Friday, November 14, 2008

मिडलाइफ क्राइसिस और ब्लॉगिंग


मुझे पीटर ड्रकर का “मैनेजिंग वनसेल्फ” (Managing Oneself) नामक महत्वपूर्ण लेख बारम्बार याद आता है। आप इस हाइपर लिंक के माध्यम से यह लेख डाउनलोड कर सकते हैं। पर डाउनलोड करने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस लेख को पढ़ना है।

मैं यहां यही कहना चाहता हूं कि अगर आपको सेकेण्ड कैरियर के लिये सप्ताह में १०-१२ घण्टे का सार्थक काम तलाशना हो, और उसमें पैसा कमाने की बाध्यता न हो, तो ब्लॉगिंग एक अच्छा ऑप्शन बन कर सामने आता है।

इस लेख के उत्तरार्ध में पीटर ड्रकर जिन्दगी के दूसरे भाग की बात करते हैं। लाइफ स्पान बढ़ते जाने और श्रमिक की बजाय नॉलेज वर्कर के रूप में अधिकांश लोगों द्वारा जीवन व्यतीत करने के कारण दूसरा कैरियर बहुत महत्वपूर्ण होता जा रहा है। मैं उनके लेख का एक अंश अनुदित कर रहा हूं -

“मिड-लाइफ क्राइसिस” से अधिकाधिक एग्जीक्यूटिव्स दो चार हो रहे हैं। यह अधिकतर बोरडम (boredom – नीरसता) ही है। पैंतालीस की उम्र में अधिकांश एग्जीक्यूटिव्स अपनी बिजनेस कैरियर के पीक पर महसूस करते हैं। बीस साल तक लगभग एक ही प्रकार का काम करते करते वे अपने काम में दक्ष हो गये होते हैं। पर वे उत्तरोत्तर अपने काम से न संतोष और चुनौती पाते हैं और न बहुत महत्वपूर्ण कर पाने का अहसास। और फिर भी उनके आगे २० से २५ साल और होते हैं, जिनमें उन्हें कार्यरत रहना है। यही कारण है कि आत्म-प्रबन्धन आगे और भी दूसरी कैरियर के बारे में सोचने को बाध्य करने लगा है।

peterdrucker आप दूसरी कैरियर के बारे में ड्रकर के विचार जानने के लिये उनका लेख पढ़ें। मैं यहां यही कहना चाहता हूं कि अगर आपको सेकेण्ड कैरियर के लिये सप्ताह में १०-१२ घण्टे का सार्थक काम तलाशना हो, और उसमें पैसा कमाने की बाध्यता न हो, तो ब्लॉगिंग एक अच्छा ऑप्शन बन कर सामने आता है। पीटर ड्रकर ने जब यह लेख लिखा था, तब ब्लॉगिंग का प्रचलन नहीं था। वर्ना वे इसकी चर्चा भी करते।

उत्तरोत्तर मैं साठ-पैंसठ से अधिक की उम्र वालों को हिन्दी ब्लॉगरी में हाथ अजमाइश करते देख रहा हूं। उस दिन बृजमोहन श्रीवास्तव जी हाइपर लिंक लगाने की जद्दोजहद से दो-चार थे। वे बहुत अच्छा लिखते हैं। एक अन्य ब्लॉग से मैने पाया कि ७१ वर्षीय श्री सुदामा सिंह हिन्दी ब्लॉगरी को ट्राई कर रहे हैं। कई अन्य लोग भी हैं।

ड्रकर के अनुसार जीवन के दूसरे भाग के प्रबन्धन के लिये जरूरी है कि आप दूसरे भाग में प्रवेश से बहुत पहले वह प्रबन्धन करने लगें। पर हमने तो मिडलाइफ क्राइसिस की झेलियत के बाद ब्लॉगरी को काम की चीज पाया। ट्रेन हांकने में पाये तमगे जब महत्वहीन होने लगे तो लेटरल कार्य ब्लॉगिंग में हाथ आजमाइश की। सारी शंका-आशंकाओं के बावजूद अभी भी इसे मिडलाइफ क्राइसिस का सार्थक एण्टीडोट मानने का यत्न जारी है।

