Thursday, March 20, 2008

राजभाषा बैठक के दौरान इधर उधर की


कल उत्तर-मध्य रेलवे की राजभाषा कार्यान्वयन समिति की त्रैमासिक बैठक महाप्रबंधक श्री विवेक सहाय जी की अध्यक्षता में हुई। इस तरह की बैठक में सामान्यत: राजभाषा विषयक आंकड़े प्रस्तुत किये जाते हैं। उनपर सन्तोष/असन्तोष व्यक्त किया जाता है। पिछले तीन महीने में राजभाषा अधिकारी की जो विभाग नहीं सुनता, उसपर आंकड़ों और प्रगति में कुछ विपरीत टिप्पणी हो जाती है। हिन्दी में क-ख-ग क्षेत्र हो कितने पत्र लिखे जाने थे, कितने लिखे गये; कितनी टिप्पणियां हिन्दी में हुईं; कितनी बैठकों के कार्यवृत्त हिन्दी में जारी हुये या कितनों में हिन्दी पर चर्चा हुई; कितने नक्शे-आरेख हिन्दी में बने .... इस तरह की बातों पर चर्चा होती है। फिर बैठक का समापन होता है। बैठक में सामान्यत: कुछ विशेष रोचक नहीं होता जिसे ब्लॉग पर लिखा जा सके। यह अवश्य हुआ कि श्री सहाय ने अपने क्लिष्ट लिखे भाषण को पढ़ने की बजाय अपने मुक्त सम्बोधन में इलाहाबाद की हिन्दी में श्रेष्ठता पर बहुत कुछ बोला और यह स्पष्ट कर दिया कि वे विशुद्ध हिन्दी वाले इलाहाबादी हैं - अंग्रेजीदां अफसर नहीं।
 
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पर, कल हुई बैठक में दो बातें मुझे ब्लॉग पर पेश करने लायक मिलीं। पहली बात हिन्दी अनुवाद की दुरुहता को लेकर है। बात "वर्तनी" की अशुद्धि पर चल रही थी। एक विभागध्यक्ष (श्री उपेन्द्र कुमार सिंह, मुख्य वाणिज्य प्रबंधक) उसे बर्तन की अशुद्धि (बर्तन का गन्दा होना) पर मोड़ ले गये। वहां से बात इस पर चल पड़ी कि हिन्दी अनुवाद कितना अटपटा होता है। एक अन्य विभागाध्यक्ष (श्री हरानन्द, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के चीफ सिक्यूरिटी कमिश्नर) ने किस्सा बताया कि गांधी जी के एक पत्र/लेख का अनुवाद करना था। उसमें बापू ने स्टेशनों पर वेटिंग रूम में शौचालय के विषय में कहा था कि - "facility should be provided for fair sex"। अर्थात वेटिंग रूम में स्त्रियों के लिये भी शौचालय की व्यवस्था होनी चाहिये।

इस अंग्रेजी वाक्यांश का अनुवाद हिन्दी सहायक ने किया - "(प्रतीक्षा कक्ष में) मुक्त यौनाचार की सुविधा होनी चाहिये!"

अधिकारी महोदय ने बताया कि मौके पर उन्होंने वह अनुवाद की गलती पकड़ ली। अन्यथा मक्षिका स्थाने मक्षिका वाले अनुवादक बापू को मुक्त-यौनाचार का प्रवर्तक बना कर छोड़ते; वह भी स्टेशन के वेटिंग रूम में सुविधा देते हुये!
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कल की बैठक में दूसरी रोचक बात मैने देखी कि हमारे उत्तर-मध्य रेलवे के चीफ मैडिकल डायरेक्टर डा. एन के कल्ला एक अच्छे रेखा चित्रकार हैं। एक डाक्टर में यह प्रतिभा पाना बहुत अच्छा लगा। डाक्टर साहब ने भारतीय रेलवे राजभाषा की सलाहकार परिषद के सदस्य श्री विभूति मिश्रजी, जो बैठक में शामिल थे, का एक रेखा चित्र बनाया था। आप उनका बनाया रेखा चित्र देखें। मिश्र जी का चित्र बिल्कुल सही बना है।»»

बाद में बातचीत में डा. कल्ला ने मुझे बताया कि वे मुझे तनाव के प्रबन्धन पर अपने कुछ लेख मुझे आगे लिख कर देने का यत्न करेंगे। एक वरिष्ठ डक्टर द्वारा लिखा लेख ब्लॉग पर प्रस्तुत करने में मुझे बहुत प्रसन्नता होगी।

««डा. कल्ला का चित्र भी मैने बैठक स्थल पर मोबाइल में उतार लिया था। मुझे अपेक्षा है कि उनके मैडिकल ज्ञान का कुछ अंश मैं अपने ब्लॉग पर आगामी सप्ताहों में प्रस्तुत कर सकूंगा।
   

Wednesday, March 19, 2008

गाजर घास पर जानकारी


आज बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में आप श्री पंकज अवधिया द्वारा गाजर घास पर विभिन्न कोणों से दी गयी विस्तृत जानकारी उनके नीचे दिये गये लेख में पढ़ें। उनके पुराने लेख आप पंकज अवधिया के लेबल सर्च से देख सकते हैं।


गाजर घास (पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस) की समस्या जन-जन की समस्या बनती जा रही है। भारत में गाजर घास लगभग सभी क्षेत्रोँ में फैली है और जन-स्वास्थ्य के लिये खतरा बनी हुई है। यह विडंबना ही है कि आज भी भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गाजरघास के विषय में नहीं जानता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि व्यापक जन-जागरण अभियान चलाकर न केवल व्यक्तिगत स्तर पर गाजर घास का उन्मूलन किया जाए बल्कि सरकार पर भी दबाव बनाया जाये। इस आलेख में प्रश्नोत्तरी के माध्यम से गाजर घास के विषयमें नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न:  गाजर घास क्या है और इसका नाम ''गाजर घास'' क्यों पड़ा?

उत्तर: गाजरघास एक साधारण सा दिखने वाला खरपतवार है जो कि पहले बेकार जमीन व मेड़ों तक ही सीमित था पर अब यह खेतों में प्रवेश कर फसलों से प्रतियोगिता कर रहा है। गाजर घास एस्टेरेसी परिवार का सदस्य है। देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रोँ में इसके अलग-अलग स्थानीय नाम हें। इन नामों के पीछे गाजर घास के पौधे की विशेषता छिपी हुई है। गाजरके समान पत्ती होने के कारण गाजर घास कहते हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं इसलिए इसे चटकचांदनी या व्हाइट टाप भी कहा जाता है। जबलपुर के आस-पास के लोग इसकी सर्वत्र उपलब्धता के आधार पर इसे रामफूल कहते हैं। चूंकि यह खरपतवार सामान्यत: समूहों में उगता है इसीलिए इसे कांग्रेस वीड कहा जाता है। पार्थेनियम की 15 जातियाँ विश्व में पाई जाती हैं। इनमें से पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस ही अधिक नुकसानदायक है। बहुत अधिक बीजोत्पादन क्षमता होने के कारण ही इसे पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस का नाम मिला। गाजरघास के पौधे वार्षिक होते हैं व इनकी ऊंचाई सामान्यतया 2 मीटर तक होती है। गाजर घासकी पत्तियों व तनों पर छोटे-छोटे रोम पाये जाते हैं जिन्हें ट्रायकोम्स कहा जाता है।

प्रश्न:  गाजरघास से क्या-क्या नुकसान हैं?

