Sunday, October 14, 2007

ई-पण्डित को धन्यवाद - विण्डोज़ लाइव राइटर के लिये


विण्डोज़ लाइव राइटर ब्लॉगिंग के लिये बेहतरीन औजार है। आप इसे यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। मुझे इसका पता ई-पण्डित (श्रीश - मेरे प्रिय ब्लॉगर) की पोस्ट से चला था। यह पोस्ट श्रीश ने 2 जनवरी को छापी थी पर मुझे बहुत बाद में पता चली। इस औजार का प्रयोग करते मुझे एक महीना हो गया है।

लाइव राइटर डाउनलोड कर इंस्टाल करने के बाद मैने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरी लगभग सभी पोस्टें विण्डोज़ लाइव राइटर पर लिखी जाती हैं और वे मेरे ब्लॉग पर कैसे लगेंगी - यह जानने के लिये उनका प्रिव्यू भी देख लेता हूं।

यह प्रोग्राम अब बीटा 3 स्टेज में है। मैने लेटेस्ट स्टेज़ इंस्टाल कर लिया है। बहुत अच्छा है। जो लोग इण्टरनेट प्रयोग में डाउनलोड किये गये मेगाबाइट्स को लेकर चिंतित रहते हैं पर अपनी पोस्ट की उत्कृष्टता के प्रति भी सजग होते हैं, उनके लिये तो यह और भी महत्वपूर्ण है।

संजय बेंगानी के सुझाव पर:
निश्चय ही विण्डोज़ लाइव राइटर के डेवलपर बन्धु - वे जो भी, जहाँ भी हों, अतिशय धन्यवाद के पात्र हैं। यह सम्पूर्ण मानवता की सेवा है।

एक पंथ दो काज - मैं श्रीश को धन्यवाद भी दे रहा हूं और विण्डोज़ लाइव राइटर की सिफारिश भी कर रहा हूं। इस लाइव राइटर के वेब-लेआउट (जिसमें आप पोस्ट रचते हैं) की खिड़की ऐसी लगती है:

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और लाइव राइटर में प्रिव्यू ऐसा दीखता है:

preview

ऑफ लाइन लिखने, प्रिव्यू देखने और सरलता से अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिये नायाब सहायता है यह। ट्राई कर देखिये (अगर पहले से ही प्रयोग नहीं कर रहे हैं, तो)!


डिवाइडर पर सोने वाला कहाँ सोयेगा?


कुछ दिन पहले मैने पोस्ट लिखी थी उस व्यक्ति के बारे में जो रात में भरे यातायात के बीच राणाप्रताप चौराहे पर रोड-डिवाइडर पर सो रहा था। उसकी गहरी नींद और अपनी नींद की गोली गटकने पर भी न आने वाली नींद की चर्चा मैने उस पोस्ट में की थी। आज सवेरे दफ्तर जाते समय राणाप्रताप चौराहे पर मैने अपने वाहन को रुकवाया। जिस डिवाइडर पर वह व्यक्ति रात में सो रहा था, उसे और ऊंचा कर उसमें क्यारीनुमा स्थान बना दिया गया था। उसमें मिट्टी डाल कर सौन्दर्यीकरण हेतु पौधे लगेंगे। अब तो उसपर कोई सो नहीं सकता।

आप जरा नीचे दोनो चित्र देखें। सामने राणाप्रताप की प्रतिमा है। दाईं ओर उर्ध्व जेब्रा धारियों वाला डिवाइडर पहले का है। उसके ऊपर ईंट की जुड़ाई से ऊंचाई बढ़ाई गयी है। जुड़ाई की गयी ईंटों के बीच नाली जैसा है जिसमें पौधे लगेंगे। ईंटों का मलबा अभी पास में पड़ा भी है। अब वह वहां सोने वाला कैसे सोयेगा?    