आप भी सोच कर देखें।      


Thursday, November 13, 2008

सोंइस


Map picture

कल पहाड़ों के बारे में पढ़ा तो बरबस मुझे अपने बचपन की गंगा जी याद आ गयीं। कनिगड़ा के घाट (मेरे गांव के नजदीक का घाट) पर गंगाजी में बहुत पानी होता था और उसमें काले – भूरे रंग की सोंइस छप्प – छप्प करती थीं। लोगों के पास नहीं आती थीं। पर होती बहुत थीं। हम बच्चों के लिये बड़ा कौतूहल हुआ करती थीं।


मुझे अब भी याद है कि चार साल का रहा होऊंगा – जब मुझे तेज बुखार आया था; और उस समय दिमाग में ढेरों सोंइस तैर रही थीं। बहुत छुटपन की कोई कोई याद बहुत स्पष्ट होती है।

Photobucket

सोंइस/डॉल्फिन

अब गंगा में पानी ही नहीं बचा।

पता चला है कि बंगलादेश में मेघना, पद्मा, जमुना, कर्नफूली और संगू  (गंगा की डिस्ट्रीब्यूटरी) नदियों में ये अब भी हैं, यद्यपि समाप्तप्राय हैं। हजार डेढ़ हजार बची होंगी। बंगला में इन्हें शिशुक कहा जाता है। वहां इनका शिकार इनके अन्दर की चर्बी के तेल के लिये किया जाता है।

मीठे पानी की ये सोंइस (डॉल्फिन) प्रयाग के परिवेश से तो शायद गंगा के पानी घट जाने से समाप्त हो गयीं। मुझे नहीं लगता कि यहां इनका शिकार किया जाता रहा होगा। गंगा के पानी की स्वच्छता कम होने से भी शायद फर्क पड़ा हो। मैने अपने जान पहचान वालों से पूछा तो सबको अपने बचपन में देखी सोंइस ही याद है। मेरी पत्नी जी को तो वह भी याद नहीं।

सोंइस, तुम नहीं रही मेरे परिवेश में। पर तुम मेरी स्मृति में रहोगी। 


इस वाइल्ड लाइफ ब्लॉग पर मुझे गांगेय डॉल्फिन का यह चित्र मिला है। ब्लॉग ओनर से परमीशन तो नहीं ली है, पर चित्र प्रदर्शन के लिये उनका आभार व्यक्त करता हूं। अगर उन्हें आपत्ति हो तो चित्र तुरत हटा दूंगा।

gangetic dolphin


Tuesday, November 11, 2008

संकठा प्रसाद लौट आये हैं


आजकल मौसम सुहाना हो गया है। मेरी सासू मां ने सवेरे की पूजा और शंखद्वनि के बाद सैर पर जाना शुरू कर दिया है। लोगों से बतियाती घर में घुसती हैं सैर के बाद। और कोई न कोई खबर ले कर आती हैं।

श्रीमती रीता पाण्डेय की; फुरसतिया सुकुल के उकसाने पर, तुरत-फुरत लिखी एक घरेलू वातावरणीय पोस्ट!
आपको यह पोस्ट पसन्द आये तो रीता पाण्डेय की नजीर मियां की खिचड़ी का भी अवलोकन करें!

दो दिन पहले घर में अफनाते हुये घुसीं और बोलीं – “अरे संकठा भाग गया है कहीं। उसकी महतारी रो रो कर जान दे रही है। दस दिन पहले तो संकठा की सगाई हुई थी।” घर में वातावरण अचानक गर्मा गया। भरतलाल (हमारे सरकारी भृत्य) को तुरंत बतौर “वन मैन कमीशन” नियुक्त किया गया – पूरी तहकीकात के लिये।

भरतलाल से जो खबर पता चली, उसके अनुसार संकठा को लड़की पसन्द नहीं थी। सो उसने शादी करने से मना कर दिया, पर बाप की मार के डर से घर से भाग गया। सामान्यत जैसा होता है; महिलायें इस तरह के मामले में पूरी तह तक गये बिना चैन नहीं लेतीं। अत: मैने भी पूरी तरह पड़ताल की ठानी। विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्र कर जो कहानी बनी, वह शुरू तो रोमांस के साथ हुई, पर समापन दर्द के साथ हुआ।

