब्लॉग भी नियमित रूप से पढ़ता हूँ। ज्ञानजी का ब्लॉग तो सुबह सुबह कॉफ़ी के साथ "जल्दी जल्दी" पढ़ता हूँ  लेकिन आपके ब्लॉग का सब्सक्राइबर हूँ। ई मेल डिब्बे में नियमित रूप से आपके लेख पहुँच जाते हैं और इत्मीनान से पढ़ता हूँ, और आनन्द उठाता हूँ।

बस जब टिप्पणी करने की सोचता हूँ तो देखता हूँ इतने सारे लोग टिप्पणी  कर चुके हैं अब तक। एक और टिप्पणी का बोझ क्यों आप पर लादूँ? वैसे कहने के लिए कुछ खास होता नहीं है। सोचता हूं - छोडो इस बार; अगली बार टिप्पणी करेंगे। यह "अगली बार" बार बार आता है और चला जाता है।

ब्लॉग जगत में और भी मित्र हैं लेकिन मैंने देखा है के वे नियमित रूप से लिखते नहीं हैं और उनके यहाँ पधारने पर कई बार वही पुराना पोस्ट नजर आता है ("अनिताजी, are you listening?")

कई और ब्लॉग हैं (जैसे रवि रतलामीजी, अनूपजी और शास्त्रीजी के ब्लॉग) जहाँ मुझे रोज पधारने के लिए समय नहीं मिलता लेकिन उनके यहाँ सप्ताह में एक या दो बार जाता हूँ और एक साथ सभी लेखों को पढ़ता हूँ। मुसीबत यह है कि यह नहीं तय कर पाता कि किस लेख पर टिप्प्णी करूँ और यदि कर भी दिया तो क्या इतने दिनों के बाद टिप्पणी में दम रहेगा? मामला तब तक ठंडा हो चुका होता है।

आपके यहाँ कई नामी ब्लॉग्गरों के नामों से परिचित हुआ  हूँ। मन करता है कि किसी का ब्लॉग न छोड़कर सब को पढ़ूँ लेकिन यह कहने की आवश्यकता नहीं की यह सरासर असंभव है। फ़िर भी कभी कभी समय मिलने पर यहाँ वहाँ झाँकने का मजा उठाता हूँ लेकिन जानबूझकर टिप्पणी करने की प्रवृत्ति पर रोक लगा लेता हूँ। ब्लॉग नशीली चीज है। एक बार किसी नए ब्लॉग्गर से सम्बन्ध जोड़ लिया तो फ़िर उसके साथ इन्साफ़ भी करना होगा। उसका भी ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ना पढ़ेगा और टिप्पणी करके उसे प्रोत्साहित करना होगा। क्या इस जिम्मेदारी के लिए समय हैं मेरे पास? यह सोचकर, कई अन्य चिट्ठाकाकारों के लेखों का कभी कभी आनन्द उठाता हूँ पर जान बूझकर टिप्पणी नहीं करता।

दूर से उन सबको मेरा गुमनाम सलाम!
--- गोपालकृष्ण विश्वनाथ


Tuesday, October 7, 2008

कुछ और विश्वनाथ, और आप मानो तर गये!


Vishwanath_with_his_Reva_2 एक ब्लॉगर का स्वप्न हैं विश्वनाथ जी जैसे पाठक। आप आधा दर्जन गोपालकृष्ण विश्वनाथ को पसन्द आ जायें तो आपकी जिन्दगी बन गयी! हम उनकी राह में ताकते हैं जो प्योर पाठक हैं। प्रबुद्ध पाठक। वे आपके लेखन का मानदण्ड भी स्थापित करते हैं। आप जबरी अण्ट-शण्ट नहीं ठेल सकते। आप टिम्बकटू के उलूलुलू नामक राष्ट्रीय पक्षी (यह क्या है?) पर धारावाहिक पोस्टें नहीं लिख सकते। ये सज्जन आपको पूरी गम्भीरता से पढ़ते हैं। और आपके लेखन में छिद्र अगर हों तो आपको धोने में कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। वे आपके साथ इमोशनली जुड़े हैं। और आपको लण्ठई नहीं करने देंगे।

