Tuesday, November 20, 2007

कहाँ से कसवाये हो जी!


साइकल ऑफ-द-शेल्फ मिलने वाला उत्पाद नहीं है। आप दुकान पर बाइसाइकल खरीदते हैं। उसके एक्सेसरीज पर सहमति जताते हैं। उसके बाद उसके पुर्जे कसे जाते हैं। नयी साइकल ले कर आप निकलते हैं तो मित्र गण उसे देख कर पूछते हैं - 'नयी है! कहाँ से कसवाये भाई!?'।

नयी चीज, नया प्रकरण या नया माहौल - उसमें 'कसवाना' शब्द का प्रयोग या दुष्प्रयोग बड़ा मनोरंजक हो जाता है।

सोनियाँ गांधी जी से पूछा जा सकता है कि उनकी "स्पीच बहुत धांसू है; किससे कसवाई है?"
पांड़े जी नयी जींस की नीली शर्ट पहने फोटो खिंचाकर अपने ब्लॉग पर फोटो चस्पाँ करते हैं। टिप्पणियाँ आती हैं - "बड़े चमक रहे हो जी। नयी जमाने की शर्ट है। कब कसवाये?"

मेटर्निटी होम से लौटने पर नौजवान से लोग पूछ बैठें (यह जानने को कि क्या हुआ) - "क्या कसवाये जी? लड़का या लड़की?"

बाऊजी के दांत क्षरित हो गये। नयी बत्तीसी के लिये डेण्टिस्ट से अप्वॉइण्टमेण्ट तय कराया लड़के ने। पिताजी को बोला - "संझा को दफ्तर से लौटूंगा तो चलेंगे। आपके नये दांत कसवाने!"

Gyan(202)

Gyan(203) कसवाई जाती नयी साइकल

रविवार को साढ़े इग्यारह बजे मैं कटरा बाजार में पुरानी 4-5 घड़ियों में सेल लगवा रहा था। एक दो में कुछ रिपेयर भी कराना था। मोबाइल पर उपेन्द्र कुमार सिन्ह जी का फोन बजा - "क्या कसवा रहे हैं जी?" कसवाना शब्द मेरी जिन्दगी में इन अर्थों में परिचित कराने का श्रेय उन्हें ही है। पिछले सप्ताह भर से इस शब्द को वे बहुत कस कर प्रयोग कर रहे हैं।Gyan(207) मैने जवाब दिया कि फिलहाल तो घड़ी कसवा रहा हूं। वहीं बगल में साइकल वाले की दुकान थी और उसका कारीगर वास्तव में नयी साइकल कस रहा था।

कसवाने में दूसरे पर निर्भरता निहित है। उदाहरण के लिये अनूप सुकुल को यह नहीं कह सकते कि "आपकी पोस्ट बड़ी मस्त है, किससे कसवाये हो जी!" यह जग जानता है कि वे (भले ही जबरी लिखते हों) अपनी पोस्ट खुद कसते हैं! सोनियाँ गांधी जी से पूछा जा सकता है कि उनकी "स्पीच बहुत धांसू है; किससे कसवाई है?"

'गुरू गुड़ और चेला शक्कर' वाले मामलों में कसवाने का मुक्त हस्त से प्रयोग हो सकता है - कसवाया गुरू से और क्रेडिट चेले ने झटक लिया। मसलन ब्लॉग जगत का टेण्ट कसवाया नारद से और झांकी जम रही है नये एग्रेगेटरों की!

सो मित्रों, कसवाना शब्द मैने उपेन्द्र कुमार सिन्ह से - जो खुद ब्लॉगर नहीं हैं; झटका है। पर असकी कसावट तो आप ला सकते हैं अपनी टिप्पणियों से। Laughing


Monday, November 19, 2007

$2500 की कार भारत में ही सम्भव है!(?)


टाटा की लखटकिया कार कैसे सम्भव है? दुनियाँ के किसी और हिस्से से ऐसी सस्ती कार की बात नहीं आयी। टाटा की बात को भी काफी समय तक अविश्वास से लिया गया। यह तो अब है कि समझा जा रहा है कि भले एक लाख में न हो, सवा लाख में तो कार मिलने लगेगी। अगले साल के शुरू में यह कार नुमाइश के लिये रखी जायेगी और सन 2008 के मध्य में मार्केट में आ जायेगी।

मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि सस्ती कार (अन्य स्तरीय चीजें भी) भारत में बन सकने के लिये सही वातावरण है। उद्यमिता और प्रतिभा - दोनो की कमी नहीं है। जबरदस्त सिनर्जी है!

इसके देखा-देखी बजाज आटो, रेनाल्ट (फ्रेंच कम्पनी) और निसान मोटर के साथ मिल कर $3000 में अपनी कार दुनियाँ भर में लाने की योजना रखते हैं। हुन्दै मोटर इण्डिया कम्पनी $5000 में ऐसी कार लाने की बात कर रही है। कुल मिला कर 2008-09 में छोटी और सस्ती कारों की लाइन लगने जा रही है। और सबके पीछे टाटा की लखटकिया कार का साकार होने जा रहा स्वप्न ही है।

