Wednesday, May 23, 2007

बॉस, जरा ऑथर और पब्लिशर का नाम बताना?

नौटियाल जी (विश्व के सारे नौटियाल क्षमा करें; यह छ्द्म नाम से वास्तविक चरित्र पर पोस्ट है और वास्तविक सज्जन नौटियाल नही हैं) पिछली रात ऑफीसर्स क्लब में दारू के काउण्टर पर ही जमे थे. वैसे वे सामान्यत: क्लब में वहीं पाये जाते थे. अगले दिन मण्डल रेल प्रबन्धक ने उन्हे काम में अपडेट न रहने पर भरी सभा में खूब धोया. बेचारे को थोड़ा हैंगओवर बचा था. सूरत दयनीय सी थी.

नौटियाल जी अगर आपके साथ यात्रा पर हों तो उनका भोजन/चाय आपके जिम्मे होता था. और तो और सैलून में उनकी अटैची भी नहीं होती थी. पैण्ट की पीछे की जेब में अपना टूथ ब्रश ले कर चलते थे. पैंट-कमीज और अधोवस्त्र जो पहने होते थे वही वे शाश्वत पहने रह सकते थे. टूथ-पेस्ट और साबुन देना आपके जिम्मे होता था. दाढ़ी उनकी ज्यादा बढ़ती नहीं थी।

प्रोमोशनल अनुरोध : कृपया शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग भी देखने का कष्ट करें। हम इसे रोचक जुगल बंदी बनाने का यत्न करेंगे।

ब्रेन इतना शार्प था कि थोड़ा कुछ मालुम हो तो विशुद्ध गोली और मासूमियत से अपना काम चला लेते थे. पर उसदिन हैन्गओवर के चलते डीरेल हो गये.

मैं उन्हे अपने कमरे में ले आया. चाय का आदेश दिया. चूंकि वे उस समय अर्जुन-विषाद योग से ग्रस्त लग रहे थे, मैने भग्वद्गीता पर प्रवचन प्रारम्भ कर दिया. स्थितप्रज्ञ दर्शन पर मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में बोलने लगा. नौटियाल जी उपयुक्त प्रकार से सिर हिला रहे थे. मैं और जोश में बोलने लगा. मेरा प्रवचन 15-20 मिनट चला होगा. इस बीच मैने और इम्प्रेस करने को अपने ब्रीफ केस से गीताप्रेस वाली भग्वद्गीता की प्रति निकाल कर 3-4 श्लोक भी कोट कर दिये.

एक सफल वक्ता की तरह मैने सोचा कि आज मैने एक विषाद युक्त जीव का भला किया है. नौटियाल जी जाने लगे तो बोले बॉस, ये किताब बड़ी अच्छी मालुम पड़ती है. जरा इसका ऑथर और पब्लिशर बताना. मेरे डैड किताबें पढ़ते हैं. उन्हे बताऊंगा.

मेरे समाज-सुधारक/वक्ता/मोटीवेशनल लीडरपने की अचानक कैसे फूंक निकल गयी; मुझे आभास तक नहीं हुआ. मुझमें इतनी ताकत नहीं बची थी कि कहता – “वैशम्पायन व्यास ने लिखी है. कृष्ण नाम के व्यक्ति के सरमंस हैं इसमें. और पब्लिशर्स तो हजारों हैं.”

मेरा मुंह अवाक खुला का खुला था. नौटियाल जी मेरे कमरे से जा चुके थे.

Tuesday, May 22, 2007

मायावती जीती हैं. क्या दलित भी जीता है?

डेढ़ साल पहले मैं बनारस में पोस्टेड था. छोटी सी खबर थी हिन्दी के अखबार में एक मुसहर ठण्ड से मर गया था गॉव में. गॉव का नाम मेरे ससुराल का था. मैने अपने साले से फोन पर पूछा तो खबर सही निकली. समाजसेवी तो हूं नहीं, अत: मेरे पास सम्वेदना व्यक्त करने का कोई जरीया नहीं था. मैने 500 रुपये देकर अपने एक कर्मचारी से 5 सस्ते वाले कम्बल मंगवाये और अपने साले के पास भेज दिये कि उन्हे मुसहरों में बंटवा दें. कम से कम पांच मुसहर तो ठण्ड झेल जायेंगे बिना मरे.

