Wednesday, January 9, 2008

स्वास्थ्य समस्याओं में मक्का (मकई) से निदान


55 यह श्री पंकज अवधिया, वनस्पति और कृषि शास्त्री की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। आज वे सामान्य तौर पर सुलभता से पायी जाने वाली वनस्पति - मक्का के स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रयोगों पर चर्चा कर रहे हैं। मेरे ब्लॉग पर उनके पिछले लेख आप पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

आप उनका हिन्दी में लेखन उनके ब्लॉग मेरी कविता और हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर पढ़ भी पढ़ सकते हैं। दूसरे ब्लॉग पर तो आपको विभिन्न चिकित्सकीय विषयों पर उनके लेखों के ढ़ेरों लिंक मिलेंगे।   


प्रश्न: मै अमेरिका मे रहता हूँ और यहाँ आपकी पोस्ट पर बतायी वनस्पतियाँ नही मिलती हैं। मै शराब पीने का आदी हूँ और लीवर व फेफडे की समस्याओ के अलावा पाइल्स और दूसरी समस्याएं भी है। कुछ उपयोगी जानकारी यदि आपके पास हो तो बतायें।

उत्तर: चूँकि मैने भारतीय वनस्पतियो पर शोध किया है अत: इन्ही से सम्बन्धित जानकारियाँ ही आपको दे सकता हूँ। मै साधारण प्रयोगों पर लिखना पसन्द करता हूँ। जटिल रोगों के लिये आप विशेषज्ञ से परामर्श ले तो अच्छा होगा। कुछ वर्षो पहले एक विदेशी वनस्पति विशेषज्ञ से मक्के के विषय मे रोचक जानकारियाँ प्राप्त हुई थी। मक्का तो आपके देश मे आसानी से मिलता है। अत: आप चाहें तो इस ज्ञान का लाभ उठा सकते है।corn_on_the_cob

जैसे श्वांस सम्बन्धी रोगो के लिये हम केले की पत्तियो की राख का प्रयोग करते है वैसे ही मक्के का प्रयोग होता है। इसके काँब (भुट्टे) के बीच के भाग को जलाकर राख एकत्र कर ली जाती है। फिर इस राख मे काला नमक मिलाकर चाटा जाता है। इससे खाँसी विशेषकर कुक्कुर खाँसी मे बड़ी राहत मिलती है। हमारे देश मे केला की पत्तियो की राख का प्रयोग इस तरह से होता है।

मक्के के छोटे पौधे को एकत्रकर इसे पानी मे उबालकर काढ़ा तैयार कर लिया जाता है। फिर इस काढ़े को टब मे भरकर उसमे बैठने से बवासिर (पाइल्स) के दर्द में लाभ पहुँचता है। इसका अधिक समय तक प्रयोग बवासिर को ठीक भी करता है।

corn_on_the_cob_1 मक्के के बाल (सिल्क) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा मे होता है। पथरी से बचाव के लिये रात भर सिल्क को पानी मे भिगोकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार मे सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग होता है।

जैसा आपने बताया कि आपको लीवर से सम्बन्धित समस्या है। यदि आप गेहूँ के आटे का उपयोग करते हैं तो उसके स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें। यह लीवर के लिये अधिक लाभकारी है।

भारत मे शहरों मे जैविक खेती से तैयार मक्का नही मिलती है पर इन प्रयोगों के लिये आप जैविक मक्के का प्रयोग करें तो अधिक लाभ होगा।

उन विदेशी विशेषज्ञ नें यह भी बताया कि किसी बडे फोड़े को बिठाने के लिये मक्के की जड़ के पास से एकत्र की गयी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। हमारे देश मे पीपल के पास से एकत्र की गयी मिट्टी का इस तरह बाहरी प्रयोग होता है।

इस उत्तर को पढ़ रहे पाठक अब जब भी भुने हुये भुट्टे खायें तो पहले दानो को खाकर बचे हिस्से को फेकें नही बल्कि उसे बीच से दो टुकडो मे तोड़ लें और फिर अंदर वाले भाग को सूंघे। विदेशी विशेषज्ञ के अनुसार इससे दाने जल्दी से पच जाते हैं। फिर उन टुकडो को जलाकर राख जमा कर लें और आवश्यकतानुसार श्वांस रोगों मे प्रयोग करें।

वनस्पतियो से सम्बन्धित तरह-तरह के सरल प्रयोग मुझे अचरज मे डाल देते हैं। मै गौरवांवित महसूस करता हूँ मानव के अपार ज्ञान के विषय मे जानकर। आप क्या कहते हैं?

पंकज अवधिया

© लेख पंकज अवधिया के स्वत्वाधिकार में। चित्र wpclipart से लिये गये हैं।


Tata car बिजनेस वीक के इस लेख और उसमें छपे इस चित्र का अवलोकन करें। यह सज्जन शीघ्र ही कार में अपग्रेड करेंगे अपनी मोटर साइकल को! »

लेख में कहा गया है कि टाटा मोटर्स एक नयी डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रेटेजी से कार की कीमत कम करेगी। कम्पनी डीलरों को किट सप्लाई करेगी और असेम्बली डीलरों के स्तर पर होने से कीमत कम होगी। अर्थात टाटा की कार फेक्टरी में नहीं, वर्कशॉपों में बनेगी। है न नया फण्डा!   


