Saturday, November 10, 2007

मंघाराम एण्ड संस के असॉर्टेड बिस्कुट कहाँ गये?


बचपन में जे.बी. मंघाराम एण्ड संस के असॉर्टेड (assorted - मिश्रित, विभिन्न, चयनित) बिस्कुट का डब्बा देखा था। ऊपर लक्ष्मी जी की फोटो वाला टिन का चौकोर डिब्बा, जिसमें तरह तरह के बिस्कुट होते थे। दीपावली पर अचानक उसी की याद हो आयी।1 गिफ्ट पैक में आने वाले वे क्रीम और वेफर्स के बिस्कुट, पोलसन के मक्खन के कैन के साथ बचपन की मधुर यादों का हिस्सा हैं। शायद आपको भी बचपन में दिखे हों। बाद में वे देखने को नहीं मिले। आपको कोलिनॉस टूथ पेस्ट के विज्ञापनों की याद है? ये सब कम्पनियाँ कहां हैं?

Kolynos1

कोलिनॉस का 50 के दशक का अमेरिकी विज्ञापन।

इण्टरनेट पर सर्च करने पर आर.बी. मंघाराम फूड्स लिमिटेड के नाम से एक कम्पनी बंगलूर की मिली। जीवनदास मंघाराम (जो स्वतंत्रता सेनानी थे और जिन्होने जे.बी. मंघाराम की स्थापना की थी) भी शायद दक्षिण में बेस्ड थे। इसलिये बहुत सम्भव है कि यह फर्म उनके उत्तराधिकारियों में से किसी की हो। दक्षिण के ब्लॉगर बता सकते हैं कि जे.बी. मंघाराम एण्ड संस का क्या वर्तमान है। वैसे इण्टरनेट सर्च जे.बी. मंघाराम फूड्स के नाम से एक फेक्टरी ग्वालियर में बता रहा है। पर इसके प्रॉडक्ट्स यहां कहीं दिखे नहीं।

पोलसन मक्खन बनाने वाले पेस्तनजी इदुल्जी दलाल थे। पॉली के नाम से जाने जाते इन सज्जन ने अंगेजों के लिये कॉफी की दुकान से 1888 में शुरुआत की थी। कालांतर में इनकी कम्पनी 'पोलसन' ने ब्रिटिश सेना को मक्खन सप्लाई करने के लिये खेरा जिला, गुजरात में एक प्लॉण्ट लगाया था, पिछली सदी के शुरू में। कम्पनी बढ़िया चल रही थी, पर अंतत: त्रिभुवन दास पटेल के गांघीवादी गांधीवादी सहकारी आन्दोलन - जो 'अमूल' बना, ने यह कम्पनी चौपट कर दी। इसी तरह कोलिनॉस सम्भवत: कोलगेट में लीन हो गयी।

कई अच्छी चलती कम्पनियां कुछ पीढ़ियों में डायनासोर बन जाती हैं। Sad


1. वैसे भी डेव वाकर के कार्टून के माध्यम से जीतेन्द्र चौधरी ने कहा है कि मैं ब्लॉगिंग के विषय ताड़ने Eye-rolling को लगा रहता हूं! जे. बी. मंघाराम वाला विषय उसी क्रिया का परिणाम है!

और सही में, मैं जीतेन्द्र को क्रेडिट दूंगा। डेव वाकर के कार्टून मैने भी देखे थे पर उनका जीतेन्द्र जैसा क्रियेटिव इस्तेमाल हो सकता है, मेरी मानसिक हलचल में नहीं आया था! ये सज्जन हिन्दी के स्टार ब्लॉगर यूंही नहीं बन गये हैं!


Friday, November 9, 2007

गाय, कुत्ते और रोटियाँ - देव और दानव


सवेरे की सैर के दौरान देखा - एक घर से गृहणी ने सात-आठ रोटियाँ और सड़क पर फेंकीं। पास ही एक गाय खड़ी थी। वह खाने लगी। गली के कुछ कुत्ते दौड़ते हुये आये और रोटियाँ छीनने के लिये गाय पर भौंकने लगे। गाय ने सींगों का सहारा लिया, पर एक बड़ा कुत्ता लगभग आधी रोटियाँ छीनने में सफल हो गया।

बड़ा कुत्ता एक पैर से रोटियाँ सड़क पर दबा कर खाने लगा। बाकी कुत्ते उसकी कद काठी के भय से आस-पास खड़े उसे ताकने लगे। अकेला ही वह छीनी हुयी रोटियाँ खा गया। गाय तीन चार रोटियाँ मुंह में दबा कर अलग हट गयी। कुछ दूर एक दूसरी गाय भी खड़ी थी। वहां उसने रोटियां जमीन पर गिरा दीं। दोनो मिल कर खाने लगीं।