मित्रों, हमारे पास सम्वेदना है, समाधान नहीं है. अपनी रोजी-रोटी में ही ऐसे फंसे हैं कि समाज की क्या देखें. पता लगा कि मुसहरों के पास कुछ भी सम्पत्ति नहीं है. पता नहीं वोट भी है या नहीं. जमीन तो मड़ई बनाने को भी नहीं है. इधर-उधर डेरा बना लेते हैं, वहां से कभी भी दुरदुरा कर अलग कर दिये जाते हैं. सबसे जरूरी है कि इन्हें जमीन का हक मिले. मायावती अकेले दम पर जीती हैं क्या यह हक मिलेगा?

यह जानने को मैं पुन: अपने साले जी की शरण में गया. वह गांव में रहता है. अब ग्राम प्रधान भी है. इस बार चुनाव में उसे सांसदी का टिकट मिलते-मिलते रह गया. जमीनी हकीकत जानता है. उसने बताया उसके क्षेत्र में दलितों के पास जमीन हो गयी है. गलीचा बुनकर कुछ ने खरीद ली है. कुछ को सरकार ने समय-समय पर पट्टे दिये हैं. करीब 40-50% के पास जमीन/पट्टे हैं. पर आगे और जमीन बांटने को है ही नहीं. कुल मिला कर इस इलाके में 50-60% व पूरी यूपी में इससे कहीं ज्यादा दलितों के पास जमीन/पट्टे नहीं हैं. ये दलित गांव मे रहेंगे. ओवरनाइट शहरी नहीं होंगे. कहां से मिलेगी जमीन? कैसे होगा उनका एम्पावरमेण्ट?

उत्तर प्रदेश चुनाव विषयक एक व्यंग पोस्ट जो मेरे छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने लिखी हैं, कृपया यहाँ देखें : उत्तरप्रदेश में आम आदमी जीता हैं क्या?

एक और पेंच है. जिस जमीन के केवल पट्टे मिले हैं, वह जमीन अगर वास्तव में दी गयी तो बसपा से जो सवर्ण जीते हैं; उनमें और दलितों में भी तनातनी होगी. सवर्ण जमीन शायद दे दें वह जमीन इतनी नहीं है कि उससे सरकार में होने वाली मलाई छोड़ दी जाये. पर जमीन का मामला मूंछ की ऐंठ से जुड़ा होता है. उस ऐंठ का क्या होगा?

मुझे लगता है मायावती जीतना चाहती थीं; सो अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के चलते उन्होने वह जीत हासिल कर ली. पर उससे दलित जीता नहीं टेक्टिकल लड़ाई हार गया है. समय के साथ दलित सेगमेंटेशन या दलित कार्ड सॉफ्ट होता जायेगा. आपने अडवानी के जिन्ना वाले स्टेटमेंट से देख ही लिया है. उनके हिन्दू सेगमेंटेशन या हिन्दू कार्ड सॉफ्ट करते ही अधोगति प्रारम्भ हो गयी भाजपा की. अडवानी शार्प पॉलिटीशियन हैं. वे भी कोई सोशल इंजीनियरिंग ले कर आ सकते हैं. पर अब अडवानी के जीतने से क्या हिन्दू जीतने वाला है?

उसी तरह मायावती जी के जीतने से (शायद) दलित जीता नहीं है. बाकी तो समय बतायेगा...


Monday, May 21, 2007

चिठेरा अजर-अमर है!

एक सुकुल जी हैं. फुर्सत से चिठ्ठा लिखते हैं. इतना तो तय है कि:

  • वे हिमालय की कन्दराओं मे नही रहते हैं.
  • वे जवान हैं; वृद्ध नहीं है.
  • गली/मुहल्ला/ईन्दारा/तालाब झांकते हैं यानी सांसारिक जीव हैं. हंसी से विरक्त नहीं हैं.
  • गज भर लम्बा लिख लेते हैं, पर लो आई क्यू वाले को भी कुछ तो पल्ले पड़ जाता है.

बस एक ही अजूबे वाली बात है इनकी उम्र है 250 वर्ष!

भैया, ये ब्लॉगरी की तकनीकें क्या नहीं करा देतीं. आप गूगल प्रोफाईल में अपना डी.ओ.बी. भर दें 12/05/1707 और बन जायें 300 साल के जवान! ऐसा ही किया है अनूप शुक्ला जी ने.