Rana1 Rana2
     राणाप्रताप की प्रतिमा लाल अर्ध-वृत्त में घेरी गयी है।

ऐसा ही हाल वर्षा ऋतु में बेघरबार लोगों के सोने का होता है - आज एक ठौर, कल वह गायब। मुझे तो उस डिवाइडर पर सोने वाले की फिक्र हो रही है।

यह भी सम्भव है मित्रों कि वह बेसुध सोने वाला व्यक्ति कोई और ठिकाना पाकर फिर भी गहरी नींद सोये। और हम उसकी सोने की जगह की फोटो ले, ब्लॉग पर छाप, जगह छिन जाने की तकलीफ से अपनी नींद न आने का एक और निमित्त या बहाना स्थापित कर लें।

उसे तो आखिर नींद आनी ही है और हमें तो आखिर नींद नहीं ही आनी है! :-)  


Saturday, October 13, 2007

क्या बतायें - सिनेमा का 'स' तक नहीं आता


संजीत त्रिपाठी ने संजय लीला भंसाली पर लिंक दिये हैं - मेरी उनके प्रति अज्ञानता दूर करने को। पर उन लिंकों पर जाने पर और भी संकुचन हो रहा है। संजय भंसाली बड़े स्तरीय फिल्म निर्देशक लगते हैं। जो व्यक्ति पूरे आत्मविश्वास के साथ कहे कि 'वह सिनेमा के माध्यम से अपनी व्यक्तिगत छटपटाहट व्यक्त कर रहा है और उसकी फिल्मों के माध्यम से विश्व उसके जीवन को समझ या वाद-विवाद कर सकता है' वह हल्का-फुल्का नहीं हो सकता। और हमारा यह हाल है कि कल आलोक पुराणिक के एक कमेण्ट के माध्यम से पहली बार संजय का नाम सुना! उसी पर मैने ब्लिंक (अनभिज्ञता में भकुआ लगना) किया - संजय लीला भंसाली कौन हैं? और फिर मित्रवत सदाशय व्यवहार के नाते संजीत ने लिंक दिये।

संजय लीला भंसाली
(चित्र विकीपेडिया से) Sanjay
"संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया’ की पहली झलक अलसभोर की तरह है, जिसमें कुछ दिखता है और बहुत-सा छिपा रहता है। आप अंग्रेज कवि कोलरिज की अधूरी कविता ‘कुबला खान’ की तरह अलिखित का अनुमान लगाइए। एक अच्छा फिल्मकार दर्शक की कल्पनाशीलता को जगा देता है। अगले प्रोमो में उजाला अधिक होगा और सूर्योदय की रक्तिम आभा होगी। धीरे-धीरे हर प्रोमो दिन के पहर-दर-पहर उजागर करेगा फिल्म को। दीपावली पर प्रदर्शन के समय सूर्य अपनी पूरी आब पर होगा।"
- जयप्रकाश चौकसे दैनिक भास्कर में.

और संजय लीला भंसाली की फिल्में - 'हम दिल दे चुके सनम', 'ब्लैक', 'सावरिया' अथवा 'खामोशी - द म्युजिकल' का नाम भी कल ही सुना। 'देवदास' का नाम इसलिये ज्ञात है कि ऐश्वर्य राय के विषय में पढ़ते हुये और फोटो के माध्यम से पता चल गया था।

कल से ही यह लग रहा है कि कम से कम ब्लॉगरी करने के लिये तो अपनी समझ और अनुभव का दायरा बढ़ाना पड़ेगा। और फिल्म ज्ञान उसमें मुख्य तत्व है; जिसका विस्तार आवश्यक है। ऐसा नहीं कि पहले मैने यह महसूस नहीं किया। दस जून को मैने एक पोस्ट 'फिल्म ज्ञान पर क्रैश कोर्स की जरूरत' नामक शीर्षक से लिखी थी। पर उस समय सब मजे-मजे में लिखा था। प्रतिबद्धता नहीं थी। अब लगता है - सिनेमा का डमीज़ वाला कोर्स होना ही चाहिये।

इस विषय में पहला काम किया है कि दो ठीक से लगने वाले मूवी/बॉलीवुड ब्लॉग्स की फीड सब्स्क्राइब कर ली है। कुछ तो पढ़ा जायेगा इस तरह फिल्मों पर।

कुछ दिनों बाद हिन्दी सिनेमा के नाम पर मैं ब्लिंक नहीं करूंगा! पक्का।


मदर (माँ मीरा - श्री अरविन्द आश्रम) के पास एक रुक्ष साधक आया। वह अपनी साधना में इतना रम गया था कि सुन्दरता, भावुकता, स्नेह और दुख जैसी अनुभूतियों से विरत हो गया था। मदर ने उसे काफी समय तक रोमाण्टिक उपन्यासों को पढ़ने को कहा। वह आश्चर्य में पढ़ गया पर उसने आदेश का पालन किया। कालांतर में उसकी रुक्षता समाप्त हो पायी।

जीवन (हम जैसे सामान्य जनों का छोड़ दें); साधक का भी हो तो भी बैलेंस मांगता है। और वह बैलेंस उसे मिलना चाहिये!


