Monday, October 6, 2008

एस्केलेटर चढ़ने की झिझक


Escalator एस्केलेटर के पास खड़े होकर लोगों को देखना एक नॉन-बौद्धिक कौतूहल पैदा करता है। बौद्धिक कौतूहल वह जो आपको रचनात्मकता की दिशा में सहायता करे। नॉन-बौद्धिक कौतूहल वह जो आपको पोस्ट ठेलने को प्रेरित करे। विशुद्ध पोस्ट ठेलक खुजली जेनरेट हुई बाजार में उस एस्केलेटर पर होने वाली गतिविधियां देख कर।

सुना है इलाहाबाद महानगर छाप हो रहा है। पर एस्केलेटर पर लोग ऐसे चढ़ते हैं मानो एक अजूबा हो। एक लड़की झिझक में अपने मित्रों से पीछे छूट गयी है। उसके साथ वाली आगे चढ़ गयीं और वह वैतरणी कैसे पार करे वाला असमंजस लिये है। मेरी पत्नी से वह लड़की आग्रह करती है – आण्टीजी मुझे अपने साथ पार करा दो। मेरी पत्नीजी स्वयं असमंजस में हैं, वे कहती हैं – मैं तो खुद हिम्मत बना कर चढ़ रही हूं; तुम्हें क्या साथ ले चलूं! इतने में उसकी सहेली वापस आ कर उसे साथ ले चलने को तत्पर हो जाती है।

कुछ स्त्रियां और बच्चे धड़ाके से चढ़ते हैं। बावजूद इसके कि स्त्रियां नकाब में हैं। मैं उनके आत्मविश्वास से प्रभावित होता हूं। शायद इस शॉपिंग मॉल में रेगुलर आने वाले जीव हैं ये। बच्चे तो एस्केलेटर में भी चहलकदमी में एक दो सीढ़ियां फलांगते नजर आते हैं।

एक मोटी सी औरत एक पतले से हसबेण्ड (जाहिर है, उसी का है) का हाथ कस कर थामे एस्केलेटर में चढ़ती आती नजर आती है। विशुद्ध फिल्मी सीन है – रोमांटिक या कॉमिक – यह आप तय करें। औरत के भय और झिझक को देख कर मन होता है कि उनका फोटो ले लिया जाये। पर मैं महिला का कद्दावर शरीर देख अपने आपको कण्टोल करता हूं। उनके पीछे ढेरों चहकती बालिकायें हैं। किसी स्पोर्ट्स टीम की सदस्य सदस्यायें। कुछ जीन्स में हैं, कुछ निक्कर छाप चीज में। कोई झिझक नहीं उनमें। गजब का आत्मविश्वास और फुर्ती है। मुझे फोटो खींचना याद ही नहीं रहता।

मन होता है कि इस जगह को दो साल बाद भी देखूं। आज से उस समय की एस्केलेटर चढ़ने की तुलना बतायेगी कि शहर कितना और शहरी बना!

(घर आ कर अपनी अम्माजी से चर्चा करता हूं, तो उनसे एक और असमंजस व्यक्त करता रिस्पॉन्स मिलता है – के जाइ ओहमें! फंसि जाइ त ओही में पेराइ जाइ! (कौन जाये उस एस्केलेटर पर। फंस जाये तो मशीन वहीं पेर दे शरीर को!))  

अनूप शुक्ल की टिप्पणी -
लोग न जाने आपको क्यों बदनाम किये हैं कि आप विविधता वाली पोस्ट लिखते हैं। हम तो ये देखते हैं कि जैसे लोग देश की सारी गड़बड़ी का ठीकरा फ़ोड़ने के लिये नेता का सर तलाशते हैं वैसे ही आजकल आप इधर-उधर न जाने किधर-किधर से तार जोड़कर ब्लागिंग के मेन स्विच में घुसा दे रहे हैं।
प्रति टिप्पणी – ब्लॉगिंग के मेन स्विच का फ्यूज तो नहीं उड़ रहा न उससे! जब फ्यूज इण्टैक्ट है तो क्या फिक्र कि लोड कितना और कैसा है। यह कहां से तय हुआ कि पारम्परिक, प्री-डिफाइण्ड लोड ही डाला जायेगा ब्लॉगिंग सरक्यूट पर? 
@@@@@

danish एक भूतपूर्व सिमी के संस्थापक सदस्य और आज के हमदर्द विश्वविद्यालय के अध्यापक श्री इश्तियाक दानिश का टाइम्स ऑफ इण्डिया में कथन:
हिन्दू-मुसलमानों में सबसे बड़ा रोग है - एक दूसरे के धर्म और संस्कृति के बारे में बराबर की पाली गयी अज्ञानता।
मैं इस कथन से तनिक भी कम सहमत नहीं हो सकता। पर इसका अर्थ यह न लगाया जाये कि मैं दानिश जी का मुरीद हूं।

27 comments:

  1. दानिश के मुरीद हम भी नहीं मगर सहमत हूँ फिर भी.