उन्होनें कई बार टिपेरा है हमारे गरीबखाने में. मैने भी टिपेर-ऋण चुकाने के लिये उनका प्रोफाईल देखा तो 250 साल के चिठेरे से वास्ता हुआ. प्रोफाइल में जितने भी ब्लॉग छपे थे सब बण्डल कंटेण्ट में नहीं, काल में. कोई पोस्ट 2007 की नहीं थी. पहले लगा कि कहीं दीर्घ समाधि में न हों सुकुल जी और योगिक पावर से टिप्पणी कर देते हों. फिर मन नहीं माना तो गूगल सर्च से उनकी इण्डिपेण्डेण्ट डोमेन वाली साइट ढूंढी.

यह कहा जा सकता है कि लिख्खाड़ ब्लॉगर को ढ़ूढने के लिये, जो जबरी लिखता हो इस तरह की एक्सरसाइज करने की क्या जरूरत है. पर भाई कभी-कभी ऐसी मूर्खता न करें तो इस तरह की अगड़म-बगड़म पोस्ट लिखने का मसाला कैसे मिले?

कल मैने सुकुल जी के ब्लॉग पर टिपेर कर ऋण कुछ चुकाया है. आगे भी चुकान चलता रहेगा.
बस वे चिर युवा रहने का राज बतादें.

Sunday, May 20, 2007

हिंदी ब्लॉगरी में कौन सा फ्रिक्वेंसी बैंड नहीं हैं?

जीतेंद्रजी ने पिछली पोस्ट की टिप्पणी में अपनी फ्रिक्वेंसी हिंदी ब्लॉगरी से मैच करने की सलाह दी हैं नेक विचार हैं उनकी हर पोस्ट पर जा-जा कर आर.टी.ओ. की लाइसेंस चेकिंग की तरह कर ये प्वाइंट आउट करना बड़ा अच्छा लग रहा हैं की लोगों ने "नारद का तावीज" अपने ब्लॉग पर नहीं बांधा हैं कुछ बेचारे तो डर के मारे 4-4 बार तावीज बान्ध ले रहे हैं. मैं अपने में इसी तरह का पैशन डेवलप करना चाहता हूँ - चाहे किसी फील्ड में हो

हिंदी ब्लॉगरीमें मन लगाने के लिए पारिवारिक माहौल बहुत हैं इसी के वशीभूत काकेश जी हिट काउण्टर की परवाह न कर जुड़े हैं. ऐसा कुछ तुलसी बाबा के साथ रहा होगा जब उन्होने मानस लिखना प्रारम्भ किया होगा.

लेकिन वही फ्रिक्वेंसी बैंड काफी नहीं हैं आप की सम्प्रेषण की जरूरतों के लिए

मेरी पिछली पोस्ट पर लोगों को हिंदी ब्लॉगरी के पक्ष में लिखने का मौका मिला वह हिंदी ब्लॉगरी का सशक्त पक्ष हैं पर वैविध्य की कमी तो हैं ही

एक तो हिंदू - मुसलमान+सेक्युलर/स्यूडो सेक्युलर का झगडा भारी हैं इसी बेकार से मुद्दे पर बडी जूतमपैजार हो रही है. और कुछ ज्यादा ही खिंच गयी हैं यह शायद भारतीय चरित्र का अंग हैं। यह अवगुण छोटा और नजर- अंदाज किये जाने योग्य हैं जो असली कमी हैं, वह हैं विशेषज्ञों का आभाव

मुझे ब्रेन इन्जरी पर वेब साईट बनने में सहायता के बहुत प्रस्ताव मिले पर सभी लोग या तो इनफॉर्मेशन तकनीक से जुडे थे या फिर मेरे जैसे जनरल फील्ड के थे अपने फील्ड के धाकड़ डाक्टर या वकील नहीं थे जिनकी सहायता वेब साईट के मैटर को परिपुष्ट कर सकती अंग्रेजी में मैंने सर्च किया तो अनेक लोग मिले जो केवल इन विषयों में माहिर थे वरन बडे पैशन से लिख रहे थे - पैसा कमाने को नहीं; अपने आनंद के लिए अब यह कमी तो मानी ही जायेगी हिंदी ब्लॉगरी में। विषयों में माहिर लोगों को यह दिक्कत तो होगी कि उनका सारा ज्ञान/उस विषय में सोच अंग्रेजी में होती है और लिखना हिन्दी में है!