संकठा खाते पीते परिवार का गबरू जवान – बिल्कुल सलमान खान टाइप बिन्दास छोरा है। सड़क पर निकलता है तो लड़कियां देख कर आहें भरती हैं। संकठा की नजर एक लड़की से उलझ गयी और वह ऐसा लड़खड़ाया कि उसका दिल लड़की की गोदी में जा गिरा। और तो ठीक था पर लड़की उसकी जात बिरादरी से अलग की थी। पर इश्क कहां देखता है जात बिरादरी! संकठा संकठा प्रेम नगर की सीढ़ियां चढ़ते गये। लड़की को समोसा – लौंगलता खिलाये। फिर मोटरसाइकल पर बैठा कर प्रेम गली में फर्राटा भरने लगे।

खैर, दुनियां बड़ी कमीनी है। प्रेमियों को जीने कहां देती है। कुछ लोग संकठा के बाप के पास पंहुच गये – “भैया छोरे को खूंटे से बांधो, वर्ना घर की इज्जत डुबोयेगा और बिरादरी की नाक कटेगी सो अलग।” बस, बाप ने पकड़ कर चार लात दिये। संकठा की मां को भी हजार गाली दी - “तुझे तो घर में कण्डे थापने से फुर्सत नहीं है और छोरा हो रहा है आवारा। किसी दिन किसी चुड़ैल को घर ले आया तो गंगा में डूब मरना।”

बाप ने आनन फानन में एक लड़की देखी और संकठा की नकेल कसने को सगाई कर दी। सगाई से पहले संकठा ने एक नाकाम सी कोशिश करते हुये मां से कहा कि “लड़की की लम्बाई छोटी है”। इस पर बड़ा भाई गुर्राया – “तू कौन छ फुट्टा है! लड़की वाले तीन लाख खर्च कर रहे हैं। और वे जण्डइल है साले। चूं-चपड़ की तो वे तुझे काट कर अपट्रान चौराहे पर गाड़ देंगे।” लिहाजा, अपट्रान चौराहे पर गड़ने को अनिच्छुक, सगाई करा संकठा गायब हो गया।

सारी कहानी पर हमारी महरी शान्ती की मेरी सासू मां को दी टिप्पणी थी - “अरे अम्मा, लड़की क लम्बइया नाय छोट बा। दहेजवा छोट लागत होये। दहेजवा तनी बढ़ जाई त लड़की क लम्बइयौ बढ़ि जाई! अउर ऊ हरामी कत्तौं न ग होये। अपने मौसिया के घरे होये। आइ जाई!” (अरे अम्मा, लड़की की लम्बाई नहीं छोटी है। दहेज छोटा लग रहा होगा। दहेज कुछ बढ़ जायेगा तो लड़की की लम्बाई भी बढ़ जायेगी। और वह हरामी कहीं नहीं गया होगा। अपनी मौसी के घर होगा। आ जायेगा।)

पता नहीं संकठा ने क्या अनुभव किया। अपट्रान चौराहे पर गाड़े जाने का भय या दहेज की बढ़ी लम्बाई?

बहरहाल संकठा प्रसाद लौट आये हैं! 


Monday, November 10, 2008

भारत – कहां है?


भारत के संविधान या भारत के नक्शे में हम भारत ढूंढते हैं। सन १९४६-५० का कॉन्सेप्ट है वह। नक्शा बना सिरिल रेडक्लिफ के बाउण्ड्री कमीशन की कलम घसेटी से। संविधान बना संविधान सभा के माध्यम से। उसमें विद्वान लोग थे। पर आदि काल से संगम के तट पर विद्वतजन इकठ्ठा होते थे कुम्भ-अर्ध कुम्भ पर और उस समय के विराट सांस्कृतिक – धार्मिक वृहत्तर भारत के लिये अपनी सर्वानुमति से गाइडलाइन्स तय किया करते थे। वह सिस्टम शायद डिसयूज में आ गया है?!