एक लाख की कार का बनना मुझे लगता है कि भारत में ही सम्भव है। भारत ही ऐसा देश है जहां इतनी सस्ती डिजाइन की जा सकती है। जबसे मैने अपनी आंख से जुगाड़ ट्रेक्टर देखा है मैं इस देश के लोगों की प्रतिभा का कायल हो गया हूं। मेरा कहना यह नहीं है कि टाटा की कार का डिजाइन जुगाड़ जैसा है - वह तो निश्चय ही बेहतरीन होगा। मैं तो मात्र भारत में सस्ता और उत्कृष्ट डिजाइन हो पाने की सम्भावना की बात कर रहा हूं जो अन्यत्र सम्भव नहीं लगता। यह डिजाइन नयी सोच के हिसाब से हो सकता है - रिवर्स इंजीनियरिंग के हिसाब से नहीं।

रतन टाटा उवाच

24 जनवरी'05 को बिजनेस वर्ल्ड में :

Let's take the example of an Indian refrigerator manufacturer who is trying to go from A to B. It will go and buy some benchmark refrigerator, will take it apart, and reverse engineer - we're still in that phase - then make a product which may not be as good. Or, by luck, better. Some of our companies are in that position. Each time they have to develop a product, they have to find a product they want to emulate, take it apart, reverse engineer. I think we will have really arrived when we don't need to do that.

एक लाख की कार में भीषण कॉस्ट कटिंग के फण्डे लगने चाहियें। यह डिजाइन और प्रोडक्शन के लिये चैलेंज है। मुझे लगता है कि टाटा मोटर्स बहुत सा काम अपनी पार्ट्स सप्लाई की वेण्डर कम्पनियों से करा रही होगी जो डिजाइन और उत्पादन दोनों में कॉस्ट कटिंग के लिये उपयुक्त हैं। भारत की ये कम्पनियां चाहे फोर्जिंग, इंजन के हिस्सों, ब्रेक असेम्बली या गीयर सिस्टम में दखल रखती हों, बहुत सक्षम हैं डिजाइन में। ये वेण्डर डिजाइन का बड़ा हिस्सा संभाल रहे होंगे। इन सब वेण्डरों की विजय बहुत बड़ी संख्या में होने जा रही बिक्री पर निर्भर है। वह बिक्री भारत की 8-9% से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के रथ पर आरूढ़, एक सशक्त सम्भावना लगती है। और कार अगर चल निकली तो दुनियाँ भर में बिकेगी!

लगभग वैसा ही बजाज आटो के साथ होगा। उनके पास दुपहिया वाहनों के पार्ट्स के बहुत से सप्लायर्स हैं जो कार के पार्ट्स वेण्डर्स में अपग्रेड होंगे और पार्ट डिजाइन भी करेंगे। हुन्दै मोटर इण्डिया कम्पनी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। वैसे भी वह दुगने दाम की कार की बात कह रही है।

मैं यह कार खरीदने की सोच से नहीं लिख रहा हूं। पर उपलब्ध सूचना के आधार पर कल्पना करना मुझे आता है। और मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि सस्ती कार (अन्य स्तरीय चीजें भी) भारत में बन सकने के लिये सही वातावरण है। उद्यमिता और प्रतिभा - दोनो की कमी नहीं है। जबरदस्त सिनर्जी है!


(1. ऊपर चित्र 24 जनवरी 2005 के बिजनेस वर्ल्ड के पेज से है। बहुत सम्भव है इसका टाटा की आने वाली कार से कोई समरूपता न हो।

2. सागरचन्द नाहर जी का ये जुगाड़ बहुत मस्त है! ऊपर मैने इस्तेमाल कर रखा है।)


Sunday, November 18, 2007

गन्ना खरीद के भाव तय करने में कोर्ट की भूमिका


कोटा-परमिट राज में सरकार तय करती थी चीजों के भाव। अब उत्तरोत्तर यह कार्य कोर्ट के हस्तक्षेप से होने लगा है। Bamulahija बामुलाहिजा में कीर्तिश भट्ट का कुछ दिन पहले एक कार्टून था कि मध्यप्रदेश में दूध के भाव सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। लगभग उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तय किया कि उत्तर प्रदेश में गन्ना का खरीद मूल्य 110 रुपये प्रति क्विण्टल रखा जायेगा। चीनी मिलें गन्ने का खरीद मूल्य 60 रुपये मात्र देने को राजी थीं - वर्ष 200708 के लिये। केन्द्र सरकार का वैधानिक न्यूनतम रेट 85-90 रुपये है वर्तमान सीजन के लिये। उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों को 125 रुपये प्रति क्विण्टल देने को कहा था।

उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश इस प्रकार का नहीं था कि अगर चीनी मिलें गन्ना नहीं खरीदतीं तो सरकार उस कीमत पर खरीदेगी - जैसा 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' के मामले में होता है। इस आदेशानुसार चीनी मिलों को ही खरीद करनी थी। चीनी मिलें इस मूल्य पर खरीद की बजाय उत्पादन न करने का विकल्प तलाश रही थीं। अब हाई कोर्ट ने थोड़े घटे मूल्य पर खरीदने को कहा है। Sugar

यह कीमतें तय करने का कृत्रिम तरीका प्रतीत होता है। अगर चीनी मिलें समय पर गन्ना खरीद का पैसा किसान को नहीं देतीं तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिये। पर खरीद मूल्य बाजार को ही तय करने चाहियें। मान लें कि किसी दशा में खरीद मूल्य कम रहता है - उस दशा में सभी चीनी उत्पादन में कूदेंगे और प्रतिस्पर्धा के चलते खरीद मूल्य स्वत: ही बढ़ेगा और उस स्तर पर आ जायेगा जिसे स्वस्थ मार्केट कण्डीशन तय करेंगी। और अगर पेट्रोल की दरों में सरकारी नियंत्रण कम हो तो शायद गन्ना वैकल्पिक ऊर्जा का स्रोत बन सके और गन्ना उत्पादकों को बेहतर मूल्य स्वत: मिलें।  