पत्रकार ढेरों हैं हिंदी ब्लॉगरी में पर अधिकतर तो हिंदू - मुसलमान+सेक्युलर/स्यूडो सेक्युलर खेमों में समय नष्ट कर रहे हैं ब्लॉगरी में न्यूज कंटेंट ढूंढने का यत्न ये लोग नहीं करते मिसाल के लिए मैंने शिव मंदिर पर बसपा के झंडे का फोटो लेख लिखा मुझे लगता था की इसमें चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन हैं यह लगा की ढेरों पत्रकार हैं ब्लागरी में - कोई तो यह मीडिया में ले जाएगा पर कुछ नहीं हुआ अपने पत्रकार भी तो सहिष्णु हैं वह जब तक नरेंद्र मोदी या सुदर्शन पर कंटिया फंसता हो - अपनी जगह से हिलते नहीं। केवल आत्म-मुग्ध ललित निबन्ध लिखते रहते हैं और इसी में प्रसन्न होते रहते हैं कि उनका सुलेख आम ब्लॉगर के लेख से ज्यादा चमकदार/वर्तनी की गलतियों से रहित/बढिया चित्रों से युक्त/अभिजात्य है!

ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं जो खुजली करते हैं बाकी तो मस्त हैं हिंदी ब्लॉगरी!

Saturday, May 19, 2007

हिंदी ब्लॉगरी बतर्ज फोन इन प्रोग्राम

मैं दफ्तर जाते समय ड्राइवर को टेप/रेडियो बजाने की इजाजत नहीं देता. उस समय मुझे अखबार पढ़ना होता है. अंग्रेजी का अर्थ जगत का अलग से रंग का अखबार. उसमें गला रेत कर हत्या के अवसाद मूलक समाचार नहीं होते. सर्र-सर्र चलती कार में बिजनेस स्टेण्डर्ड का वाचन करते बड़ी अभिजात्य साहबी अनुभूति होती है.

पर शाम को वापस लौटते समय धुन्धलका होता है और अखबार या पुस्तक नहीं पढ़ी जा सकती. ड्राइवर यह जानता है और अपना टेप/रेडियो फुल वाल्यूम पर रखता है. कभी भोजपुरी (श्लीलाश्लील) गाने सुनाता है. कभी ऑल इण्डिया रेडियो का "आपकी फरमाइश – फोन इन कार्यक्रम". मुझे गानों में रुचि कम है, उसका मैं बन्धुआ श्रोता होता हूं. पर आपकी फरमाइश की बात-चीत बहुत एम्यूज़ करती है.

बेचारे श्रोता घंटों से फोन नम्बर घिस रहे होते हैं. फोन लगने पर उनकी खुशी केवल छलकती नहीं, बहती दीखती है. ऐसी खुशी नये-नये ब्लॉगरी में आये व्यक्ति को होती है जिसे समीर जी (या उनके जैसे जोश बढ़ाऊ टिपेरे) ने टिप्पणी दे कर कृतार्थ किया हो.

“जी मेर नाम सपना; माफ करें प्रीती है ... वो जी सपना स्कूल का नाम है; प्रीती घर का ... मेरी ये दोस्त रिंकी भी आप से बात करना चाहती है ... बड़ी देर से ट्राई कर रहे थे ... फोन लगने पर इत्ता अच्छा लग रहा है ... जी वो फलानी फिल्म का ढिमाका गाना सुनना है ... जी मेरी मम्मी भी आ गयी हैं ... वे भी बात करेंगी ... आपको रोज सुनते हैं ...”

“मेरा नाम गब्बर सिघ है जी ... मुझे तो आप पहचानती ही होंगी ... ये अजब इतिफाक है जी कि मैं जब भी फोन मिलाने में सफल होता हूं, आपकी ही ड्यूटी होती है (गब्बर के यह लपेटने पर उद्घोषिका लिपिड़ियाती है, वह उसकी नौकरी है. गली में यह डायलॉग बोलते गब्बर तो कहती - लगाऊं हरामी के पिल्ले दो चप्पल?) ...जी वो 2-3 साल पहले फलाने जी प्रोग्राम पेश करते थे, बतायेंगी वे आजकल कहां हैं ... उन्हे मेरी नमस्ते कहियेगा”