sri aurobindo“युगों का भारत मृत नहीं हुआ है, और न उसने अपना अन्तिम सृजनात्मक शब्द उच्चरित ही किया है; वह जीवित है और उसे अभी भी स्वयम के लिये और मानव लोगों के लिये बहुत कुछ करना है। और जिसे अब जागृत होना आवश्यक है, वह अंग्रेजियत अपनाने वाले पूरब के लोग नहीं, जो पश्चिम के आज्ञाकारी शिष्य हैं, बल्कि आज भी वही पुरातन अविस्मरणीय शक्ति, जो अपने गहनतम स्वत्व को पुन: प्राप्त करे, प्रकाश और शक्ति के परम स्रोत की ओर अपने सिर को और ऊपर उठाये और अपने धर्म के सम्पूर्ण अर्थ और व्यापक स्वरूप को खोजने के लिये उन्मुख हो।”
 
---- श्री अरविन्द, “भारत का पुनर्जन्म” के बैक कवर पर।

जब मेरे मन में छवि बनती है तो उस वृहत्तर सांस्कृतिक – धार्मिक सभ्यता की बनती है जो बर्मा से अफगानिस्तान तक था। और जिसका अस्तित्व बड़े से बड़े तूफान न मिटा पाये।

Vrihattara bhaarat
कभी हाथ लगे तो श्री अरविन्द की यह पुस्तक ब्राउज़ करियेगा।
लिहाजा जब सतीश पंचम जी के हाथ कांपते हैं, राष्ट्रीयता के लिये “भारत” भरने विषय पर; तब मुझे यह वृहत्तर भारत याद आता है। मुझे लगता है कि मेरे जीवन में यह एक पोलिटिकल एण्टिटी तो नहीं बन पायेगा। पर इसे कमजोर करने के लिये जो ताकतें काम कर रही हैं – वे जरूर कमजोर पड़ेंगी।

मुझे भारत के प्राचीन गणतन्त्र (?) होने पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं है। मुझे यह  भी नहीं लगता कि वैशाली प्राचीनतम गणतन्त्र था। वह सम्भवत: छोटे राजाओं और सामन्तों का गठजोड़ था मगध की बड़ी ताकत के खिलाफ। लिहाजा मुझे अपरिपक्व लोगों की डेमोक्रेसी से बहुत उम्मीद नहीं है। बेहतर शिक्षा और बेहतर आर्थिक विकास से लोग एम्पावर्ड हो जायें तो बहुत सुन्दर। अन्यथा भरोसा भारत की इनहेरेण्ट स्ट्रेन्थ – धर्म, सद्गुणोंका सम्मान, त्यागी जनों के प्रति अगाध श्रद्धा, जिज्ञासा का आदर आदि पर ज्यादा है।

क्या आपको लगता है कि यूं आसानी से भारत फिस्स हो जायेगा?

Sunday, November 9, 2008

किधर?


अजदकायमान

पानी पर हम

जो भी है, बड़ी फैसिनेटिंग है!

प्री-पोस्ट त्वरित टिप्पणी –
कर दो पोस्ट। क्या फरक पड़ता है। तुम सब आधे दिमाग के लोग हो – रीता पाण्डेय।
(लिंकित पोस्ट पर जाने के लिये चित्र क्लिक करें)

Saturday, November 8, 2008

सनराइज की सेलरी का सदमा


मेरे निरीक्षक श्री सिंह को कल सेलरी नहीं मिली थी। कैशियर के पास एक करोड़ तेरह लाख का कैश पंहुचना था कल की सेलरी बांटने को; पर बैंक से कुछ गूफ-अप (goof-up – बेवकूफियाना कृत्य) हो गया। कुल सत्तर लाख का कैश पंहुचा। लिहाजा सौ डेढ़ सौ लोगों को सेलरी न मिल पाई। पहले तनातनी हुई। फिर जिन्दाबाद-मुर्दाबाद। फॉलोड बाई यूनियन की चौधराहट की गोल्डन अपार्चुनिटी!