उत्तर:  गाजरघास संभवत: विश्व एक एकमात्र ऐसा खरपतवार है जो कि मनुष्यों, पशुओं, फसलों, वनों और वन्यप्राणियों सभी के लिये नुकसानदायक है। गाजर घास के फूलों से उत्सर्जित होनेवाले पराग-कण मनुष्य के श्वास तंत्र में प्रवेश करके अस्थायी दमा व एलर्जी उत्पन्न करते हैं। गाजर घास के एक फूल से असंख्य परागकण उत्सर्जित होते हैं। एक परागकण किसी मनुष्य को अस्वस्थ करने के लिये पर्याप्त है। ये परागकण हमारे आस-पास हवा में फैले रहते हैं व साधारण ऑंखों से दिखायी नहीं पड़ते हैं। देश के विभिन्न महानगरों व नगरों में किये गये सर्वेक्षणों से पता चला है कि वहाँ के वातावरण में गाजर घास के परागकण अन्य हानिकारक परागकणों की तुलना में बहुत अधिक हैं। पश्चिम बंगाल के मोहनपुर क्षेत्र में काली पूजा के समय गाजर घास के फूल आते हैं व परागकणों का उत्सर्जन होता है। इस समय यहाँ का प्रशासन लोगों की मदद के लिये दसों अस्थायी अस्पतालों की व्यवस्था करवाता है। फिर भी प्रभावित लोगों की संख्या में कमी नहीं आती है। गाजरघास के परागकण मनुष्यों के अलावा पशुओं व फसलों को भी नुकसान पहूँचाते हैं। हवा में उपस्थित असंख्य परागकण पर- परागित सब्जी की फसलों में पौधों के मादा जनन अंगों के ऊपर एकत्रित हो जाते हैं जिससे कि उनकी संवेदनशीलता खत्म हो जाती है और बीज नहीं बनने से फसलों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। गाजर घास के निरंतर संपर्क में आने वाले मनुष्यों को त्वचा की एलर्जी का खतरा रहता है। अनुसंधानों से पता चला है कि गाजर घास के संपर्क में आने से एक विशेष प्रकार का एक्जीमा हो जाता है। आपका ये जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के कर्नाटक राज्य में गाजर घास जनित रोगों से प्रभावित होकर 7 से भी अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह विश्व में पहली घटना है जबकि किसी खरपतवार से परेशान होकर किसानों ने आत्महत्या की हो। गाजर घास के पौधे कुछ घातक एलिलो-रसायनों का स्त्राव करते हैं। ये एलिलो-रसायन आस-पास किसी अन्य पौधों को उगने नहीं देते हैं। भारतीय वन अपनी जैव-विविधता के कारण विश्व के मानचित्र में विशेष स्थान रखते हैं। भारतीय वनों में आज भी ऐसी सैकड़ों वनौषधियाँ उपलब्ध हैं जिनके दिव्य औषधिय गुणों का सही आकलन अभी तक नहीं हुआ है। भारतीय वनों में गाजर घास के अनियंत्रित फैलाव से बेशकीमती जड़ी-बूटियाँ नष्ट होती जा रही हैं। गाजर घास के दुष्प्रभाव से वन्य प्राणी भी अछूते नहीं रह गये हैं। आस्ट्रेलिया में प्रति वर्ष 165 अरब रूपयों का खाद्य/मांस गाजर घास के कारण अप्रत्यक्ष रूप से बर्बाद होता है।भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किये गये अनुसंधानों से पता चला है कि गाजर घास के प्रकोप से फसलों की उपज में 40 प्रतिशत तक कमी हो जाती है। गाजर घास के परागकण मक्के के पर-परागण में बाधा डालते हैं व इसकी उपज को 50 प्रतिशत तक कम कर देते हैं। आस्ट्रेलिया में गाजर घास एक विशेष प्रकार के सूत्राकृमि को आश्रय देती है। यह सूत्राकृमि सूर्यमुखी के लिये नुकसानदायक है।

प्रश्न:  क्या गाजर घास का उत्पत्ति स्थान भारत है और क्या भारत में ही इसका प्रकोप हैं?

उत्तर:  नहीं। गाजर घास का उत्पत्ति स्थान भारत नहीं है। गाजर घास का उत्पत्ति स्थान है दक्षिणमध्य अमेरिका । भारत में गाजर घास को जानबूझकर 1951 में आयातित अन्न के साथ लाया गया। सबसे पहले भारत में इसे पूना में देखा गया। अब यह बात एकदम साफ हो गई है कि अमेरिका ने भारत को आयतित अन्न के साथ गाजर घास के बीज मिलाकर भेजे ताकि भारत जैसे विकासशील देश की सुदृढ़ कृषि व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया जा सके। आज गाजर घास का उत्पत्ति स्थान अमेरिका गाजर घास की समस्या से उतना अधिक प्रभावित नहीं है, जितना विश्व के अन्य क्षेत्र। यदि गाजर घास से प्रभावित देशों को मानचित्र में दर्शाया जाये तो सबसे ज्यादा प्रभावित देश भारत ही दिखेगा। गाजर घास से प्रभावित देशों में अफ्रीका गणतंत्र, मेडागास्कर, केन्या, मोजाम्बिक, मारिशस, इजरायल, भारत, बांग्लादेश, नेपाल, चीन, वियतनाम, ताइवान, आस्ट्रेलिया आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न:  गाजरघास के तेजी से फैलने के क्या-क्या कारण हैं?

उत्तर:  गाजरघास का पौधा कई विशिष्ट गुणों से युक्त होता है। इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण इसका फैलाव निर्बाध गति से हो रहा है। गाजर घास के एक पौधे से लगलग 25,000 बीज बनते हैं।इन बीजों में सुसुप्तावस्था नहीं पाई जाती है अर्थात ये सभी बीज तुरंत अंकुरण की क्षमता रखते हैं। गाजर घास के बीज हवा व जल के माध्यम से फैलते हैं। एक वर्ष में गाजर घास की तीन से चार पीढ़ियाँ होती हैं। गाजर घास सभी प्रकार की मिट्टियों में अच्छी वृद्धि करता है। यह विपरीत वातावरणीय परिस्थितियों, अधिक अम्लता या क्षारीयता वाली भूमि आदि में उग सकता है। इसके अलावा गाजर घास के पौधे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक एसिड आदि घातक एलिलोरसायनों का स्त्रवण करते हैं जो कि अपने आस-पास किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं व गाजर घास से कोई भी पौधा या फसल प्रतियोगिता नहीं कर पाती है। इन्हीं कारणों से गाजर घास का फैलाव अन्य पौधों की तुलना में तेजी से हो रहा है।

प्रश्न:  गाजरघास को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?

उत्तर:  गाजरघास को परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग विधियों से नियंत्रित किया जा सकता है। गाजर घास को हाथ से उखाड़कर नष्ट किया जा सकता है। यह कार्य फूल आने से पहले करना चाहिये ताकि गाजर घास का आगे फैलाव न हो। इस उपाय से गाजर घास को प्रभावी रूप से नियंत्रण के लिये विशेष सावधानी की आवश्यकता है। हाथों में दस्ताने पहनना व मुँह व कान को अच्छी तरह से कपड़े से बांधना आवश्यक है। बच्चों को तो हाथ से गाजर घास नहीं उखाड़ने देना चाहिये। नमक के 20 प्रतिशत घोल से भी गाजर घास को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। किसान भाई 5 गिलास पानी में एक गिलास साधारण नमक घोलकर पौधों पर छिड़काव कर सकते हैं। घरों के आस-पास सीमित स्थानों पर गाजर घास को इस तरह नियंत्रित किया जा सकता है पर बहुत बड़े क्षेत्र में इसके प्रयोग से भूमि की लवणता बढ़ सकती है। साथ ही बड़े क्षेत्र के लिये यह विधि खर्चीली भी है। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने कई ऐसे पौधे सुझायें हैं जो कि तेजी से बढ़ते हैं व उपयोगी हैं तथा गाजर घास की वृद्धि को कम करने में सहायक हैं। इन पौधों में गेंदा, चरोटा, क्रोटन आदि प्रमुख हैं। गेंदे के पौधे का निचोभी गाजर घास की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। कर्नाटर सरकार कैसिया सेरेसिया नामक पौधे के बीज किसानों को उपलब्ध करा रही है। ये पौधे गाजर घास से प्रतियोगिता करके उसे नष्ट कर देते हैं। कुछ मित्र कीट व रोग कारक भी गाजर घास के विरूद्ध उपयोगी पाये गये हैं। कीटों में जाइगोग्रामाबाइकलरेटा नामक कीट केवल गाजर घास को ही नष्ट करता है व भारतीय परिस्थितियों के लिये उपयुक्त पाया गया है। गाजर घास को उपलब्ध कृषि रसायनों की सहायता से भी नियंत्रिात किया जा सकता है। इन रसायनों में एट्राजीन, डाइकाम्बा, एट्राजीन+2, 4 डी, मेटसल्फ्यूरॉन, ग्लाइफोसेट आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न:   क्या गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण पर्यावरण के दृष्टिकोण से सुरक्षित है?

