Wednesday, March 14, 2007

वर्वर राव, इन्टर्नेट और वैश्वीकरण


वर्वर राव पर एक चिठ्ठा पढ़ा. वर्वर राव (या वारा वारा राव) को मैं पीपुल्स वार ग्रुप के प्रवक्ता के रूप में जानता हूं. सत्तर का दशक होता तो मैं उनका भक्त होता. उस समय जयप्रकाश नारायण में मेरी अगाध श्रद्धा थी. कालान्तर में जेपी को वर्तमान के समाजवादी पार्टी/आरजेडी/जेडी(यू) के वर्तमान नेताओं मे "मॉर्फ" होते देखा. उन नेताओं मे से बहुतों के पास "आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा सम्पत्ति" है. रूस का पतन, बर्लिन की दीवार का ढहना, बिहार/झारखण्ड/ओड़ीसा/आन्ध्र में नक्सली अराजकता आदि ने इस प्रकार के लोगों से मेरा मोहभंग कर दिया है.

मैं वर्वर राव को भ्रष्ट नहीं मानता. पर वे वर्तमान युग के काम के भी नहीं हैं.

वर्वर राव को महिमामण्डित करने वाले; समाजवाद/भूख/आदिवासी लाचारी/किसानों का भोलापन आदि को भावुकता तथा नोस्टाल्जिया की चाशनी में डुबो कर बढिया व्यंजन (लेख) बनाने और परोसने वाले लोग हैं. ऐसे लोग प्रिंट तथा टेलीवीजन पर ज्यादा हैं. मजे की बात है कि वैश्वीकरण के धुर विरोधी (वर्वर राव) का महिमामण्डन वैश्वीकरण के सबसे सशक्त औजार - इन्टर्नेट से हो रहा है! अल कायदा भी वैश्वीकरण के इस तंत्र का प्रयोग विश्व में पलीता लगाने के लिये करता है.

भावुकता तथा नोस्टाल्जिया मुझे प्रिय है. गुलशन नंदा को पढे जमाना गुजर गया - पर उनके नावलों में मजा बहुत आता था. वर्वर राव के बारे में वह मजा नहीं आता. उनपर पढ़ने की बजाय मैं गुरुचरण दास की India Unbound पढ़ना चाहूंगा. उसमें भविष्य की आशायें तो हैं!

(फुटनोट १: वर्वर राव को सामन्तवाद और उपनिवेशवाद से चिढ़ है; मुझे भी है. मनुष्य को दबाना कायरता है. पर वर्वर राव प्रासंगिक नहीं हैं.)

Monday, March 12, 2007

पत्थर पर प्रोफाइल


प्रोफाइल तराशने का काम केवल चिठेरे ही करते हों, ऐसा नहीं है. आज सवेरे की सैर के समय एक सवा बिस्से की जमीन पर बने घर के गेट पर लगे पत्थर पर जो लिखा देखा, वह किसी प्रोफाइल से कम नहीं है. अठारह साल में बने अपने ताज महल पर कितनी हसरत से पत्थर लगाया है इस सज्जन ने!

जरा चित्र देखें!

Saturday, March 10, 2007

टाटा डकैत तो नहीं है


अज़दक जी बहुत बढ़िया लिखते हैं. हमें तो लिखने का एक महीने का अनुभव है, सो उनकी टक्कर का लिखने की कोई गलतफ़हमी नहीं है. लेकिन सोचने में फर्क जरूर है. अपने चिठ्ठे में अजदक ने सिंगूर में टाटा के प्लान्ट के लिये हो रहे जमीन के अधिग्रहण को बदनीयती, धांधली, "जनता का पैसा लुटा कर जनहित का नाटक", जमीन का हड़पना (पढें - डकैती) आदि की संज्ञा दी है.

अब टाटा डकैत तो नहीं है.

पैसा कमाने के दो तरीके हो सकते हैं. एक है डकैती का. यह तरीका इस सिद्धान्त पर टिका है कि धन finite वस्तु है. अगर आपको पैसा चाहिये तो, वह जिनके पास है (व जो ताकतवर नही हैं), उनसे आपको बल पूर्वक छीनना होगा. अजदक के अनुसार यही हो रहा है. इस सिद्धान्त का प्रयोग चोर, पाकेटमार, डकैत, कालाबाजारी करने वाले और कई देश के नेता लोग (ज्ञात स्रोत से ज्यादा सम्पत्ति के मामले वाले लोग इसका उदाहरण हैं) करते है.