सिंह साहेब से यह आख्यान सुन कर मैं सेलरी मिलने में कुछ देरी के कारण उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड तड़फ पर अपने विचार बना ही रहा था कि एक प्रॉबेबिलिटी के आधार पर छपास पर पंहुच गया। और सनराइज जी ने क्या दमदार पोस्ट लिखी है – मेरी सेलरी कम कर दो

Chhapas
एक तारीख को सैलरी नहीं मिलने के कारण मैं सैलरी विभाग में इतनी बार मत्था टेकने जाता हूं कि वहां के अधिकारी भी मुझे पहचानने लगे हैं...कई कर्मचारी तो मेरे दोस्त भी बन गए हैं....कौन कहता है कि समय पर सैलरी नहीं मिलना काफी दुखद होता है ?
...सनराइज जी, छपास पर
सनराइज जी कौन हैं; पता नहीं चलता ब्लॉग से। यह जरूर पता चलता है कि उनकी सेलरी पच्चीस हजार से ज्यादा है। इससे कम होती तो उन्हें एक तारीख को तनख्वाह मिल गयी होती। और वे  क्रेडिट कार्ड, होम लोन, घर का बजट, बिजली का बिल, फोन का बिल और ना जाने कौन कौन से बिल चुका चुके होते। अब तो (बकौल उनके) “बच्चे का डायपर खरीदते वक्त भी ऐसा लगता है जैसे उसका पॉटी डायपर पर ना गिरकर मेरे अरमानों पर गिर रहा हो...”

money_bag_brown साहेब, यह नियामत है कि (मेरी सेलरी पच्चीस हजार से ज्यादा होने पर भी) मेरे पास क्रेडिट कार्ड नहीं है। किसी अठान-पठान-बैंक से लोन नहीं ले रखा। दाल-चावल के लिये मेरी अम्माजी ने जुगाड़ कर रखा है अगले १००-१२० दिनों के लिये। दिवाली की खरीददारी पत्नी जी निपटा चुकी हैं पिछले महीने। कोई छोटा बच्चा नहीं है जिसका डायपर खरीदना हो। लाख लाख धन्यवाद है वाहे गुरू और बजरंगबली का (वाहे गुरू का सिंह साहब के चक्कर में और बजरंगबली अपने लिये)!

खैर, मेरा यही कहना है कि सनराइज जी ने बड़ा चहुचक लिखा है। आप वह पोस्ट पढ़ें और अपने क्रेडिट-कार्ड को अग्निदेव को समर्पित कर दें। न रहेगा लोन, न बजेगा बाजा! 

ॐ अग्नये नमः॥

Thursday, November 6, 2008

ओबामामानिया


obamania ओबामामानिया (Obamamania) शब्द मुझे रीडर्स डाइजेस्ट के नवम्बर अंक ने सुझाया था। इस अंक में लेख में है कि दुनियां भर के देशों में ओबामा को मेक्केन पर वरीयता हासिल है – लोगों की पसन्दगी में।

ओबामा का जो कथन बार बार आया है – वह आउट सोर्सिंग को ले कर है। उनका कहना है - “मैक्केन से उलट , मैं उन कंपनियों को कर में राहत देना बंद कर दूंगा जो ओवरसीज देशों में रोजगार की आउटसोर्सिन्ग करती हैं। मैं यह राहत उन कंपनियों को दूंगा जो अमेरिका में अच्छे रोजगार उत्पन्न करती हैं।”obama

मुझे नहीं मालुम कि इसका कितना असर भारत छाप देशों पर पड़ेगा। पर यह बढ़िया नहीं लगता। आगे देखें क्या होता है। दो-तीन महीनों में साफ हो जायेगा। वैसे अपना सेन्सेक्स तो आजकल हवा चलते लटकता है। कल भी लटका है। खुलने के बाद सलंग (मालवी शब्द - सतत, एक सीध में) लटका है। पता नहीं ओबामा सेण्टीमेण्ट के चलते है या नहीं? इसको तो जानकार लोग ही बता सकते हैं।

अब पता चलने लगेगा कि दुनियां का ओबामामानिया सही है या नहीं।  

और पुछल्ले की तलाश न करें। यह पोस्ट ही पुछल्ला है

Wednesday, November 5, 2008

भविष्य से वर्तमान में सम्पदा हस्तांतरण


Friedmanथामस एल. फ्रीडमान का न्यूयार्क टाइम्स का ब्लॉग पढ़ना आनन्ददायक अनुभव है। बहुत कुछ नया मिलता है। और वह पढ़ कर मानसिक हलचल बड़ी बढ़िया रेण्डम वाक करती है। बहुत जियें थामस फ्रीडमान। मुझसे दो साल बड़े हैं उम्र में। और समझ में तो सदियों का अन्तर होगा!