कल एक सज्जन मेरी पोस्ट पर आये - राजेश बाजपेयी। पता नहीं वे मुझे कितना जानते हैं। मैं तो उन्हे न जान पाया – उनका ब्लॉगर आई.ड़ी. किसी प्रोफाइल को इंगित नहीं करता। उन्होंने टिप्पणी में कहा -
…तो आप लिखते रहिये, हम क्रिटिक तो हैं नही बस इत्ता कह सकते हैं की आपका लिखा, पढ़ना अच्छा लगता है।
राजेश बाजपेयी
उन्होंने नाम लिखा है तो मैं मान कर चलता हूं कि वे राजेश बाजपेयी ही होंगे। मैं चाह रहा हूं कि उनका ई-मेल, फोटोग्राफ और कुछ लेखन मिल पाता जिसे मैं गर्व से प्रदर्शित कर पाता – कि यह हैं मेरे एक पाठक। और यदा-कदा वे अतिथि पोस्ट का कण्ट्रीब्यूशन करने लगें तो क्या कहने?!

यह समझ में आता गया है – हम यहां ब्लॉगिंग में अन्ना कारनीना या नदी के द्वीप नहीं रच रहे। और वह रच पाने का भ्रम भी नहीं है। लेकिन ब्लॉग के माध्यम से जो सोशल केमिस्ट्री के अणुओं का उद्घाटन/उत्तरोत्तर विस्तार और लिंकेज का हम जबरदस्त प्रकटन देख रहे हैं – वह किसी प्रकार से यूरेका से कम नहीं है।

जी हां, मेरे अन्य कुछ गोपालकृष्ण विश्वनाथ कहां हैं? मैं पूरी ईमानदारी से उन्हें पुकार रहा हूं।

(और सभी ब्लॉगर भी पुकारते होंगे। मेरी पुकार के स्टाइल में लोगों को शायद खुरदरापन लगे।smile_regular)    

Monday, June 9, 2008

अहिन्दी भाषी श्री जी. विश्वनाथ का परिचय और अतिथि पोस्ट



G Vishwanath Small
श्री जी विश्वनाथ
ब्लॉगिंग की सामाजिक ताकत का पूरे ब्लॉस्ट पर अन्दाज मुझे शनिवार को हुआ। और क्या गज़ब का अन्दाज था!

शनिवार की पोस्ट में मैने श्री जी विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु को धन्यवादात्मक फुटनोट लिखा था - उनकी टिप्पणियों से प्रभावित हो कर। उसमें यह लिखा था कि जब वे ४ साल इन्जीनियरिन्ग पढ़ चुके होंगे तब मैं बिट्स पिलानी में दाखिल हुआ था।

Saturday, June 7, 2008

iGoogle से ब्लॉगस्पॉट में पोस्टिंग का गैजेट


मैं मानसिक हलचल में नीचे आने वाले Daily Essential Thoughts के लिये या तो पुस्तकों से कोटेशन टाइप करता हूं या नेट पर से कॉपी-पेस्ट। Daily Essential Thoughts मेरा ब्लॉग है जो नीचे वाली विजेट को फीड प्रदान करता है।
यह कोटेशन पोस्ट करने का एक सरल तरीका कल मुझे मिला। ब्लॉगर-इन-ड्राफ्ट ने iGoogle के लिये एक ब्लॉगर पब्लिशिंग गैजेट बनाया है। इसे आप अपने iGoogle पेज पर चस्पॉ कर सकते हैं। चस्पॉ करते समय ध्यान रहे कि आपका ब्लॉगर अकाउण्ट भी उसी आईडी से गवर्न होता हो।