दैवी और आसुरी - दोनो वृत्तियों के उदाहरण देखने को मिल गये। वह भी जानवर में जो उस वृत्ति के प्रति चैतन्य नहीं है। Gods Demons 

एक कथा है। पूरी याद नहीं। स्वर्ग और नर्क का अंतर समझाने के लिये बनाई गयी है। एक बड़े कक्ष में बहुत से पकवान मेजों पर रखे थे। ढ़ेरों असुर वहां बैठे थे। उनके हाथों में खपच्चियां बंधी थीं। समने स्वादिष्ट भोजन होने पर भी वे खा नहीं पा रहे थे। खीझ और कुण्ठा के चलते जल्दी ही वे आपस में युद्ध करने लगे। मेज-सामान-पकवान जल्दी ही गिर कर व्यर्थ हो गये। वैर-वैमनस्य बढ़ा, सो अलग।

देखने वाले को दूसरे कक्ष में ले जाया गया। उतना ही बड़ा और वैसा ही कक्ष। वैसी ही मेजें और वैसे ही पकवान। सामने ढ़ेरों देव बैठे थे। उनके भी हाथों में खपच्चियाँ बन्धी थीं। पर वे सभी प्रसन्न मन थे। दो-दो के ग्रुप में वे एक दूसरे को पकवान उठा-उठा कर खिला रहे थे। सभी परस्पर तृप्त कर रहे थे, सभी परस्पर तृप्त हो रहे थे।

वही परिस्थितियां। पर मानसिकता का अंतर। मनस से हम देव बनते हैं; मनस से ही दानव बनते हैं। बस विकल्प हमारे पास है। मानव होने का मुख्य लाभ यही है - देव और दानव बनने का विकल्प हमें मिला हुआ है।


कल नरक चतुर्दशी ने नरक-दर्शन करा दिये! कल सवेरे झांसी-बीना खण्ड पर ट्रेक्शन विद्युत के तार टूटे और एक रेल लाइन 5½ घण्टे बधित रही। फिर, कल शाम को ट्रेक्शन विद्युत के तार नैनी-इलाहाबाद के बीच टूटे और 3½ घण्टे यातायात बाधित रहा। उसके बाद जो पहली गाड़ी पुणे-दरभंगा एक्स्प्रेस चली, उसको उसके पीछे ऑटोमेटिक सिगनलिंग पर चल रही ग्वालियर-हावड़ा चम्बल एक्स्प्रेस ने इलाहाबाद स्टेशन के बाहर टक्कर मार दी। लगभग आधा दर्जन लोग घायल हुये। पूरी रात का जागरण हो गया। उस लाइन पर यातायात आज सवेरे 6 बजे चालू हो पाया। और दुर्घटना के आधे घण्टे में ही टेलीवीजन चैनल स्क्रॉल मैसेज देने लगे थे - 5 मरे, 50 घायल।

कुछ सोने का प्रयास किया, पर सवेरा होते ही जिन्दगी फिर चालू हो जाती है। रात भर जागने के कारण छूट नहीं देती! पोस्ट पब्लिश कर रहा हूं, पर आपकी टिप्पणी दिखाने के पहले छोटी नींद निकालना चाहूंगा! 


Thursday, November 8, 2007

आपकी अंग्रेजी में टिप्पणियोँ का भी स्वागत है!


हिन्दी ब्लॉगरी में लोग हिन्दी को ले कर काफी सेण्टी हैं। बोले तो फिनिकी (finicky - नकचढ़ा, तुनकमिजाज, जिद्दी)। शुरू में हमने काफी रार की। बाद में समझ में आया कि यह कि मामला गहरी जड़ें रखता है। जब तक भाषा पर्याप्त समृद्ध नहीं हो जाती, तब तक अंग्रेजी विरोध ही उसे ऊर्जा प्रदान करेगा। बहुत कुछ वैसे कि आपका प्रतिद्वन्द्वी तगड़ा हो तो आप में उत्कृष्ट प्रदर्शन की सम्भावनायें कई गुणा बढ़ जाती हैं।

इस लिये हिन्दी ब्लॉगरी में हिन्दी में ही लिखा जाये, यह मेरी समझ में (बड़ी अनिच्छा से) आता है। पर यह पोस्ट के विषय में ही लागू होना चाहिये, टिप्पणियों पर नहीं। कुछ समय से मैं यह देख रहा हूं कि ऐसे भी लोग ब्लॉग पढ़ रहे हैं जो हिन्दी लेखन में सहज नहीं हैं पर पढ़ रहे हैं। हिन्दी वालों को इससे प्रसन्नता होनी चाहिये। जो व्यक्ति आज हिन्दी पढ़ने का कष्ट ले रहे हैं, वे देर सबेर लिखेंगे भी। शिवकुमार मिश्र स्वयम एक उदाहरण हैं। वे मेरे ब्लॉग पर अंग्रेजी/रोमन हिन्दी में टिप्पणी करते थे; आज ब्लॉग पर स्तरीय सटायर लेखन के प्रतिमान बनते जा रहे हैं।