अपने हाल ही के पोस्ट में उन्होने एक पते की बात कही है। माइकल मण्डेलबाम के हवाले से उन्होने कहा है:
“शायद सन १९१७ की रूसी बोल्शेविक क्रान्ति के बाद पहली बार इतना जबरदस्त सम्पदा हस्तांतरण हुआ है, अब! और यह हस्तान्तरण अमीर से गरीब को नहीं, वरन भविष्य की पीढ़ी से वर्तमान पीढ़ी को हुआ है।”

आने वाले अर्थव्यवस्था के सुधार के लिये, जो बहुत तनावपूर्ण होने जा रहा है, एक ऐसे राष्ट्रपति की आवश्यकता होगी जो देश को जोश, ऊर्जा और एकजुटता से इकठ्ठा रख कर नेतृत्व प्रदान करे। हमें इस अर्थव्यवस्था के खतरनाक दौर से उबरना है जब "बेबी बूमर्स" रिटायरमेण्ट के कगार पर हैं, और जिन्हें शीघ्र ही सोशल सिक्यूरिटी और अन्तत मैडीकेयर की जरूरत होगी। हम सभी सरकार को अधिक देने और कम पाने वाले हैं - तब तक, जब तक कि इस गड्ढे से उबर नहीं जाते।
... थामस एल फ्रीडमान
एक बार ध्यान से सोचें तो यह सच मुंह पर तमाचा मारता प्रतीत होता है। इस समय की भोग लिप्सा के लिये भविष्य पर कर्ज का अम्बार लगा दिया गया। आज के उपभोग के लिये आने वाले कल के जंगल, नदी, तालाब और हवा ऐंठ डाले गये। भविष्य के साथ वर्तमान ने इतनी बड़ी डकैती पहले कभी नहीं की! 

बड़ा क्राइसियाया (crisis से बना हिन्दी शब्द) समय है। ऐसे में अच्छे नेतृत्व की जरूरत होती है, झाम से उबारने को। और जो लीडरशिप नजर आती है – वह है अपने में अफनाई हुई। कुछ इस तरह की जिसकी अप्राकृतिक आबो हवा से ग्रोथ ही रुक गयी हो। कहां है वह लीडर जी! कहां है वह संकल्प जो भविष्य के लिये सम्पदा क्रीयेट करने को प्रतिबद्ध हो। 

आइये सोचा जाये!

tornado पुछल्ले में पोस्ट से ज्यादा पठनीयता है। यह मुझे गहराई से अहसास हुआ। लिहाजा पोस्ट हो न हो, पुछल्ला जरूर होना चाहिये!

प्रधानमंत्री जी ने “जुबां पर 'सिंह' गर्जन” कर दिया है; मन्दी की आसन्न धुन्ध को लेकर। पर असल बात यह है कि इस सिंह गर्जना से कितने आश्वस्त महसूस कर रहे होंगे उद्योग जगत के शीर्षस्थ सुनने वाले?

हर आदमी को अपने तरीके से सोचना है!

Monday, November 3, 2008

नैनो-कार की जगह सस्ते-ट्रैक्टर क्यों नहीं बनते?


मेरे प्रिय ब्लॉगर अशोक पाण्डेय ने एक महत्वपूर्ण बात लिखी है अपनी पिछली पोस्ट पर। वे कहते हैं, कि टाटा की नैनो को ले कर चीत्कार मच रहा है। पर सस्ता ट्रेक्टर बनाने की बात ही नहीं है भूमण्डलीकरण की तुरही की आवाज में। उस पोस्ट पर मेरा विचार कुछ यूं है:

green_farm_tractorवह बाजारवादी व्यवस्था दिमागी दिवालिया होगी जो ट्रैक्टर का जबरदस्त (?) मार्केट होने पर भी आर-एण्ड-डी प्रयत्न न करे सस्ते ट्रेक्टर बनाने में; और किसानों को सड़ियल जुगाड़ के भरोसे छोड़ दे।
 