    एस्केलेटर भी भारत के बड़े शहरों याने महानगरों को छोड़ कर अभी स्थापन के दौर में है और समृद्धि का मानक बना हुआ है और उस पर सहजता से चढ़ने वाले समृद्ध.

    आप छोटी छोटी आम बातों को बहुत खूबी से कलमबद्ध करते हैं, शायद यही आपके लेखन की खूबी है.

    ReplyDelete
  2. आप ने ये कैसे मान लिया कि मोटी सी औरत उस पतले हसबैण्ड की ही थी :) कहीं लगता है पहले भी सामना हो चुका है ऐसे ही किसी जोडी-पाडी से :) अच्छी पोस्ट।

    ReplyDelete
  3. अजी ऐस्केलेटर की धीरे धीरे आदत हो ही जायगी ..ये आधुनिकता की आँधी है ..
    "चली चली फिर चली चली चली,
    आधुनिकता की हवा चली "
    और दानिश जी ने बात तो सही कही .
    .पर उपाय नहीँ बताया ?
    आपसी सहयोग और भाईचारे का ?
    - लावण्या

    ReplyDelete
  4. येसे सीन दिल्ली में भी भौत मिलते हैं। वैसे ये इस्केलेटर हैं मजे की चीज। दानिश साहब बात तो सही कह रहे हैं,पर मसला वही है कि यह हो कैसे। यह काम आसान नहीं है। इतने सालों में नहीं हो पाया है। आगे हो पाया है, ऐसी उम्मीद ही की जा सकती है।

    ReplyDelete
  5. आज हल्के-फुल्के मूड में लगते हैं गुरुदेव...। आनन्द आ गया। सण्डे को ‘बड़ा बाजार’ खुला था क्या?

    एक दूसरे के धर्म के बारे में जानने का एक साधन यह चिठ्ठा-जगत भी हो सकता है। क्या ख़याल है?

    ReplyDelete
  6. धीरे धीरे लोग आदी हो जाएंगे।
    यहाँ तो कई जगह एस्कलेटर हैं।
    मुझे याद है पहले लोग लिफ्ट से डरते थे लेकिन अब नहीं डरते।
    बिजली चली जाने पर एस्कलेटर में कोई फँसता नहीं।
    महिलाओं को लिफ्ट में किसी अजनबी मर्द के साथ अकेले रहने में संकोच होता था। एस्कलेटर में यह डर नहीं रहता।

    Quote
    ------------------
    बच्चे तो एस्केलेटर में भी चहलकदमी में एक दो सीढ़ियां फलांगते नजर आते हैं।
    ---------------------
    Unquote

    मुझे कुछ बच्चों की याद आती है जो एक बार ऊपर पहुँचते ही झट से नीचे आते थे ताकि फर ऊपर चढ़ने का मज़ा उठा सकें।

    ReplyDelete
  7. हम तो रोज ही २-३ बार चढ़ते उतरते हैं, इतनी तन्मयता से कभी नही देखा या हो सकता है ऐसा दृश्य नही देखा

    ReplyDelete
  8. एसकेलेटर को आपने बहुत सूक्षम नजर से देखा ! बिल्कुल ये का ये नजारा हर माल में होता है ! हां मोटी औरत और बारीक मर्द की जगह पात्र बदल जाते हैं ! बहुत धन्यवाद !

    ReplyDelete
  9. जब नया आता है तो अचंभा और खेल दोनों होता है। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन रोज कुछ नए तो होंगे ही इस लिए ये दृश्य दो साल बाद भी दुर्लभ नहीं होंगे।

    ReplyDelete
  10. एक घटना सुनती हूँ मैं दक्षिन भारतीय के खाने की तलाश में हल्दी राम के बालीगंज (कोल्कता ) के ठिकाने पर गई थी १२ -१३ साल की एक बच्ची चलंत सीढ़ी के पास आई और घबराती हुई कदम आगे बढाया उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया और वाह वापस मुड गई ..थोडी देर बाद सीढियाँ रुक गई क्योंकि निश्चित समय तक कोई नही चडा था (उसमे सेंसर लगे थे ) ..वह लड़की रुका देखकर खुस हो गई फ़िर वापस आई पर जैसे ही वह १ मीटर के दायरे पर पहुँची सीढियाँ फ़िर चल पड़ी ..ऐसा करीब ३ -४ बार हुआ अंत में मैंने उसे हाँथ पकड़ कर पार करा दिया .