पैसा कमाने का दूसरा तरीका इस सिद्धांत पर टिका है कि पैसा असीमित है. उसी तरह जैसे प्रेम, दया, करुणा, प्रसन्न्ता आदि असीमित हैं. पैसा चाहिये तो वह करना होगा जिससे समग्र रूप से वह बढ़े. बिल गेट, टाटा और कई धनी इस सिद्धान्त से पैसा कमाते हैं.

समाजवाद मेरी समझ में नहीं आता. मान लीजिये आज आप पूरी दुनिया की सम्पदा सभी लोगों मे बराबर बांट दें. क्या होगा? कुछ समय के लिये आमोद-प्रमोद और सीधे consumption से जुडा व्यवसाय जूम कर जायेगा, पर दुनिया की समग्र अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जायेगी. दो साल बाद समग्र सम्पदा (जो आज की सम्पदा से कम होगी) फिर उसी अनुपात में बंट जायेगी, जिसमें आज है.

जरूरत धन के समाजवादी बंटवारे की नहीं, धन की समग्र मात्रा बढाने वालों की है. किसान को आप सशक्त बनायें पर टाटा को डकैत बता कर नहीं.

(डिस्क्लेमर - मैं टाटा के पे रोल पर नहीं हूं व टाटा मोटर्स के शेयर भी मेरे पास नहीं हैं. मैं मानवीय सहानुभूति किसानों से रखता हूं. पर उनका कल्याण किसमें है - इसका ब्लूप्रिन्ट मुझे स्पष्ट नहीं है.)

Friday, March 9, 2007

हताशा के पांच महीने बाद



समय सबसे बड़ी दवा है. साथ के चित्र में जो बुजुर्ग दिख रहे हैं वे पिछ्ली मई में हैजे से मरणासन्न थे. अस्पताल में इलाज हुआ तो पता चला कि समय पर चिकित्सा न होने से किडनियों ने काम करना बंद कर दिया है. इन्टेंसिव केयर में हफ़्ते भर और तीन महीने गहन चिकित्सा से किडनियां सामान्य हो पाईं. इधर किडनी ठीक हुयी तो इन बुजुर्ग ने बरसात से गीली जमीन पर पैर रखकर अपनी कूल्हे की हड्डी तोड ली. हड्डी का आपरेशन हुआ. डेढ महीने फ़िर बिस्तर पर रहे. अवसाद के गर्त में जा कर जीने की इच्छा शक्ति खो बैठे. फिर फिजियोथेरेपी ने कमाल किया. वाकर ले कर धीरे धीरे चलने लगे. कुछ मनोबल लौटा. महीने भर वाकर पर रहे. कुछ ताकत बढी तो छडी़ ले चलने लगे. दो महीने बाद छ्डी़ के बिना भी चलने लगे.

लेकिन इलाज की कहानी खत्म नही हुई. एक दिन घर के कुत्ते पर पैर रख दिया. कुत्ते ने काट खाया. डाक्टर की सलाह पर दो एन्टी रेबीज इन्जेक्शन लगे. कुत्ते पर पैर क्यों रखा; इसपर सोचा गया तो लगा कि आंख से शायद कम दिखता है. आंखों के चेक अप में निकला कि दोनो आंखों मे मोतियाबिन्द है. दो हफ़्ते पहले एक आंख का ऑपरेशन कराया गया. अब जब ठीक से दिखने लगा तो बुजुर्ग ने खुद कपडे़ के जूते खरीदे. उन्हे पहन कर सडक पर सवेरे की सैर को दो दिन से निकल रहे हैं. एहतियाद के लिये साथ में मेरा लड़का जाता है. जी हां; ये सज्जन मेरे पिताजी हैं.

अवसाद, हताशा और खुश जिन्दगी में कितने महीनों का अंतर होता है?