खेती के जानकार बेहतर बता सकते हैं; पर मुझे लगता है कि खेती में लोग घुसे हैं, चूंकि बेहतर विकल्प नहीं हैं। लोग अण्डर एम्प्लॉयमेण्ट में काम कर रहे हैं। सामुहिक खेती और पर्याप्त मशीनीकरण हुआ ही नहीं है। जोतें उत्तरोत्तर छोटी होती गयी हैं। खेड़ा में मिल्क कोऑपरेटिव सफल हो सकता है पर कानपुर देहात में कोऑपरेटिव खेती सफल नहीं हो सकती।  सौ आदमी सामुहिक खेती करें तो एक चौथाई लोगों से चार गुणा उपज हो। उससे जो समृद्धि आये, उससे बाकी लोगों के लिये सार्थक रोजगार उत्पन्न हो।

विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह हुआ है। यहां यूपी-बिहार में कोई इस दिशा में काम करे तो पहले रंगदारी और माफिया से निपटे। वो निपटे, उससे पहले ये उसे निपटा देंगे। उसके अलावा सौ लोगों के सामुहिक चरित्र का भी सवाल है। लोग सामुहिक लाभ के लिये काम करना नहीं जानते/चाहते। एक परिवार में ही मार-काट, वैमनस्य है तो सामुहिकता की बात बेमानी हो जाती है। फिर लोग नये प्रयोग के लिये एक साल भी सब्र से लगाने को तैयार नहीं हैं।

मैं जानता हूं कि यह लिखने के अपने खतरे हैं। बुद्धिमान लोग मुझे आर्म-चेयर इण्टेलेक्चुअल या पूंजीवादी व्यवस्था का अर्थहीन समर्थक घोषित करने में देर नहीं करेंगे। पर जो सोच है, सो है।

लोगों की सोच बदलने, आधारभूत सुविधाओं में बदलाव, मशीनों के फीच-फींच कर दोहन की बजाय उनके सही रखरखाव के साथ इस्तेमाल, उपज के ट्रांसपेरेण्ट मार्केट का विकास … इन सब से ट्रैक्टर का मार्केट उछाल लेगा। और फिर नैनो नहीं मेगा ट्रैक्टर की डिमाण्ड होगी - जो ज्यादा कॉस्ट-इफेक्टिव होगा। तब कोई टाटा-महिन्द्रा-बजाज अपने हाराकीरी की बात ही करेगा, अगर वह ध्यान न दे! 

और कोई उद्योगपति हाराकीरी करने पैदा नहीं हुआ है!


