Thursday, April 21, 2011

आगे की सभी पोस्टें "मेरी मानसिक हलचल" पर


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MeriMansikHalchal

Sunday, April 10, 2011

पण्डित रामलोचन ब्रह्मचारी और हनुमत निकेतन

हिन्दू मन्दिरों में बहुत पिचिर पिचिर होती है। ढ़ेर सारे फूल-मालायें सड़ती हैं। उसपर जल, अक्षत, रोली, सिन्दूर, काजल, कड़ुआ तेल और जानबूझ कर बनाये गये संकरे रास्ते - जिससे पण्डा-पुजारी अपनी वैल्यू बना-बेंच सकें। कमोबेश सब मन्दिरों में है यह। अमूमन जितना बड़ा मन्दिर उतना ज्यादा गन्द!
इलाहाबाद में सिविल लाइंस/बस अड्डे के पास हनुमत निकेतन का मन्दिर इस मामले में बहुत साफ सुथरा है। इसको बनाने में पण्डित रामलोचन ब्रह्मचारी जी ने कुछ वैसा ही किया था, जैसे महामना मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय बनाने के लिये किया था। अपनी साइकल पर गली कस्बे छाने थे उन्होने। लोगों ने कहा कि वे बड़ा दान दे कर बनवा देते हैं मन्दिर। पर रामलोचन जी को वह गवारा नहीं था। लोगों से एक दो रुपये चंदे के इकठ्ठे किये। इलाहाबाद के सन सत्तर के आसपास के लोगों को याद होगा अपना चन्दा देना।

Sunday, March 27, 2011

कंटियायुग की आसन्न गर्मियां

Gyan1264-002गर्मियां आने को हैं। दस्तक दे ही दी है। बिजली की किल्लत आसन्न है। हर गली कूचे के किनारे लगे ट्रांसफार्मर गर्म हो कर बम बोलेंगे। फिर निठल्ले लोगों की फौज खड़ी हो कर घण्टों देखेगी कि कैसे ठीक करते हैं उनको बिजली कर्मी। बहुधा ट्रांसफार्मर बदले जाते हैं। उनका तेल रिसता है या चोरी जाता है!
और भी कई तरह की चीजें खराब होंगी। थर्मल या हाइडल (निर्भर करता है कि आपके इलाके के पास कौन सा बिजली का जेनरेशन सोर्स है) से बिजली जायेगी। कई बार अण्डरग्राउण्ड केबल पंक्चर हो जाया करेगी। कई बार बे मौसमी आन्धी-पानी से बिजली बन्द होगी। कई बार लगेगा कि बिजली यदा कदा जाती है तो कई दिन ऐसे लगेंगे कि बिजली यदा कदा आती है!
पर एक चीज कंटियाफंसाऊ यूपोरियन वातावरण में तय है, वह है एक्सेस कंटिया फंसाने की बदौलत बिजली के तार टूटने या बिजली जाने का नियमित खेल। यहां शिवकुटी में पिछले पांच साल से रहते हुये मैं यह खेल यूं देखता रहा हूं, जैसे धृतराष्ट्र की सभा में सभासद आये दिन शकुनि को पासे फैंकते देखते रहे होंगे - बोर होते, पर असहाय!

Friday, February 4, 2011

अमवसा स्नान, कोहरा और पारुल जायसवाल

DSC03119अमवसा[1] का स्नान था दो फरवरी को। माघ-मेला क्षेत्र (संगम, प्रयाग) में तो शाही स्नान का दिन था। बहुत भीड़ रही होगी। मैं तो गंगाजी देखने अपने घर के पास शिवकुटी घाट पर ही गया। सवेरे छ बज गये थे जब घर से निकला; पर नदी किनारे कोहरा बहुत था। रेत में चलते हुये कभी कभी तो लग रहा था कि अगर आंख पर पट्टी बांध कर कोई एक चकरघिन्नी घुमा दे तो आंख खोलने पर नदी किस दिशा में है और मन्दिर/सीढ़ियां किस तरफ, यह अन्दाज ही न लगे। नया आदमी तो रास्ता ही भुला जाये!

वैसे रास्ते की अच्छी रही – पचपन साल की सीनियॉरिटी हो गयी, पर अभी तक मालुम नहीं कि जाना कहां है और रास्ता कहां है। यह जानने-भुलाने की बात तो छलावा है। किसी एमेच्योर दार्शनिक का शब्दों से खेलना भर!

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[1] अमवसा का स्नान - माघ महीने में संगम पर कल्पवास करते श्रद्धालु आमावस्या के सवेरे मुख्य स्नान करते हैं। स्थानीय भाषा में इसे अमवसा का स्नान कहा जाता है। संगम पर अमवसा का मेला लगता है। बहुत भीड़ जुटती है!