Friday, October 12, 2007

एक कतरा रोशनी


Gyan(041) मेरे घर में मेरे सोने के कमरे में एक जरा सा रोशनदान है। उससे हवा और रोशनी आती है और वर्षा होने पर फुहार। कमरे का फर्श और कभी-कभी बिस्तर गीला हो जाता है वर्षा के पानी से।

एक बार विचार आया था कि इस गलत डिजाइन हुये रोशनदान को पाट दिया जाये। पर परसों लेटे-लेटे सूरज की रोशनी का एक किरण पुंज छत के पास कमरे में दीखने लगा तो मैं मुग्ध हो गया। मुझे लगा कि प्रकृति को कमरे में आने/झांकने का यह द्वार है छोटा रोशनदान।

सहूलियत के चक्कर में प्रकृति को अनदेखा करना; अपने दरवाजे-खिड़कियां-रोशनदान बन्द कर रखना - प्राइवेसी के लिये; यह सामान्य मानव का व्यवहार है।DSCF1902

प्रकृति को अपने पास निमंत्रित करने को कुछ अलग करना पड़ता है! या कम से कम जो हो चुका है; उसे रहने देना भी सही व्यवहार है। मैने पढ़ा है कि जापानी अपने बगीचे बनाते समय स्थान की मूल संरचना से छेड़-छाड़ नहीं करते। यह सीखा जा सकता है।  


यह पोस्ट तो बहुत छोटी हो गयी। मेरे पास अवसर है एक कविता प्रस्तुत करने का। यह श्री शिवमंगल सिन्ह 'सुमन' की लिखी है और 'मिट्टी की बारात में संकलित' है:

ठहराव

तुम तो यहीं ठहर गये

ठहरे तो किले बान्धो

मीनारें गढ़ो

उतरो चढ़ो

उतरो चढ़ो

कल तक की दूसरों की

आज अपनी रक्षा करों,

मुझको तो चलना है

अन्धेरे में जलना है

समय के साथ-साथ ढलना है

इसलिये मैने कभी

बान्धे नहीं परकोटे

साधी नहीं सरहदें

औ' गढ़ी नहीं मीनारें

जीवन भर मुक्त बहा सहा

हवा-आग-पानी सा

बचपन जवानी सा।


Thursday, October 11, 2007

आत्मवेदना: मि. ज्ञानदत्त आपकी हिन्दी बोलचाल में पैबन्द हैं।


ब्लॉग पर हिन्दी में लिखने के कारण शायद मुझसे ठीक से हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने की भी अपेक्षा होती है। लोगों के नजरिये को मैं भांप लेता हूं। अत: जब वेब-दुनिया की मनीषाजी ने मुझसे 10-15 मिनट फोन पर बात की तो फोन रख सामान्य होने के बाद जो पहला विचार मन में आया वह था - मिस्टर ज्ञानदत्त, योर स्पोकेन हिन्दी इज सिम्पली प्यूट्रिड (Mr. Gyandutt, your spoken Hindi is simply putrid!)| उन्होने हिन्दी में ही बात प्रारम्भ की थी और उसी में जारी रखने का यत्न भी किया। मैं ही हिन्दी में निरंतरता कायम नहीं रख पाया। उसी का कष्ट है।

यह आत्मवेदना ऐसी नहीं कि पहली बार हो रही हो। धाराप्रवाह हिन्दी में वार्तालाप में विचार रख पाने की हसरत बहुत जमाने से है। यही नहीं, धाराप्रवाह किसी गहन विषय पर अवधी में निरंतर 5 मिनट बोल सकने की चाह तो बाल्यकाल से है।