Sunday, January 6, 2008

एक पोस्ट अस्पताल के वार्ड से


कल शाम मेरी माताजी अचानक बीमार हो गयीं। रक्त वाहिनी में थक्का जम जाने से पैर में सूजन और असहनीय दर्द के चलते उन्हें अस्पताल में ले आये। प्राथमिक आपात चिकित्सा से मामला ठीक है। कल परसों तक कुछ परीक्षण होंगे और फिर अस्पताल से छुट्टी। यह दो बार पहले भी हो चुका है।

जैसे पहले घर में तार (टेलीग्राम) का आना बिना मजमून पढ़े रुलाई का कारण बन जाता था; कुछ वैसा ही अस्पताल में भर्ती होना है। टेलीकम्यूनिकेशन के बढ़े साधनों से फोन कॉल्स की भरमार हो जाती है। और लोग बड़े जेनुइन चिन्ता में होते हैं। जो आसपास होते हैं - वे अस्पताल आने की कोशिश करते हैं। अस्पताल में भर्ती होना एक विषादयोगीय अनुष्ठान है। यह हर परिवार यदा कदा करता-झेलता रहता है। Hospital Bed

« अस्पताल के बिस्तर पर सोती अम्मा जी। दूसरे बिस्तर पर रजाई पर लैपटॉप रख मैं पोस्ट लिख रहा हूं - डाक्टर साहब के राउण्ड का इन्तजार करते हुये। 

इस बार मरीज के साथ अस्पताल में रात्रि कालीन रुकने की बारी मेरी पड़ गयी है। मुझे याद नहीं आता कि पहले मैं अकेले किसी मरीज की अटेण्डेंस में रात में रुका होऊं। लिहाजा यह मेरे लिये बड़ी प्लानिन्ग का मामला हो गया। लैपटॉप, पुस्तकें, कलम, कॉपी, कपड़े, रजाई, शेविन्ग किट ... जो कुछ साथ ले कर आया हूं वह तो कोई व्यक्ति सामान्य जिन्दगी अनवरत काट सकने के लिये प्रयोग करता होगा। और मित्रों, यह तैयारी तब, जब कि अस्पताल मेरे घर से डेढ़ किलोमीटर भर दूर होगा। अपरिग्रह का सिद्धान्त सोचने में बढ़िया है; पर वास्तविकता में --- मॉस्कीटो रिपेलेण्ट लाना तो रह ही गया!

और बेचारे डॉक्टर साहब - मैने सोचा कि अनुभवी अधेड़ होंगे; पर वे तो नीरज रोहिल्ला जैसे जवान निकले। उन सज्जन से मैने वे सब सवाल पूछ लिये जो सामान्यत: मरीज के साथ आया चकपकाया अटेण्डेण्ट नहीं पूछता होगा। तब भी मुझे लगता है कि कुछ वाइटल सवाल बच गये! खैर सवाल पूछने से अपनी व्यग्रता कम होती है। बाकी उन्होंने मुझे यह अश्वासन दे दिया है कि मामला नियंत्रण में है। कुछ टेस्ट कर देख लिया जायेगा और आवश्यकता पड़ी तो दवा बदली जायेगी।

मैं अस्पताल में निरुद्देश्य चक्कर लगाता हूं। तरह तरह के मरीज। तरह तरह की व्यथा। कहीं दक्षता, कहीं लापरवाही, कहीं सहभागिता की उष्णता और कहीं बेरुखी। अस्पताल के मुख्य प्रबंधक महोदय को मैं फोन मिलाता हूं - कुछ पुराने सम्पर्क का लाभ लेने को। वे बहुत सज्जन व्यक्ति हैं। पर वे कहीं दूर से जवाब देते हैं - अपनी एन्जियोप्लास्टी करा कर इलाहाबाद के बाहर किसी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। उनकी आवाज से लग रहा था कि वे स्वयम एक जद्दोजहद कर रहे हैं। अब मेरे पास और कोई काम नहीं - मां के साथ समय भर गुजारना है। अब, जब व्यग्रता लगभग दूर हो गयी है तो मुझे पोस्ट लिखने की सूझी है।   

जगह जगह से ब्लॉगर बंधु पोस्ट ठेल चुके हैं। एक पोस्ट अस्पताल के प्राइवेट वार्ड से भी सही!


अस्पताल और दफ्तर में ताल-मेल बिठाने के चक्कर में शायद ब्लॉग जगत से दूर रहना पड़े अगले दो तीन दिन! यह पोस्ट मैं सोमवार को ठेल सकता था; पर जब तैयार कर ही ली है तो आज ही सही।

Saturday, January 5, 2008

पशुओं के सानिध्य में


Dog Small1 सवेरे घूमते समय दो कुत्ते आपस में चुहल करते दीख गये। एक पामेरियन था। किसी का पालतू। घर से छूट कर बहक आया हुआ। दूसरा सड़क पर पला। दोनो एक दूसरे से ऊर्जा पा रहे थे। सवेरे की सैर आनन्ददायक हो गयी। Cat small 22

दुकाने खुलने पर अखबार वाले से बिजनेस स्टेण्डर्ड लेने गया। अखबार ले कर पर्स से पैसे निकाल रहा था कि अखबार पर दुकान वाले का बिल्ली का बच्चा आ कर खड़ा हो गया। उसका मुंह मेरी ओर नहीं था। उसके मालिक ने उसे अपनी गोद में ले कर मेरे मोबाइल के लिये एक पोज भी दे दिया।Cat small1

पंकज अवधिया जी की कृपा से मेरे ब्लॉग सप्ताह में एक दिन वनस्पति जगत (flora) के लिये हो गया है। अगर किसी जुगत से एक दिन जीव जगत (fauna) के नाम भी हो जाये तो मजा आ जाये। जीव जगत के प्राणी अपनी पर्सनालिटी रखते हैं। वे बहुत कुछ सिखाते हैं। मैने रीडर्स डाइजेस्ट में अनेक लेख पढ़े हैं उनपर जो मैं किसी भी उत्कृष्ट रचना के समकक्ष रख सकता हूं। कुछ तो मैं अपने गोलू पर लिख सकता हूं; पर गोलू पर लिखना मेरे लिये कष्ट दायक है - वह इस संसार से जा चुका है। और जाते जाते मुझे मौत के सामने असहायता के अनुभूत-सत्य को स्पष्ट कर गया है। cobra_small_BW

क्या आपके पास पशुओं के प्रति कोई विशेष सोच है? उदाहरण के लिये मेरी पत्नी ने एक बार किंग कोबरा के दर्शन किये। सामने पड़ गये थे वे और फन काढ़ कर तन गये थे। मेरी पत्नी सन्न खड़ी रहीं। ताकती भी रहीं अपलक। बाद में मुझे बताया कि इतना भय कभी नहीं महसूस हुआ था। और वह जीव इतना सुन्दर था कि बार-बार देखने का मन भी करता है! 

