Friday, July 11, 2008

अस्वस्थता


स्पॉण्डिलाइटिसफोटो पुरानी है। दशा वर्तमान है। दशा आराम मांगती है ब्लॉगरी से। दफ्तर का काम तो पीछा छोड़ने से रहा। वहां गले में पट्टा बांध कर बैठते हैं। लोगों को बताना पड़ता है क्या बीमारी है और कबसे है। क्या व्यायाम करते हैं, आदि, आदि। लोग च्च-च्च करते हैं पर फिर काम की बात पर लौट आते हैं। जान छोड़ते नहीं।
खांसी बन्द हो, सर्वाइकल खिंचाव मिटे तो लिखने और टिप्पणी आदि करने का रुटीन बनाया जाये। अभी तो आराम का मन करता है - जो बहुत बदा नहीं है। ट्रेनों का अबाध आवागमन धकियाता है। चैन नहीं लेने देता। पग पग पर निर्णय मांगता है। लिहाजा ब्लॉगिंग का टाइम कट। बाकी, रेल का काम तो चलाना ही होगा! राशन-पानी उसी से मिलता है। 
वैसे दशा ऐसी खराब नहीं कि सहानुभूति की टिप्पणियों की जरूरत पड़े। लोग चुपचाप सटक लेते हैं। हम कम से कम अपनी कार्टूनीय फोटो दिखा कर सटक रहे हैं!
और ब्लॉगिंग का क्या, जब लगा कि कुछ ठेला जा सकता है, लौट लेंगे।ROFL 8
अच्छा जी, नमस्ते!

Thursday, July 10, 2008

सत्रह हजार से कम में मिनी-लैपटॉप


यह पोस्ट श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ नें भेजी है। एक गैजेट पर पोस्ट है। है बड़े काम का; और जेब पर भी बोझ न डाले, ऐसा लग रहा है यह गैजेट। आप उन्ही के शब्दों में पढ़ें-

कुछ दिन पहले मैंने टिप्प्णी करते हुए कहा था कि मैंने अपनी पत्नी का हैण्डबैग उनसे ले लिया है और उन्हें लौटाऊंगा नहीं। असल में एक चीज पर दिल लगा लिया था और उसके बारे में दो  या तीन सप्ताह तक सोच सोच कर थक गया था, उसे आखिर खरीद ही लिया मैने। और उसे सुरक्षित रखने के लिए मेरी पत्नी का हैण्डबैग एक दम उपयुक्त निकला।
 
दुनिया में सबसे छोटा लैपटॉप पी सी, ASUS Ee PC, 512 MB Ram, (केवल) 4GB सॉलिड स्टेट हार्ड-डिस्क, (केवल) 7" का स्क्रीन साइज, और एक संपूर्ण Qwerty की-बोर्ड के साथ पिछले रविवार को खरीदा मैने। वजन है केवल 900 ग्राम के आसपास। दाम केवल 16,950/- रुपये। आकार 225x160x20 मिलीमीटर3 जो किसी महिला के हेण्डबैग के अन्दर आसानी से फ़िट हो सकता है।
asus and normal laptop size comparison

« तसवीर देखिए जिससे आप सामान्य लैपटॉप और इस लैपटॉप के साईज़ में अंतर देख सकते हैं। Xandros लिनक्स OS,  Open Office और कई सारे Utilities इसमें पहले से ही लोड किये गए हैं. वायरलेस इण्टरनेट, लैन,  वेब-कैम, माइक्रोफोन, स्पीकर्स, 3 USB पोर्ट, मेमोरी कार्ड, टेलीफोन जैक वगैरह भी इसमे मिल जाएँगे। डिस्क का स्पेस और स्क्रीन का साइज कम है लेकिन इसे छोड़कर यह पीसी सामान्य लैपटॉप पीसी से क्षमता या उपयोगिता में कम नहीं। मेमोरी कार्ड और पेन ड्राइव अगर साथ हो तो डिस्क-स्पेस की कमीं कोई गंभीर अड़चन नहीं होगी। (कम से कम मेरे लिए।)
इस पीसी से मैं बेहद खुश हूँ। आप लोगों को इसे खरीदने का करण भी बता देना चाहता हूँ।
 