Dhanteras

धनतेरस की शाम बिजली के लेम्पों की झालर।

दीपावली मंगलमय हो।

और कोई न भी लिखे, हमें तो पाठक की दरकार है। लेखक की बजाय पाठक ज्यादा सहज जीव होने चाहियें। जो शब्दों को जितना घुमाने की क्षमता रखते हैं, वे उतने ही जटिल, दुखी और दम्भी जीव होते हैं। मेरे एक इंजीनियर मित्र थे (अब सम्पर्क नहीं है उनसे) - जो न तो अंग्रेजी ढ़ंग की लिखते थे न हिंन्दी। पर विश्लेषण और तर्कसंगत सोचने में उनका मुकाबला नहीं था। भाषा में हाथ तंग था इसलिये लफ्फाज बिल्कुल नहीं थे। शब्दों का प्रयोग किफायत से करते थे। ऐसे लोग भी पढ़ते हैं। उनकी टिप्पणी भी महत्वपूर्ण है।  

इसलिये अगर एग्रेगेटर यह कहता है कि वह केवल हिन्दी में लिखे शीर्षकों की फीड दिखायेगा - तो मैं हुज्जत नहीं करूंगा। पर मैं अंग्रेजी में टिप्पणी करने वालों का भी स्वागत करता हूं। और टिप्पणी करने वाले को हिन्दी या अंग्रेजी की शुद्धता की भी ज्यादा परवाह नहीं करनी चाहिये। सम्प्रेषण हो जाये और कुछ अश्लील न हो - बस!

Tippani

मैने इस आशय का स्क्रॉल मैसेज भी अपने ब्लॉग पर लगा दिया है (ऊपर लाल आयत में देखें)। अत: मित्र, यदि आपको हिन्दी लेखन में झिझक है, तो भी बेझिझक टिप्पणी कीजिये। सम्प्रेषण कुछ भी न होने से सम्प्रेषण होना बेहतर है - भले ही वह अंग्रेजी में हो!


Wednesday, November 7, 2007

आस्था बनी रहे परस्पर - एक मोनोलॉग!


अभय ने ब्लॉग के फुल फीड की बात की परसों और मैने निर्णय लेने में समय नहीं लगाया। फीडबर्नर में खट से समरी फीड को डी-एक्टीवेट कर दिया। पर मैं अभय तिवारी से कहता हूं कि वह धन और उसकी दिव्यता के विषय में विचार बदलें। वह जवान सुनता ही नहीं।

पंकज अवधिया जी ने कहा कि जो चित्र ब्लॉग पर लगाऊं, उसका सोर्स बताऊं। मैने कोशिश की वैसा करने की। और फल यह हुआ कि मुझे अपने सस्ते मोबाइल कैमरे पर ज्यादा यकीन करना पड रहा है। ममता जी ने पूछ लिया कि अपना नाम क्यों चिपका रखा है चित्र पर? शिवकुमार मिश्र ने कहा कि (बकौल विक्रम सुन्दरराजन) मैं जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट) का वाटर मार्क चित्रों पर लगा कर अर्थ व्यवस्था पर विश्वास जता रहा हूं क्या? मजे की बात यह रही कि झांसी से मीठीजी ने यह पूछ लिया कि मैं चित्र चुपके से लेता हूं या अलानिया? उनका सवाल अंग्रेजी में था और उनको मेल से मैने जवाब भी दे दिया। पर पूरी प्रॉसेस में यह लगा ब्लॉग माने 'बेलगाम' नहीं है। आप अपना जो चरित्र पेश करते हैं - और अगर रोज एक पोस्ट तथा 20 टिप्पणियाँ सरका रहे हों तो छद्म चरित्र नहीं पेश कर सकते - उसकी रक्षार्थ आप उत्तरदायी बन जाते हैं। आपको अपनी और अपने में पढ़ने वालों की आस्था की रक्षा करनी होती है। 'गैर जिम्मेदार और अपनी मर्जी का मालिक ब्लॉगर' की छवि मिथक सी बनती दीखती है।Gyan(169)

मित्रों, लगता है कि जिन्दगी पूर्ण चिर्कुटई में गुजारने की जो स्वतंत्रता थी, उसमें खलल आ रहा है। ब्लॉग पर जो भी लिखा जा रहा है - वह एक तरह से स्कैनर, जीरॉक्स या रेसोग्राफ पर है - पर्सनल डायरी पर नहीं! आप पतली गली से रिगल (wriggle) कर निकल नहीं सकते। ब्लॉग आपके व्यक्तित्व का विस्तार है। आपके फिजिकल, इण्टेलेक्चुअल, इमोशनल और स्पिरिचुअल अस्तित्व का एक नये आयाम में एक वैश्विक प्रमाण। क्या आप भी ब्लॉग को उस प्रकार से लेते हैं?