उत्तर:  गाजरघास को विदेशों से भारत लाया गया है। यह कटु सत्य है कि गाजर घास को नियंत्रित करने में सक्षम कृषि रसायन भी विदेशों की ही देन हैं। गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण पर्यावरण के दृष्टिकोण से बिल्कुल सही नहीं है। उपलब्ध रसायन न केवल मिट्टी बल्कि मिट्टी में उपस्थित लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिये भी नुकसानदायक हैं। इसके अलावा ये रसायन भूमिगत जल को भी दूषित कर देते हैं। यदि यह कहा जाय कि गाजरघास को रासायनिक विधि से नियंत्रित करना एक समस्या को हटाकर दूसरी भयानक समस्या को आमंत्रण देना है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

प्रश्न:  क्या सरकारी स्तर पर किसी अभियान के तहत इसे उखाडा जा रहा है?

उत्तर:  नही सरकारी स्तर पर ऐसा कोई प्रयास नही हो रहा है। खरपरवार वैज्ञानिको की पहल पर प्रतिवर्ष 6 से 12 सितम्बर को गाजर घास जागरुकता सप्ताह मनाया जाता है। इसे हाल ही के वर्षो से आरम्भ किया गया है। इसके पीछे उद्देश्य सही है पर ज्यादातर आयोजन भाषणो तक सीमित होने लगे हैं। जिस गति से गाजर घास का फैलाव हो रहा है उसे देखकर यही लगता है कि एक दशक तक वृहत पैमाने पर अभियान की जरुरत है।

प्रश्न:  गाजर घास के विरुद्ध अभियान मे जुटी संस्थाए सोपाम और आई.पी.आर.एन.जी. को इस कार्य के लिये पैसे कहाँ से मिलते है?

उत्तर:  दोनो ही संस्थाए निज व्यय से चलती है। यहाँ तक की सदस्यो से सदस्यता शुल्क भी नही लिया जाता है। इन संस्थाओ का संचालन संस्थापक पंकज अवधिया करते है। सोपाम द्वारा अभी तक दस हजार से अधिक किसानो को पोस्टकार्ड के माध्यम से जानकारी दी जा चुकी है। आई.पी.आर.एन.जी. गाजर घास से जुडे किसानो और वैज्ञानिको का आन-लाइन ग्रुप है। इसकी अपनी वेबसाइट है जो गाजर घास पर विस्तार से जानकारी देने वाली दुनिया की एकमात्र वेबसाइट है। इसे भी निज व्यय से संचालित किया जाता है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय से गाजर घास जागरुकता अभियान बिना किसी आर्थिक और तकनीकी सहायता से चल रहा है।     


गाजर घास पर इण्टरनेट पर उपलब्ध कुछ महत्वपूर्ण लिंक:

इंटरनेशनल पार्थेनियम रिसर्च न्यूज ग्रुप की वेबसाइट

गाजर घास के चित्र

गाजर घास पर हिन्दी आलेख और शोध पत्र

इकोपोर्ट पर उपलब्ध शोध आलेख

बाटेनिकल डाट काम पर उपलब्ध शोध आलेख

गाजर घास पर चर्चा हेतु याहू ग्रुप


पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


गाजर घास के चित्र लेने में देर कर दी हमने। कल धुंधलका होने पर याद आया। मैं और रीताजी घूमने निकले। टॉर्च, कैमरे के प्लैश और स्ट्रीट लाइट में यह चित्र लिये जो ऊपर लगाये हैं। रात में झाड़-झंखाड़ का फोटो लेते देखने वाले हमें निश्चय ही खब्ती समझ रहे होंगे! :-)

ब्लॉगिंग खब्तियाने का ही दूसरा नाम है शायद!



Tuesday, March 18, 2008

भय, विश्वास और कर्मयोग


हर एक के जीवन में अवसर आते हैं जब नयी अपेक्षायें होती हैं व्यक्ति से। नेतृत्व की विविधता की आवश्यकता बनती है। पर लोग उसे फेस करने या उस पर खरा उतरने से बचते हैं। बहुत कुछ अर्जुन विषाद की दशा होती है। जब कर्म की अपेक्षा होती है तो मन उच्चाटन की दिशा में चल रहा होता है। लगता है जैसे विगत में काम करने का जो माद्दा था, वह नहीं रहा। आत्म विश्वास क्षीण सा होता लगता है।

बहुत से लोग इस अवस्था से गुजर चुके होंगे। बहुत से टूट जाते हैं। बहुत से अर्जुन बन कर निकलते हैं। मैं सोचता हूं कि कई ऐसे हैं - सरकारी तन्त्र में, और उसके बाहर भी, जो बिना काम किये जी रहे हैं। उनके पास पद और पैसा दोनो है। वैसे तो जिया जा सकता है। शायद आराम से चल भी जाये। पर उस प्रकार से जीने के बारे में कृष्ण कहते हैं - "अर्जुन जब लोग कहेंगे कि अर्जुन तो कायर था; तब क्या वह तुम्हारी वृत्ति के अनुरूप होगा? क्या तुम उसे झेल पाओगे?" गीता के प्रारम्भ की उनकी लताड़ मुझे याद आती है - "क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वयुपपपद्यते क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वोक्तिष्ठ परंतप।"

और हम दो भिन्न भावों के बीच अपने को पाते हैं। क्लीवता से उबरने की इच्छा और असफलता के भय के बीच। यह तनाव बढ़ाती है।

मैं अपने में यह स्थिति महसूस करता हूं और काम करने के तरीके खोजता हूं। मैं अपने में नेतृत्व की सम्भावनायें टटोलता हूं।
सभी ऐसा करते होंगे। सभी अपने अपने समाधान पाते होंगे।

हम सभी असफलता की आशंका और सफलता के प्रति विश्वासहीनता से ग्रस्त रहते हैं। पर क्या सफलता में विश्वास सम्भव है? स्वामी जगदात्मानन्द के अनुसार - "साधक को दिन-रात ईश्वर का चिन्तन करते हुये, पथ की सफलता-विफलता को नजर अन्दाज करते हुये, सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर, ज्ञान-विनय का आश्रय ले कर प्रयत्नशील रहना होगा। जैसे तैराकी सीखने के लिये जल सिन्धु में कूदना पड़ता है, वैसे ही विश्वास की प्राप्ति के लिये साधक को साधना सिन्धु में कूदना पड़ेगा।"