बहुत दिनों से अपना सीधा साधा मोबाईल फ़ोन त्यागकर, एक हाई-एण्ड (मंहगा वाला) मोबाइल फ़ोन खरीदना चाहता था जैसा आजकल के नौजवान सोफ़्टवेर वाले लेकर घूमा करते हैं। Blackberry, Nokia communicator,HTC advantage  वगैरह के बारे में सोचता था। लगभग ३०,००० रुपये का बजट था मेरा। लेकिन बहुतों ने सलाह दी के यह सब महँगे गैजेट्स के साथ केवल कुछ दिनों का हनीमून चलता है और फ़िर यह केवल आम मोबाइल फ़ोन जैसा ही काम आता है। ज्यादा से ज्यादा कभी कभार एकाध फ़ोटो खींचते हैं और वह भी अच्छी नहीं आती - उसमे कैमेरा केवल 1.3 मेगापिक्सल का होता है।
 
इन गैजटों का पीसी जैसा प्रयोग लोग शुरू में कुछ दिनों के लिए ही करते हैं और बाद में छोड़ देते हैं। दो इन्च का स्क्रीन साइज़ और अंगूठे से चलने वाला की-बोर्ड से क्या उम्मीद रख सकते हैं? कुछ दिनों बाद यह केवल एक बहुत महँगा और फैंसी फ़ोन बन जाता है जिसका खो जाने का डर हमेशा रहता है।
 
मेरे लिए, संपूर्ण पोर्टेबिलिटी के साथ, मूल PC की शक्ति और अंतर्जाल क्षमता अनिवार्य शर्त थी। क्या हुआ अगर मैं इसे अपने जेब में लेकर घूम नहीं सकता? भारी ब्रीफ़केस उठाना नहीं चाहता था लेकिन कंधे पर हैण्डबैग लटकाने से मैं बिलकुल कतराता नहीं हूँ।
 
कमर बेल्ट पर लगा अपना पुराना साधारण मोबाईल फोन के साथ इस पीसी का उपयोग के बारे में सोचने लगा। इसे मैं "अतिरिक्त" पीसी मानता हूँ, मेरा डेस्कटॉप PC का विकल्प नहीं। दफ़्तर में यह छोटी पी सी मेरे लिए उपयुक्त नहीं होगा। लेकिन दफ़्तर के बाहर, सामान्य लैपटॉप भी मेरे लिए भारी और असुविधाजनक साबित होता है। बहुत सोचने के बाद इसे खरीद लिया।
 
खरीदते समय ब्लॉगर "पीडी", (प्रशांत प्रियदर्शी, जो मुझसे मिलने आये थे) मेरे साथ थे। उनकी राय/टिप्पणी भी आमंत्रित है।
 
Asus Ee PC के पूरे तकनीकी विवरण आप देखिए और तय कीजिए के यह यंत्र आपके लिए ठीक रहेगा कि नहीं।
 
एक और बात कहनी है। अभी तक इसपर हिन्दी में कैसे टाइप करेंगे, इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला है। बरहा सोफ़्टवेर, जिसका प्रयोग मैं करता हूँ लिनक्स में काम नहीं करता। फ़िलहाल, अंग्रेज़ी में टाईप करके, बाद में पेन ड्राइव के जरिए उसे डेस्कटॉप पर ट्रान्स्फ़र करके उसे बरहा में चेप देता हूँ। इससे मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। कोई हल निकालना ही पढेगा।
 