कल एक नये ब्लॉगर के कहे पर मैने उनकी पोस्ट देखी। दंग रह गया नयी पीढ़ी की काबलियत पर। आज मैं लिंक नहीं दे रहा, थोड़ा और परखता हूं उनको। पर यह जरूर लगता है कि हिन्दी ब्लॉगरी बहुत चमकेगी। बाईस-पच्चीस साल के जवान इतना गदर प्रतिभा प्रदर्शन कर रहे हैं तो थोड़ा सा अध्ययन और अनुभव से जाने कौन सी ऊंचाइयाँ छुयेंगे!

मैं सिनिसिज्म नहीं दर्शाऊंगा। मैं हाई मॉरल प्लेटफॉर्म जैसा कुछ नहीं ले रहा हूं कि तुलनात्मक रूप से औरों में या समाज में दोष दिखें और अपने में गुण ही गुण। और इसके उलट मैं अपने को खिन्न/हीन भी नहीं समझूंगा।

मैं बस यही कहना चाहूंगा कि हम सब में आस्था बनी रहे, परस्पर।


एक बात: कई ब्लॉगर अपने पोस्ट की पब्लिश के समय और दिनांक के प्रति सजग नहीं रहते। एक उदाहरण तो मुझे नीरज जी की पोस्ट 'गीत भंवरे का सुनो' में मिला है। यह उन्होने टेम्पररी तरीके से 3 नवम्बर को पब्लिश की। फीड एग्रेगेटर उसी दिन दिखाता रहा। तब क्लिक करने पर पेज मिला ही नहीं। बाद में यह उन्होने 5-6 नवम्बर को छापी और हम भी देखने से चूक गये - देर से देखी! गजल बड़ी भाव युक्त है पर छापने उतारने की लुका-छिपी में बहुतों ने नहीं देखी होगी। मैं नीरज जी से अनुरोध करूंगा कि वे सजग रहें पोस्ट पब्लिश करने के बारे में और आपसे अनुरोध करूंगा कि यह गजल अवश्य पढ़ें।

Tuesday, November 6, 2007

सिनिकल हो रहा हूं क्या?


उम्र के साथ सिनिसिज्म (cynicism - दोषदर्शन) बढ़ता है? सामान्यत: हां। इस पर बहुत पढ़ा है। अब तो जिन्दगी फास्ट पेस वाली होने लगी है। लोग अब पैंतालीस की उम्र में सठियाने लगेंगे। नया मोबाइल, नया गैजेट, नया कम्प्यूटर इस्तेमाल करने में उलझन होगी तो कम उम्र में भी असंतोष और उससे उत्पन्न सिनिसिज्म गहराने लगेगा।

रविवार को काकेश और अनूप शुक्ल की टिप्पणियों ने एक बार आत्म मंथन पर विवश कर दिया है। उनके अनुसार (मजाक में ही सही) मैं हर स्थिति में भयभीत या असंतुष्ट क्यों रहता हूं? मूली लेने जाते थूंक के वातावरण से अरुचि होती है। डॉक्टर के पास जाने पर डॉक्टर न बन पाना सालता है। मरीजों को देख कर लगता है कि ज्यादा देर वहां रहे तो मरीज बन जायेंगे। 

'अजब थूंकक प्रदेश' में वास्तव में परिवेश से खुन्नस चम-चम चमकती है। यह खुन्नस बुढ़ौती की दहलीज का परिचायक तो नहीं है? अच्छ किया इन महाब्लॉगरों ने चेता दिया। रही-सही कसर ममता जी ने टिप्पणी में पूरी कर दी। अब लम्बी सांस ले कर तय करते हैं कि सिनिकल नहीं होंगे। अ शट केस फॉर ऑब्ट्यूस एंगल (obtuse angle) थॉट! 

अब सिनिकल होने से बचने के सात सुझाव सरकाता हूं इस पोस्ट पर1:Gyan(168)