"हमारा मन सदैव ही भय घृणा, निन्दा, तथा कष्ट की भावना का विरोध करता है। बार-बार विफल होने की वजह से उत्पन्न कष्ट, घृणा तथा भय की भावना, तथा यह भावना कि "मैं यह कार्य नहीं कर सकता", ही लोगों को आलसी बनाती है।"

"भय दरवाजे पर दस्तक देता है। विश्वास दरवाजा खोल कर पूछता है, ’कौन है?’ वहां तो कोई भी नहीं है। विश्वास की आवाज सुन कर भय सिर पर पांव रख कर भाग जाता है।

मुझे समझ में आता है - अपने आप में और ईश्वर में विश्वास ही सफल होने की कुंजियां हैं।
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दिनकर रचित कुरुक्षेत्र में भीष्म का धर्मराज को उपदेश:

धर्मराज, सन्यास खोजना कायरता है मन की,
है सच्चा मनुजत्व ग्रन्थियां सुलझाना जीवन की।
दुर्लभ नहीं मनुज के हित, निज वैयक्तिक सुख पाना,
किन्तु कठिन है कोटि-कोटि मनुजों को सुखी बनाना।
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जिस तप से तुम चाह रहे पाना केवल निज सुख को,
कर सकता है दूर वही तप अमित नरों के दुख को।
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स्यात, दु:ख से तुम्हें कहीं निर्जन में मिले किनारा,
शरण कहां पायेगा पर, यह दाह्यमान जग सारा?
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धर्मराज क्या यती भागता कभी गेह या वन से?
सदा भागता फिरता है वह एक मात्र जीवन से
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जीवन उनका नहीं, युधिष्ठिर, जो उससे डरते हैं,
वह उनका जो चरण रोप, निर्भय हो कर लड़ते हैं।
यह पयोधि सबका मुंह करता विरत लवण कटु जल से,
देता सुधा उन्हें, जो मथते इसे मन्दराचल से।
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धर्मराज, कर्मठ मनुष्य का पथ सन्यास नहीं है,
नर जिसपर चलता वह मिट्टी है, आकाश नहीं है।

शनिवार के दिन मैं अस्पताल में अपनी इन्सोम्निया की समस्या के विषय में रेलवे अस्पताल में चक्कर लगा रहा था। अचानक मेरा एक ट्रेन कण्ट्रोलर मनोज दिखा। मनोज हमारा एक दक्ष और कर्तव्यपारायण ट्रेन कण्ट्रोलर है।

दो दिन पहले मनोज की पत्नी ने सीजेरियन के जरीये एक बालक को जन्म दिया है। वह बच्चे को रोग-प्रतिरोधक टीके लगवा रहा था।

मैने बालक का फोटो मोबाइल में कैद किया और मेरी पत्नी ने बच्चे की मुंहदिखाई में पर्स ढ़ीला किया। अगर रीताजी साथ न होती तो हमें यह ध्यान भी न रहता कि शगुन में कुछ दिया भी जाता है। भगवान सही समय पर साथ रहने के लिये पत्नी की (कोई झन्झट न खड़ा हो, इस लिये "पत्नियां" इस स्थान पर "पुरुष" पढ़ें) रचना करते हैं।

मनोज का बालक बहुत सुन्दर लग रहा है। आप भी देखें।



Sunday, March 16, 2008

शिवकुमार मिश्र का ब्लॉग


भाई गुड़ रहा, छोटा भाई शक्कर हो गया। वह भी जमाना था कि शिवकुमार मिश्र को ब्लॉगरी की दुनियां में ठेलियाने के लिये मैने बहुत जतन किया। पहले पहल वे मेरे ब्लॉग पर रोमनागरी में टिप्पणी किया करते थे। फिर मैने उन्हे लिखने को प्रेरित करने के लिये एक ज्वाइण्ट ब्लॉग बनाया - शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग। शिव बहुत बढ़िया लिखते हैं। पर शुरुआती दौर में उनसे लिखवाना कठिन काम था। गूगल के ट्रान्सलिटरेशन टूल के माध्यम से उन्होंने प्रारम्भिक पोस्टें लिखीं। मैने उनपर इधर उधर के चित्र लगाये। साथ ही लगभग उन्ही विषयों से मिलती जुलती पोस्टें मैने भी उस ब्लॉग पर लिखीं। मेरा विचार था कि हम The Becker-Posner Blog जैसा प्रयोग हिन्दी भाषा में करें। पर मुझे अन्दाज नहीं था कि शिव कुमार इतनी विविधता से लिखेंगे कि उनके साथ कदम मिलाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। मेरे इस "बेकर-पोस्नर" प्रयोग की योजना कभी टेक-ऑफ ही न कर पायी और विविध विषयों पर पोस्टों का शिव ने सैंकड़ा भी पार कर लिया।
 
उनके कम्प्यूटर पर ऑफलाइन हिन्दी टाइपिंग टूल इन्स्टाल होने की देर थी कि उनका लेखन नये आयाम पकड़ गया। कई बार मैने देखा है कि किसी विषय पर हम हल्के से बात भर करते हैं और घण्टे भर में अत्यन्त स्तरीय पोस्ट उस विषय पर वे ब्लॉग पर उतार भी देते हैं। शिव की याददाश्त भी गजब की है। दशकों पहले पढ़े पैराग्राफ दर पैराग्राफ ज्यों का त्यों उतार देना उनकी खासियत है।



आज मैं चिठ्ठाजगत पर उनकी रैंकिंग देख रहा था। उनका ब्लॉग मेरे अनाधिकृत ब्लॉग के रूप में भी लिस्ट किया हुआ है। उनके ब्लॉग की रैंकिंग ४५-५० के मध्य चल रही है। मेरी सक्रियता में कमी के कारण मुझे लगता है कि वे मुझसे जल्दी ही आगे बढ़ जायेंगे।

शिवकुमार मिश्र से हमारी चर्चा का एक विषय यह बहुधा होता है, कि पेशे से हम दोनो लेखक नहीं हैं। लिखना हमारा बहुत बड़ा पैशन भी नहीं रहा है। फिर भी ब्लॉगिंग का माध्यम हाथ लगने पर हमने पूरा रस लेते हुये बहुआयामी तरीके से अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। यही हमारी ब्लॉगिंग की सार्थकता है। और शिव ने क्या क्या नहीं लिखा - बंगाल, निन्दक महासभा, नौटन्की, रामलीला, उदयप्रतापजी, नन्दीग्राम, ब्लॉगिंग का इतिहास, दुर्योधन की डायरी....। कोई भी समर्पित लेखक इस विविधता से ईर्ष्या कर सकता है।

मैने शिव के ब्लॉग से अपना नाम गायब करने का एक बार प्रयास किया पर शिव ने उसे विफल कर दिया। दो तीन दिन पहले मैने फिर अपनी उपस्थिति कम करने की थोड़ी हेराफेरी ब्लॉग हेडर के डिस्क्रिप्शन में कर चुका हूं। पर वह हेराफेरी बहुत हल्की है। मैने अपना नाम मात्र ब्रेकेट में कर दिया है।



आखिर बड़ा भाई गुड़ और छोटा शक्कर हो गया है। और उसमें बड़ा भाई अपने को अतिशय गर्व का पात्र मानता है।
और अभी अभी शिव ने एसएमएस किया है - उनके लेख दैनिक जागरण में छपे है। बधाई।

Friday, March 14, 2008

वाटर मार्क लगाने का सॉफ्टवेयर


श्री पंकज अवधिया ने मुझे मीनाक्षी जी का चित्रों पर वाटरमार्क के लिंक बताने के लिये आग्रह करने वाला ई-मेल फार्वर्ड किया है। आप इस सन्दर्भ में  पिक्चर शार्क (Picture Shark)  नामक फ्रीवेयर से यह सुविधा पा सकते हैं। यह 0.795 MB  का सॉफ्टवेयर लिंक पर जा कर अपने कम्प्यूटर पर इंस्टाल करलें।