(मेरी पत्नी ने कहा कि ऐसा ही कुछ फकीरमोहन सेनापति ने अपने आत्मजीवनचरित में शायद कहीं लिखा है। हमने ढ़ूंढ़ा, पर मिला नहीं। हो सकता है किसी अन्य पुस्तक में हो।)


a-adobermanअच्छा; मैं इण्टरनेट पर उपलब्ध यह चित्र आपको दिखाता हूं। चित्र में ये सज्जन नॉर्थ केरोलीना के एक फायरमैन हैं। आग लगी इमारत से इन्होने इस डॉबरमैन कुतिया को बचाया। बेचारे डर भी रहे थे कि डॉबरमैन काट-वाट न ले। पर बचाने के बाद कुतिया ने यह किया - वह इस थके फायर मैन के पास गयी और उसे चूम कर उसे और उसके बच्चों (वह गर्भवती है) को बचाने के लिये धन्यवाद दिया।

मित्रों, सद्व्यवहार केवल मानव की बपौती नहीं है।       


रविवार को गैरसरकारी छुट्टी रहेगी! :-)

कल दो टिप्पणी करने वाले सज्जनों ने याद दिलाया कि मैं उनके ब्लॉग पर नहीं जा रहा हूं। असलियत यह है कि मेरे दफ्तर की शिफ्टिंग से वहां इण्टरनेट उपलब्ध नहीं है। घर में इतना समय नहीं निकल पाता कि पोस्टें पढ़ने - टिप्पणी करने के धर्म का पूरा पालन हो सके। देर से घर लौटने के कारण सामान्यत: सवेरे ही समय निकल पाता है।

पर यह जान कर अच्छा लगा कि टिप्पणियां करना मेरे ब्लॉगीय धर्म के महत्वपूर्ण अंग के रूप में पर्सीव किया जा रहा है! या शायद यह है कि प्रमुख टिप्पणीकारक - समीर लाल और अनूप शुक्ल आजकल गायब हैं! Blushing


Friday, January 4, 2008

स्किट्जो़फ्रेनिया के ध्रुव


Globe हिन्दी ब्लॉगरी और काफी सीमा तक भारतीय समाज में संकुचित सोच के दो ध्रुव नजर आते हैं। एक ध्रुव यह मानता है कि सेन्सेक्स उछाल पर है। भारत का कॉर्पोरेट विकास हो रहा है। भारत विश्व शक्ति बन रहा है। देश को कोई प्रगति से रोक नहीं सकता। दूसरा ध्रुव जो ज्यादा सिनिकल है, मानता है कि कुछ भी ठीक नहीं है। किसान आत्महत्या पर विवश हैं। सेन्सेक्स से केवल कुछ अमीर और अमीर हो रहे हैं। बड़े कॉरपोरेट हाउस किराना बाजार भी सरपोटे जा रहे हैं। आम आदमी और गरीब हो रहा है। समाज में खाई बढ़ रही है। "सर्जिंग इण्डिया" और "स्टिंकिंग भारत" दो अलग अलग देश नजर आते हैं। 

यह फ्रेगमेण्टेड सोच मीडिया का स्किट्जो़फ्रेनिया है जो विभिन्न प्रकार से फैलाया जाता है। मीडिया फ्रेगमेण्टेशन फैला पाने में सफल इसलिये हो पाता है, क्योंकि हमें स्वतन्त्र वैचारिकता की शिक्षा नहीं मिलती। हमारी शिक्षा पद्धति लिखे पर विश्वास करने को बौद्धिकता मानती है। आदमी स्वतन्त्र तरीके से अपने विचार नहीं बनाते।

ये दोनो ध्रुव जो मैने ऊपर लिखे हैं - सचाई उनके एक के करीब नहीं है। सचाई कहीं बीच में है। पर अगर हम एक ध्रुव को पकड़ कर बैठ जायें तो निश्चय ही स्क्टिजो़फ्रेनिक होंगे। राजनेता चुनाव जीतने के लिये जाग्रत भारत या चौपट भारत के ध्रुव सामने रखते हैं - वोट की खातिर। पर मुझे लगता है कि बड़े नेताओं को (अर्थात राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को) यह स्पष्ट है कि सचाई कहीं मिड वे है। वे जो बोलते हों; पर आर्थिक नीतियां ऐसी चल रही हैं जो लगभग दोनो ध्रुवों के बीच में कहीं सोची-समझी नीति का परिचय देती हैं। समस्या राज्यों और चिर्कुट स्तर पर आती है। उसकी काट एक शिक्षित समाज ही है। पर अगर हिन्दी ब्लॉग जगत शिक्षित और जाग्रत समाज का नमूना है - तो मुझे निराशा होती है। बहुत से लोग बहुत सा सिनिसिज्म ले कर आते हैं और अपनी पोस्टों में उंडेलते हैं। नये साल के संदर्भ में कुछ पॉजिटिव पोस्टें, कुछ सकारात्मक रिजोल्यूशन, कुछ अच्छाई नजर आयी। अन्यथा वही सिनिसिज्म दीखता रहा।

शिक्षित समाज से तीन चुनौतियों का मुकाबला करने की अपेक्षा की जाती है। भारत में विविधता और भिन्नता (जातिगत-धर्मगत भिन्नता सन्निहित) से उत्पन्न घर्षण और दिनो दिन बढ़ रहे वैमनस्य से छुटकारा पाने के लिये एकात्मता की स्थापना एक जागरूक और शिक्षित वर्ग से ही सम्भव है। दूसरे, यह मान कर चला जा सकता है कि आने वाले समय में पर्यावरण विषमतर होता जायेगा। जगत का तापक्रम बढ़ेगा। नदियां साल भर बहने की बजाय मौसमी होने लगेंगी। और उत्तरोत्तर फसलें खराब होने लगेंगी। इससे कई प्रकार के तनाव होंगे। तीसरे - विकास के साथ-साथ स्वार्थ, संकुचन और सांस्कृतिक क्षरण की समस्या उतरोत्तर बढ़ेगी।