पर यदि भावों को लेकर राजनीति चलती रही तथा चीनी का आयात-निर्यात बाजार की आवश्यकताओं से परे किन्ही अन्य कारणों के आधार पर तय होते रहे तो भाव तय करने में न्यायालय की भूमिका उत्तरोत्तर बढ़ती जायेगी। न्यायालय को भाव तय करने पड़ें - यह बहुत स्वस्थ दशा नहीं है समाज या अर्थव्यवस्था की। और कोई आशा की किरण नजर नहीं आती।     


Saturday, November 17, 2007

राजकमल, लोकभारती और पुस्तक व्यवसाय


सतहत्तर वर्षीय दिनेश ग्रोवर जी
सतहत्तर वर्षीय दिनेश ग्रोवर जी (लोकभारती, इलाहाबाद के मालिक) बहुत जीवंत व्यक्ति हैं। उनसे मिल कर मन प्रसन्न हो गया। व्यवसाय में लगे ज्यादातर लोगों से मेरी आवृति ट्यून नहीं होती। सामान्यत वैसे लोग आपसे दुनियाँ जहान की बात करते हैं, पर जब उनके अपने व्यवसाय की बात आती है तो बड़े सीक्रेटिव हो जाते हैं। शब्द सोच-सोच कर बोलते हैं। या फिर जनरल टर्म्स में कहने लग जाते हैं। लेकिन दिनेश जी के साथ बात करने पर उनका जो खुलापन दीखा, वह मेरे अपने लिये एक प्रतिमान है।

दिनेश जी के बड़े मामा श्री ओम प्रकाश ने 1950 में राजकमल प्रकाशन की स्थापन दरियागंज, दिल्ली में की थी। सन 1954 में राजकमल की शाखा इलाहाबाद में स्थापित करने को दिनेश जी इलाहाबाद पंहुचे। सन 1956 में उन्होने पटना में भी राजकमल की शाखा खोली। कालांतर में उनके मामा लोगों ने परिवार के बाहर भी राजकमल की शेयर होल्डिंग देने का निर्णय कर लिया। दिनेश जी को यह नहीं जमा और उन्होने सन 1961 में राजकमल से त्याग पत्र दे कर इलाहाबाद में लोक भारती प्रकाशन प्रारम्भ किया।

उसके बाद राजकमल के संचालक दो बार बदल चुके हैं। राजकमल में दिनेश जी की अभी भी हिस्सेदारी है।

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विभिन्न मुद्राओं में दिनेश ग्रोवर जी

सन 1977 में दिनेश जी ने लोकभारती को लोकभारती प्रकाशन के स्थान पर लोकभारती को पुस्तक विक्रेता के रूप में री-ऑर्गनाइज किया। वे पुस्तकें लेखक के निमित्त छापते हैं। इसमें तकनीकी रूप से प्रकाशक लेखक ही होता है। दिनेश जी ने बताया कि उन्होने लॉ की पढ़ाई की थी। उसके कारण विधि की जानकारी का लाभ लेते हुये अपने व्यवसाय को दिशा दी।

उन्होने बताया कि उनकी एक पुत्री है और व्यवसाय को लेकर भविष्य की कोई लम्बी-चौड़ी योजनायें नहीं हैं। उल्टे अगले तीन साल में इसे समेटने की सोचते हैं वे। कहीं आते जाते नहीं। लोकभारती के दफ्तर में ही उनका समय गुजरता है। जो बात मुझे बहुत अच्छी लगी वह थी कि भविष्य को लेकर उनकी बेफिक्री। अपना व्यवसाय समेटने की बात कहते बहुतों के चेहरे पर हताशा झलकने लगेगी। पर दिनेश जी एक वीतरागी की तरह उसे कभी भी समेटने में कोई कष्ट महसूस करते नहीं प्रतीत हो रहे थे। व्यवसायी हैं - सो आगे की प्लानिंग अवश्य की होगी। पर बुढ़ापे की अशक्तता या व्यवसाय समेटने का अवसाद जैसी कोई बात नहीं दीखी। यह तो कुछ वैसे ही हुआ कि कोई बड़ी सरलता से सन्यास ले ले। दिनेश जी की यह सहजता मेरे लिये - जो यदा-कदा अवसादग्रस्त होता ही रहता है - बहुत प्रेरणास्पद है। मैं आशा करता हूं कि दिनेश जी ऐसे ही जीवंत बने रहेंगे और व्यवसाय समेटने के विचार को टालते रहेंगे।

मैं दिनेश जी की दीर्घायु और पूर्णत: स्वस्थ रहने की कामना करता हूं। हम दोनो का जन्म एक ही दिन हुआ है। मैं उनसे 25 वर्ष छोटा हूं। अत: बहुत अर्थों में मैं उन्हे अपना रोल मॉडल बनाना चाहूंगा।