हिन्दी भाषा के जानकार लिख्खाड़ सज्जन कह सकते हैं मैं भाव खाने के मोड में आ गया हूं। अंग्रेजी में अपने पैबन्दों की चर्चा को इस प्रकार हिन्दी जगत में लिया जाता है कि बन्दा इठला रहा है। पैबन्दों को बतौर मैडल प्रयोग करता है। अपने को अंग्रेजी अभिजात्य से जोड़ता है। Gyan(055) आत्मदया तो छद्म नाम है अपने आप को विशिष्ट दर्शाने के यत्न का। पर जो लोग मुझे पढ़ रहे हैं, वे शायद मेरे हिन्दी प्रयास और प्रेम को नकली न मानें। और वह नकली है भी नहीं। मैने सतत हिन्दी बेहतर लिखने का यत्न किया है और पूरे निश्चय से बेहतर हिन्दी बोलने की क्षमता अर्जित कर रहूंगा। श्रीश और नाहर जी जो अंग्रेजी में अपनी कमी कभी छिपाते नहीं - बौद्धिकता और लेखन में मुझसे बीस ही होंगे। उनके ब्लॉग और उनकी उपलब्धियां मुझे प्रेरित करती हैं।

मनीषा वेब-दुनियां की ओर से मुझसे बात कर रही थीं। अगर वे कुछ लिखेंगी तो शायद यह अवश्य हो कि मैं अपना कथ्य अच्छी तरह हिन्दी में व्यक्त नहीं कर पाया। अंग्रेजी के पैबन्द - जो कई लोगों के लिये फैशन हो; मेरे लिये भाषायी लाचारी दर्शाते हैं।

ऐसा क्यों होता है कि भारत में आपकी उच्च तकनीकी शिक्षा और तत्पश्चात जीविका आपको आपकी भाषा से विमुख करती जाती है। मुझे याद है कि सत्तर के दशक में इंजीनियरिंग की शिक्षा के दूसरे वर्ष में एक गेस्ट लेक्चर था मेरे स्ंस्थान में। वह बी.एच.यू. के गणित के एक प्रोफेसर साहब ने हिन्दी मैं - 'चार और उससे अधिक विमा के विश्व' पर दिया था। उस दिन मैं बिना अंग्रेजी का रत्ती भर प्रयोग किये डेढ़ घण्टे का हिन्दी में धाराप्रवाह और अत्यंत सरस तकनीकी भाषण सुन कर अभिमंत्रित सा महसूस कर रहा था। वैसे अनुभव फिर नहीं हुये।

बाद मे तो नौकरी के दौरान सही गलत आंकड़े ही बने हिन्दी के। हिन्दी ब्लॉग लेखन का यह फेज़ मुझे अवसर प्रदान कर रहा है भाषाई इम्यूरिटी को अन-लर्न करने या टोन डाउन करने का।

और इस विषय में मुझमें संकल्प की कमी नहीं है। यह हो सकता है कि जो मेरी बोलचाल की हिन्दी अंतत: बने; वह सामान्य हिन्दी और साहित्यिक और बुद्धिमानों की हिन्दी से अलग हो। पर वह पैबन्द नहीं होगी।

अभी आप मेरी बोलचाल की हिन्दी पर व्यंग कर सकते हैं। शिव कुमार मिश्र - आपके लिये एक विषय है! बड़े भाई होने का लिहाज न करना!


Tuesday, October 9, 2007

आगरा में आब है!


Gyan(052) आगरा को मैने बाईस वर्ष पहले पैदल चल कर नापा था। तब मैं ईदगाह या आगरा फोर्ट स्टेशन के रेस्ट हाउस में रुका करता था। वहां से सवेरे ताजमहल तक की दूरी पैदल सवेरे की सैर के रूप में तय किया करता था। आगरा फोर्ट के मीटर गेज की ओर फैले संकरे मार्किट में काफी दूर तक पैदल चला करता था। समस्या बिजली जाने पर होती थी, जब लगभग हर दुकान वाला जेनरेटर चलाता था और किरोसीन का धुआं सिरदर्द कर दिया करता था। आगरा फोर्ट से ईदगाह और आगरा कैण्ट स्टेशन तक पैदल भ्रमण करता था और सभी ठेले वालों द्वारा लगाई गयी सामग्री का अवलोकन किया करता था। तब यह समस्या नहीं थी कि कौन हमें पहचानता है और आगे वह हमारे स्टाफ में हमारी आवारागर्दगी के गुण गाता फिरेगा! अब अंतर आ गया है।Gyan(053)