यह चुनौतियां फेस करने के लिये शिक्षित लोग व्यक्तिगत रूप से या समग्रता से कहां तैयार हो रहे हैं? और अगर स्किट्जो़फ्रेनिया, सिनिसिज्म या पढ़े लिखों की जूतमपैजार को तैयारी मानने की बात समझा जाये तो भगवान ही मालिक है इस देश का।


Shiv यह पोस्ट मैं शिवकुमार मिश्र के कल के हमारे ज्वाइण्ट ब्लॉग पर लिखे व्यंग "रीढ़हीन समाज, निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलीस डिजर्व करता है" के सीक्वेल के रूप में लिख रहा हूं। वह लेख पढ़ कर बहुत दिनों से चल रहे विचारों को व्यक्त करने का मुझे निमित्त मिल गया। हमारा मीडिया-प्रोपेल्ड बुद्धिजीवी समाज शोर अधिक करता है, पर दूरगामी पॉजिटिविज्म देखने में नहीं आता।

कायदे से मुझे यह पोस्ट उस ब्लॉग पर छापनी चाहिये थी; पर मैं उत्तरोत्तर महसूस करता हूं कि उस ब्लॉग पर शिव के विचार आने चाहियें और मेरी हलचल इस ब्लॉग पर। मैं शिव से अनुरोध भी करता रहा हूं कि वे उस ब्लॉग के अकेले कर्ता-धर्ता बन जायें। वैसे भी उनके सटायर के स्तर के टक्कर का लिख पाना मेरे बस की बात नहीं। और अब वे स्वयम रेग्युलर लिख भी रहे हैं। पर छोटे भाई के सामने बड़े की कहां चलती है!


Thursday, January 3, 2008

दन्तनिपोर


बहुत दिनों के बाद कल सवेरे वह चाय की दुकान पर चाय छानने का इन्तजार करते दिख गया। मैं सोचता था कि वह शिव कुटी से फेड आउट हो चुका है। पर अपने को गलत पा कर मुझे प्रसन्नता हुयी। वह मैले कुचैले कपड़े पहने था। पैण्ट और कमीज। ऊपर से आधा स्वेटर। सर्दी निश्चय ही आधे स्वेटर से ज्यादा की थी। पर वह चाय वाले की भट्टी के पास था और कंपकंपाता प्रतीत नहीं हो रहा था। दांत उसके वैसे ही थे - बत्तीसी नहीं, फुटकर और विभिन्न दिशाओं में प्वाइण्ट करते हुये। उसी के कारण हम उसे दन्तनिपोर कहते हैं। असली नाम तो मालुम नहीं। उसके सिर में जितने भी बाल थे - वे अर्से से बिना नहाये लटों में परिवर्तित हो गये थे। दाढ़ी चार-पांच दिन की शेव की हुई लग रही थी। उसका लम्बोतरा मुंह पिचक कर और भी लम्बा नजर आ रहा था। मेरी पत्नी ने उसका फोटो नहीं लेने दिया। वे चाय की दुकान पर खड़े हो कर दन्तनिपोर से संवाद के कतई पक्ष में नहीं थीं। 

दंतनिपोर का फोटो तो मेरी पत्नी ने लेने नहीं दिया! लिहाजा यही फोटो देखें! असली दंतनिपोर के चश्मा नहीं है और सिर पर बाल कम और लट पड़े हैं।

Photobucket

दन्तनिपोर इलेक्ट्रीशियन है। मेरे घर में कुछ बिजली का फुटकर काम और मरम्मत कर रखी है। उसके काम में सुगढ़ता नहीं है और न ही उसके जीवन में है। दारू का नियमित व्यसनी है। अधेड़ है। पर शादी नहीं हुई है। शादी को बहुत बेताब है। उसी के चक्कर में बनारस भी गया था।

वह यहां शिवकुटी में अपने भाई के साझे में रहता था। सवा बिस्से की जमीन में उसके पास पक्का कमरा-सेट था और उसी में भाई के पास एक झोंपड़ी थी। भाई ने उसका राशन कार्ड बनवाने के बहाने एक कागज पर उसके अंगूठे का निशान ले लिया था। इधर दन्तनिपोर बनारस गया और उधर भाई ने जमीन और मकान ६ लाख में (भरतलाल के अनुमान अनुसार यह कीमत मिली होगी) बेंच दिया। तीन-चार महीने बाद वह वापस आया - बिना शादी के - तो यहां उसने पाया कि उसका मकान है ही नहीं। कई दिन बदहवास घूमता रहा। एक दिन भरतलाल ने देखा तो खाने को कुछ पैसे दिये। उसके बाद फिर गायब हो गया।

भरतलाल बताता था कि दन्तनिपोर बहुत हताश था। लोगों ने उसे सलाह दी कि वह भाई के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला कोर्ट में ले जाये, पर उसने मना कर दिया - "भाई भी तो गरीब है। उसकी दो लड़कियां भी हैं।" मुझे लगता है कि यह दया-दर्शन उसने अपनी अकर्मण्यता और अनिश्चय को तर्कसंगत जामा पहनाने को गढ़ा होगा।

खैर, यह स्पष्ट हो गया कल कि दन्तनिपोर मरा नहीं, जिन्दा है। उसने मेरी पत्नी को नमस्कार भी किया - यानी वह मानसिक रूप से बैलेन्स्ड भी है। चाय की दूकान पर था - तो पैसे भी होंगे कुछ उसके पास। आगे का हाल तो अब भरतलाल के माध्यम से पता किया जायेगा। अभी तो यही दिलासा है कि दन्तनिपोर जिन्दा है और चल फिर रहा है।

भगवान निर्बल और निरीह को भी जिन्दा रखते हैं। क्यों करते हैं ऐसा भगवान?    