Friday, November 16, 2007

बम्बई जाओ भाई, गुजरात जाओ


मेरी सरकारी कार कॉण्ट्रेक्ट पर है। ठेकेदार ने ड्राइवर रखे हैं और अपनी गाड़ियाँ चलवाता है। ड्राइवर अच्छा है। पर उसे कुल मिलते हैं 2500 रुपये महीना। रामबिलास रिक्शेवाला भी लगभग इतना ही कमाता है। मेरे घर में दिवाली के पहले पुताई करने वाले आये थे। उन्हें हमने 120 रुपया रोज मजूरी दी। उनको रोज काम नहीं मिलता। लिहाजा उनको भी महीने में 2000-2500 रुपये ही मिलते होंगे।

tailors कल मैं अपनी पत्नी के साथ टेलर की दूकान पर गया। मास्टर ने दो कारीगर लगा रखे थे। उनसे मैने पूछा कितना काम करते हो? कितना कमाते हो? उन्होने बताया कि करीब 10-12 घण्टे काम करते हैं। मास्टर ने बताया कि दिहाड़ी के 100 रुपये मिलते हैं एक कारीगर को। कारीगर ने उसका खण्डन नहीं किया। मान सकते हैं कि इतना कमाते हैं। यह भी पड़ता है 2500 रुपया महीना।

मेरी पत्नीजी का अनुमान है कि अगर घर का हर वयस्क इतना कमाये तो परिवार का खर्च चल सकता है। यह अगर एक बड़ा अगर है। फिर यह भी जरूरी है कि कोई कुटेव न हो। नशा-पत्ती से बचना भी कठिन है।

कुल मिला कर इस वर्ग की आमदनी इतनी नहीं है कि ठीक से काम चल सके।

'ब' बम्बई से मुझे फोन करता है - भैया, बम्बई आई ग हई (भैया बम्बई आ गया हूं)। उसे मैने सीड मनी के रूप में 20,000 रुपये दिये थे। कहा था कि सॉफ्ट लोन दे रहा हूं। साल भर बाद से वह 500 रुपये महीना ब्याज मुक्त मुझे लौटाये। उस पैसे को लेकर वह बम्बई पंहुचा है। बाकी जुगाड़ कर एक पुरानी गाड़ी खरीदी है और बतौर टेक्सी चलाने लगा है। मैं पैसे वापस मिलने की आशा नहीं रखता। पर अगर 'ब' कमा कर 4000-5000 रुपया महीना बचाने लगा तो उसका पुण्य मेरे बहुत काम आयेगा।

'स' मेरे पास आया था। बोला मूंदरा पोर्ट (अडानी का बन्दरगाह, गुजरात) जा रहा है। उसका भाई पहले ही वहां गया था - 8-10 महीना पहले। वह 7000 रुपया महीना कमा रहा है। इसे 3500 रुपया शुरू में मिलेगा पर जल्दी ही यह भी 7000 रुपया कमाने लग जायेगा। Car Driver

मैं तुलना करता हूं। अपने ड्राइवर को कहता हूं कि बम्बई/अहमदाबाद क्यों नहीं चला जाता। भरतलाल के अनुसार खर्चा-खुराकी काट कर एक टेक्सी ड्राइवर वहां 5000 रुपया महीना बचा सकता है। मैं ड्राइवर से पूछता हूं कि वह इलाहाबाद में क्यों बैठा है? वह चुप्पी लगा जाता है। शायद स्थितियाँ इतना कम्पेल नहीं कर रहीं। अन्यथा मैं तो इतने लोगों को देख चुका हूं - यहां इलाहाबाद में और वहां बम्बई गुजरात में - कि सलाह जरूर देता हूं -

भाई, बम्बई जाओ, गुजरात जाओ।

आपके अनुसार यह सलाह उचित है या नहीं? 


Thursday, November 15, 2007

मित्रों, आप तो मेरा पर्सोना ही बदल दे रहे हैं!


Bouquet किसी भी जन्म दिन पर नहीं हुआ कि मुझे इतने एकोलेड्स (accolades - प्रशस्तियाँ?) मिले हों। सुकुल ने तो इतना कहा कि जितना मेरे किसी जगह के फेयरवेल में भी नहीं कहा गया। सभी कुछ सुपरलेटिव! उसके बाद तो आप सब ने इतना चढ़ाया कि मुझे अपने पर्सोना (persona - व्यक्ति का सामाजिक पक्ष) में परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा। संजीत ने किसी पोस्ट पर कमेण्ट में ऐसा कहा भी था - पर मैने उस समय खास नोटिस नहीं किया। अब लगता है कि हिन्दी ब्लॉगरी ने मेरे व्यक्तित्व में स्पष्ट देखे जाने योग्य परिवर्तन किये हैं।

अनूप की ब्लॉग पोस्ट और टिप्पणी के बाद अपने आप के प्रति जो भी भाव था, वह मन में केन्द्रित न रह कर चारों ओर फैल गया।  पहले मैं जन्मदिन जैसे विषय को पश्चिमी सोच की स्नॉबरी मानता था। उसी जिद के चलते कई बार यह दिन आया और चला गया - बिना किसी से कोई जिक्र के। पर इस बार तो जैसे मन में था कि भाई कोई नोटिस तो करे! और नोटिस जो किया सो जबरदस्त था। इतना उछाला गया मैं कि दिन भर सम्पट ही नहीं बैठ रहा था - कितना खुशी जाहिर की जाये और कितना "बस ठीक है" वाले भाव से दबा दी जाये! Gyandutt

मेरी कल की पोस्ट पर और सुकुल की पोस्ट पर जो टिप्पणियाँ आयीं, उससे मन अभिभूत हो गया है। समझ में नहीं आ रहा कि अपने में सिमटा एक धुर-इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति कैसे इतने लोगों का स्नेह पा सकता है? शीशे में देखने पर कोई खास बात नजर नहीं आती।

टिप्पणियाँ ही नहीं, फोन भी आये - प्रियंकरजी, संजीत, बालकिशन और नीरज गोस्वामी जी के। सब स्नेह से सेचुरेटेड - संतृप्त। आलोक 9211 का ई-मेल और शाम को अनिताकुमार जी का ई-ग्रीटिंग कार्ड। देर से आयी मीनाक्षी जी की टिप्पणी नें तो फारसी में जन्म दिन मुबारक सुना दिया! 