(ऊपर का चित्र आगरा छावनी स्टेशन के बाहर स्टीम-इंजन और दायें का चित्र आगरा छावनी स्टेशन जगमगाहट के साथ।)

आज दशकों बाद आगरा आया हूं। जिस रास्ते पर वाहन से चला हूं, वे बड़े साफ-साफ थे। स्टेशनों पर रेल तंत्र/सुविधाओं का मुआयना करने के अलावा शहर का जो हिस्सा देखा वह निहायत साफ था। चौरस्तों पर दो मूर्तियां देखीं - तात्या टोपे और महारानी लक्ष्मीबाई की। दोनो अच्छी लगीं। आगरा कैण्ट स्टेशन का बाहर का दृष्य भी बहुत खुला-खुला, चमकदार और स्वच्छ था। मन प्रसन्न हो गया। यह अलग बात है कि मैं संकरे और कम साफ इलके में गया नहीं - वहां का कोई काम नहीं था मेरे पास। खरीददारी को मेरी पत्नी गयी थीं। पर वे भी बता रही थीं कि वे जिस भी क्षेत्र में गयीं - कोई बहुत गन्दगी नहीं नजर आयी उन्हे।

Gyan(046) मैं आगरा रेल मण्डल के विषय में लिखना चाहूंगा। यह नया बना मण्डल है जिसमें पहले के 5 विभिन्न जोनल रेलों के 5 मण्डलों के क्षेत्र शामिल किये गये हैं। स्टाफ अलग-अलग मण्डलों से आया होने के कारण यहां कार्य करने की हेट्रोजीनस कल्चर है। अत: पूरे तालमेल की और सुदृढ़ परम्परायें बनने की स्थिति में अभी समय लगेगा। पर जीवंतता सभी में दिखी - मण्डल रेल प्रबन्धक से लेकर सामान्य कर्मचारी तक में। (बायीं बाजू में मण्डल रेल प्रबन्धक दफ्तर के नये उभर रहे ट्रेन नियंत्रण कार्यालय का चित्र)

आगरा और आगरा में स्थित रेल प्रणाली से मैं प्रभावित हुआ। यह कहूं कि आगरा में आग है - शायद अलंकारिक होगा। पर सही शब्द शायद हो - आगरा में आब है!


(यह पोस्ट आगरा में लिखी और वहां से वापसी में 2404 मथुरा-इलाहाबाद एक्स्प्रेस से यात्रा में पब्लिश की जा रही है।)

वापसी की यात्रा प्रारम्भ होने पर प्रतीक से बात हुई - फोन पर। अच्छा लगा। मैं अगर पहले अपनी ई-मेल चेक कर लेता तो शायद आगरा में मिल भी लेते!


ब्लॉगस्पॉट : कृपया टिप्पणी के लिये पॉप-अप खिड़की दें।


ब्लॉगस्पॉट के ब्लॉग में अगर टिप्पणी करनी हो और टिप्पणी देने में लेख को पुन: देखने का मन करे तो लेख का पन्ना फिर खोलना पड़ता है। यह झंझटिया काम है। इससे कई बार टिप्पणी करनी रह जाती है। कई बार टिप्पणी की गुणवत्ता कम हो जाती है।AAA

बेहतर है ब्लॉगस्पॉट के ब्लॉगर बन्धु ब्लॉगर डैशबोर्ड में सेटिंग>कमेण्ट्स>शो कमेंट्स इन अ पॉप अप विण्डो? के लिये "हां" का विकल्प देने का कष्ट करें। इससे हम जैसे कम याद रखने वाले को टिप्पणी करते समय लिखी पोस्ट साथ-साथ देख पाने की सुविधा होती है।

हां, हम जैसे के लिये, जो आंखों पर कम जोर देना चाहते हैं, अगर शो वर्ड वेरीफिकेशन फॉर कमेण्ट्स? वाले विकल्प में "नहीं" स्टोर कर दें तो और भी अच्छा है।

(कृपया चित्र की सेटिंग देखें)