इसे खोलने पर आपको निम्न चित्र दिखता है -  
जैसा ऊपर के चित्र में है, इस सॉफ्टवेयर के तीन खण्ड हैं।
 
पहले खण्ड - इनपुट सलेक्शन (Input Selection) के माध्यम से आप उस अपने कम्प्यूटर से उस चित्र का चयन कर सकते हैं, जिसपर वाटरमार्क लगाना है।

दूसरे खण्ड -  पोजीशनिंग+सेटिंग (Positioning+Setting) के माध्यम से आप वाटरमार्क के स्टाम्प चित्र और उसकी चयनित चित्र में पोजीशन का चयन कर सकते हैं। यदि आप वाटरमार्क के रूप में कोई चित्र नहीं लगाना चाहते, वरन कोई टेक्स्ट देना चाहते हैं तो वह आप एक्सेल में एक सेल में लिख कर उस सेल को दूसरे खण्ड में स्टाम्प चित्र की जगह कट/कापी पेस्ट कर सकते हैं। स्टाम्प चित्र के साथ दूसरा खण्ड निम्न प्रकार से दिखता है -
 
तीसरे खण्ड - आउटपुट सलेक्शन (Output Selection) के माध्यम से परिवर्तित चित्र के प्रकार (.jpg, .bmp या .png फाइल) और आउटपुट सेव करने के स्थान का चयन कर चित्र वाटरमार्क करने के लिये स्टार्ट बटन क्लिक कर दें। आपका वाटरमार्क क्या चित्र आपके इच्छित फोल्डर में आ जायेगा।
उदाहरण के लिये श्री पंकज अवधिया द्वारा प्रेषित सबसे प्रथम खण्ड में दिख रहा हडजोड़ वनस्पति का चित्र उनके पोटो के स्टाम्प वाटर मार्क के साथ नीचे दिये चित्र जैसा लगेगा -
 
 और अगर एक्सल के सेल में से टेक्स्ट जोड़ कर वाटरमार्क बना कर इस चित्र पर लगायें तो इस प्रकार बन सकता है -

मैं यह अधिक विस्तार से नहीं लिख रहा हूं। पर अगर आप सॉफ्टावेयर डाउनलोड करते हैं तो आपको समझ आ जायेगा।

Wednesday, March 12, 2008

खरपतवार बनाम खरपतवार नाशक


पंकज अवधिया जी इतना व्यस्त होते हुये भी समय पर लिख कर अपना लेख मुझे भेज देते हैं। और उनके लेखों में विविधता-नयापन बरकरार रहता है। इस बार भी उन्होंने  बिल्कुल समय पर अपना आलेख भेज दिया। 

मैने उनके पिछले आलेख के पुछल्ले के रूप में गेंहूं के खेत का एक चित्र लगा दिया था। उसमें सरसों के  कुछ पीले फूलों वाले पौधे भी थे। पंकज जी का लेख उसी को लेकर बन गया है। और क्या महत्वपूर्ण अनुभव युक्त जानकारी दी है उन्होंने!


आप पंकज जी की पोस्ट पढ़ें। वे खेतों में उगने वाले खरपतवार के विषय में बहुराष्ट्रीय कीटनाशक व्यवसाय और खरपतवार की उपयोगिता के सम्बन्ध में रोचक जानकारी दे रहे हैं।


आप उनकी पहले की पोस्टें पंकज अवधिया पर लेबल सर्च कर देख सकते हैं।


पिछले बुधवार को ज्ञान जी ने गेहूँ के खेत की फोटो प्रकाशित की थी जिसमे सरसों के दो पौधे उगे हुये थे। कृषि विज्ञान की शिक्षा के दौरान हमें पढाया गया था कि मुख्य फसल के अलावा शेष सभी पौधे चाहे वे कितने भी उपयोगी हों, खरपतवार होते हैं। इस नजरिये से गेहूँ के खेत मे उग रहे सरसों के ये पौधे भी खरपतवार हैं। हमे यह भी बताया गया कि हाथ से इन्हे उखाडना महंगा है और दूसरे उपाय उतने कारगर नही है सिवाय खरपतवारनाशियों के। खरपतवारनाशी मतलब खरपतवारो को मारने वाले रसायन। ज्यादातर विदेशी कम्पनियाँ इन्हे बनाती हैं। परीक्षा के लिये हमने इनके नाम रटे और इनपर देश मे हो रहे शोधों के बारे मे पढ़ा। पता चला कि इस तरह के शोधों मे बड़ा पैसा खर्च किया जा रहा है। बहुत अच्छे नम्बरो से पास हुये। फिर तन कर साहब बन पहुँच गये किसानो के बीच अपना ज्ञान बाँटने।


पर वहाँ तो स्थिति एकदम उलट थी। जिन्हे खरपतवार बताया जा रहा था वे पौधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ बने हुये थे। किसानो को इनसे समस्या थी और वे जानते थे कि ये पौधे मुख्य फसल से पानी, भोजन और सूर्य के प्रकाश के लिये प्रतियोगिता करते हैं। पर उनका इनसे निपटने का ढंग अनोखा था। पशु चारे से लेकर अपने परिवार की स्वास्थ्य रक्षा के लिये इन तथाकथित खरपतवारों का प्रयोग वे करते दिखे। कुछ भागों मे किसान इसे एकत्र करके पास के दवा व्यापारियों को बेच देते हैं। इससे उखाड़ने के पैसे वसूल हो जाते हैं और साथ ही अलग से कमाई भी। ज्यादातर भागों मे इन खरपतवारो के बदले वे गाँव की दुकान से दैनिक उपयोग के समान खरीद लेते हैं। वे इन्ही खरपतवारों को साग के रूप मे वर्ष भर खाते हैं। इससे बाजार से रसायनयुक्त सब्जी उन्हे नहीं खरीदनी पडती। फिर ये उन्हे साल भर रोगों से भी बचाते हैं। मतलब चिकित्सा व्यय मे भारी बचत। भले ही हमे कुछ खरपतवारो के उपयोग पढ़ाये गये पर किसान तो सभी पौधो के उपयोग जानते हैं, पीढ़ियों से साथ जो रह रहे हैं। वे इनसे बाड़ तैयार कर लेते हैं या फिर झोपड़ियों की छत बना लेते हैं।

 

जब उनसे खरपतवारनाशी रसायन के प्रयोग की बात कही गयी तो वे बोले ये तो महंगा है और फिर इससे जब पौधे नष्ट हो जायेंगें तो इन सब लाभों का क्या होगा? हम निरुत्तर हो गये। अब किसानो से पढना शुरु किया और फिर पहुँच गये वैज्ञानिको के बीच संगोष्ठियो में। पता लगा इन विराट आयोजनों के पीछे खरपतवारनाशी बनाने वाली कम्पनियों का हाथ और साथ होता है। वे ही शोध के लिये पैसा देती हैं। इसलिये वैज्ञानिक ऐसे शोध करते हैं। जैसी उम्मीद थी मुझे बिरादरी से अलग करने की कोशिश शुरु हो गयी। किसान जैसे गुरु पाकर लगा कि सही विश्वविद्यालय मे दाखिला हो गया है और अब जीवन भर पढ़ना होगा। मैने कूप मंडूक की तरह रह रहे वैज्ञानिक समाज को नमस्कार किया और असली वैज्ञानिकों के पास पहुँच गया। जब मेडीसिनल वीड पर मैने हजारो आलेख लिखे तो नयी पीढी के वैज्ञानिकों को बात समझ आने लगी और अब जमीनी स्तर पर कृषि शोध की बात की जा रही है। इन सालो मे पता नही कितने टन खरपतवारनाशी भारतीय धरती पर डाले जा चुके हैं। पर्यावरण को कितना नुकसान पहुँच चुका है। गाँवो पर इसका प्रभाव तो साफ दिखता है। किसान रसायनयुक्त सब्जियाँ खरीद रहे हैं। वे बीमार भी हो रहे हैं। चिकित्सा के लिये शहरों पर उनकी निर्भरता बढ रही है। दिन-ब-दिन पारम्परिक खेती से दूरी का फल वे भुगत रहे हैं। ये फल वे वैज्ञानिक नही भुगत रहे हैं; जिन्होने इसे किसानो पर थोपा। वे आज उच्च पदो पर हैं और नयी किसानोपयोगी (?!) नीतियों के विकास मे जुटे हैं।