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अमवसा स्नान, कोहरा और पारुल जायसवाल


Wednesday, February 2, 2011

सरपत की ओर


सिरसा के उत्तर में गंगा में मजे से पानी है। इलाहाबाद में यमुना मिलती हैं गंगा में। उसके बाद पनासा/सिरसा के पास टौंस। टौंस का पाट बहुत चौड़ा नहीं है, पर उसमें पानी उतना है जितना संगम में मिलने से पहले गंगा में है। अत: जब सिरसा के पहले टौंस का पानी गंगा में मिलता है तो लगता है कि मरीज गंगा में पर्याप्त बल्ड ट्रांसफ्यूजन कर दिया गया हो। गंगा माई जीवंत हो उठती हैं।

पॉण्टून का पुल है गंगाजी पर सिरसा से सैदाबाद की तरफ गंगापार जाने के लिये। चौपहिया गाड़ी के लिये पच्चीस रुपये लगते हैं। रसीद भी काटता है मांगने पर। न मांगो तो पैसा उसकी जेब में चला जाता है। एक दो लाल तिकोनी धर्म ध्वजाये हैं। आसपास के किसी मन्दिर से कुछ श्लोक सुनाई पड़ रहे थे। गंगाजी की भव्यता और श्लोक - सब मिलकर भक्ति भाव जगा रहे थे मन में।

तारकेश्वर बब्बा ने बता दिया था कि गाड़ी धीरे धीरे चले और लोहे के पटिय़ों से नीचे न खिसके। वर्ना रेत में फंस जाने पर चक्का वहीं घुर्र-घुर्र करने लगेगा और गाड़ी रेत से निकालना मुश्किल होगा। ड्राइवर साहब को यह हिदायत सहेज दी गयी थी। धीरे चलने का एक और नफा था कि गंगाजी की छटा आखों को पीने का पर्याप्त समय मिल रहा था।

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सरपत की ओर


Sunday, January 30, 2011

बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस और बायोडाइजेस्टर टॉयलेट


मुझे बताया गया कि यह बैक्टीरिया सियाचिन ग्लेशियर पर सेना के टॉयलेट्स का ठोस अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। इतनी सर्दी में अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने में अन्य कोई जीवाणु काम नहीं करता।

अब यह बेक्टीरिया रेलवे प्रयोग कर रहा है अपने ट्रेनों के टॉयलेट्स में। ट्रायल के तौर पर बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के 23 कोच इसके प्रयोग के लिये तैयार हैं और 17 जनवरी से चल भी रहे हैं।

आत्म-कथ्य - मैं रेलवे के लिये प्रेस विज्ञप्ति ठेलक नहीं हूं और उत्तर-मध्य रेलवे के लिये यह ब्लॉग सूचना डिसिमेनेशन (dissemination  - प्रसारण) का माध्यम भी नहीं है। पर रोज के काम में जब मुझे यह बायोडाइजेस्टर टॉयलेट की जानकारी मिली, तो लगा कि यह सब के लिये रोचक और मेरे सरकारी दायित्व के सन्दर्भ में कण्टकहीन विषय है जिस पर लिख सकता हूं ब्लॉग पर।

पूरी पोस्ट आप पढ़ें मेरी मानसिक हलचल पर:

बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस और बायोडाइजेस्टर टॉयलेट


Thursday, January 27, 2011

मुटापा किसके लिये फायदेमन्द?


मेकिंजे (McKinsey) क्वार्टरली ने चार्ट-फोकस न्यूज लैटर ई-मेल किया है, जिसमें मोटापे की विश्वमारी (महामारी का वैश्विक संस्करण – pandemic) पर किये जा रहे खर्चों के बारे में बताया गया है। मसलन ब्रिटेन में मोटापे से सम्बन्धित रोगों पर दवाइयों का खर्च £4,000,000.000 है। एक दशक पहले यह इसका आधा था। और यह रकम 2018 तक आठ हजार पाउण्ड हो सकती है।

पर जैसा यह न्यूजलैटर कहता है - खर्चा केवल दवाओं का नहीं है। दवाओं से इतर खर्चे दवाओं पर होने वाले खर्चे से तिगुने हैं। मसलन अमेरिका $450बिलियन खर्च करता है मुटापे पर दवाओं से इतर!

इस विषय में पोस्ट आप मेरी मानसिक हलचल पर पढ़ें:
मोटल्ले लोगों की दुनियाँ

Monday, January 24, 2011

कल्लू का बिजूका


अरविन्द वहीं था, गंगा किनारे अपने कोन्हड़ा-नेनुआ के खेत पर। अब वह मुझे पहचानने लगा है; सो दूर से ही उसने नमस्ते करी। मैं उसकी ओर मुड़ा तो बोला - जरा बच के आइयेगा। नीचे नेनुआ के पौधे हैं। पिछले दिनों की सर्दी से पनपे नहीं। वास्तव में नीचे सम दूरी पर जरा-जरा से पौधे थे। मैं बच कर चलने लगा।

अरविन्द पौधे के पास फावड़े से रेत खोद रहा था। उसमें गोबर की खाद मेरे सामने ही बिछाई। बोला - इसपर एक गिलास यूरिया डाल कर समतल कर देंगे और उसके बाद बस सिंचाई ही करनी है।

DSC02986 (Medium)

पहले वह मुझसे कहता था - क्या करें बाबूजी, यही काम है। पर अब वह मुझसे परिचय होने पर खुल गया था और बेहतर आत्मविश्वास में लगा - इस काम में मजूर भी लगा दें तो आधा-तीहा काम करेंगे। पता भी न चलेगा कि खाद पूरी डाली या नहीं। अब खुद के पास समय है तो मेहनत करने में क्या जाता है? 

[पूरी पोस्ट वर्डप्रेस वाले ब्लॉग पर यहां पढ़ें।


Thursday, January 20, 2011

Monday, January 17, 2011

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मैने तय किया है कि वर्डप्रेस पर ब्लॉग पोस्टें लिखने का यत्न करूं। उसका प्रमुख कारण यह है कि वहां टिप्पणी का प्रत्युत्तर देने की अच्छी सुविधा है। अत: आगे पोस्टें आपको वर्डप्रेस पर मिलेगी।

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मेरी मानसिक हलचल पर यह पोस्ट देखें:

पर्यावरण, विकास और थर्मल पावर हाउस