यही नहीं कि यह ब्लॉगरी में ही हुआ हो। मेरे दफ्तर में मुझे बुके दिया गया। सामुहिक मिष्टान्न का कार्यक्रम रहा। ढ़ेरों लोग मुझसे मिलने आये। बहुत ही विशिष्ट दिन रहा आम जिन्दगी में भी।

मित्रों लगता है आप सब के संसर्ग ने मेरे पर्सोना में व्यापक परिवर्तन का सूत्रपात कर दिया है।

एक और खास बात यह रही कि कई ब्लॉगर मित्र जिनसे बौद्धिक/वैचारिक मतभेद कभी न लिपिड़ियाने की परम्परा निर्वाह करने की आदत के चलते आवृत नहीं रहे - वे भी थे। अभय और अविनाश के ब्लॉग पर मैं टिप्पणी करने से बचता रहता हूं - दूसरे ध्रुव की सोच रखने के कारण। वे भी जन्म दिन की बधाई देने वालों में थे। यह भी बहुत अच्छा लगा। उनके बारे में भी बेहतर समझ बनेगी समय के साथ। 

मेरी पत्नी प्रसन्न हैं - बार-बार कह रही हैं कि तुम्हारा जन्मदिन कभी ऐसा तो नहीं रहा। सभी टिप्पणियाँ ध्यान से पढ़ कर प्रसन्न हो रही हैं। कह रही हैं कि यह परिवर्तन इन्ही सब (यानी आप सब) के कारण हुआ है।

सही में मित्रों आप सब तो मेरा पर्सोना ही बदले दे रहे हैं! अ चेंज फॉर द बैटर! बहुत बहुत धन्यवाद। और फुरसतिया की पोस्ट के कल के गीत के शब्द उधृत करूं -

पंक्तियां कुछ लिखी पत्र के रूप में,
क्या पता क्या कहा, उसके प्रारूप में,
चाहता तो ये था सिर्फ़ इतना लिखूं
मैं तुम्हें बांच लूं, तुम मुझे बांचना।

यह परस्पर बांचन चलता रहे मित्रों!


इस पर्सोना में परिवर्तन की सोच कर मुझे कृतमाला (अलकनन्दा) में नहाते वैवस्वत मनु की याद आ रही है। उनके हथेली में जीरे के आकार की छोटी सी मछली आ गयी थी, जिसे वे साथ आश्रम में लेते आये थे। वह मछली उन्होने पानी भरे छोटे मिट्टी के बर्तन में रख दी थी। पर वह बढ़ने लगी। उसे मिट्टी के पात्र से नांद, नांद से तालाब और अंतत: वे उसे नदी में ले गये। जब प्रलय आयी तो यही जीरे के आकार की परिवर्तित मछली ही थी जो उन्हे और सप्तर्षियों को बचाने उनकी नाव को विशाल पर्वत तक ले कर गयी। उसी से नव युग चला। जीरे जैसी छोटी मछली युग परिवर्तन का सूत्रपात कर सकती है!

सम्भावनायें अनंत हैं। मेरा ट्रांसफार्मेशन तो बहुत छोटे स्केल की चीज है। 


Wednesday, November 14, 2007

तनाव की बोगी तो चलाओ मत जी!


तनाव में कौन काम नहीं करता। ब्लॉगरी में एक बिरादरी है। सुपीरियॉरिटी कॉम्पेक्स से लबालब। जनता का ओपीनियन बनाने और जनता को आगाह करने का महत्वपूर्ण काम ये करते हैं तो जाहिर है कुछ भगवा तत्व (या नॉन भगवा भी) इनको कॉर्नर कर लेते हैं। कॉर्नर होने से बचने में पहले तो ये गुर्राते रहते हैं; पर जब तरकश में तर्क के तीर खतम हो जाते हैं तो, विषय से इतर, बड़े मस्त तर्क देते हैं -

  • हम मीडिया पर अपनी बात कहने को स्वतंत्र थोड़े ही हैं। मीडिया मालिक तय करता है हमें क्या कहना है!
  • आप क्या जानें; कितने तनाव में काम करना पड़ता है हमें।

भैया, किसका ऑर्गेनाइजेशन उसपर अपनी पॉलिसी सुपरइम्पोज नहीं करता? कौन है जिसे काम में तनाव - भीषण तनाव नहीं झेलना पड़ता। पर सभी तो सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स की ऐंठ में नहीं रहते और कॉर्नर होने पर तनाव की बोगी (bogey - हौव्वा) नहीं खड़ा करते। tension