  1. अपनी आत्म छवि सुधारें। हीनता की भावना को चिमटी से पकड़-पकड़ बाहर नोचें। अपनी बाह्य छवि को भी चमकायें। अपने गुणों पर चिंतन करें।
  2. इच्छा शक्ति का सतत विकास करें। जीवन में जो नकारात्मक मिला है, उसे सकारात्मक में बदलने की अदम्य इच्छा जगायें। अपने आप को फोकस (एकाग्र) करें। स्वामी शिवानन्द के अनुसार सर्दियों का मौसम इस काम के लिये बहुत अच्छा है।
  3. अपने ध्येय और उनको पाने की अपनी कार्य योजना तय करें। ध्येय में ठोसपन होना चाहिये। अस्पष्ट ध्येय ध्येयहीनता का दूसरा नाम है।
  4. अपना नजरिया (पैराडाइम - paradigm) सही बनायें। अपने और दूसरों के बारे में अच्छा सोचें। घटिया सोच से बचें। विनाशकारी/विस्फोटक/आतंकवादी सोच से बचें।
  5. औरों के साथ अपने व्यवहार को सुधारें। शुरुआत अपनी पत्नी/अपने पति से करें। यह मान कर चलें कि दूसरों को उनके ध्येय पाने में मदद करेंगे तो आप स्वयं आगे बढ़ेंगे।
  6. दुनियां में फ्री-लंच जैसी चीज नहीं होती। कर्म-यज्ञ में अपना योगदान देकर ही फल पाने की हकदारी जतायें।
  7. ईश्वर में सदा आस्थावान रहें। यह मान कर चलें कि वे सदैव आपके साथ हैं।

ये सात सुझाव अटकल बाजी नहीं है। आधा रविवार लगाया है यह सोचने में। हर सुझाव पर एक आध पुस्तक ढ़ूढ़ी जा सकती है। हर सुझाव पर पोस्ट/पोस्टें बन सकती हैं। पर उस तरह का लेखन करने के लिये मुझे 'आत्मोन्नति' छाप ब्लॉग बनाना पड़ेगा। लेकिन जिस प्रकार का लेखन हिन्दी ब्लॉगजगत में चल रहा है - इस तरह के ब्लॉग के लिये रेगुलर स्पेस नहीं लगता।

(पंकज अवधिया जी ऊपरके चित्र के पौधे का नाम बतायेंगे? हमारा माली इसे मुर्गकेश कहता है - मुर्गे की कलगी नुमा फूल के कारण।)


1. अचानक आस्था चैनल चलाने पर क्षमा करें। असल में अनूप, काकेश और ममता जी की टिप्पणियों ने इतना इंटर्नलाइज किया है कि आस्था चैनल ही निकल रहा है।

Monday, November 5, 2007

'पेप्सी, कोक और फीड एग्रेगेटर' पर एक और दृष्टिकोण


नरसों अमितजी ने मेरी पोस्ट 'पिंग सेवायें...' पर टिप्पणी कर कहा - 'नारद नये रूप में आ रहा है, उसकी भी तीव्रता देख कर बताइयेगा'। फिलहाल तो नारद के लिंक पर क्लिक करने से अंग्रेजी में आता है - 'Work in progress. Narad will be back soon!'। नारद जल्दी और अपने तेज रूप में आये इसकी प्रतीक्षा है।

नारद की प्रतीक्षा किसी नोस्टाल्जिया के चलते नहीं है। मैं खालिस उपभोक्ता के फायदे के दृष्टिकोण से कह रहा हूं। किसी भी उपभोक्ता को सेवायें देने वाले क्षेत्र में दो या तीन सशक्त प्रतिद्वन्द्वी हों और उनमें किसी तरह का कोई कार्टेल(सांठ-गांठ) न हो, तो उपभोक्ता के लिये इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।

ब्लॉगवाणी की प्रतिद्वंद्विता में चिठ्ठाजगत को सशक्त बनना मैं इसी लिये पसन्द करता हूं। आलोक 9-2-11 उस प्रॉसेस में अगर अपनी टीम में पर्याप्त सक्रियता लाकर चिठ्ठाजगत को और और बेहतर बना सके तो ब्लॉगरों का बड़ा नफा होगा। और प्रतिद्वन्द्विता के चलते ब्लॉगवाणी भी परिपुष्ट होगा।1 नारद के पराभव का कारण भी यही था कि उस समय उसके पास प्रतिद्वन्द्विता नहीं थी (जीतेन्द्र शायद सहमत न हों)। आगे भी नारद अगर चमकेगा तो प्रतिद्वन्द्विता के कारण ही।

फीड एग्रेगेटर एक से अधिक और लगभग बराबरी के सशक्त होने ही चाहियें। और ब्लॉग जगत में विस्तार के चलते सब के लिये जगह है।

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भारत में जब तक टेलीफोन में सरकारी विभाग का वर्चस्व रहा, फोन सेवा किर्र-किर्र ही रही। आपके पास विकल्प हों - और अच्छे विकल्प हों तो मजा है।

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अकेला गूगल पावरफुल होता जाता है तब बेचैनी होती है। याहू और माइक्रोसॉफ्ट को भी चमकना चाहिये।

(सभी लोगो इण्टरनेट से उतारे हैं)