Tuesday, March 6, 2007

बहन मायावती की रैली


एक मार्च को लखनऊ में बहन मायावती की रैली थी. पहले वे सवर्णो को मनुवादी कहती थीं. उनके खिलाफ बोलती थीं. सामान्य लगती थीं. पर जब से उनकी पार्टी ने ब्राह्मणों को टैग किया है, तब से मामला क्यूरियस हो गया है. यूपोरियन राजनीति में क्या गुल खिलेगा; उसका कयास लगाना मजेदार हो गया है. सो, उनकी रैली कितनी धमाकेदार रहती है - यह जानने की उत्कंठा मन में थी. मायूसी तब हुई जब उस दिन अखबारों के नेट संस्करण ने रैली को खास भाव नही दिया. अगले दिन अमर उजाला (जो मेरे घर आता है) ने रैली को पेज तीन पर कवर किया. वह भी ब्लैक-ह्वाइट चित्र के साथ.
इस रैली के लिये रेल से भी लोग ले जाये गये थे. दर्जन से भी ज्यादा स्पेशल रेलगाडियां (पूरा किराया देकर) लखनऊ गई थीं. बसों का इन्तजाम तो बेतहाशा था. यह सब पेज तीन पर कवरेज के लिये? इतना कवरेज तो बेमौसम सूखी प्रेस-रिलीज पर भी मिल जाता है. शहर के किसी कोने में तथाकथित एनकाउन्टर को भी पेज तीन पर कलर फोटो के साथ जगह मिलती है.
सब कुछ गड़बड़ सा हो रहा है. इन्फ्लेशन बढ़ रहा है. सीमेण्ट वाले दाम कम करने की हिदायत के बावजूद दाम बढ़ा देते हैं. पंजाब व उत्तराखण्ड में बिना जोर लगाये विपक्ष जीत जाता है. बिहार के कार्यकाल के बिल्कुल उलट, लालू जी रेल में २०,००० करोड़ रुपये का मुनाफा दिखाते हैं. सेन्सेक्स गिरे जा रहा है...
लोग कयास लगा रहे हैं कि मुलायम गये और मायावती आईं. लोगों का कयास रैली के ल्यूकवार्म कवरेज से गड़बड़ाता नजर आता है.
यूपोरियन इलेक्शन को लेकर कई सवाल हैं. क्या मायावती "क्रिटिकल मास" जुटा पायेंगी? क्या उनके बन्दे - विशेषकर सवर्ण - चुनाव बाद जीतकर भी साथ रहेंगे? क्या भाजपा या कॉग्रेस डार्क हॉर्स साबित होंगे? गेंगेस्टर-ब्रिगेड चुनाव आयोग को ठेंगे पर रख सकेगी? क्या बाजार का चमत्कार/बेरोजगारी/"बाबालोगों" की चमकती इमेज फर्क डाल सकेंगे? और कितना?
मुझे लगता है कि चिठेरा समुदाय इन मसलों पर अपनी व्यक्तिगत/सामुहिक राय जरूर रखता होगा. एक बहस बहन मायावती पर चलेगी जरूर! बहनजी (व लालूजी) ऐसे लीडर हैं, जिनके प्रति आप उदासीन भाव तो रख ही नहीं सकते.

Monday, March 5, 2007

चिठेरी (हिन्दी ब्लॉगरी) और विवादास्पद होने का पचड़ा.


ब्लॉगिन्ग की दुनिया की ताकत मुझे तब पता चली थी, जब हजरत मुहम्मद पर कार्टून बनाने के कारण मौत का फतवा दिया जा चुका था. मै वह कार्टून देखना चाहता था. प्रिन्ट और टीवी तो ऐसे पचडे़ में पड़ते नहीं. इन्टर्नेट पर मसाला मिला. भरपूर मिला. ज्यादातर ब्लॉगरों के माध्यम से मिला. ब्लॉगरों के प्रति मेरी इज्जत बढ़ गई.

हिन्दी के चिठेरों में वह जज्बा देखने को नही मिलता. अभी तो सब भूख, गांव की मड़ई, कवितायें, हिन्दुस्तान की बदहाली जैसे नान-कन्ट्रोवर्शियल मुद्दों पर की-बोर्ड चला रहे हैं. कैसे वो तकनीकें जानें जिससे उनका चिठ्ठा चमक सके और उसपर ढेरों क्लिक हों - यही मुख्य जद्दोजहद है. भारत में भी कन्ट्रोवर्शियल मुद्दों पर बहुत कमेंट होते है. रिडिफ पर Francois Gautier के लेख पर जम कर प्रतिक्रियायें थीं.

सो ऐसा नही है कि यह सब हिन्दी में नही लिखा जा सकता. वह भी देर-सवेर होगा. असल में बकौल थॉमस फ्रेडमेन ("The World is Flat") फ्लेट होती दुनिया पहले चकाचौंध करती ही है. हम हिन्दी चिठेरों को अभी तो हिन्दी में फ्लैट दुनियां का नजारा मिला है. जब कुलाचें भरने से जी थक जायेगा, तब Francois Gautier जैसे लेखक भी हिन्दी में आयेंगे. तब हिन्दी चिठेरी हिन्दीवाद-समाजवाद-रूमानियत से उबर कर विश्ववाद में प्रवेश कर जायेगी. वह दिन दूर नहीं है. (कृपया ये लिंक ट्राई करें - Francois Gautier on Rediff  व  Francois Gautier पर मेरा ब्लॉग.)