 

तो ज्ञान जी द्वारा ली गयी फोटो में भी यदि ध्यान से देखेंगे तो आपको खजाना दिखायी देगा। गेहूँ के खेतो मे दसों किस्म के पौधे अपने आप उगते हैं। इन सभी का सही प्रयोग न केवल एक साल तक बल्कि आजीवन निरोग रख सकता है। यदि हमने पारम्परिक खेती, किसानों और माँ प्रकृति के इन उपहारों का महत्व नही समझा तो जल्द ही हम इन्हे खो देंगे और साथ ही निरोगी जीवन की कुंजी भी।

 

इकोपोर्ट पर औषधीय खरपतवारो पर मेरे शोध आलेख यहां, यहां और यहां पर देखें।  

 

इकोपोर्ट पर औषधीय खरपतवारों पर हिन्दी लेख इस लिंक पर लेख इस लिंक पर उपलब्ध हैं। 

 

कुछ अन्य शोध आलेख आप यहां देख सकते हैं। 

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।



 

Monday, March 10, 2008

किल्लत का अर्थशास्त्र चल रहा है क्या?


कोटा-परमिट राज का जमाना था। तब हर चीज का उत्पादन सरकार तय करती थी। सरकार इफरात में नहीं सोचती। लिहाजा किल्लत बनी रहती थी। हर चीज की कमी और कालाबाजारी। उद्यमिता का अर्थ भी था कि किसी तरह मोनोपोली बनाये रखा जाय और मार्केट को मेनीप्युलेट किया जाय। खूब पैसा पीटा ऐसे मेनीप्युलेटर्स ने। पर अब भी क्या वैसी दशा है?

कुछ दिन पहले श्री दिनेशराय जी ने एक पोस्ट लिखी थी - दास को उतना ही दो जिससे वह जीवित रहे, मरे नहीं। यह पोस्ट उनके ब्लॉग तीसरा खम्बा पर थी और ध्येय कनून लागू करने के विषय में उस मनोवृत्ति की बात करना था जो सिस्टम की कैपेसिटी नापतोल कर ही बढ़ाती है। बहुत अधिक केपेसिटी नहीं बढ़ाने देती - क्यों कि उससे कई लोगों की अवैध दुकान पर असर पड़ेगा।

आप समझ सकते हैं कि जो सुधार अर्थ के क्षेत्र में सन नब्बे के दशक में प्रारम्भ हुये और जारी हैं; जिनके चलते आज अर्थव्यवस्था हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ से तिगुनी गति से बढ़ रही है; उनका अंशमात्र भी कानून लागू करने के क्षेत्र में नजर नहीं आता। और कानून की अकेले की क्या बात की जाये? शिक्षा, बीमारू प्रान्तों में बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सुविधायें, ग्रामीण और दूर दराज का विकास जैसे कई क्षेत्र बचे हैं जहां अभी सुधारों की रोशनी नहीं आयी है। कुछ पॉकेट्स में काम हो रहे हैं पर बहुत कुछ बाकी है और वह हरक्यूलियन टास्क है।

पर मात्र सिनिसिज्म के मन्त्र का जाप करते रहना भी सही बात नहीं है। डेढ़ दशक में बहुत परिवर्तन दिखे हैं। इतने व्यापक और आशावादी परिवर्तन हैं कि मुझे बार बार लगता है कि मुझमें पच्चीस-तीस वर्ष की उम्र वाली ऊर्जा और वर्तमान समय हो तो क्या कर डाला जाये। आज के नौजवानों से बहुत ईर्ष्या होती है - बहुत डाह!

मुझे विश्वास है कि जिन क्षेत्रों में किल्लत का अर्थशास्त्र या मानसिकता चल रही है, वहां भी बड़ी तेजी से परिवर्तन होंगे। सिस्टम में बहुत सारी हिडन केपेसिटी भी सामने आयेगी। उदाहरण के लिये रेलवे का टर्न-एराउण्ड वैगन और ट्रैक की अतिरिक्त वहन क्षमता को पहचानने से हुआ है। विघ्न-आशंका वाले बहुत सारे लोग इसमें भी भविष्य में होने जा रही समस्याओं से अभी ही अपना दिल हलकान किये जा रहे हैं और अपना निराशावाद बांटने को तत्पर हैं; पर उत्तरोत्तर उनको सुनने वाले कम होते जा रहे हैं। ऐसा ही अन्य कई क्षेत्रों में होगा।

मित्रों, किल्लत का अर्थशास्त्र या किल्लतवादी मनोवृत्ति को टा-टा करने और टाटा जैसों की भविष्यवादी सोच से नाता जोड़ने के दिन हैं। फटाफट, अपने सिनिसिज्म को; जो भी दाम मिले, बेच कर छुट्टी पायें। उसके शेयर का दाम बहुत नीचे जाने वाला है। समय रहते उससे अपना पोर्टफोलियो मुक्त कर लें।

क्या ख्याल है? ;)


ऊपर की पोस्ट का कलेवर बहुत दिन पहले बना था। फिर सब ठण्डे बस्ते में बंद हो गया। रविवार को नार्दन रीजनल पावर ग्रिड की गड़बड़ी ने बड़ा जोर का झटका दिया। सभी ट्रेने जस की तह रह गयीं। सात घण्टे यातायात अवरोध के चलते मन का विक्षेप हटाने को मैने यह पोस्ट पूरी की।
बड़ा कठिन है अपने को ब्लॉगिंग से दूर रखना। और इस पर बार-बार आने का उपयोग; मन अपने को आवश्यक काम से दूर रखने के लिये करता है। पोस्टें मैं तीव्र गति से पढ़ ले रहा हूं। पर टिप्पणियां करने के लिये जो इंवाल्वमेण्ट आवश्यक है, उस स्तर पर समय मिलने में लगता है, महीना भर लगेगा। तब तक एक या दो पोस्ट लिख पाना ही हो सकेगा।
धीरे-धीरे व्यस्तता जब अपना स्तर खोज लेगी तो इस प्रकार के काम के लिये समय और मन फ्री होने लगेगा। मेरे लिये इस प्रक्रिया से गुजरना भी एक महत्वपूर्ण अनुभव है। इस अनुभव को अंतत: एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में जगह मिलेगी - अगर ब्लॉगिंग चलती रही।
और चलती रहेगी - यह आशा जरूर है!