आज रात मैं इलाहाबाद से आगरा जा रहा हूं 2403इलाहाबाद-मथुरा एक्स्प्रेस में। यह पोस्ट ट्रेन में सम्पादित और वहीं से इण्टरनेट पर पोस्ट की जा रही है। इलाहाबाद-मथुरा एक्सप्रेस एक रेगुलर गाड़ी (जिसका टाइमटेबल में अस्तित्व हो) के रूप में 1 जुलाई 2007 से चलाने में मेरा प्रशासनिक योगदान रहा है और उसी ट्रेन में पहली बार ब्लॉग-पोस्ट पोस्ट कर रहा हूं। अपने आप में यह सुखद अनुभूति है। यह छोटी सी पोस्ट बनाने-पोस्ट करने का ध्येय यह अनुभूति लेना ही है!

दाईं ओर चित्र में मेरी पत्नी देर रात में ट्रेन में सोते हुये। वह थोड़ी रुग्ण हैं और हल्का कम्बल ओढ़ कर सो रही हैं।

पुन: सवेरे 6 बजे टुण्डला निकला है। मैं सोचता था कि मेरा सेल-वन का जीपीआरएस कनेक्शन यूं ही है। पर यह पोस्ट करने और टिप्पणी मॉडरेट करने का काम तो कर ही दे रहा है!


Monday, October 8, 2007

गुण्डी

शरारती बच्चा - जो अपने कहे की करे, दूसरे पर रोब जमाये और सामने वाले को तौल कर पीट भी दे, उसे कहते हैं - शैतान या गुण्डा। गुण्डा शब्द में लड़की को शामिल नहीं किया गया है। शायद लड़की से दबंग व्यवहार की अपेक्षा ही नहीं होती। पर छोटी सी पलक ऐसी है। उसे क्या कहेंगे? मैने ज्यादा दिमाग नहीं लगाया और नाम रख दिया - गुण्डी। मैं और मेरी पत्नी उसे गुण्डी कहते हैं।

Palak पलक पड़ोस में रहती है। उसके पिता रिलायंस के किसी फ्रेंचाइसी के पास नौकरी करते थे। वह नौकरी छोड़ कर उन्होने किसी अर्ध सरकारी स्कूल में अकाउण्टेण्ट की नौकरी कर ली है। पड़ोस में उसके पिता-माता एक कमरा ले कर रहते हैं। कमरे में पलक की मोबिलिटी के लिये ज्यादा स्थान नहीं है। सो उसकी माता येन-केन उसे हमारे घर में ठेल देती है।

और पलक पूरी ठसक से हमारे घर में विचरण करती है। यह देख कर कभी खीझ होती है कभी विनोद। तीन साल की पलक घर के हर एक वस्तु को छूना-परखना चाहती है। और जो वह चाहती है वह कर गुजरती है। मेरा गम्भीर-गम्भीर सा चेहरा देख कर मुझसे उसकी बातचीत नहीं होती। लेकिन अगर मुझे मोबाइल निकाले देखती है तो दौड़ कर पास चली आती है और इस आशासे ताकती है कि उसका फोटो खींचा जायेगा। फोटो खींचने पर यह उत्सुकता प्रकट करती है कि उसे फोटो दिखाया जाये। मैं अब सोचता हूं कि यदा कदा कैण्डी या टॉफी के माध्यम से उससे सम्वाद कायम करने का भी यत्न करूं।

अपने से कुछ बड़े बच्चों के साथ भी पलक दबंग है। उनकी चलने नहीं देती। कभी-कभी उन्हे पीट भी देती है। उसे देखना एक अनूठा अनुभव है।  

एक तीन साल की लड़की जो आज पूरी ठसक के साथ गुण्डी है, को घर समाज धीरे-धीरे परिवर्तित करने लगेगा। उसके व्यवहार में दब्बूपन भरने लगेगा लड़की सुलभ लज्जा के नाम पर। "कमर पर हाथ रख कर लड़कों जैसे नहीं खड़े हुआ करते" या "लड़कों जैसे धपर धपर नहीं चला करते" जैसे सतत दिये जाने वाले निर्देश अंतत: व्यवहार बदल ही देंगे।

यह देखने का विषय होगा कि आजसे 10 साल बाद पलक का व्यवहार कैसा होता है!

