Saturday, January 15, 2011

लोकोपकार और विकास

redtape
रेड टेप निराकरण जरूरी है!
लोकोपकार – फिलेंथ्रॉपी एक ग्लैमरस मुद्दा है। जब मैने पिछली पोस्ट लिखी थी, तब इस कोण पर नहीं सोचा था।  लोकोपकार में निहित है कि अभावों के अंतिम छोर पर लोग हों और हम - मध्यमवर्गीय लोग अपने अर्जन का एक हिस्सा - एक या दो प्रतिशत - दान या जकात के रूप में दें। वह दान किस तरह से सही तरीके से निवेशित हो, उसकी सोचें।

इस दान से कोई सिने स्टार, कोई राजनेता, कोई धर्माचार्य सहज जुड़ सकता है। इस मुद्दे की बहुत इमोशनल वैल्यू है। कोई भी अपनी छपास दूर कर सकता है किसी बड़े दिन कम्बल-कटोरी दान कर। अगर आप नेकी कर दरिया में डालने वाले हैं तो फिर कोई कहने की बात ही नहीं!

Thursday, January 13, 2011

मुसहर, नट और फिलेंथ्रॉपी में निवेश

हममें से हर एक दान देता है। सब से आसान है रेलवे स्टेशन या हनुमान मन्दिर पर उपलब्ध भिखारी को दान देना। पर वह देते समय मन में यह भाव होता है कि एक आदमी को अकर्मण्य बनाने में हम योगदान कर रहे हैँ। अत: इन भिखारियों को अनदेखा करने की भावना भी मन में स्थाई रूप से आती गयी है। फिर भी इन भिखारियों की बड़ी संख्या को देखते हुये लगता है कि यह फिलेंथ्रॉपी (philanthropy - लोकोपकार) का तरीका बहुत लोकप्रिय है।

शायद यह फिलेंथ्रॉपिक इनवेस्टमेण्ट (पी.आई.) का सबसे सुगम तरीका है। जैसे पी.आई. का म्यूचुअल फण्ड हो! पर मेरे ख्याल से इस इनवेस्टमेण्ट का रिटर्न बहुत कम है। सीधे पी.आई. की इक्विटी में निवेश करना चाहिये। 

पी.आई. का रिटर्न इस तरह से मापना चाहिये कि उससे कितने की जान बची, कितने को आपने साक्षर बनाया, कितने को आंखों की ज्योति दी, कितने लोगों को आपने अपने परिवेश के प्रति जागरूक बनाया, आदि... 

Saturday, January 8, 2011

दुर्योधन की डायरी के लीक

duryodhanशिवकुमार मिश्र, दुर्योधन की डायरी के पच्चीस-छब्बीस पन्ने छाप चुके हैं। दुर्योधन ने अब तक इस पर एतराज नहीं किया, सो मान सकते हैं कि उनकी सहमति है। अन्यथा यह सहस्त्राब्दियों का सबसे बड़ा लीक होता! Smile 

यह बहुत लोकप्रिय लीक क्यों है? सभी कलाकार राजनेताओं के लिये दुर्योधन से बड़ा आइकॉन कौन हो सकता है? रावण में वह पोलिटिकल चातुर्य नहीं दीखता। बर्बरता दीखती है – सीतामाता के साथ अन्याय करते हुये। दुर्योधन का सोफिस्टिकेटेड काइंयापन कहां मिलेगा!

शिवकुमार मिश्र के पास जबरदस्त दस्तावेज हैं और वे सारे के सारे लीक नहीं कर रहे हैं। पता नहीं जन दबाव क्यों नहीं पड़ता कि वे सारे के सारे एक साथ लीक कर दें।

मैं वही दबाव डालना चाहता हूं।


Saturday, January 1, 2011

चिठ्ठाचर्चा की एकतर्फियत

CCआप चर्चा करें, पर आप एक वाद की तरफदारी करें तो हम जैसे क्या टिपेरें? एक सज्जन नृशंस माओवादी नक्सली हत्यारों के समर्थक/सहायक हैं। एक कोर्ट उन्हे दण्डित करती है तो बहुत पांय पांय मचती है। वैसे भी आजकल समझ का उलटफेर चल रहा है। हम जिसे गद्दार समझते हैं, वह बुद्धिजीवियों की समझ में महान देश भक्त या मानवता भक्त निकलता है। जिसे बुद्धिवादी महान समाजवादी समझते हैं, वह वह देश बेच-खाने वाला निकलता है। जिसे राजनेता समझते हैं वह … लिहाजा बिनायक सेन के मामले में हम जजमेण्टल कैसे बनें? कुछ हिन्दूवादी थामे गये हैं, उनके बारे में भी जजमेण्टल नहीं हैं।