भरतलाल के दंतनिपोर पर फर्दर इनपुट: दन्तनिपोर का नाम राजन है। जब वह पहले भरतलाल से मिला था तो बता रहा था कि सीएमपी डिग्री कॉलेज में उसे गेटमैनी का काम मिल जायेगा। शायद वही काम कर रहा हो। नहीं तो फुटकर इलेक्ट्रीशियन का काम ही कर रहा होगा। यही काम वह जानता है। यहां शिवकुटी में रहने को किसी ने उसे बिना किराये के पनाह दे दी है।  

Wednesday, January 2, 2008

जोड़ों के दर्द में लाभप्रद वनस्पतीय प्रयोग


55 यह श्री पंकज अवधिया, वनस्पति और कृषि शास्त्री की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। आप उनका हिन्दी में लेखन उनके ब्लॉग मेरी कविता और हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान पर पढ़ सकते हैं। आज वे जोड़ों के दर्द पर वनस्पतीय प्रयोग की चर्चा कर रहे हैं। मेरे ब्लॉग पर उनके लेख आप पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।  


प्रश्न: जोड़ों के दर्द से परेशान हूँ। कई उपाय किये पर सफलता कम ही मिली। ऐसी वनस्पति सुझायें जिसे कि भोजन के रूप मे या भोजन के साथ प्रयोग किया जा सके।

उत्तर: आपके प्रश्न के लिये धन्यवाद। हमारी पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियो मे जोड़ों के दर्द के लिये बहुत सी वनस्पतियाँ सुझायी गयी है। पर इन सब का प्रयोग उतना आसान नही है जितना कि लगता है। यही कारण है कि जब हम अपने मर्जी या अकुशल विशेषज्ञ के मार्गदर्शन मे इनका प्रयोग करते है तो सफलता नही मिलती है। फिर हमारे मन की चंचलता भी प्रेरित करती है कि हम जल्दी-जल्दी दवा बदलें। किसी भी दवा के प्रयोग मे जल्दी का रवैया नुकसान दायक हो सकता है।

Hadjod1 आपने तो सुना ही होगा कि वनस्पतियाँ बोलती हैं। जी, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। वनस्पतियाँ बोलती हैं और स्वयम बताती हैं कि वे किस रोग मे उपयोगी हैं। वनस्पतियाँ विशेष लोगो से नही बोलती हैं। सभी उनको सुन सकते हैं यदि सुनना चाहें तो। हड़जोड़ नामक वनस्पति भी बोलती है। आप पोस्ट पर प्रस्तुत दोनो चित्र देखे। इसके माँसल तने आपको मानव अस्थि की तरह दिखेंगे। यह वनस्पति इन माँसल तनों के माध्यम से यह बताती है कि अस्थि और जोड़ सम्बन्धी रोगो में इसकी उपयोगिता है। Hadjod2 रोग की जटिल अवस्था में इसके प्रयोग के लिये विशेषज्ञ की सलाह चाहिये पर आरम्भिक अवस्था मे इसके साधारण प्रयोग से जोड़ों के दर्द से न केवल मुक्ति पायी जा सकती है बल्कि इससे बचा भी जा सकता है। प्रयोग आसान है।

आप सब ने चावल से बना चीला तो खाया ही होगा। देश के अलग-अलग हिस्सो मे अलग-अलग प्रकार का चीला बनता है। आपको किसी भी प्रकार के चीले को बनाते समय इसके तने की दो सन्धियो के बीच के आधे भाग को कुचलकर घोल मे मिला लेना है और फिर यह विशेष चीला बनाकर खाना है। चलिये यदि आपके लिये चीला नया शब्द है तो इसके टुकडो को सूजी (रवे) या आटे के हलवे मे मिला कर उपयोग कर ले। सप्ताह मे छुट्टी के दिन एक बार इसे खायें। यह निश्चित ही लाभ करेगा। रोज या दिन मे कई बार मन से खाने का प्रयोग न करें।

देश के वे पारम्परिक चिकित्सक जो कि टूटी हड्डियो को जोड़ने मे माहिर हैं वे अन्य वनस्पतियों के साथ इसका बाहरी प्रयोग करते हैं। आधुनिक अनुसन्धान बताते हैं कि इसमे कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। पर इसके अलावा भी इसमें बहुत कुछ ऐसा होता है जिसके बारे मे आधुनिक विज्ञान जानने की कोशिश कर रहा है। हाल ही मे इसके एक अनोखे ग़ुण के आधार पर एक अमेरीकी पेटेण्ट सामने आया है। विशेषज्ञों ने पाया है कि यदि आप मनमर्जी वसा (फैट) खाने के बाद इसके विशेष तत्व को खा लें तो वसा शरीर मे रूके बिना मल के साथ बाहर निकल जाता है। यह तो मोटे और पेटू लोगों के लिये वरदान से कम नही है। भारत के पारम्परिक चिकित्सक इस बात को पहले से जानते थे पर जब हमारे देश में उनकी ही कद्र नही है तो उनके ज्ञान की कद्र कौन करेगा? नतीजा यह कि अब हमारे ज्ञान के लिये हमे पैसे खर्चने होंगे।

आप इस वनस्पति को आसानी से बागीचे मे लगा सकते हैं। मैने अपने घर मे आम के पेड के सहारे इसे लगाया है। यह प्रश्न का उत्तर लम्बा होता जा रहा है। पर कुछ दिनो पहले हड़जोड़ पर मैने लगातार आठ घंटे का व्याख्यान दिया। आप इससे अन्दाज लगा ही सकते है इसके विषय मे हमारे देश मे उपलब्ध समृध्द ज्ञान का।

हड़जोड़ विषयक इकोपोर्ट पर मेरे लेख आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

पंकज अवधिया

© इस पोस्ट के लेख और चित्रों पर कॉपीराइट पंकज अवधिया का है।


1. पंकज अवधिया जी की फोटो और नाम उनके द्वारा दिये हड़जोड़ के चित्रों पर बतौर वाटर मार्क लगाये हैं। फ्री ऑफलाइन जुगाड़मेण्ट है यह सॉफ्टवेयर। इण्टरनेट से डाउनलोड किया हुआ। आपको मालूम है यह जुगाड़?!Wave Vivek Sahai

2.  श्री विवेक सहाय, उत्तर-मध्य रेलवे के नये महाप्रबंधक आज सवेरे इलाहाबाद पंहुच जायेंगे। मैने पिछले कई दिनों से सनसनी देखी है - उत्तर-मध्य रेलवे के अधिकारियों के बीच। श्री सहाय से इण्टरेक्शन की प्रक्रिया, जो आज प्रारम्भ होगी, स्पष्ट करेगी कि लोग अपनी बेल्ट कितनी कसेंगे। कसेंगे जरूर। पिछले नवम्बर माह में वे इलाहाबाद आये थे तो उतरते ही पॉवर केबिन के निरीक्षण को बड़ी तेजी से चल कर गये थे। उस समय कुछ अधिकारी उनके साथ कदम मिलाने में अपनी सांस फुला बैठे थे! 