Saturday, March 3, 2007

नेकी, दरिया और भरतलाल पर श्री माधव पण्डित


भरतलाल शर्मा का केस आपने देखा. हम सब में भरतलाल है. हम सभी अपनी माली हैसियत दिखाना चाहते हैं. हम सब में सामाजिक स्वीकृती और प्रशंसा की चाह है. हम सब समाज के हरामीपन (जो मुफ़्त में आपका दोहन करना चहता है) से परेशान भी हैं.

जब कभी द्वन्द्व में फसें, तब बड़े मनीषियों की शरण लेनी चहिये.

ऐसे में, मुझे माधव पंड़ित की सुध हो रही है. वे श्री अरविन्द आश्रम, पॉण्डिच्चेरी से जुडे़ संत थे. अनेक ग्रंथ हैं उनके. मैं जिस पुस्तक की चर्चा करना चहता हूं, वह छोटी सी है - लाइफ ब्युटीफुल (सुन्दर जीवन). इस सवा सौ पेज की किताब में १२ पेज का खण्ड है - लेसंस इन माई लाइफ. इस खण्ड में ४ छोटे-छोटे लेख हैं. ये लेख श्री पंडित ने एक मित्र के विशेष आग्रह पर लिखे थे. ये लेख अत्यन्त सरल भाषा में हैं. इन लेखों में बहुत कुछ है जो भरतलाल के सिण्डरॉम की दवा है. कुछ अंश देखें:

  1. कभी अपनी वस्तुयें (विशेषकर पैसा) अपने मित्रों और संबंधियों (विशेषकर संबंधियों) को उधार न दें. यद्यपि इन मामलों में पहले हार्दिक धन्यवाद व्यक्त होगा, पर बाद में लौटाते समय सामान्यत: अनिच्छा व कड़वाहट होगी जो संबंधों को तनावग्रस्त कर देगी. अगर आप उपकृत करने की दशा में हैं तो उपहार दें, पर उधार न दें.

  2. रिश्ते स्थायी नहीं होते. हम सोचते हैं कि मित्रता शाश्वत रहेगी, पर वैसा नहीं होता. इसी प्रकार दुश्मनी भी शाश्वत नहीं होती. अत: दुश्मन से व्यवहार में यह ध्यान रखो कि वह आपका मित्र बन जायेगा. और मित्र में भविष्य के शत्रु की संभावनायें देख कर चलो.

  3. दूसरों से अपनी परेशानियों व समस्याओं कीचर्चा उनकी सहानुभूति तथा सहयोग पाने के लिये न करें. एक रिटयर्ड अमेरिकन एडमिरल की सीख पर ध्यान दें - जिनसे आप अपनी तकलीफों की चर्चा करते हैं, उनमें से आधों को कोई फ़िक्र नहीं कि आप पर क्या गुजरती है. शेष आधे लोग उससे बहुत प्रसन्न होते हैं.

  4. यह आम बात है कि हम जिनकी सहायता करते हैं, वे बहुधा हमारे लिये परेशानियां खड़ी करते हैं. हमें लगने लगता है कि इनसे अच्छे वे हैं, जिनके लिये हमने कुछ भी नहीं किया. शायद सहायता पाने वाले की चेतना का कोई अंश ऋणी नहीं होना चाहता. और सहायता करने वाला अगर पाने वाले की कृतज्ञता व धन्यवाद पर अपना हक जमाने लगे तो स्थिति और खराब हो जाती है. अत: नेकी कर दरिया में डालना ही अच्छा है.
  5. बिना कुछ दिये कुछ पाने का सिद्धांत विज्ञापनों में ही सच होता है, वस्तविक दुनिया में नहीं. कुछ पाने के लिये कीमत अदा करनी पड़ती है - हर क्षेत्र में व हर समय. ज्ञान प्राप्त करना हो तो अध्यन करना ही पड़ेगा.शरीर सुगठित बनाना है तो व्यायाम करना ही पडे़गा. अपने ध्येय के लिये आपको कार्य अवश्य करना होगा.

श्री माधव पंडित के उक्त सबक आपको सोचने को बाध्य करते हों तो आप "भरतलाल सिण्डरॉम" की दवा पा जायेंगे.
(चित्र - श्री माधव पंडित, इन्टरनेट से उतारा हुआ)

हरिश्चंद्र - आम जिन्दगी का हीरो


आपकी आँखें पारखी हों तो आम जिन्दगी में हीरो नजर आ जाते हैं. च्यवनप्राश और नवरतन तेल बेचने वाले बौने लगते है. अदना सा मिस्त्री आपको बहुत सिखा सकता है. गीता का कर्म योग वास्तव के मंच पर घटित होता दीखता है.
आपकी आँखों मे परख हो, बस!