अपने अनुभवों के बारे में आगे भी बताऊँगा। जाते जाते एक और आखरी बात - पत्नी आजकल (पिछले दो महीनों से) USA गई है, मेरी बेटी के साथ कुछ समय बिताने। अब आप समझ गए होंगे कि आजकल इतना समय कहाँ से निकाल लेता हूँ ब्लॉग लिखने और टिप्पणी करने के लिए। सीधी सी बात है, अकेलेपन से लड़ने के लिए इससे अच्छा नशा कहाँ? बस, कुछ ही दिनों की बात है और वह लौट रही है। इस पीसी को देखकर, मुझे डर है कि कहीं वह मुझसे यह पीसी छीन न लें। आखिर फेमिनाइन लॉजिक जैसी कोई चीज़ भी होती है। हैण्डबैग आखिर उनका है,  उसके अन्दर रखी चीज़ खरीदने वाले पति भी उसके, तो वह  चीज़ भी उसकी  क्यों नहीं?
 
आज के लिए बस इतना ही। फिर कभी मिलेंगे ज्ञानजी के ब्लॉग पर।
 
शुभकामनाएं
गोपालकृष्ण विश्वनाथ

Wednesday, July 9, 2008

कार्बन टेक्स और कार्बन क्रेडिट



Truck ट्रक वालों की हड़ताल थी तो कुछ सुकून था। सड़क कुछ खाली लगती थीं। प्रदूषण कुछ कम था। यह अलग बात है कि कुछ लोग आगाह कर रहे थे कि खाने-पीने का सामान जमा कर लो - अगर हड़ताल लम्बी चली तो किल्लत और मंहगाई हो जायेगी। पर बड़ी जल्दी खतम हो गयी हड़ताल।
ट्रकों की लम्बी कतार और उनके कारण होने वाला प्रदूषण कष्ट दायक है। यही हाल भारतीय उद्योग जगत का भी होगा। कोई कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रति सोचता ही नहीं। मुझे पता चला कि अफवाह है - यूरोपियन यूनियन के देश भारत से आयात होने वाले औद्योगिक माल पर कार्बन टेक्स लगाने की सोच रहे हैं। वे अगर सोच रहे हैं तो गलत बात है। उन्होने सदियों तक ऊर्जा का बेलगाम इस्तेमाल कर जो प्रदूषण जमा किया है, पहले उसका तो हिसाब लगाया जाये। पर भारत अपने अन्दर इस प्रकार के टेक्स और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने वाले को कार्बन क्रेडिट देने का काम तो कर सकता है।
Carbon Smoke - The Library of Congress on Flickrइससे पेट्रोलियम बिल कम होगा। प्रदूषण कम होगा। लोग ऊर्जा बचाने की ओर स्थिर मति से ध्यान देंगे। रेवा कार और यो-बाइक/हीरो इलेक्ट्रिक/टीवीस इलेक्ट्रिक स्कूटी जैसे वाहनों का चलन बढ़ेगा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की ओर लोग ज्यादा झुकेंगे। उद्योगजगत में कार्बन उत्सर्जन का ध्यान कोयले और पेट्रोलियम की खपत को नियंत्रित करेगा। थर्मल पावर हाउस ज्यादा कार्यकुशल बनेंगे। 
रेलवे को बेतहाशा कार्बन क्रेडिट मिलेगी। बिजली के इन्जनों का प्रयोग और रेलवे का विद्युतीकरण और गति पकड़ेगा।
बस गड़बड़ यही होगी कि सर्दियों के लिये हमारी कोयले की सिगड़ी लेने की चाह पर ब्रेक लगेगी!    