मैं एक उदाहरण देता हूं। इस मास के अंत में भारतीय रेल के ग्रूप -सी व डी के कर्मी वोट देंगे। वे मान्य यूनियनों (recognised unions) का चुनाव करेंगे। और उचित यही होगा कि कम से कम दो सशक्त यूनियनें उभरें। केवल एक मान्यता प्राप्त यूनियन हो तो वह उछृंखल या आत्मसंतुष्ट हो सकती है। एक यूनियन ताकतवर हो और बाकी टिलिर-पिलिर तो नेगोशियेशन में भीषण दिक्कतें आती हैं। साथ ही कुछ कर्मचारी मलाई काटते हैं और बाकी फटफटाते फिरते हैं।

ठण्डे पेय के रूप में केवल अकेला कोक या पेप्सी होता तो उसकी गुणवत्ता भी कम होती और बिकता भी डबल मंहगा। अकेला गूगल पावरफुल होता जाता है तब बेचैनी होती है। याहू और माइक्रोसॉफ्ट को भी चमकना चाहिये। इण्टरनेट एक्स्प्लोरर के मुकाबले फॉयरफॉक्स को भी चमकना ही चाहिये। वैसे ही, भारत में जब तक टेलीफोन में सरकारी विभाग का वर्चस्व रहा, फोन सेवा किर्र-किर्र ही रही। आपके पास विकल्प हों - और अच्छे विकल्प हों तो ही मजा है।

इसलिये भैया, ब्लॉगवाणी, नारद और चिठ्ठाजगत - सभी रिवाइटल खायें - भले ही अभय तिवारी उसे बेकार बता रहे हों! सभी नयी-नयी सेवायें दें और सभी एक से बढ़ कर एक निकलें। इसी में नफा है हिन्दी ब्लॉगर का।

और फीड एग्रेगेटर्स पर चर्चा चलती रहनी चाहिये। जितने वे फोकस में रहेंगे, विवाद में रहेंगे, उतना बेहतर बनेंगे।

अब कौन सा एग्रेगेटर किसका चिठ्ठा उड़ाने जा रहा है! Waiting


1. ब्लॉगवाणी संचालक अरुण अरोड़ा इसे किसी पंगे का मामला न समझें।

परसों आलोक (9211) जी ने अनिवार्य सब्जी के रेट की बात की थी। भरतलाल कल फाफामऊ मण्डी से सब्जी लाया - आलू 46 रुपये के 5 किलो, टमाटर 15 रुपये किलो, प्याज 24-28 रुपये किलो(प्याज खरीदा नहीं)। मूली के रेट पर बहुत चर्चा थी, तो मैने सोचा अनिवार्य सब्जी के भाव बता दिये जाये!Happy


Sunday, November 4, 2007

न्यूरोलॉजिस्ट के पास एक विजिट


पत्नी के आधासीसी सिरदर्द के चलते मैं 2-3 महीने में उनके साथ एक बार न्यूरोलॉजिस्ट (तंत्रिका-तंत्र विशेषज्ञ) के पास जाता हूं। काफी डिमाण्ड में हैं इस प्रजाति के लोग। सवेरे मेरे एक सहायक उनसे शाम की विजिट का नम्बर ले लेते हैं; जिससे प्रतीक्षा न करनी पड़े। हर बार मेरी पत्नी की 5 मिनट की मुलाकात के वे ठीकठाक पैसे ले लेते हैं। ब्लड-प्रेशर मात्र देखते हैं। दवा में हेर-फेर भी कुछ खास नहीं करते। एक आध विटामिन कम ज्यादा कर देते हैं और योगासन करने की सलाह दे देते हैं।

विजिट के लिये नम्बर 1 होने पर भी हम प्रतीक्षा करते हैं। प्रतीक्षारत लोगों की किस्म और संख्या देख कर मुझे लगता है कि इस जिन्दगी में डॉक्टर न बन कर गलती कर दी।

Gyan(155)डाक्टर साहब आने को हैं।  उनके दरवाजे पर खड़ा चपरासी नुमा व्यक्ति मुझे स्वयम तंत्रिका-तंत्र के रोग का मरीज लगता है। पतला दुबला और हाथ पैर के अन कण्ट्रोल्ड मूवमेण्ट वाला। अपने आप में आत्मविश्वास की कमी वाला व्यक्ति। डाक्टर आये नहीं हैं - कार से आयेंगे तो वही रिसीव करेगा। फिर भी वह डाक्टर साहब का चेम्बर खोल कर झांकता है और पुन: लैच लगा कर बन्द करता है। आशंकित ऐसे है, जैसे कि डाक्टर साहब कहीं से अवतरित होकर कमरे में न आ गये हों।Gyan(154)