हरिश्चंद्र पिछले महीने भर से मेरे घर में निर्माण का काम कर रहा था. उसे मैने घर के addition/alteration का ठेका दे रखा था. अनपढ़ आदमी होने पर भी मैने उसमें कोई ऐब नहीं पाया. काम को सदैव तत्पर. काम चाहे मजदूर का हो, मिस्त्री का या ठेकेदार का, हरिश्चंद्र को पूरे मनोयोग से लगा पाया.

आज काम समाप्त होते समय उससे पूछा तो पता चला कि उसने मजदूरी से काम शुरू किया था. आज उसके पास अपना मकान है. पत्नी व दो लड़कियां छोटी सी किराने की दुकान चलाती है. बड़ी लड़की को पति ने छोड़ दिया है, वह साथ में रहती है. पत्नी पास पड़ोस में ब्यूटीशियन का काम भी कर लेती है. लड़का बारहवीं में पढता है और हरिश्चंद्र के काम में हाथ बटाता है.

मेहनत की मर्यादा में तपता, जीवन जीता - जूझता, कल्पनायें साकार करता हरिश्चंद्र क्या हीरो नहीं है?

भरतलाल की सगाई


भरतलाल शर्मा मेरा सरकारी भृत्य है. उसकी अस्थाई नौकरी लगते ही गांव-देस में उसकी इज्जत बढ गई. पांच हजार की पगार की स्लिप उसने गर्व से सबको दिखाई. सब परिजन-दुर्जन कर्जा मांगने में जुट गये. उसके भाई जो उससे बेगार कराते थे और उसकी सारी मजदूरी हड़प जाते थे, अब उससे हक से/बेहक से पैसा मांगने लगे. बिना मां-बाप का भरतलाल इतना अटेंशन पाकर कुप्पा होगया. लिहाजा बचत का बड़ा हिस्सा धर्मादे में जाने लगा. जो कर्जा उसने दिया उसे कोई चुकाने का नाम ही नही लेता.

सरकारी नौकरी - जो देर सबेर पक्की होने वाली हो, लड़के को जवान होती लड़की के मां-बाप का आदर्श बना देती है. सो पड़ोस की लड़की से बात भी पक्की हो गई. सगाई के समय तक भरतलाल गांव के लोगों को पैसे बांटते-बांटते तंग हो गया था. सगाई में खर्चे की बात आई तो सब किनारा कर गये. उल्टे, भरतलाल को इस बात पर ब्लैकमेल भी करने लगे कि वे सगाई में न आ सकेंगे.

सगाई का पूरा इन्तजाम-खर्च भरतलाल ने किया. परिजनों ने उसे सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करने की कस कर कीमत वसूली. सारे आये. ठसक कर आवभगत कराई. गांव मे शहर के स्टाइल का ३०० लोगों का भोज भी भरतलाल के खर्चे पर डकारा. सब की मदद करने वाला भरतलाल १५-२० हजार रुपये के नीचे उतर गया. लगभग इतना ही पैसा उसने लोगों को मुसीबत के समय बिना ब्याज के कर्ज दिया था, जो लोगों ने उसका काम पड़ने पर नहीं लौटाया. भरतलाल अब यदा कदा अवसाद से ग्रस्त रहता है, कुछ बुदबुदाता रहता है.

भरतलाल भोन्दू नहीं है. भरतलाल संवेदनशील जीव है. उसकी संवेदना गांव का हरामीपन मारे दे रहा है. गांव का हरामीपन और भरतलाल की संवेदना किस सीमातक जाते हैं, यह देखने की बात होगी.

Thursday, March 1, 2007

शेयर मार्केट धड़ाम



उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है - भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता.


चीनी के शेयर अर्से से धडाम हैं. मुझे शरद पवार की सेहत की सलामती और एथेनाल की स्टोरी पर भरोसा है. मुझे यह भी भरोसा है कि देर सबेर पेट्रोल के दाम बढेंगे ही. चीनी भी कब तक कड़वी रहेगी. इसी तरह टाटा का कोरस का सौदा भी रंग लायेगा. हीरो होण्डा की बाइक बिकेगी. महाराष्ट्र स्कूटर की जमीन चमकेगी....


शेयर बाजार धड़ाम होता है, चढने के लिये. असली चीज आशावाद है. मैं मुन्ना का टानिक लेना छोड़ूंगा नहीं.

(फोटो - २८ फरवरी का गंगा तट पर आशावादी सवेरा)