तनाव की बात चली है तो मैं रेल के तनाव की बात बताता हूं। दिवाली से पहले इलाहाबाद में रेल दुर्घटना हुई। 12 घण्टे से ज्यादा यातायात बन्द रहा। उसके बाद पूजा और छठ स्पेशल गाड़ियाँ बेशुमार चल रही हैं। दिवाली के चलते स्टॉफ का गैर हाजिर होना भी ज्यादा है। लिहाजा पूरा दिल्ली-हावड़ा ट्रंक रूट ठंसा पड़ा है गाड़ियों से। इस स्थिति में जिसके ऊपर ट्रेन यातायात की जिम्मेदारी हो, वह काम के बोझ/थकान/खीझ और झल्लाहट के चलते कटखने कुकुर जैसा हो जाता है। और आप देख रहे हैं कि मैं 'चना जोर गरम' या 'चिन्दियां बटोरने वाले' पर लिख रहा हूं। अपनी शहादत बयान नहीं कर रहा। मैं इस बारे में सहानुभूति वाली टिप्पणी की अपेक्षा भी नहीं कर रहा। ब्लॉगरी समय चुरा कर की जाती है। जैसा समीर लाल जी ने अपनी पोस्ट में कहा है - उसके लिये समय बीच-बीच में निकालने की बाजीगरी करनी होती है - पर वह ढ़िंढोरा पीटने का विषय नहीं है।


रेल यातायात सेवा में तनाव के किस्से

1. रेल अधिकारी को तनाव अपने से ऊपर वाले को सवेरे की पोजीशन देने में सबसे ज्यादा होता है। दो दशक पहले, मैं रतलाम में पदस्थ था। बारिश का मौसम शुरू हो गया था। गाड़ियां तरह तरह की मुसीबतों के चलते अटक रही थीं। बारिश में मालगाड़ी की स्टॉलिंग और सिगनलों का विफल होना त्राहि-त्राहि मचा रहा था। ऐसे में मुख्यालय के अधिकारी (जैसा मैं आज हूं) को झेलना सबसे तनावग्रस्त होता है। अधिकारी बहुत अच्छे थे पर काम का तनाव तो था ही। उनके बार-बार टोकने-कहने से मैं झल्ला पड़ा - 'सर, अठारह घण्टे काम कर रहा हूं पिछले हफ्ते भर से। अब और क्या करूं।'

फोन पर एकबारगी तो सन्नाटा हो गया। ऐसा जवाब सामान्यत: रेलवे में किसी बहुत बड़े को दिया नहीं जाता। फिर लगभग गुर्राती आवाज में दूसरी तरफ से वे बोले - 'ह्वाट फ** अठारह घण्टा! बाकी छ घण्टे क्या करता है तुम!" बुढ़ऊ की गुर्राती आवाज में जो स्नेह था; वह महसूस कर काम पर लग गये हम; अतिरिक्त जोश से!

2. मेरे सहकर्मी अफसर ने कुछ दिन पहले एक किस्सा सुनाया। मण्डल स्तर का अधिकारी (जैसे ऊपर के किस्से में मैं था) मुख्यालय के बॉस को जवाब दे रहा था। सवालों की झड़ी लगी थी। अचानक बॉस को लगा कि कहीं यह जवान गोली तो नहीं दे रहा। पूछ लिया कि सच बोल रहे हो या यूं ही गप बता रहे हो? जवान ने बड़ी बेबाकी से कहा - 'सर, जितना मैने बताया है, उसमें 60-65% तो सही-सही है। पर यह भी देखें कि सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अगर 60-65% कोई सही-सही कर दे तो टॉपर हो जाता है।' ऐसे जवाब पर अगर ट्यूनिग सही हो तो तनाव फुर्र! नहीं तो बिसुरते रहो - मीडियाटिक तरीके से!


Lokvani
श्री दिनेश ग्रोवर, लोकभारती, इलाहाबाद के मालिक
(सतहत्तर साल के लगते नहीं! सन 1954 में राजकमल की शाखा ले कर इलाहाबाद आये थे।)


कल हम दोपहर कॉफी हाउस जाने को निकले पर पंहुच गये लोकभारती (पुस्तक वितरक और प्रकाशक)। वहां लोकभारती के मालिक दिनेश ग्रोवर जी से मुलाकात हुयी| उनसे बातचीत में पता चला कि वे पुस्तक प्रकाशन में तब जुड़े जब हम पैदा भी नहीं हुये थे।