Tuesday, January 1, 2008

अनुगूंज-२३: कम्प्यूटर प्रयोग - मेरा घरेलू कम्प्यूटर और संचार तन्त्र


Akshargram Anugunjहर एक ब्लॉगर अपना घर का स्टडी टेबल और कम्प्यूटर सिस्टम जमाता होगा। मेरा अध्ययन तो सामान्यत: बिस्तर पर होता है। पर कम्प्यूटर और संचार (कम्यूनिकेशन) का सिस्टम मेज कुर्सी पर काफ़ी सीमा तक मेरी व्यक्तिगत और सरकारी आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर बना है।

इस लेख को अंश में मैं पहले इस पोस्ट पर प्रस्तुत कर चुका हूं। अनुगूंज - २३ के लिये इसे संशोधित और परिवर्धित कर पुन: प्रस्तुत कर रहा हूं|

अनुगूंज-२३ के विषय में मुझे ख्याल नहीं था। आलोक ९२११ जी ने याद दिलाया; उसके लिये अतिशय धन्यवाद।  

पहले पहल मैं आपको अपने कम्प्यूटर और संचार व्यवस्था का वास्तविक घरेलू परिदृश्य दिखाता हूं। यह घर के फर्नीचर सेट-अप का हिस्सा है और सामान्यत इसे आप मेरा अभयारण्य कह सकते हैं। घर में कोई गतिविधि चल रही हो; अगर मैं इन चित्रों में दिखाई गयी कुर्सियों में से एक पर बैठा होऊ तो मुझे व्यस्त मान कर बक्श दिया जाता है:

COMP SMALL1
यह घर में मेरे लैपटॉप की सेटिंग है

COMP SMALL2
यह घर में मेरे डेस्कटॉप की सेटिंग है 

उक्त दोनो सिस्टम अलग अलग और अलग कमरों में होते हुये भी संचार नेटवर्क से जुड़े हैं। मैं उसका विवरण नीचे देता हूं।

मेरा (पिताजी का) मकान रेलवे दफ़्तर से १४ किलोमीटर दूर है। दफ़्तर इतनी अधिक लिखित पोजीशन दिन में बार-बार जेनरेट करता है कि मुझे फ़ैक्स पर निर्भर रहना पड़ता है - जो सस्ता उपाय है लिखित सूचना को प्राप्त करने का। और फैक्स भी मैं सीधे कम्प्यूटर में लेता हूं जिससे व्यर्थ कागज बरबाद न करना पड़े। केवल बहुत जरूरी पन्नों की हार्ड कॉपी लेता हूं। 

मुझे रेलवे ने बात करने और डाटा ट्रांसफर के लिये एक बीएसएनएल फोन दे रखा है। उसी फोन के माध्यम से मैं अपने दफ्तर के रेलवे और बीएसएनएल नेटवर्क को एक्सेस करता हूं। बचा काम मैं रेलवे द्वारा दिये गये मोबाइल फोन से या घर पर उपलब्ध व्यक्तिगत (पिताजी के नाम) बीएसएनएल फोन से पूरा करता हूं।

मेरा घर का कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क इस प्रकार का है:Communication Layout

इस ऊपर वाला तन्त्र में मेरा लैपटॉप दो ब्रॉडबैण्ड सूत्रों से और डेस्कटॉप एक से जुड़ा है। डेस्कटॉप से फैक्स-प्रिण्टर-स्कैनर युक्त है। फोन करने की सुविधा दोनो ’केन्द्रों’ पर है। मैं लगभग १५-१८ पेज प्रति दिन फैक्स के रिसीव करता हूं। इण्टरनेट का प्रयोग लगभग ८ घण्टे प्रतिदिन होता है।

मैं जब अपने कम्प्यूटर और संचार नेटवर्क को देखता हूं तो पाता हूं कि इसे स्थापित करने में बहुत कुछ मेरा खुद का योगदान है। मैने एक "नेटगीयर" वायरलेस मॉडम भी लगा रखा है जो बीएसएनएल डाटालिंक को बिना तार के पूरे घर भर की रेंज में लैपटॉप से जोड़ देता है। यह लगभग रुपये २०००/- का मिला है। पूरा सिस्टम शायद यह बीएसएनएल के सामान्य कॉनफीग्यूरेशन के अनुकूल न भी हो। पर वह काम कर रहा है!  

इस कम्प्यूटर और संचार तन्त्र से लाभ यह है कि मैं दो बीएसएनएल फोनों के स्टार्ट-अप ब्रॉडबैण्ड प्लान २५० का प्रयोग सुविधानुसार कर रुपये ५०० प्रति मास में २ जीबी का डाउनलोड सुनिश्चित कर लेता हूं। यह बहुत सस्ता है। अगर यह भी कम पड़ता है तो मैं अपने दफ्तर के फोन के ब्रॉडबैण्ड खाते के यूजरनेम और पासवर्ड का प्रयोग कर उसमें १ जीबी डाउनलोड की बची हुई क्षमता का इस्तेमाल भी कर लेता हूं। कुल मिला कर मैं बीएसएनएल के न्यूनतम टैरिफ रेट पर काम करते हुये महीने में ३ जीबी डाउनलोड का फायदा लेता हूं। और उसमें भी मेरी जेब से खर्च केवल रुपये २५० मात्र है। शेष रुपये ५०० तो रेलवे वहन करती है!    

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: अनुगूँज, anugunj,


यह बहुत रोचक होगा अगर ब्लॉगर लोग अपनी घर की कम्प्यूटर सेटिंग के चित्र प्रस्तुत करें। मेरे लैपटॉप-डेस्कटॉप सेटिंग के चित्र देख कर तो मेरी पत्नी मुंह बिचका कर गयी हैंSarcastic - "घर की सफाई-डस्टिंग कोई और करे; फोटो दिखाने को तुम चघड़ बने रहते हो!"Happy

Gyan(328)

नये साल में मेरे बगीचे में नरगिस की कलियां खिल गयीं मित्रों!