पर यह देखते आये हैं कि यह नक्सलवाद कोई क्रान्ति फ्रान्ति करने वाला नहीं। शुद्ध माफिया है। रंगदारी वसूलक। तरह तरह के असुर इससे जुड़े हैं। कुछ सिद्धान्तवादी भी शायद होंगे। पर वे चीन के इशारे पर तीस साल से खुरपेंच कर रहे हैं। वे अदरवाइज रिकेटी डेमोक्रेसी का रक्त निकाल रहे हैं। साथ साथ जनता का भी। और इनसे आदिवासी का चवन्नी  अठन्नी भर भी कल्याण हुआ हो, लगता नहीं।

Friday, December 31, 2010

नैराश्य के हीरो

प्रिण्ट में दो लोगों का वन्दन चल रहा है। विकीलीक्स के श्री असांजे और कंट्रोलर एवम ऑडीटर जनरल श्री विनोद राय। ये हीरो हमें कोई नया पथ नया लक्ष्य नहीं दिखा रहे; केवल आसपास फैली सड़ान्ध और बजबजाहट की परत उघाड़ कर दिखा रहे हैं।

इनमें से कोई आने वाले समय को बदलने का ब्लू-प्रिण्ट नहीं जानता। इनकी जितनी सोचता हूं, उतना मन में नैराश्य उपजता है।

Monday, December 27, 2010

अरविन्द पुन:

DSC02947अरविन्द से मैं सन 2009 के प्रारम्भ में मिला था। गंगा किनारे खेती करते पाया था उसे। तब वह हर बात को पूरा कर वह सम्पुट की तरह बोल रहा था - “और क्या करें, बाबूजी, यही काम है”।

कल वह पुन: दिखा। वहीं। रेत में खेती करता। आसपास मुझ जैसे दो तीन तमाशबीन थे। कोंहड़ा की कतारें बड़ी हो गयी थीं। वह कोंहड़ा के आस पास तीन गढ्ढ़े खोद रहा था - करीब दो हाथ गहराई वाले। उनमें वह गोबर की खाद डालकर कुछ यूरिया डालेगा। कोंहड़े की जड़ इतनी नीचे तक जायेगी। वहां तक उनको पोषक तत्व देगी खाद।

खोदते हुये वह कहता भी जा रहा था - "क्या करें, यही काम है।"

बोल रहा था कि पिछली खेती में नफा नहीं हुआ। उसके पहले की में (जिसकी पहले वाली पोस्ट है) ठीक ठाक कमाई हो गई थी। "अबकी देखें क्या होता है?" 

व्यथित होना अरविन्द के पर्सोना का स्थाई भाव है। कह रहा था कि गंगा बहुत पीछे चली गई हैं; सो खोदना फावड़े से नहीं बन पा रहा। वह यह नहीं कह रहा था कि गंगा इतना पीछे चली गई हैं कि खेती को बहुत जगह मिल गई है!

Saturday, December 25, 2010

होरी, तुम शाश्वत सत्‍य हो!

Photos from Peepli Live_1293189630557‘‘पीपली लाइव‘‘ फिल्‍म देखी । फिल्‍म की विशेषता भारतीय गांव का सजीव व यथार्थ चित्रण है ,जिसमे किसानों की कर्ज में डूबने के बाद आत्‍महत्‍या की बढ़ती प्रवृत्‍ति की पृष्ठ भूमि में कूकरमुत्‍तों की तरह फैले खबरी न्‍यूज चैनलों तथा देश की राजनीति पर करारे व्‍यंग किये गये हैं।

Sunday, December 19, 2010

मोटी-मांऊ

Nattu and Motherनत्तू पांड़े आजकल ननिहाल आये हुये हैं। अब डेढ़ साल के हुये हैं तो कारकुन्नी भी उसी स्तर के हैं। कुछ ज्यादा ही। उनकी नानी मगन भी हैं और परेशान भी रहती हैं। अजब कॉम्बिनेशन है उनकी खुशी और उनकी व्यग्रता का।

नाना; पण्डित ज्ञानदत्त पाण्डेय उन्हे प्रधानमन्त्री बनाना चाहते हैं और वे हैं कि अपनी ठुमुकि चलत वाले फेज़ की गतिविधियां करने में ही व्यस्त हैं। कोई गम्भीरता नहीं दिखा रहे आगे की जिम्मेदारियों के प्रति!