    ReplyDelete
  11. एसकेलेटर के आस-पास ऐसा नजारा अक्सर देखने को मिल जाता है फ़िर वो चाहे बड़ा शहर हो या छोटा । :)

    ReplyDelete
  12. हम भी टिप्पडी करेंगे। हम एक उपभोक्ता हैं इस ब्लॉग जगत के ! टोटल १००% और हमें पूरा यकीन है हमारे जैसे और भी होंगे जो सिर्फ़ पढ़ते हैं, न लिखते हैं न टिप्पडी करते हैं।
    एस्केलेटर पोस्ट ने उस दिन की याद करा दी जब पिताजी बम्बई (उन दिनों बम्बई ही कहते थे ) में एयर इंडिया की बिल्डिंग में खास एस्केलेटर दिखाने और उस पे चढ़ने के लिए ले गए थे। सन तेरासी में पहली बार ऑटोमेटिक जीना देखा था ।
    तो आप लिखते रहिये, हम क्रिटिक तो हैं नही बस इत्ता कह सकते हैं की आपका लिखा, पढ़ना अच्छा लगता है।
    राजेश बाजपेयी

    ReplyDelete
  13. एस्केलेटर चढ़ने की तुलना बतायेगी कि शहर कितना और शहरी बना!
    यह गजब कहा. बड़ा कारगर तरीका होगा.


    दानिश का कहना सही है. वैसे अन्य धर्मो के बारे में कितना जानते है? फिर भी राड नहीं. यानी झगड़ना हो तो जानना न जानना एक बराबर.

    ReplyDelete
  14. नहीं बहुत ही कम होंगे दानिश जी के मुरीद पर ये जरूर है कि इस बात के मुरीद लाखों होंगे। और
    एक मोटी सी औरत एक पतले से हसबेण्ड (जाहिर है, उसी का है)हां भई ये तो जग जाहिर है। पढ़ते के साथ ही हंसी आई इसलिए लिख दिया।

    ReplyDelete
  15. एक सीधी साधी रोचक पोस्ट...
    नीरज

    ReplyDelete
  16. मैने ये अर्थ नही लगाया की आप दानिश के मुरीद है.. पर ठीक कहना है उनका भी..

    वैसे आज की पोस्ट बढ़िया रही.. प्रति टिप्पणी यहा भी शुरू?

    ReplyDelete
  17. आप अभी तक प्रायः दो दो असंबंध पोस्ट एक साथ देते रहे हैं -आज यह तीन की संख्या में है -हम टिप्पणी कारों पर तनिक रहम तो क्या करें -अब आप ही बताईये कस्मै पोसटाय टिप्पणी विधेम ! चलिए अभी तक तो पोस्ट लेखन की प्रकृति का कोई अन्तिम मानदंड तो तय नहीं हुआ है -और करेगा भी कौन नर पुंगव ! वैसे ऐसा मुगालता कुछ लोगों में दिखता है .पर वे भी समय के प्रवाह में हाशिये पर आते जा रहे हैं -इसलिए ठेलते ज्ञान जी जो कुछ आयं शायं मन में आता रहे -आपकी पोस्ट्स में एक मौलिकता तो होती है -आप इलाहाबाद वाले एक्सलेटर पर अभी चढ़े या नहीं ?

    ReplyDelete
  18. क्या यार, आप भी न… अच्छे और सही मौके पे फोटो खींचना ही भूल जाते हो ;)

    एस्केलेटर पे चढ़ते समय हमहू झिझके थे। और इ सब सीन अभी हमरे शहर मा नवा नवा खुले मॉल में रोज्जै दिखता है।

    श्रीमान दानिश जी के इस कथन से असहमत हुआ ही नही जा सकता।

    ReplyDelete
  19. एस्केलेटर ना बाबा ना हम ओर हमारे बच्चे तो सीढीयो से चढ कर बहुत खुश होते है, लिफ़्ट भी ३,४ मंजिल जाना हो तो ना बाबा ना.
    डरते नही, लेकिन यहां ज्यादातर ड्रा० लोग राय देते है एस्केलेटर ना बाबा ना
    आप का एस्केलेटर बहुत रोचक लगा,वेसे वो मोटी ओरत ओर बरीक आदमी .....
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  20. ammaaji ne sahee to kahaa
    घर आ कर अपनी अम्माजी से चर्चा करता हूं, तो उनसे एक और असमंजस व्यक्त करता रिस्पॉन्स मिलता है – के जाइ ओहमें! फंसि जाइ त ओही में पेराइ जाइ! (कौन जाये उस एस्केलेटर पर। फंस जाये तो मशीन वहीं पेर दे शरीर को!))