नया साल मुबारक!

(जोड़ा - सवेरे ७:२२ पर)  


Monday, December 31, 2007

अपने अपने इन्द्रप्रस्थ


Alchemist जिप्सियाना स्वभाव को ले कर जब मैने पोस्ट  लिखी तो बरबस पॉउलो कोएल्हो की पुस्तक द अलकेमिस्ट की याद हो आयी। (अगर आपने पुस्तक न पढ़ी हो तो लिंक से अंग्रेजी में पुस्तक सार पढ़ें।) उसका भी नायक गड़रिया है। घुमन्तु। अपने स्वप्न को खोजता हुआ मिश्र के पिरामिड तक की यात्रा करता है। वह संकेतों को समझता है, दैवीय चिन्हों को महत्व देता है और दैवीय सहायता भी मांगता/प्राप्त करता है। मुझे भी लगा कि कुछ वैसा रोमांचक हम लोगों की जिंदगी में भी होना चाहिये।

¶ दुनियां में हर व्यक्ति के लिये एक खजाना उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। 
¶ आपको सदा यह ज्ञात होना चाहिये कि आप क्या चाहते हैं।
¶ आपका दिल जहां है, वहीं पर आपको आपका खजाना मिलेगा। 
    ---पॉउलो कोएल्हो  के उद्धरण : द अलकेमिस्ट से।

 
कल मैने स्वप्न देखा। युधिष्ठिर अपनी राजधानी इन्द्रप्रस्थ में हैं। भव्य हैं मय दानव के निर्मित प्रासाद। युधिष्ठिर मुझसे पूछते हैं - ऐसा और कहां है तुम्हारे जगत में? मैं सोचता हूं - अटकल लगाता हूं। इतने में नींद खुल जाती है।

नये साल के संकल्प की बात भी मन में है। विचार आता है कि इन्द्रप्रस्थ जरूरी नहीं कि नगर-अट्टालिकायें भर हों। इन्द्रप्रस्थ पाण्डवों के समग्र संकल्प और क्षमता का टेन्जिबल अवतरण है। वह शून्य (खाण्डववन जैसी मूल्यहीन जमीन) से निर्मित मानव की क्षमताओं का चमत्कृत कर देने वाला प्रमाण है। ऐसा अभूतपूर्व मैं या हम क्या कर सकते हैं? युधिष्ठिर द्वारा मेरे स्वप्न में किया गया प्रश्न एक चैलेंज भी है और आवाहन भी। mughal flowers small

नये साल में इन्द्रप्रस्थ बनाना है। चाहे वह मूर्त हो या अमूर्त। मैं अपनी पत्नी से बात करता हूं और वे भी सहमत हैं। इन्द्रप्रस्थ भविष्य की कर्मठता का निमित्त है। हम सब को अपना अपना इन्द्रप्रस्थ तय करना और बनाना है। और उस बनाने की प्रक्रिया में महाभारत का अपना रोल है। महाभारत जीवन की जद्दोजहद का दूसरा नाम है। वह अन्तत: इन्द्रप्रस्थ को और मजबूती प्रदान करता है।

अपना इन्द्रप्रथ तय करने की प्रक्रिया अपनी क्षमताओं के आकलन, अपने पास के संसाधनों, दैवयोगों, अपनी लम्बे समय से चल रही जानी-अनजानी तैयारियों और उससे ऊपर ईश्वरीय सहायता मांगने और पहचानने पर बहुत निर्भर है।

आइये मित्रों नव वर्ष के अवसर पर अपने इन्द्रप्रस्थ को पहचानें और पूरी समग्रता से उसके सफल निर्माण के लिये ईश्वरीय आवाहन करें। संकल्प निर्माण की कुंजी है। 


Nargis

मेरे घर में गुलदाउदी पूरे यौवन पर है। नरगिस की कलियां चटकने लगी हैं। नये साल के पहले दिन तो नरगिस के फूल पूरी रंगत में आ जायेंगे।

नव वर्ष मंगलमय हो!


Saturday, December 29, 2007

रविरतलामी जी ब्लॉगर.कॉम मूर्ख नहीं है


रवि रतलामी ने अपने लेख ’हनी, आई श्रंक द पिक्स’ मे‍ यह कहा है कि मैने लगभग १०० केबी के चित्रों का प्रयोग किया है और वह - 

"आवश्यकता से 10 गुना अधिक रिसोर्स का प्रयोग किया गया है जो चिट्ठाकार के लिए भी ठीक नहीं है और उसके पाठकों के लिए भी." (रवि के शब्द)

चिट्ठाकार/ब्लॉगर (पढ़ें - ज्ञानदत्त पाण्डेय) तो कालिदास (अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला) है, उसकी फिक्र न की जाये। पर क्या उससे पाठक को टेक्स किया जा रहा है? और अगर पाठक को टेक्स किया जा रहा है तो ब्लॉगर.कॉम भी उतनी बार टेक्स हो रहा है जितनी बार पेज क्लिक हो रहे हैं।

क्या ऐसा है? क्या ब्लॉगर.कॉम मूर्ख है मेरी तरह!

raviratlami आप जरा उनके लेख में उद्धृत मेरे ब्लॉग पोस्ट "कैसे लाऊं जिप्सियाना स्वभाव" का अवलोकन करें। उसपर उपलब्ध चित्रों पर राइट क्लिक कर चित्र को अपने कम्प्यूटर पर सेव करें («बायां चित्र देखें)। आप पायेंगे कि चित्र, जो पन्ने पर आ रहे हैं, १५ से २७ केबी के हैं - न कि ९० से १२४ केबी के जैसा रवि कह रहे हैं। हां आप अगर चित्र पर क्लिक कर उसे डाउनलोड करने का यत्न करेंगे तो वे अवश्य ९० से १२४ केबी के मिलेंगे।

मैने आप (पाठक) के रिसोर्स को चूना नहीं लगाया! जब आप मेरा पेज डाउनलोड करते हैं तो आपको चित्रों के लिये १५-२७ केबी का डाउनलोड करना होता है। पर आप मेरे चित्र डाउनलोड करना चाहें तो जरूर आपको दस गुने रिसोर्स देने होंगे।

खैर में अब कोशिश करूंगा कि ब्लॉगर.कॉम पर १०० केबी छाप चित्र ही न ठेलूं। उससे मेरा लाभ है। पर भूतकाल में मैने न पाठक को चूना लगाया है न ब्लॉगर.कॉम ही मूर्ख है! 