Saturday, March 8, 2008

होली का घोड़ा


कपड़े का घोड़ा। लाल चूनर की कलगी। काला रंग। भूसा, लुगदी या कपड़े का भरा हुआ। मेला से ले कर आया होगा कोई बच्चा। काफी समय तक उसका मनोरंजन किया होगा घोड़े ने। अन्तत: बदरंग होता हुआ जगह जगह से फटा होगा। बच्चे का उसके प्रति आकर्षण समाप्त हो गया होगा। घर में कोने पर काफी समय पड़ा रहा होगा। लोग कोई भी वस्तु यूं ही त्याग नहीं करते। वस्तुयें आदत की तरह होती हैं। मुश्किल से छूटती हैं। पर अन्तत: वह घर के बाहर फेंका गया होगा।

मुझे शाम को शिवकुटी मन्दिर के पास चहल कदमी करते दीखा। फोन पर श्री अनूप शुक्ल से बात हो रही थी - वे कह रहे थे कि हमने लिखना क्यों बन्द कर दिया है। हम दफ्तर में बढ़े काम का हवाला दे रहे थे। उनका कहना था कि ब्लॉग पर जब हमने श्री समीर लाल जी से मुलाकात की चर्चा की तो जरूर रेलवे वालों को लगा होगा कि यह व्यक्ति वजनी चीजों को टेकल कर सकता है। लिहाजा सवारी से माल यातायात का काम थमा दिया गया! हम सफाई दे रहे थे कि इसमें श्री समीर लाल जी का कोई योगदान नहीं है। हमारा भाग्य ही ऐसा है। खैर; बात लम्बी चली। घर पर होता तो एक आध फोन कॉल से व्यवधान आ गया होता। पर सड़क पर घूमते हुये बात चलती रही।

बात गंगा किनारे तक घूम आने पर चली। वापसी में तिराहे की सोडियम वेपर लेम्प की रोशनी में फिर दिखा वह घोड़ा। तिराहे पर बीच में आगामी होलिका दहन के लिये लोगों ने लकड़ियां इकठ्ठी कर रखी थीं। उन्हीं के बीच में रखा था वह घोड़ा। अभी उसके दहन में दस दिन का समय और है। होली के लिये इकठ्ठा की गयी लकड़ियों/सामग्री को कोई उठाता नहीं है। अत: सम्भावना नहीं है कि घोड़ा वहां से कहीं जाये।

भला हो घोड़े का - उसके फोटो ने एक छोटी सी पोस्ट की सोच मुझे दे दी। काले-बदरंग-फटे घोड़े ने मेरी कल्पना को मालगाड़ियों की फिक्र से कुछ बाहर निकाला। अनूप शुक्ल जी के कहने का असर यह हुआ कि यह लिख कर पब्लिश बटन दबा रहा हूं। आप तो कम रोशनी में लिया उसका फोटो देखें। यह अनूप शुक्ल जी से बातचीत के पौने दो घण्टे बाद पोस्ट कर रहा हूं।

Wednesday, March 5, 2008

तनाव और किडनी के रोगों में उपयोगी चटनियां


पंकज अवधिया जी ने बिल्कुल समय पर अपना आलेख भेज दिया। और मुझे लगा कि यह मुझे ध्यान में रख कर लिखा है उन्होंने। तनाव से मुक्ति कौन नहीं चाहता? और मैं तो इस समय कार्य-परिवर्तन के तनाव से गुजर ही रहा हूं। मैं अपने दफ्तर से १४ किलोमीटर दूर रहता हूं। अगर दफ्तर के पास रेलवे की अपनी संचार सुविधाओं से लैस होता तो शायद तनाव कुछ कम होता। पर बहुत सी चीजें हैं, जिन पर आपका अपना बस नहीं होता।


खैर मेरी छोड़ें, पंकज जी की पोस्ट पढ़ें। वे दो महत्वपूर्ण वनस्पतियों की बात कर रहे हैं जो तनाव और किड़नी में होने वाली पथरी की दशा में लाभप्रद हैं। आप उनकी पहले की पोस्टें पंकज अवधिया पर लेबल सर्च कर देख सकते हैं।


यह कहना गलत नही होगा कि हममे से ज्यादातर लोग तनाव में जी रहे हैं। क्या सचमुच तनाव इतने बढ गये हैं? या हमारी सहन शक्ति कम हो गयी है? क्या नींद का कम होना तनाव का कारण है या तनाव का अधिक होना कम नींद का? कारण जो भी हो पर अब ऐसी वनस्पतियो को अपनी दिनचर्या मे शामिल करना आवश्यक हो गया है जो कि हमारी क्षमता को इतना बढ़ा दें कि हर तरह की तकलीफ हम सहन कर लें।

 

Brahmi plant पिछले दिनो मै पारम्परिक चिकित्सको से इसी विषय पर चर्चा कर रहा था (चित्र इण्टरनेट से फ्री डोमेन सर्च से लिया गया »»»)। वे ब्राम्ही नामक जानी-पहचानी वनस्पति के प्रयोग के पक्षधर दिखे। इसे न तो दवा के रूप मे सुखाकर खाने की जरुरत है, न ही अन्य वनौषधियों के साथ मिलाकर। वे कहते हैं कि इसे आप अपने बागीचे मे स्थान दें। वह स्थान जहाँ पानी भरा रहता है या दलदली है ब्राम्ही के पौधे लगा दें। इसे गमले मे भी लगा सकते हैं। अधिक पानी देने से यह तुलसी और गुलाब के पौधो की तरह नाराज नही होगा। फिर खाने से पहले इसकी पत्तियो से चटनी बनाये और स्वादानुसार नमक वगैरह डालकर खाने के साथ खायें। चाहें तो इसे रोज खायी जाने वाली चटनी के साथ भी मिलाया जा सकता है। मुझे याद आता है कि कुछ वर्षों पहले मै कोलकाता मे अल्मोडा की एक महिला फिल्मकार से मिला था। उन्हे नर्वस सिस्टम से सम्बन्धित बीमारी थी। सब दवा कर जब हार गयीं तो पारम्परिक चिकित्सको की सलाह पर उन्होने इस चटनी को अपनाया। पहले एक गमले मे इसे लगाया और फिर तो दूसरे पौधो के लिये गमले नही बचे। दिन के खाने मे हमे भी इसकी स्वादिष्ट चटनी परोसी गयी। मैने महसूस किया है कि अच्छी नींद और दिमाग को राहत देने के लिये यह बडी कारगर है। बाकी तो इसके बहुत सारे लाभ है।

 

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क्या आप यह महसूस करते है कि आजकल पथरी के मरीज कुछ ज्यादा ही बढ़ गये हैं। किडनी से सम्बन्धित बीमारियाँ अब आम हो रही हैं। इनमे से कई बीमारियो का तो कोई इलाज उपलब्ध नही है और मरीजों को यूँ ही मरने छोड दिया जाता है। क्राँनिक रीनल फेल्योर ऐसी ही बीमारी है। मै ऐसे दसों मरीजो को जानता हूँ जो डायलीसिस के सहारे जिन्दा हैं। पारम्परिक चिकित्सकों की माने तो वे शरीर के अन्य अंगो की तरह शुरु से किडनी की भी देखभाल की बात करते हैं। बहुत सी वनस्पतियाँ हैं हमारे आस-पास जो किडनी को सुचारु ढंग़ से काम करने मे मदद करती हैं। इन्हे भोजन मे शामिल करने की जरुरत है। इनमे से एक है पानफूटी जिसे हम ब्रायोफिलम या पत्थरचटा के नाम से भी जानते हैं। इसे उद्यानों मे लगाया जाता है। आप इसकी माँसल पत्तियो से इसे आसानी से पहचान सकते हैं। पत्तियों ही से नये पौधे तैयार हो जाते हैं। माँसल पत्तियों को चटनी के रुप मे खाना है। चिकित्सा साहित्यों मे पथरी के उपचार मे इसके प्रयोग की बात कही गयी है, पर पारम्परिक चिकित्सक इस जानकारी को अधूरी मानते हैं। वे किडनी के लिये इसे सम्पूर्ण वनस्पति मानते हैं। वे साल के किसी भी तीन महिने में इसके प्रयोग की सलाह देते हैं।

 