बिल्कुल हिन्दी ब्लॉगरी जैसा माहौल. यहां गदहा सम्मेलन की चर्चा किये चले जाते हैं अरुण जी. शादी का ब्लॉग-पत्र (ई-निमंत्रण) होता है चिठ्ठों पर. पुत्र-रत्न प्राप्ति की खबर होती है. प्राउड ताऊ जी भतीजे का फोटो पेश करते हैं. ये ही क्यों, हम भी भरतलाल की सगाई या कुल्फी लेकर उपस्थित रहते हैं. केवल कुछ ही हंसी को तलाक दिये ब्लॉगर हैं, जो विद्वतापूर्ण लिखते हैं और डिक्शनरी से लैस उनके बन्धुआ/पट्टीदार पाठक टिपेरते हैं.

बस इन विद्वतजनों को छोड़ दें तो हिन्दी ब्लॉगरी बहुत मस्त चीज है – बिल्कुल फोन इन प्रोगाम की तरह! यहाँ माहौल देसी है, अंग्रेजी ब्लॉगरी की तरह फार्मल नहीं।

Thursday, May 17, 2007

हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैं

ढ़ाई आखर में क्या ये खजुराहो को उड़ायेंगे है. उसमें नसीरुद्दीन जी ने तालिबानियों की खबर ली है:
तालिबानियों को लगा कि बामियान के बुद्ध को नष्ट कर, वे प्रसिद्धि के शिखर पर चले जायेंगे। शिखर पर तो गये पर हमेशा की बदनामी के कलंक के साथ। इतिहास हमेशा उन्हें अतिवादी कठमुल्लों के रूप में याद करेगा। और बामियान के बुद्ध का क्या बिगाड़ा.... वे तो स्मृतियों में थे और स्मृतियों में जिंदा रहेंगे।
....... नसीरुद्दीन

बस, अब वे उसी तर्ज पर, मुस्लिम काल में भारत में हजारों मूर्तियों/मन्दिरों के भंजन को भी, उसी स्पिरिट में, अनुचित ठहरा दें। बड़ी कृपा होगी। अपने को उस विरासत से अलग करलें, तो साफ लगेगा की वे केवल हुसैन को बचने को तालिबान की क़ुरबानी नहीं दे रहे वरन सैद्धांतिक बात कर रहे हैं।

पर हुसैन जी फिर भी धतकरम वाले रहेंगे। उनके साथ एक और नाम जुड़ गया है - चन्द्र मोहन का। सायाजी विश्व विद्यालय मे उनके कारण बवाल चल रहा है। मानवाधिकार वाले मोर्चा सम्भाले हैं।

आइए हाथ उठाएं हम भी में लाल्टू जी उसे सेनसेशनलाइज करते हैं : हमला कलाकारों पर है. अभी तक किसी को मारा नहीं है.

पर चन्द्र मोहन के बारे में पॉयोनियर में लिखा है : इस कलाकार ने "कमोड पर नग्न ईसा मसीह के गिरते वीर्य" और "बच्चा जनती नग्न औरत" जिसका कैप्शन था "दुर्गा माता" जैसे अश्लील चित्र बनाये

अगर पायोनियर का लिखा पढ़ें तो ये कलाकार कुत्सित और बजारू प्रतीत होते हैंआप पायोनियर का लेख पढ़ाने की कृपा करें उसके बाद ही अपना खेमा, यदि तय करना चाहते हों, तो करें।

हुसैन और चन्द्रमोहन दोनो एक ही केटेगरी में आते हैं. हिन्दू जैसा नाम कोई कंशेसन नहीं होता अपने आप में!
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और एक बात। खजुराहो या हिंदू साहित्य में नग्नता का घिसा रिकार्ड न बजायें, कृपया। उस के बारे में पहले ही मैं भी लिखा चुका हूँ "हुसैन क्यों फंसे हैं" में।

Wednesday, May 16, 2007

नयी सुपर उच्छिष्ट कुल्फी

हमारे घर में और कोई बीमार हो, चल सकता है. भरतलाल (मेरा भृत्य) बीमार हो जाये तो तहलका मच जाता है.

भरतलाल का नाम अगर चण्डीप्रसाद होता और मेरी पत्नी भरत-भरत की जगह चण्डी-चण्डी टेरती होती तो हर सप्ताह मेरी पत्नी को लक्ष चण्डी जाप का पुण्य मिलता. इतना महत्वपूर्ण है भरतलाल.