क्या ख्याल है आपका?

~~~~~     

Angad सन २००४ में महिन्द्रा ने रु. ९९,००० का अंगद ट्रैक्टर लॉंच किया था। क्या चला नहीं? smile_sad

दमदार काम में बच्चा ट्रैक्टर शायद ज्यादा फायदेमन्द नहीं है!

एक हजार में उन्नीस किसानों के पास ही ट्रैक्टर है। लिहाजा बाजार तो है ट्रैक्टर का। पर बॉटलनेक्स भी होंगे ही।


Gyan Small
चमेली का तेल लगाये ज्ञानदत्त
और पुछल्ले में यह मस्त कमेण्ट -

नये ब्लॉगर के लिये क्या ज्ञान दत्त, क्या समीर लाला और क्या फुरसतिया...सब चमेली का तेल हैं, जो नजदीक आ जाये, महक जाये वरना अपने आप में चमकते रहो, महकते रहो..हमें क्या!!!

फुरसतिया और समीर लाल के चमेली का तेल लगाये चित्र चाहियें।


Saturday, November 1, 2008

इण्टेलेक्चुअल्स बड़े “डाइसी” पाठक होते हैं।


diceढ़ेरों बुद्धिमान हैं जो दुनियां जहान का पढ़ते हैं। अलावी-मलावी तक के राष्ट्र कवियों से उनका उठना बैठना है। बड़ी अथारिटेटिव बात कर लेते हैं कि फलाने ने इतना अल्लम-गल्लम लिखा, फिर भी उसे फुकर प्राइज मिल गया जब कि उस ढ़िमाके ने तो काल जयी लिखा, फिर भी फुकर कमेटी में इस या उस लॉबी के चलते उसे कुछ न मिल पाया। यह सब चर्चा में सुविधानुसार धर्मनिरपेक्षता/अल्पसंख्यक समर्थन/मानवाधिकार चाशनी जरूर लपेटी जाती है। ऐसे पाठक बहुत विशद चर्चा जेनरेट करते हैं, आपके हल्के से प्रोवोकेशन पर। पर उनका स्नेह दुधारी तलवार की माफिक होता है। कब आपको ही ले गिरे, कहना कठिन है।

बाई-द-वे, सभी इण्टेलेक्चुअल ऐसे नहीं होते। कुछ की वेवलेंथ को आपका एण्टीना पकड़ता भी है। यह जरूर है कि आपकी समझ का सिगनल-टू-न्वॉयज रेशो (signal to noise ratio) कम होता है; कि कई बातें आपके ऊपर से निकल जाती हैं। अब कोई दास केपीटल या प्रस्थान-त्रयी में ही सदैव घुसा रहे, और उसे आलू-टमाटर की चर्चा डी-मीनिंग (de-meaning – घटिया) लगे तो आप चाह कर भी अपनी पोस्टें सुधार नहीं पाते।

असल में, आप जितना अपने में परिवर्तन का प्रयास करते हैं, बुद्धिमानों की आशानुसार; उतना आप वैसा का वैसा ही रह जाते हैं। मन में कोई न कोई विद्रोही है जो मनमौजी बना रहना चाहता है!

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sumant mishraखैर, विषय को जरा यू-टर्न दे दिया जाये। सुमन्त मिश्र “कात्यायन” एक बड़े ही बड़े महत्व के पाठक मिले हैं। उनके प्रोफाइल में लिखे उनके इण्टरेस्ट – धर्म/दर्शन/संस्कृति/सभ्यता/सम्प्रदायों का उद्भव… बड़े प्रभावी हैं। समस्या हमारे साथ है, हम यदा-कदा ही उनके मोड में आ कर कुछ लिख सकते हैं। अपनी नियमित मानसिक हलचल तो टमाटर/आलू/टाई/बकरी पर टिक जाती है।

यह अवश्य है कि अपना नित्य लेखन पूर्णत: उथला नहीं हो सकता। क्रौंच पक्षी की टांगें पूरी तरह डूब जायें, इतना गहरा तो होता है। पर उसमें पर्याप्त (?) गहराई होने की भी कोई गारण्टी नहीं दे सकता मैं। लिहाजा ऐसे पाठक केवल तीन कदम साथ चलेंगे, या मैत्री की ट्रॉसंण्डेण्टल (transcendental – उत्तमोत्तम) रिलेशनशिप निभायेंगे; अभी कहना कठिन है।

अजीब है कि ५०० से अधिक पोस्टों के बाद भी आप अपने ब्लॉग और पाठकों की प्रकृति पर ही निश्चयात्मक न हो पायें। Don't Know

सुमन्त जी का स्वागत है!


चिठ्ठाजगत हर रोज ई-मेल से दर्जन भर नये चिठ्ठों की सूची प्रदान करता है शाम सात बजे। अगर उन्हें आप क्लिक करें और टिप्पणी करने का यत्न करें तो पाते हैं कि लगभग सभी ब्लॉग्स में वर्ड वैरीफिकेशन ऑन होता है। वर्ड-वैरीफिकेशन आपको कोहनिया कर बताता है कि आपकी टिप्पणी की दरकार नहीं है। इस दशा में तो जुझारू टिप्पणीकार (पढ़ें – समीर लाल) ही जोश दिलाऊ टिप्पणी ठेल सकते हैं।

(नये ब्लॉगर्स से अनुरोध: गूगल ब्लॉगर में ब्लॉग के डैशबोर्ड में Settings>Comments>Show word verification for comments?>No का विकल्प सेट कर दें वर्ड-वेरीफिकेशन हटाने को। जैसा टिप्पणियों से लगता है, नये ब्लॉगर यहां से पढ़ने से रहे। लिहाजा यह काट दे रहा हूं। दूसरी जुगत लगाऊंगा!)

अमित जी की देखा देखी इंक ब्लॉग ठेलाई, एमएस पेण्ट से:
 Fursatiya