उनको भोजन करना एक प्रॉजेक्ट होता है। एक छोटी सी थाली, जिसमें कटोरी एम्बेडेड है; में उनका खाना निकलता है और उसके साथ होने लगते हैं उनके नखरे – न खाने की मुद्रायें दिखाने वाले। तब घर के सारे लोग उन्हे भोजन कराने में जुट जाते हैं। कोई ताली बजाता है। कोई मुन्नी बदनाम सुनाने लगता है तो कोई जो भी श्लोक याद है, उसका पाठ करने लगता है। यह सिर्फ इस लिये कि नत्तू पांडे का ध्यान बंटे और उनके मुंह में एक कौर और डाल दिया जाये।

Friday, December 17, 2010

सुरेश जोसेफ

SJसुरेश जोसेफ से मैं मिला नही‍। जानता भी नहीं। पर गौरी सक्सेना ने मुझे उनके बारे में बताया।

गौरी मेरी सहकर्मी हैं। वे उत्तर-मध्य रेलवे का सामान्य वाणिज्य प्रबन्धन देखती हैं – वैसे ही जैसे मैं मालगाड़ी प्रबन्धन देखता हूं। परसो‍ उन्होने बताया कि सुरेश जोसेफ उनसे मिलने आ रहे हैं। आयेंगे तो वे मुझे फोन कर मिलवायेंगी। पर जोसेफ के आने पर मैं किसी और काम में व्यस्त था, और मुलाकात न हो सकी।

जोसेफ रेल अधिकारी थे, मेरी तरह के। फिर उन्होने रेलवे छोड़ दी। उसके बाद कोच्ची में एक कण्टेनर टर्मिनल का काम देखा। वह प्रोजेक्ट पूरा होने पर इस साल उन्होने अपनी लड़की की शादी की। अब अपने एक मित्र की एक मारुति स्विफ्ट कार उधार ले कर अकेले भ्रमण पर निकले हैं भारत का। बहुत अच्छी तरह नियोजन कर यात्रा प्रारम्भ की है अक्तूबर’१० के प्रारम्भ में।

Sunday, December 12, 2010

कुछ उभर रही शंकायें

पिछले चार-पांच महीनों में सोच में कुछ शंकायें जन्म ले रही हैं:

    1. लौकी के नीचे दबा सिर अगर मुक्त होती अर्थव्यवस्था सही है, तो छत्तीसगढ़-झारखण्ड-ओडिसा के आदिवासियों की (कम या नगण्य) मुआवजे पर जमीन से बेदखली को सही कहा जा सकता है? माओवादियों या लाइमलाइट तलाशती उन देवियों की तरफदारी को नकारा जाये, तब भी।
    2. मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर यत्न करते भारत के डेढ़ दशक से ज्यादा हो गया। आठ-नौ परसेण्ट की ग्रोथ रेट आने लगी है। पर न करप्शन कम हो रहा है न क्राइम। बढ़ता ही नजर आ रहा है। गड़बड़ कहां है?
    3. प्राइवेट सेक्टर प्रॉडक्ट बेचने में बहुत तत्पर रहता है। पर जब सेवायें देने की बात आती है, तो लड़खड़ाने लगता है। चाहे वह प्रॉडक्ट सम्बन्धित सेवायें हों या फिर विशुद्ध सेवायें - सफाई, प्रॉजेट के ठेके, खानपान।
    4. कम्प्यूटरों पर सरकारी दफ्तरों में बेशुमार खर्च है। पर कर्मचारियों की भरमार में काम करने वाले कर्मचारी दीखते ही नहीं। कम्प्यूटर भी मेण्टेन नहीं - न ढंग के एण्टीवाइरस, न स्तरीय प्रोग्राम।