भरतलाल का पेट अक्सर खराब हो जाता है. जब भी वह मार्केट जाता है तो एक रुपये वाले 5-6 समोसे दनादन भकोस आता है. पेट तो खराब होगा ही. पर इस बार पेट नहीं, गला खराब हुआ. गर्मी के मौसम में आवाज बैठी हुयी और हल्की हरारत. गरारे करने और पेरासेटामॉल का इलाज चला. दबिश दी तो बताया कि वह 5 रुपये वाली कुल्फी खा कर आया था.

शाम को मैं और पत्नी कुल्फी वाले को ढूढ़ने निकले. तिराहे पर मिले कुल्फी वाले राम आसरे पटेल. हम हड़काने के मूड में चालू होने वाले थे कि ठेले के बोर्ड पर नजर गयी और हंसी निकल गयी. बेचारे पटेल ने बोर्ड तो सही लगाया था. (चित्र देखें)जब राम आसरे खुद ही बता रहे हैं कि उनकी कुल्फी न्यू सुपर वेस्ट (रद्दी/कूड़ा/उच्छिष्ट/अपशिष्ट) है तो दोष कैसे दिया जाये!
हम राम आसरे की पीठ थपथपा कर, अपने मोबाइल से फोटो खींच कर वापस चले आये.राम आसरे आशंकित भी थे - "कौनो जांच त न होई?"

Tuesday, May 15, 2007

कौन से “स्पैमर” से डर लगता है जी?

हरिराम जी से विनम्र निवेदन किया कि वे वर्ड-वेरीफिकेशन वाला चक्कर बंद करवा दें अपने चिठ्ठे पर. पचास की उम्र के बाद अंग्रेजी के आड़े-तिरछे शब्द पढ़ उसे टाइप करना आंखों पर जोर डालता है. पर उन्होने नजर अन्दाज कर दिया.

वैसे भी हिन्दी में टिपेरना कठिन काम है. रोमन में करें तो उड़न तश्तरी वाला आप गदहा लेखक हैं... जैसा कंफ्यूजन का खतरा होता है. प्योर अंग्रेजी में टिपेरने पर अमित (बच के रहना रे!) और ई-पण्डित से इमोशनल रार मोल लेनी होती है. ऊपर से वर्ड-वैरीफिकेशन की वैतरणी पार करना... बड़ा ही झमेला है टिप्पणी करना! केवल समीर लाल और घुघूती बासूती जी जैसे ही हैं जो सारी विघ्न-बाधाओं के बावजूद भी सरल/सटीक टिप्पणी किये मिलते हैं. कभी-कभी तो लगता है कि चिठेरा चिठ्ठा बाद में लिखता है, उसके मनोभाव पढ कर समीर लाल जी की उड़न तश्तरी टिप्पणी पहले कर देती है. खैर, यह तो विषयांतर हो गया.

मुद्दे की बात यह है कि ये वर्ड-वेरीफिकेशन काहे को? हिन्दी में कौन स्पैमर है जो आपके चिठ्ठे पर कम्प्यूटर जेनरेटेड गन्द उंडेलने को तत्पर है? क्या किसी सज्जन ने स्पैमर देखा अपने हिन्दी चिठ्ठे पर? (अगर यह समस्या हो यो कृपया ज्ञान वर्धन करने का कष्ट करें.)

और अगर आपने वर्ड-वेरीफिकेशन की वैतरणी पार कर टिप्पणी भेज देने पर लम्बी सांस ले भी ली तो कई चिठ्ठों पर मॉडरेशन की स्टिक आपको धवांस देती है. जाओ बेटा, आधे घण्टे बाद आकर चिठ्ठे का स्टैट-काउण्टर फिर बढ़ाना और देखना कि चिठ्ठाधिपति ने आपकी टिप्पणी को कृतार्थ किया या नहीं?

अपने समीर लाल जी या अनामदास जी जैसे लिख्खाड़ चिठ्ठाकार मॉडरेशन करें तो बुरा नहीं लगता. पर नये-नये दुधमुंहे, टिप्पणी के तरसते चिठेरे जब वर्ड-वेरीफिकेशन और मॉडरेशन का जंजाल फैलाते हैं, तो जी जल-भुन जाता है.