मेरे अन्दाज से वह गुण्डी तो नहीं रह पायेगी।   

Sunday, October 7, 2007

जीवन में सफलता और असफलता को लिपिबद्ध करने की सोच


failure असफलता कतरा कर नहीं जाती। आंख में झांकती है। प्वाइण्ट ब्लैंक कहती है - "मिस्टर जीडी, बैटर इम्प्रूव"! फटकार कस कर देती है। कस कर देने का मतलब अंग्रेजी में आत्मालाप। सिर झटकने, मेज पर मुक्का मारने, च-च्च करने में हिन्दी की बजाय अंग्रेजी के मैनेरिज्म ज्यादा प्रभावी हैं। असफलता उनका प्रयोग करती है। जब तक आत्मलताड़ और इम्प्रूवमेण्ट का सोच चलता है - तब तक अंग्रेजी के मैनरिज्म चलते हैं। पर जब अवसाद घेरने लगता है तो हिन्दी टेकओवर करने लगती है। अवसाद में करुणा है। वह मातृभाषा में प्रभावी ढ़ंग से बयान होती है। पता नहीं आप लोगों के साथ असफलता का कैसे भाषाई प्रभाव चलता है।

उम्र के साथ असफलता को झेलने की क्षमता कम होती जा रही है। वह जीजीविषा कम जगा रही है, अवसाद ज्यादा बढ़ा रही है। लिहाजा अपने ध्येय स्केल डाउन करने की प्रवृत्ति बन रही है। Gyan(036) एक साधनों की विपन्नता की सीमा पर चल रहे परिवार के लड़के से जीवन शुरू करने वाले मुझ को जितना जमीन पर मिला उतना कल्पना में उड़ने को भी मिला। अत: उड़ना और जमीन पर उतरना मेरे लिये नया नहीं है। 

किसी जमाने में - बहुत पहले स्कूली दिनों में; जब एनरिको फरमी की बायोग्राफी पढ़ रहा था तो नोबल पुरस्कार की सोचता था। मेरे विचार से बहुत से लोग किसी न किसी मुकाम पर वैसा सोचते/उड़ते हैं। उस समय (अंतत:) स्कूली शिक्षा में बोर्ड की मैरिट लिस्ट में आने वाले तथाकथित मेधावी छात्र सरकारी गजटेड अफसरी पर संतोष करने लगे थे। अब वे अमरीका जाने लगे हैं या इंफोसिस ज्वाइन करने लगे हैं। नोबल पुरस्कार से रेलगाड़ी हांकने के बीच असफलताओं-सफलताओं का एक बड़ा जखीरा मेरे पास है। उस जखीरे को टटोलने में बड़ा कष्ट होता है।

फिर भी मन करता है सफलता और असफलता के मेकेनिज्म - जैसे समझा-जिया है - पर लिखूं। आखिर कभी न कभी वह दस्तावेज लिखना ही है। उसमें से काफी अंश पूर्णत व्यक्तिगत होगा। पर बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो शेयर किया जाये। फिर लगता है कि हममें क्या सुर्खाब के पर लगे हैं! जो कुछ उनमें लिखा जायेगा, वह किसी न किसी प्रकार से पहले भी लिखा जा चुका है। एक मन होता है कि इस विषय पर जो कुछ पढ़ा है उसपर लिखना प्रारम्भ करूं - ज्यादातर उसमें से मोटीवेशनल लिटरेचर से प्रकटित हुआ है। उस लेखन में अपने अनुभव भी समाहित हो सकते हैं।

कुछ दिन पहले मेरी "दो चेतावनी देती पोस्टें" पर टिप्पणी करते हुये प्रशांत प्रियदर्शी (PD) चेतन भगत और रोबिन शर्मा का नाम ले रहे थे। ये मेरे आदर्श तो नहीं हैं पर इन जैसे अनेक को पढ़ा गुना है। उपनिषद-गीता-मानस से होती हुई एक धारा वर्तमान युग के लेखकों तक आती है। उनको अपने तरीके से चुना जा सकता है। यह सब जरूरी नहीं कि ब्लॉग दुनियाँ को पसन्द आये। जब गान्धीजी पर लोग उलट सोच रख रहे हैं - तब यह लिखना डाइसी (dicey) है।

पर क्या डाइसी नहीं है? 