    ReplyDelete
  21. चूंकि आप 'ब्‍लाग गुरु' हैं और भाई लोग, जाने-अनजाने ही आपकी बनाई पगडण्‍डी पर चलते हैं इसलिए पोस्‍ट की विषय वस्‍तु से अलग हट कर एक निवेदन करने का मुर्खतापूर्ण दुस्‍साहस कर रहा हूं ।
    आपने 'सदस्‍याएं' शब्‍द प्रयुक्‍त किया है । कृपया ऐसे उपयोग पर पुनर्विचार करने का उपकार करें । तनिक विचार कर देखिएगा -'सदस्‍य' होता तो अधिक ठीक होता ।
    अन्‍यथा लगे तो इस 'नौसिखिया ब्‍लागर' को क्षमा करने की उदारता बरतिएगा ।

    ReplyDelete
  22. @ विष्णु बैरागी जी - आपने जो कहा, वह सही है। मैं त्रुटि सुधार कर रहा हूं। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  23. दानिशजी का मुरीद होने में कोई बुराई नहीं । जैसे ही उन्‍होंने देखा कि 'सिमी' अपने लक्ष्‍य से भटक गया है और वे उस पर से अपना नियन्‍त्रण खो चुके हैं, उन्‍होंने अपने आप को 'सिमी' से अलग कर दिया - विधिवत घोषणा करते हुए । धर्मान्‍धता के लिए बदनाम हो चुके इस्‍लाम में यह अपने आप में अत्‍यधिक साहस भर कदम है ।

    ReplyDelete
  24. देर आये पर दुरूस्त आये कि तर्ज पर टिप्पणी कर रहा हूँ :-)

    आज से लगभग १६-१८ वर्ष पहले (जब हम कक्षा ४-६ में हुआ करते होंगे) का किस्सा है । हर साल गर्मियों की छुट्टियों में मथुरा जाना होता था और वहाँ कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में केनरा बैंक के पास लिफ़्ट लगी हुयी थी । वो शायद ३-४ मंजिल तक जाती थी और कुल पचास पैसे का टिकट था । मैं और मेरी बहन भी कई बार शौक शौक में गये । कई बार माताजी ने किस्से भी सुनाये कि कैसे बिजली चले जाने पर बीच में फ़ंसे रह जाते हैं लेकिन हम डरे नहीं :-) उस समय बहुत से लोग कौतूहल से टिकट लेकर देखते थे कि क्या बला है । पता नहीं अब भी देखते होंगे क्या?

    एक और किस्सा भी याद आ रहा है । लगभग १८ साल पहले जब मेरे मामाजी लंदन गये थे तो दिल्ली हवाई अड्डे पर उन्हे छोडने हम सब गये थे । और वहाँ अपने ममेरे भाई बहनों के साथ हम लोगों ने लिफ़्ट की बोले तो रेल बना दी थी :-) नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे । इसी से याद आया तब कितना खाली था हवाई अड्डा, बहुत कम लोग थे ।

    एस्केलेटर से लगता है फ़्रेंच लोग बहुत डरते हैं, कारण है कि दो बार पेरिस हवाई अड्डे पर एस्केलेटर बन्द दिखे, सीढी चढ के जाना पडा । ये भी हो सकता है कि बिजली चली गयी हो :-)

    हमारी एस्केलेटर पर चढ के सीढियाँ चढने की आदत अभी भी नहीं गयी है । नार्मल सीढियों पर एक के बदले दो सीढियाँ चढने की आदत भी अभी कायम है । तीसरी आदत जो ३-४ सीढियाँ बाकी रहते (नीचे आते समय) छलांग लगाने की थी अब नियंत्रण में है लेकिन ४-६ महीने में एक बार उसे भी पूरा कर ही लेते हैं ।

    काफ़ी लम्बी टिप्पणी हो गयी है लेकिन नियमित पाठकों को इतनी छूट तो होगी ही :-)

    ReplyDelete
  25. gyandutt ji apne theek kaha hai. aap eskelater par meri ek kavita anubhuti-hindi.org ke taje ank me dekhiyega.
    tasleem ahmed

    ReplyDelete
  26. मैकडोनाल्ड में देसी बच्चे वाली ही बात है... दो साल में तो सब बदलना ही है.

    ReplyDelete

आपको टिप्पणी करने के लिये अग्रिम धन्यवाद|

हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणियों का स्वागत है|
--- सादर, ज्ञानदत्त पाण्डेय