वर्डप्रेस और इण्डिपेण्डेण्ट डोमेन वाले ब्लॉग्स पर एक और झमेला है. ब्लॉगस्पॉट के लिये अगर आपके कम्प्यूटर पर गूगल आईडी स्थापित है तो आप दन्न से क्लिक कर टिपेरदें. वर्डप्रेस और इण्डिपेण्डेण्ट डोमेन पर आप को अपना नाम-गांव-गोत्र सब भरना पडता है. तभी आप टिप्पणी प्रेषित कर सकते हैं.

आखिर अपन टिप्पणी करने का धर्म निर्वहन कर रहे हैं कोई बन्धुआ मजदूरी थोड़े ही कर रहे हैं!

मित्रों, इन सब विघ्न-बाधाओं के खिलाफ एक चिठ्ठा सुधार आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है? है कोई लीडर?

Monday, May 14, 2007

माया मेमसाहब की सोशल इंजीनियरिंग का जवाब नही!

अपन तो सत्तर के दशक में इंजीनियरिंग पढ़े थे. तब प्रागैतिहासिक काल की टेक्नॉलॉजी हुआ करती थी. फोर्ट्रान फोर में आखें फोड़ कर प्रोग्रामिंग करते थे और कम्प्यूटर दन्न से सिंटेक्स एरर बताते हुये एक पन्ने का प्रिंट-आउट हमारे मुंह पर फैंक देता था. अब तो नये-नये फील्ड आ गये हैं. बायोटेक्नॉलाजी में पडोस की लड़की ऐरे-गैरे कॉलेज से इंजीनियरिंग पढ़ हमारी वर्तमान सेलेरी से ज्यादा कमाने जा रही है.

पर वह सब माया मेमसाहब की सोशल इंजीनियरिंग के सामने फेल है...

छिपकली कल तक काक्रोच को खाने को लपकती थी. अब माया मेम साहब ने काक्रोच का सिर ही छिपकली पर फिट कर दिया है.

छिपकली डायनासोरों के विलुप्त हो जाने के बाद भी जीवंत है. और काक्रोच तो हार्डेण्ड एनीमेट ऑब्जेक्ट है. तरह-तरह के जल-थल-वायु-प्रदूषण के बावजूद भी जिन्दा प्राणी. आप समझ सकते हैं कि इन दोनो का फ्यूज़न कर क्या गदर सोशल इंजीनियरिंग की है माया मेम साहब ने.

सोशल इंजीनियरिंग है क्या बला?

कम्प्यूटर के जमाने में सोशल इंजीनियरिंग के मोटे तौर पर मायने है कि कोई भेदिया सीना तान के आपका मित्र/अन्दरी/जेन्युइन पोज करे और आपके सारे भेद ले कर चलता बने. माया मेमसाहब इस मायने में सोशल इंजीनियर नहीं हैं. वे ब्राह्मणों के भेद (वोट) ले कर सरकने वाली नही हैं. तय हो गया है कि दिल्ली की कुर्सी उनका लक्ष्य है. पर ब्राह्मण सोशल रिमिक्सिंग/फ्यूज़न को तैयार होंगे? शायद नहीं. इसी कारण से मैं सोशल इंजीनियरिंग का ही प्रयोग कर रहा हूं. अंतत: यह क्या निकलेगा सामाजिक परिवर्तन/सोशल रीमिक्सिंग/पोलिटिकल इंजीनियरिंग/मॉयोटिक्स (माया-पॉलिटिक्स) या कुछ और यह समय ही बतायेगा. नया शब्द समय ही गढ़ेगा.

बायो या सोशल फील्ड में इंजीनियरिंग का एक ही भय होता है. पार्ट अगर एक दूसरे के साथ एक्लेमेटाइज कर पाये तो प्रयोग फेल हो जाता है और जीव का राम नाम सत्त. अब वही देखना है क्या होता है आगे.

पर माया मेम साहब ने सोशल इंजीनियरिंग का एक फण्डा दे कर जितने भी रजनीति मे घुसे चुगद हैं, उनकी ट्यूब लाइटें जला दी हैं. आगे देखते जाइये एक से एक फेण्टाबुलस प्रयोग होंगे सोशल इंजीनियरिंग में. बस, आपमें अगर बिजनेस सेंस है तो बिना देर किये संस्था पंजीकृत करा लें संत कूड़ादास मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल टेक्नॉलाजी एण्ड साइंस.

बहुत चलेगी यह संस्था!