वैसे भी मैं विण्डोज लाइवराइटर से पोस्ट बनाते समय सामान्यत: चित्र का ऑप्शन Small(240x169) रखता हूं जो सबसे छोटा साइज है। उसमें फोटो ठीक ठीक दिखती है और रिसोर्स १५-३० केबी की रेंज में लगता है पेज पर।  


Friday, December 28, 2007

जमीन, भैंसें और शिलिर-शिलिर परिवर्तन


मेरे घर के आसपास गाय भैंस पालने वाले रहते हैं। पिछली मुलायम सिंह सरकार के थोक वोटबैंक थे यह। उस दौरान कई सरकारी नौकरी पा गये और सभी ने शिवकुटी मेला क्षेत्र की जमीन लेफ्ट-राइट-सेण्टर हड़पी। कई अपनी दुकाने अधिकृत-अनाधिकृत तरीके से खोल कर जीवन यापन करने लगे। उनका जीवन स्तर गंवई, श्रमिक या निम्न मध्यवर्गीय शहरी जैसा है। मेरा अनुमान है कि जिस औकात के लगते हैं, उससे अधिक पैसा या रसूख है इनके पास। ये लोग श्रम करने में कोताही नहीं करते और व्यर्थ खर्च करने में नहीं पड़ते। 

सरकार बदलने से समीकरण जरा गड़बड़ा गया है। कुछ दिन पहले मेरे पड़ोस के यादव जी ने बताया कि अतिक्रमण ढ़हा देने के विषय वाला एक नोटिस मिला है उन लोगों को। उसके कारण बहुत हलचल है। पास में ही एक पार्क है। या यूं कहें कि पार्क नुमा जगह है। उसमें भी धीरे धीरे भैंसें बंधने लगी थीं। पर अब उसकी चारदीवारी रिपेयर कर उसमें कोई घास लगा रहा है। अर्थात उसे पार्क का स्वरूप दिया जा रहा है। यह सब सामान्य प्रकृति के विपरीत है। पार्क को जीवित रखने के लिये अदम्य इच्छा शक्ति और नागरिक अनुशासन की आवश्यकता होती है। वे दोनो ही नहीं हैं। तब यह क्या गोरखधन्धा है?

Encroachment small

"उनका जीवन स्तर गंवई, श्रमिक या निम्न मध्यवर्गीय शहरी जैसा है। मेरा अनुमान है कि जिस औकात के लगते हैं, उससे अधिक पैसा या रसूख है इनके पास। ये लोग श्रम करने में कोताही नहीं करते और व्यर्थ खर्च करने में नहीं पड़ते।" 

मेरी मानसिक ट्यूब लाइट को कुछ और इनपुट मिले। कल मेरी पत्नी ने बताया कि अतिक्रमण विरोधी मुहीम ठण्डी पड़ गयी है। सामुहिक रूप से शायद कुछ चढ़ावा चढ़ाया गया है।  अब जब जब यह नोटिस आयेगा, ऐसा ही किया जायेगा। भैसें, गायें और छप्पर यथावत हैं। पूरी सम्भावना है कि यथावत रहेगा - अगर लोग सरलता से चढ़ावा देते रहेंगे। शहर के व्यवस्थित विकास/सौन्दर्यीकरण और मेहनतकश लोगों की जीजीविषा में गड्ड-मड्ड तरीके से तालमेल बनता रहेगा।  

जो जमीन पार्क के रूप में विकसित करने की योजना है - उसका भी अर्थशास्त्र है। घास-वास तो उसमें क्या लगेगी, जमीन जरूर उपलब्ध हो जायेगी सामुहिक फंक्शन आदि के लिये। शादी-व्याह और अन्य सामुहिक कार्यों के लिये स्थानीय स्वीकृति से वह उपलब्ध होगी। और स्वीकृति निशुल्क नहीं मिलती।

परिवर्तन लाना सरल कार्य नहीं है। बहुधा हम चाहते हैं कि सब व्यवस्थित हो। पर होता अपने अनुसार है। कई बार हल्के से यत्न से या यत्न न करने पर भी बड़े परिवर्तन हो जाते हैं। सामान्यत: सब ऐसे ही शिलिर-शिलिर चलता है।    


1. एक स्वीकारोक्ति - मैं मेहनतकश लोगों की जीजीविषा के पक्ष में हूं या जमीन के अतिक्रमण के विपक्ष में; यह तय नहीं कर पा रहा हूं और यह संभ्रम ऊपर के लेखन में झलकता है। शायद ऐसा संभ्रम बहुत से लोगों को होता हो।) उसी कोण से यह पोस्ट लिख रहा हूं।

2. रवि रतलामी जी ने कल कहा कि मैं चित्रों में बहुत किलोबाइट्स बरबाद कर रहा हूं। लिहाजा मैने एमएस ऑफिस पिक्चर मैनेजर का प्रयोग कर ऊपर की फोटो १३२ किलोबाइट्स से कम कर २२ किलोबाइट्स कर दी है। आगे भी वही करने का इरादा है। मैं दूसरों की सोच के प्रति इतना कंसीडरेट पहले नहीं था। यह बी-इफेक्ट (ब्लॉगिन्ग इफेक्ट) है!Blushing

और ब्लॉगिंग में अगर कुछ सफलता मुझे मिलती है तो वह बी-इफेक्ट के कारण ही होगी।

3. शास्त्री फिलिप जी ने याद दिला दिया कि वर्ष के अन्त का समय आत्म विवेचन और भविष्य की योजनायें फर्म-अप करने का है। लिहाजा कल और परसों दुकान बन्द! आत्ममन्थनम करिष्यामि।Praying