Saturday, October 6, 2007

पत्ता खड़का - झारखण्ड बन्द


कल शाम मेरी मेज पर सन्देश आया - झारखण्ड बन्द के कारण पूर्व मध्य रेलवे मुख्यालय 11 मेल एक्स्प्रेस ट्रेनों के डायवर्शन (रास्त बदल) और एक ट्रेन को रात भर रोके रखने के लिये कह रहा है. नक्सली बन्द है. कोई झिक झिक नहीं. गाड़ियां रुकेंगी तो रुकेंगी, रास्ता बदल कर जायेंगी तो जायेंगी. यात्री सुरक्षा सर्वोपरि है. पीरियड.

रात में गोमो-बरकाकाना-गरवा रोड-चोपन खण्ड पर चलने वाली रेलगाडियां उस खण्ड पर नहीं डाली गयीं. आने वाले चौबीस घण्टे में भी यही रहेगा. पिछली बार के बन्द में तो हमें एक ट्रेन 4-5 स्टेशन वापस घुम कर लानी पड़ी थी दूसरे रास्ते से भेजने के लिये.   

jharkhandrailsबन्द क्यों और किस प्रकार डिक्लेयर होता है एमसीसी या अन्य नक्सलियों द्वारा? यह जानने के लिये मैं पूर्व-मध्य रेलवे के उच्च अधिकारी से पूछता हूं. वे भी झुंझला कर जवाब देते हैं. बस जी कुछ देर पहले पता चला. वह भी दानापुर मण्डल के एक पुलीस अधिकारी ने बताया. बोकारो - गिरिडीह में अपने रिश्तेदारों से पूछता हूं. जवाब मिलता है कि पता चल जाता है. कभी अखबार में बयान छप जाता है नक्सली लोगों का. कभी वैसे शोर मच जाता है. पर इस बन्द के बारे में उन्हे खबर नहीं थी.

अब नक्सली आकस्मिक स्ट्राइक करना चाहते हैं या विधिवत बन्द करना? यह कोई राजनैतिक बन्द तो है नहीं कि विरोधी पार्टी वाले उसका उल्लंघन का प्रयास करें. हिंसात्मक बन्द का प्रतिकार जब सरकार नहीं कर पाती तो जनता क्या करेगी? लिहाजा शांति से बन्द के विषय में समय से बता दें, जनता स्वत: अनुसरण करेगी. वैसे भी मैने देखा है कि वहां वाहन कारवां में चलते हैं रात में. अकेले विचरण करने का दुस्साहस कम ही वाहन करते हैं.  

ऐसे में प्रचार तो पर्याप्त होना चाहिये बन्द का. बाड़मेर पुलीस के पास ब्लॉग है जो रोज की जिले की गतिविधियां बताता है तो नक्सली ग्रुप के पास ऐसे ब्लॉग क्यों न हों जिन पर बन्द जैसी गतिविधियों की अग्रिम सूचना हो?1 जिस प्रकार से शॉर्ट नोटिस पर बन्द होते हैं उसके अनुसार सूचना स्कैन करने को ही लोग ढ़ेरों क्लिक करेंगे. विचारधारा का प्रसार भी इस तरह से सम्भव है. पता नहीं नक्सली ग्रुप फ्लैट होते विश्व की कितनी तकनीकें प्रयोग करते हैं. अल-कायदा तो बहुत करता प्रतीत होता है. 


1. मैने माओइस्ट रजिस्टेंस, रजिस्टेंस और नक्सल रजिस्टेंस नाम के ब्लॉग पाये हैं जो नक्सली विषय वस्तु रखते हैं. मैं जान बूझ कर इनके लिंक नहीं दे रहा हूं. रजिस्टेंस नामक ब्लॉग पर तो यह लिखा है कि यह ब्लॉग हैक हो चुका है. यद्यपि हैक करने पर उसका डिसफिगरमेण्ट नहीं हुआ है. ये ब्लॉगस्पॉट और वर्डप्रेस पर बने हैं. 

पर ये सभी ब्लॉग साइटें मात्र प्रचार सामग्री या फिर अखबारों की कतरनें (उबासी...) छाप रही हैं. इन ब्लॉगों पर ढेरों लिंक हैं. कहीं पर किसी बन्द की अग्रिम सूचना नहीं दीखती.