मुझसे पाठक अक्सर प्रश्न करते हैं कि आपके लेखो मे वर्णित वनस्पतियाँ कहाँ मिलेंगी? इसका आसान सा जवाब है आपके आस-पास। आप शहर से निकलकर गाँवो मे जायें और लोगो से पूछें तो वे आपको इसकी जानकारी देंगे। यदि आप अपने क्षेत्र का नाम बतायेंगे तो मै वहाँ वनस्पतियो को स्थानीय भाषा मे क्या बोला जाता है, यह बता दूंगा। ये स्थानीय नाम हर कोस में बदल जाते हैं। और अधिक जानकारी के लिये आप मुझे इसकी फोटो भेज सकते हैं। अब तो सब कुछ आसान हो गया है। आप अपने क्षेत्र के वनस्पति विशेषज्ञों से भी मिल सकते है। यह बात सभी क्षेत्रो के लिये लागू होती है। यहाँ तक कि मुम्बई की बोरीवली पहाड़ियों और करज़त के इलाको से मैने वनस्पतियाँ एकत्र की हैं। पिछले वर्ष मुझे सुबह के भ्रमण के दौरान आरे मिल्क कालोनी में कई दुर्लभ वनस्पतियाँ दिखीं। मुम्बई के इतने सन्दर्भ इसलिये दे रहा हूं, क्योकि ज्यादातर सन्देश ऐसे ही महानगरों से आते हैं।

 

इस लेख मे मै 15 प्रकार की चटनियों के विषय मे लिखना चाहता था पर यह लम्बा होता जा रहा है। मै आगे इस पर लिखता रहूंगा।



मेरे इस विषय से सम्बन्धित कुछ लिंक:

 

ब्राम्ही पर शोध आलेख

 

पानफूटी पर शोध आलेख

 

चटनी पर शोध आलेख

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


(अपडेट सवेरे सात बजे)

आज सवेरे की सैर के दौरान पाया कि नारायणी आश्रम के खेतों में गेहूं की फसल में बालियां लग गयी हैं। फसल अच्छी है और उसके बीच बीच में एक दो सरसों के पौधे भी हैं जिनमें पीले फूल लगे हैं। सवेरे सवेरे यह देखना बहुत मन भाया। आप मोबाइल से लिया खेत का चित्र देखें। मार्च का महीना होने पर भी हल्का कोहरा है! 



Monday, March 3, 2008

संयम और कछुआ


श्री अरविन्द आश्रम की रतलाम शाखा के सन्त थे श्री स्वयमप्रकाश उपाध्याय (<<<)। उनके साथ मुझे बहुत करीब से रहने और उनका आशीर्वाद प्रचुर मात्रा में मिलने का संयोग मिला। उनका मेरे सत्व के (जितना कुछ भी उभर सका है) उद्दीपन में बहुत योगदान है। श्री उपाध्याय मुझे एक बार श्री माधव पण्डित (जो पॉण्डिच्चेरी के श्री अरविन्द आश्रम में सन्त थे) के विषय में बता रहे थे। माधव पण्डित को तिक्त नमकीन प्रिय था। भोजन के बाद उन्हे इसकी इच्छा होती थी। श्री उपाध्याय जब रतलाम से पॉण्डिच्चेरी जाते तो उनके लिये रतलामी सेव के पैकेट ले कर जाते थे। माधव पण्डित भोजन के उपरान्त एक हथेली में रतलामी सेव ले कर सेवन करते थे। उनसे मुलाकात में उपाध्याय जी ने उन्हें थोड़ा और नमकीन लेने का आग्रह किया। पण्डित जी ने मना कर दिया। वे रस लेने के लिये नाप तौल कर ही नमकीन लेने के पक्ष में थे। रस लेने का यह तरीका संयम का है।

साने गुरूजी की पुस्तक है – भारतीय संस्कृति। उसमें वे लिखते है:

"न्यायमूर्ति रनाडे की एक बात बताई जा रही है। उन्हें कलमी आम पसन्द थे। एक बार आमों की टोकरी आयी। रमाबाई ने आम काट कर तश्तरी में न्यायमूर्ति के सामने रखे। न्यायमूर्ति ने उसमें से एक दो फांकें खाईं। कुछ देर बाद रमाबाई ने आ कर देखा कि उस तश्तरी में आमकी फांकें रखी हुई थीं। उन्हें अच्छा नहीं लगा। बोलीं – “आपको आम पसन्द हैं। इसी लिये काट कर लाई। फिर खाते क्यों नहीं?” न्यायमूर्ति ने कहा – “आम पसन्द हैं इसका अर्थ यह हुआ कि आम ही खाता रहूं! एक फांक खा ली। जीवन में दूसरे भी आनन्द हैं।“

संसार में सभी महापुरुष संयमी थे। पैगम्बर साहब सादा खाते थे। वे सादी रोटी खा कर पानी पी लेते थे। गांधी जी के बारे में तो सादगी की अनेक कथायें हैं। संयम बहुत सीमा तक मितव्ययता के सिद्धान्त से भी जुड़ा है।

संयम का सिद्धान्त केवल भोजन के विषय में नहीं है। वाणी में, निद्रा में, श्रम में, चलने में, व्यायाम में, आमोद प्रमोद में, अध्ययन में – सब में अनुशासन का महत्व है।

कछुआ संयम का प्रतीक है। भग्वद्गीता के दूसरे अध्याय में कहा है –

यदा संहरते चायम् कूर्मोंगानीव सर्वश:।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (२.५८)

“जिस प्रकार कछुआ सब ओर से जैसे अपने अंगों को जैसे समेट लेता है; वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से अपने को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि को स्थिर मानना चाहिये।“

कछुआ अपनी मर्जी से अपने अंगों को बाहर निकालता है और जब उसे खतरे की तनिक भी सम्भवना लगती है, वह अपनी सभी इन्द्रियों को समेट लेता है। यही कारण है कि कछुआ भारतीय सन्स्कृति का गुरु माना गया है।

मैं संयम के बारे में क्यों लिख रहा हूं? असल में मुझे कुछ दिन पहले एक ब्लॉग दिखा – मेरा सामान। इसमें एक उत्साही फाइनल ईयर के रुड़की के छात्र श्री गौरव सोलन्की ने आई.आई.टी. के छात्रों की खासियत बताते हुये यह लिखा कि वे लम्बे समय तक काम कर सकते हैं, दो दिन तक लगातार सो सकते हैं, लगातार फिल्में देख सकते हैं, इत्यादि। अर्थात हर काम वे अति की सीमा तक कर सकते हैं। गौरव जी को यह गुण लगा। एक सीमा में यह लगता भी है। हमने भी यह अति कर रखी है, बहुत बार, बहुत विषयों में। पर अन्तत: देखा है कि संयम ही काम आता है।

आशा है उत्साही जन अन्यथा न लेंगे!


जब बहुत सा काम करना हो, और करने की इच्छा शक्ति में कमी हो तो सबसे अधिक काम आता है - सॉलिटायर (Solitaire)। विण्डोज़ एक्सपी में यह टाइम किलर साथ में आता था। विस्टा में यह देखने को नहीं मिलता। इण्टरनेट से डाउनलोड करने में भांति-भांति के सॉलिटायर दीखते हैं। फ्री में उपलब्ध हैं। पर वह सॉलिटायर जो विण्डोज 98 के जमाने से प्रयोग करते रहे हैं; नहीं दीखता।

आपको कोई जुगाड़ मालुम है जिससे विस्टा पर इसे डाउनलोड किया जा सके?

एक जगह मैने पढ़ा कि अगर आपको एकाकी/सुस्त/बिना शादी के जिन्दगी काटनी हो तो सॉलिटायर सबसे उपयुक्त टाइम किलर है। आपका क्या ख्याल है? आपने कितना समय इस (या इस प्रकार के) गेम के हवाले किया है?!