आज दिनेश जी 77 के हो गये। जन्मदिन की बधाई।

इतनी उम्र में इतने चुस्त-दुरुस्त! मैं सोचता था वे 65 साल के होंगे।


Tuesday, November 13, 2007

चिन्दियाँ बीनने वाला


वैसे तो हम सभी चिन्दियाँ बीनने वाले हैं - विजुअल रैगपिकर (visual rag picker)। किसी भी दृष्य को समग्रता से ग्रहण और आत्मसात नहीं करते। उतना ही ग्रहण करते हैं जितने से काम चल जाये। बार-बार देखने पर भी किसी विषय के सभी पक्षों को देखते-परखते नहीं। हमारा एकाग्रता का समय और काल इतना छोटा होता है कि कोई भी बात पूर्णरूपेण समझ ही नहीं पाते। पर फिर भी हम बुद्धिजीवी की जमात में बैठने की हसरत रखते हैं।
इसके उलट भौतिक जगत में चिन्दियां बीनने वाला जो कूड़े-कचरे की रीसाइकल इण्डस्ट्री का मुख्य तत्व है; हम सब की हिकारत और दुरदुराहट का पात्र है।
मेरी सवेरे की सैर में चिन्दियाँ बीनने वाले का अवलोकन एक अनिवार्य अंग है। सवेरे सवेरे चिन्दियाँ बीनने वाले को ज्यादा कीमती चीजें मिलती होंगी। जैसे कहावत है - अर्ली बर्ड गेट्स द वॉर्म; उसी तरह जल्दी चिन्दियाँ-बीनक को भी लॉटरी लगती होगी। सवेरे-सवेरे सफेद रंग के बड़े पॉली प्रॉपीलीन के थैले बायें हाथ में लिये और दायें हाथ से पॉलीथीन, शीशी, प्लॉस्टिक, गत्ता, धातु आदि बीनते हर गली-नुक्कड़ पर ये दिख जाते हैं। कूड़े के ढ़ेर को खुदियाते कुरेदते बहुत सारे चिन्दियाँ बीनने वाले मिलते हैं। एक आध से बात करने का यत्न किया। पर ये बहुत शर्मीले और जल्दी में रहते हैं।
चिन्दियाँ बीनने वाला बच्चा
आप मुझे देख रहे हैं; क्या देख रहे हैं?
मेरे चिथड़े कपड़े, मेरे सिर में जुयें?
मेरा शरीर समय की मार से दोहरा है।
मेरे पैर नंगे हैं।
पर, मेरे पास भी दिल है।
और मुझे भी प्यार की तलाश है।
अर्सा गुजर गया, मेरी भी माँ थी;
पिता, बहन और भाई थे।
अब कहाँ हैं वे?
मैया रे, कितनी सर्दी है।
हर सवेरे जब लोग चहल-पहल करने लगते हैं,
घरों में आग जलती है; पर मैं सर्दी से कांपता हूं।
सर्दी जो मेरी हड्डियों में घुस जाती है;
ओह, कोई मुझे प्यार करे, कोई तो छुये।
अगर मैं बहुत सवेरे उठूं, तो चिन्दियाँ बेहतर मिलती हैं;
पर तब मुझे रात के चौकीदार और चूहों से लुकाछिपी खेलनी पड़ती है।
देखो, मैं एक बच्चा ही हूं;
पर मेरा शरीर जर्जर हो गया है;
और समय की मार ने,
बना दिया है मुझे, समय से पहले अकलमन्द।-------
---- केरोल एजकॉक्स की कविता के अंश का भावानुवाद
दीपावली के बाद ये चिन्दियाँ बीनने वाले सामान्य से ज्यादा सक्रिय नजर आये। बाकी लोग अलसाये थे। सवेरे घूमने वालों की भीड़ जरा भी न थी सामान्य की तुलना में। पर चिन्दियाँ बीनने वाले सामान्य से ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे थे। ध्यान से देखने पर पता चला कि वे फुलझड़ी के तार में रुचि रख रहे हैं। तार का धात्वीय तत्व - शायद अच्छे भाव बिकता हो कबाड़ में। दीपावली के तीन दिन बाद एक भी चिन्दियाँ बीनने वाला न दिखा। सारी फुलझड़ी के तार जो बीन लिये जा चुके!
चिन्दियाँ बीनने वाले 10-18 साल के लगते हैं। कई दिनों से बिना नहाये। सवेरे जल्दी उठने वाले। आर्थिक रूप से इतने दयनीय लगते हैं कि कबाड़ी जरूर इनका शोषण करता होगा। औने-पौने भाव पर कबाड़ इनसे लेता होगा। और शायद पूरे पैसे भी एक मुश्त न देता होगा - जिससे कि वह अगली बार भी कबाड़ ले कर उसी के पास आये।
मेरा अन्दाज यह है कि जो पैसे इन्हें मिलते भी होंगे, उसका बड़ा हिस्सा जुआ और नशे में चला जाता होगा। बहुत कम पैसा और बहुत अधिक समय शायद इनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। फिर भी इनको मैं सम्मान की दृष्टि से देखता हूं। ये भिखारी नहीं हैं और पर्यावरण साफ रखने में इनकी अपनी भूमिका है।
क्या विचार है आपका?

सहायता की अपील: अंकुर गुप्ता ने अदृष्य फोल्डर बनाना बताया। मैने ऐसा फोल्डर विस्टा में डेस्कटॉप पर बना डाला। अब वह अदृष्य फोल्डर सिन्दबाद जहाजी के बूढ़े की तरह चिपक गया है।डिलीट ही नहीं होता! डेस्कटॉप से कहीं जाता भी नहीं। डिलीट कैसे करें? Confused
चना जोर गरम की पोस्ट के बाद पंकज अवधिया जी चाहते थे कुछ मीठा। पर मुझे दुख है कि मैं यह अभावग्रस्त पोस्ट दे रहा हूं, जो पर्व के माहौल के अनुरूप नहीं है। पर मानसिक हलचल पर मेरा पूर्ण नियंत्रण तो नहीं कहा जा सकता।

Monday, November 12, 2007

मेरा चना बना है आली!


गा-गा कर चने बेचने वाले लगता है भूतकाल हो गये। साइकल पर चने-कुरमुरे या चपटे मसालेदार चने का कनस्तर कैरियर पर लादे आगे टोकरी में अखबार के ठोंगे रखे नमकीन चने बेचने वाला गली से निकलता था तो हर मकान से भरभरा कर बच्चे और उनके पीछे बड़े भी निकल आया करते थे। बेचने वाले का सामान जो होता था, सो तो ठीक; मुख्य होता था उसका गायन।