Sunday, May 13, 2007

समझ में क्यों नहीं आते कुछ चिठ्ठे?

फ्राडिये आज के पैदा नहीं हुये. ऋग्वैदिक युग में भी थे. ऋषि का लेबल लगाये थे. ऋचाओं के पर्म्युटेशन-कॉम्बिनेशन से नयी ऋचायें गढ़ लेते थे. एकाध उदाहरण के. एम. मुंशी जी ने अपने उपन्यासों में दिया है (मैं मुंशी जी का नाम इस लिये ले रहा हूं कि कल विश्व हिन्दू परिषद वाले पकड़ें तो निकलने को पतली गली मिल सके). और फिर स्यूडो-इण्टेलेक्चुअलिटी कोई बड़ा भारी आविष्कार नहीं कि अमेरिका-इंगलैण्ड वाले ही कर सकें. भारत में ये जीव हर गली/कूचे/मुहल्ले और अब वेब साइटों में पाये जाते हैं.

अब देखें ऐसा कई बार होता है कि आप पूरा लेख पढ़ जायें; आपके पल्ले कुछ शब्दों की चिन्दियां भर पडें. गज भर लम्बा लेख आप इस लालच में पढ़ें कि आप उसपर कुछ मस्त टिपेरकर इंटेलेक्चुअल छाप काम करेंगे. पर अंत तक आते-आते आपको लगे कि चिठेरा लेख में जो कुछ ले कर चला था उसका कुछ उलट ही सिद्ध कर रहा है. लेकिन आप की हिम्मत न बने कि यह बोध शब्दों मे लिख सकें. यानि फ्राड चिठेरा आपको इतना कंफ्यूजिया दे; उसका इंटेलेक्चुअल होने का लेबल आपको ऐसा टैरराइज कर दे; कि आप चुप-चाप दबे पांव वापस चले आयें उस वेब साइट से.

ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है. मैने कुशा ले कर संकल्प भी किया है कि उन साइटों पर नहीं जाऊंगा. पर धुरविरोधी के शब्द उधार लूं, तो निषेध ही निमंत्रण वाली थ्योरी के अनुसार फिर वहां के चक्कर मार आता हूं.

ये ब्लॉगर 80-98 आई.क्यू. बैण्ड वाले पाठक को सामने रख कर क्यों नहीं लिखते चिठ्ठा? क्यों अपने को सुपर इंटेलेक्चुअल प्रमाणित करना चाहते है? क्यों वे पढ़ने वाले को सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय (वाकई!) मान कर चलते हैं? क्यों वे सही-साट और साधारण बात न करने की कसम खाये बैठे हैं?


जरूरी नहीं कि वे अपने ब्लॉग को संता-बंता डॉट कॉम की पूअर कॉपी बना दें. पर वे समझ में आ जाये, ऐसा तो लिख सकते हैं.

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स्पष्टीकरण (यह टिप्पणी में भी है)
इतने लोगों ने कहा है तो स्पष्टीकरण देना पड़ेगा ही. मैं उदाहरण देता हूं ब्लॉगरी से नहीं, हिन्दी साहित्य से. भारतेन्दु जी, मुंशी प्रेम चन्द जी सबकी समझ में आते हैं. पढ़्ते चले जाने का मन करता है. वहीं अज्ञेय जी, जैनेन्द्र कुमार जी और राजेन्द्र यादव जी के पन्ने दर पन्ने पढ़ जाइये. उसके बाद सिर खुजाना पड़ता है. ज्यादा पढ़ लिया तो कायम चूर्ण की तलब होती है. कविता में दिनकर जी को पढ़ें तो सस्वर पाठ करने लगते हैं. मन होता है कि राह चलते को रोक लें और सुना कर छोड़ें कुरुक्षेत्र. पर कई कवि हैं कि आसमान में चांद पर लिखते है पर वर्णन जलेबी का करते हैं.

ब्लॉगरी में रोज नये जुड़ रहे हैं. इनमें से ज्यादातर शाम को घर लौटते नेनुआ, सतुआ, भूंजा और किराने के सामान की पन्नी ले कर आते होंगे. उनको घर आने पर बुद्धिवादी और तथाकथित बुद्धिवादी लोगों के गरुह-गरुह ब्लॉग पढ़ने को मिलें तो उनका कष्ट मेरे कष्ट जैसा ही होगा. न हो तो कहे सुने की माफी.