पास में दो नौजवान बैठे हैं। उनमें से एक बार-बार चपरासी नुमा व्यक्ति से अंतरंगता गांठने का प्रयास करता है कि डाक्टर के आने पर उसे सबसे पहले मिलने दिया जाये। चपरासी चुगद है - भाव नहीं खा पा रहा है। दूसरा नौजवान शायद मरीज है। बार-बार अपने हाथ मलता है। सिर इस-उस ओर घुमाता है और कभी कभी अपनी बड़ी-बड़ी आंखें मींजता है। लाल धारीदार टी-शर्ट पहने इस नौजवान से मुझे सहानुभूति होती है। बहुत जिन्दगी है उसके आगे। भगवान करें वह सक्षमता-सफलता से व्यतीत करे।

एक और व्यक्ति है जो 20 मिनट से अकेला बैठा अपने मोबाइल पर कुछ बटन टीप रहा है। बहुत व्यस्त। सिर भी ऊपर नहीं उठाया। 

Gyan(157) Gyan(156)

सर्दी नहीं है, पर एक मरीज बैठे हैं पूरा लपेट लपाट कर। सिर पर पूरी तरह गमछा बांधे हैं। उनके साथ दो-तीन लोग आये हैं। उन्हें बिठा कर बाहर लॉन में प्रतीक्षा कर रहे हैं। बैग साथ है - शायद इलाहाबाद के बाहर से हैं। और भी मरीज हैं जो लॉन में या पास के कमरे में इंतजार कर रहे हैं। 

मरीजों की प्रतीक्षारत दुनियाँ कम ही देखता हूं। ज्यादातर दफ्तर और रेल की पटरियों के इर्द-गिर्द आपाधापी में देखना-सोचना-चलना रहता है।

आधे घण्टे वहां व्यतीत कर समझ जाता हूं कि यहां ज्यादा समय व्यतीत करने पर या तो मरीज बन जाऊंगा या एक अर्थर हेली छाप उपन्यास लिखने की क्षमता अर्जित कर लूंगा। पहले की सम्भावना ज्यादा है।Wilted Rose       


Saturday, November 3, 2007

अजब थूंकक प्रदेश है यह!


शाम के समय पत्नी जी के साथ बाजार तक घूमने निकला। लिया केवल मूली - 6 रुपये किलो। आधा किलो। वापस लौटते समय किसी विचार में चल रहा था कि सामने किसी ने पच्च से थूंका। मैं थूंक से बाल-बाल बचा। देखने पर चार-पांच व्यक्ति नजर आये जो यह थूंकने की क्रिया कर सकते थे। उसके बाद सारा ध्यान थूंक केन्द्रित हो गया।

Friday, November 2, 2007

पिंग सेवायें - फीडबर्नर, चिठ्ठाजगत और ब्लॉगवाणी


एक ब्लॉगर की सबसे बड़ी तलब यह होती है कि जैसे ही वह पब्लिश बटन दबाये, उसकी पोस्ट फीड एग्रेगेटर पर तुरंत दिखे। फीड एग्रेगेटरों से बहुत से ब्लॉगरों की तल्खी इस मुद्दे पर देखी गयी है। यह पोस्ट इसी मुद्दे पर मेरे फुटकर विचार हैं। ई-पण्डित की तरह महारत नहीं है तकनीकी लेखन में - पर जो लिखा है सो झेल लीजिये।

आपने अपनी पोस्ट पब्लिश/अपडेट की हो तो आप चाहते हैं कि कुछ साइट्स; जैसे फीडबर्नर (अगर वह आपकी फीड का ठेकेदार है), तथा आपके पसन्दीदा फीड एग्रेगेटर्स उसे तुरत पकड़ लें।

फीडबर्नर के बारे में मैने पहले ही पोस्ट लिखी थी - नयी ब्लॉग पोस्ट को पिंग शहद चटायें। अगर आप की फीड फीडबर्नर से जाती है तो पहले फीडबर्नर को पिंग करें।

चिठ्ठाजगत:

इस पेज पर अंत के सब-हेडिंग ('दो सेकण्ड में लेख चिट्ठाजगत पर छापें') से मुझे पता चला कि चिठ्ठाजगत पर यदि आप पंजीकृत ब्लॉगर हैं और उसके मुख्य पृष्ठ पर जा कर अपने को लॉग-इन (सत्रारम्भ) कर देते हैं तो उसके खुले पेज पर सबसे ऊपर ऐसा दिखेगा -

Chittha

जो लाल रंग में आयताकार भाग मैने ध्यान खींचने के लिये बनाया है उसमें लिखा है- सारे अधिकृत चिठ्ठे अभी यहाँ खींचें। यह हाइपर लिंक है। इसपर क्लिक करने से आपके सभी पंजीकृत चिठ्ठों की फीड वह अपडेट कर देगा और आपकी नयी पोस्ट उसपर दिखने लगेगी| अपडेट दिखने में समय, चिठ्ठाजगत के अनुसार "Server की Connectivity के हिसाब से, कम से कम १ सेकण्ड, अधिक से अधिक १ घण्टा" लग सकता है।

ब्लॉगवाणी:

ब्लॉगवाणी पर यह सुविधा तो आपके ब्लॉग पर चिपकाये ब्लॉगवाणी लोगो पर क्लिक करने के माध्यम से उपलब्ध है। बस आप अपना ब्लॉग खोलें और ब्लॉगवाणी के आइकॉन पर चटका लगायें।

और अगर आप विण्डोज लाइवराइटर का प्रयोग करते हैं तो लाइवराइटर अपने Tools>Option>Ping Servers में एक ही जगह पिंग सर्वर के विवरण भरने की सुविधा प्रदान करता है। आप नीचे चित्र में ध्यानाकर्षण के लिये बनाये लाल आयताकार क्षेत्र को देखें।

Ping

उसका फायदा यह है कि आपके द्वारा पोस्ट पब्लिश करते ही फीड एग्रेगेटर पर आ जायेगी। बस आपको फीडबर्नर/ब्लॉगवाणी का अपने ब्लॉग को पिंग करने का URL पता करना और भरना पड़ेगा। ब्लॉगवाणी के पिंग URL के लिये आप अपने ब्लॉग पर लगे ब्लॉगवाणी के लोगो पर राइट क्लिक कर 'Copy Shortcut' या 'Copy Link Location' के विकल्प का चयन करें तथा उपयुक्त जगह पेस्ट कर दें।

अत: पोस्ट लिख कर उसके अपनी बारी से फीडएग्रेगेटर पर दिखाये जाने तक अंगूठा चूसते बैठे रहने की आवश्यकता नहीं। आप उपयुक्त कर्म करें और फल पायें।

(इस लेख में मेरी जानकारी बतौर उपभोक्ता ही है - अटकल और उपयोग पर एकत्रित। ज्यादा विशेषज्ञता हेतु तो ई-पण्डित या एग्रेगेटर वाले सज्जन बता सकेंगे। )


फुटकर खुराफाती बात
- आप अगर गूगल ब्लॉग सर्च में अपना ब्लॉग अपडेट डालना चाहते हैं, तो यहां पिंग करें।
पुनर्लेखन - आज मैने यह जांचा और पाया कि उक्त दोनो ब्लॉग एग्रेगेटरों ने फीड तुरंत अपडेट की इस पोस्ट के लिये!

Thursday, November 1, 2007

कलजुग केवल चुगद अधारा!


चुगद बहुत पवित्र शब्द है। महालक्ष्मी का वाहन। कलयुग में महालक्ष्मी अधिष्ठात्री देवी हैं। उनका वाहन माने प्रधानमंत्री जी छाप बड़मनई का ओएसडी (ऑफीसर ऑन स्पेशल ड्यूटी)। इस लिये फुरसतिया जब अपने को चुगद घोषित करते हैं तो मन करता है कि इंक ब्लॉगिंग की तकनीक के जरीये उनसे 'चुगद' का अप्वॉइण्टमेण्ट ऑर्डर जो महालक्ष्मीजी के दफ्तर से जारी हुआ होगा - देखने को मांगा जाये।

नालन्दा विशाल शब्द सागर -

चुग़द [संज्ञा पु.] (फा.) १- उल्लू पक्षी।

अभी-अभी करवा चौथ हो कर गया है। हर घर मे‍ चुगद की पूजा हो कर चुकी है। सुकुल इसलिये शायद करवा चौथ के मूड में थे जो स्वगान गा उठे - OWL फुरसतिया जी आप चुगद हैं। जब हम यह लिख रहे हैं, तब तक जलन के मारे 10 से ज्यादा (जो फुरसतिया का टिप्पणी लेवल का बेंचमार्क है) लोग उन्हे ललकार चुके हैं कि वे कैसे यह क्लेम कर सकते हैं कि वे चुगद हैं।

कुल मिला कर यह प्रथम दृष्ट्या प्रतीत होता है कि सुकुल जी का क्लेम जाली है - न तो वह स्वीकार होने जा रहा है, न ही उसके लिये कोई आर्बीट्रेटर बैठाया जायेगा। वे और कोई पक्षी अपने परिचय में चुन लें; चुगद तो प्राइज़-पोस्टिंग है - बड़ी जोड़ तोड़ से मिलती है। बहुत लॉबीइंग करनी होती है उसके लिये। अब देखिये रोनेन सेन कूटनेताओं को 'हेडलेस चिकेन' कहने के बाद भी प्रमाणित चुगद नहीं बन पाये और सुकुल अपनी ही घोषणा से बनना चाहते हैं।

नो-नो। नॉट अलाउड। कलयुग में चुगद ही मूल है, वही आधार है। उसपर फुरसतिया केवल लम्बी ब्लॉग पोस्ट लिख कर कब्जा कर लें; यह न नेचुरल जस्टिस है और न अननेचुरल जस्टिस।