Chanaमेरा चना बना है आली

उसको खाते हैं बंगाली

पहने धोती ढ़ीली ढ़ाली

सिर पर जुल्फें काली-काली

चना जोर गरम बाबू, मैं लाया मजेदार

चना जोर गरम

मेरा चना बना अलबत्ता

उसको भेजूं शहर कलकत्ता

जहं चेहरेदार रुपैया चलता1

चना जोर गरम बाबू, मैं लाया मजेदार

चना जोर गरम

मेरा चना बना वजीर

उसको खाते लछिमन बीर

मारा मेघनाद को तीर

फुटिगइ रावन की तकदीर

चना जोर गरम बाबू, मैं लाया मजेदार

चना जोर गरम

यह चने वाला ट्रेन में भी चलता था।2 या ट्रेन में ही ज्यादा चलता था। जितना माल वह चने की गुणवत्ता से बेचता था, उतना ही अपनी गायन प्रतिभा से। अब वह कहीं बिला गया है। चना जाने कैसे बिक रहा है। गली में वह आता नहीं। जिन ट्रेनों में - लोकल पैसेंजर ट्रेनों में - वह बेचता था, उनमें मुझे बतौर आम यात्री चढ़े अर्सा गुजर गया। पता नहीं अब वह उनमें चलता है या नहीं। चलता भी हो तो कहीं पाउच में ब्राण्डेड चना-मूंगफली न बेंच रहा हो, बेसुरी आवाज में हांक लगा कर!

फुरसतिया सुकुल आज कल पॉडकास्टिंग का प्रपंच चला रहे हैं - कहीं यह चने वाला मिल जाये तो उसका गायन टेप कर पॉडकास्ट कर सुनवाने का कष्ट करें। या और कोई ब्लॉगर भाई जो ये हाईटेक काम सड़क छाप चनेवाले पर कर सकते हों, कृपया उस गायक से मिलवायें - प्लीज़!

और बाकी पाठक साहबान को अगर ऊपर वाले गाने की और पंक्तियाँ आती हों तो कृपया टिपेरे बिना हिलें मत। यूनुस अगर किसी फिल्म में यह गाना सुनवा सकें तो सोने में सुहागा!


Gyan(181)1. चेहरेदार रुपैया से मतलब टकले एडवर्ड सप्तम के चांदी के रुपये के सिक्के से है। जाने किस कारण से उनका बिना मुकुट का सिक्का ढ़ाला गया था!

2. रेलवे के दृष्टिकोण से देखा जाये तो चने वाला ट्रेन में अनाधिकृत वेण्डर होगा - जो रेलवे एक्ट में दण्डनीय है।Loser 

 


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Sunday, November 11, 2007

नौकरी खतरे में है- क्या होगा?


परसों की अपनी सवेरे की ट्रेन-मॉनीटरिंग पोजीशन की बात करता हूं आपसे। इस पोजीशन के 32 A4 साइज पन्नों के साथ नरसों की रेल दुर्घटना का समय-विवरण (event-log) और चम्बल एक्स्प्रेस (जिसके इंजन ने टक्कर मारी थी) के ड्राइवर-असिस्टेण्ट ड्राइवर का बायो डाटा भी फैक्स किया था मेरे नियंत्रण कक्ष ने। अगर ये कर्मचारी जांच में जिम्मेदार पाये गये तो इनकी नौकरी खतरे में है।

इस बॉयो डाटा में था कि सैंतालीस साल के लोकोमोटिव ड्राइवर के परिवार में पत्नी, सत्रह साल का लड़का और 14,11 साल की दो लड़कियाँ हैं। निश्चय ही बच्चों का भविष्य अभी बना नहीं है। क्या होगा उनका?WDM2

यह ड्राइवर दर्जा नौ पास है। बतौर स्टीम इंजन क्लीनर भर्ती हुआ था बीस वर्ष की उम्र में। पता नहीं कैसे संस्कार हैं। सामान्यत चालकगण पैसा ठीक-ठाक पा जाते हैं। काम के चलते घर से बहुत समय दूर रहते हैं। पत्नी अगर कुशल न हुई तो पैसे का प्रबन्धन ठीक नहीं होता। संतति भी बहेतू और आवारा बन जाती है। पढ़े लिखे कम होने के कारण अगर नौकरी गयी तो वैकल्पिक व्यवसाय भी नहीं मिलता। मलाई खाते खाते छाछ के लाले पड़ जाते हैं।

विचित्र बात है - एक हल्की सी चूक और उसके गम्भीर परिणाम होते हैं। दुर्घटना जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जांच कर्मचारी को तोड़ डालती है। नौकरी से निकाले जाने पर सालों वह अपील और रिव्यू-रिवीजन की अपीलें करता रहता है। इस प्रक्रिया में पैसे खत्म हो जाते हैं, प्रारम्भिक सहानुभूति रखने वाले भी किनारा कर लेते हैं। अंत में कर्मचारी अकेला जद्दोजहद करता रहता है। कभी-कभी सेण्ट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के चक्कर भी लगाता है। एक पतली सी डोर से आस बन्धी रहती है।  

जब लोग अपना काम करते हैं तो क्या इस कोण को ध्यान में रखते हैं कि अगर उनके कदाचार या लापरवाही के कारण उनकी जीविका चली जाये तो उनके परिवार का क्या होगा? मैने कई परिवारों को सक्षम अधिकारी के पैर पकड़ते, गिड़गिड़ाते देखा है। कई परिवार तो यह शॉक सह नहीं पाते।Broken heart उन्हें घिसटते-बिखरते देखा है।  

उम्र के साथ ज्यादा संवेदना महसूस करने लगते हैं हम। खुद मैने कई गलती करते कर्मचारी नौकरी से निकाले हैं। पर अब कर्मचारियों के परिवार की तकलीफें ज्यादा महसूस होती हैं।