Tuesday, July 8, 2008

ब्लॉग अभिव्यक्ति का कम; रूपांतरण का माध्यम अधिक होना चाहिये


आप रोज ३०-४० ब्लॉग पढ़ते हैं। उनमें से पचास फीसदी पर तो टिप्पणी करते हैं ही। रोज आप को ऐसा कम ही मिलता है कि ब्लॉगर रूपांतरित हो रहे हों।

एक ब्लॉगर संवेदनशील कवि है, तो वह उसी संवेदना की कवितायें ठेलता जाता है। फुरसतिया समय की कमी के बावजूद रूपांतरित नहीं होते। उनके दिमाग में, बाई डिफाल्ट लम्बी पोस्टें ही आती हैं (कुछ बदलाव है क्या आजकल?)। चोंच लड़ाने वाले उसी तरह की खुराफात किये चले जा रहे हैं। फलाने जी अपने स्टाइल में अपनी श्रेष्ठता से मुग्ध हैं और समझ नहीं पा रहे कि ब्लॉगजगत उनके अनुसार क्यों नहीं चलता।

लोगों को ब्लॉग अभिव्यक्ति का अद्भुत माध्यम मिला है और वे सरपट, बिना समय गंवाये अपने को अभिव्यक्त किये जा रहे हैं। वे इसको अपने रूपांतरण का चेतन माध्यम नहीं मान रहे।

आपको अपने को सतत रूपान्तरित (री-क्रीयेट) करना होता है। और रूपान्तरण (री-क्रियेशन) में केवल अभिव्यक्ति के माध्यम का प्रयोग कर आत्म-मुग्ध होना ही नहीं आता। आपको बड़े समझ बूझ से अपना चैत्य, अपना पर्सोना बदलना होता है। रूपांतरण, ट्रांसफार्मेशन की मांग आपका स्वत्व (इनर सेल्फ) करता है। अमूमन आप वह मांग अनसुनी करते हैं।

आपको एक कविता, एक पोस्ट, एक प्रयोग पर वाह, वाह मिलती है। (यकीन मानिये कि आप रद्दी भी लिखते तो भी आपको वाह-वाह मिलने के चांस ज्यादा थे!) और आप वाह वाह के वशीभूत उसी प्रकार का लेखन/कविता/पॉडकास्ट और ठेले चले जाते हैं।

रूपांतरण कहां है मित्रों! जरा देखें, आप स्टेल तो नहीं बनते जा रहे! मैं भी देखता हूं अपने आप में।



रूपान्तरण:

ग्रीक सागर का देवता प्रोटेअस की सारी ताकत इस बात में निहित थी कि वह अपना रूप और आकार अपने सोच के अनुसार बदल सकता था। जब अगमेम्नॉन उसे पकड़ने लगा तो वह पहले शेर में रूपांतरित हो गया, फिर सांप, जंगली सूअर, झरने और अन्तत: एक पेड़ की पत्ती में।

रूपांतरण की तो यह पराकाष्ठा है; व्यक्तित्व परिवर्तन, परिवर्धन और सर्वाइवल हेतु। हम कुछ तो सतत बदल ही सकते हैं - पूरी चेतनता के साथ!
(इसे आस्था-चैनलात्मक पोस्ट न माना जाये। यह मैने मेरे अपने उपयोग के लिये भी लिखा है! Thinking )
*

Monday, July 7, 2008

होमवर्क की आउटसोर्सिंग!



homework_red_1 बच्चों का होमवर्क मम्मियां करती हैं - प्राइमरी कक्षाओं तक। पर यह तो गजब है - आस्ट्रेलिया के कम्प्यूटर साइंस के विद्यार्थी अपना होमवर्क भारत के प्रोग्रामर्स को आउटसोर्स कर दे रहे हैं! और १०० आस्ट्रेलियायी डालर्स में उनका काम पक्का कर उन्हे मिल जा रहा है। बाकायदा रेण्ट-अ-कोडर पर निविदा निकलती है। कोडर अपनी बोली भरते हैं और भारतीय अपनी बोली कम होने के आधार पर बाजी मारते हैं।
भैया हमारे जैसे "जीरो बटा सन्नाटा" कितने समय में प्रोग्रामिंग सीख कर यह निविदा भरने लायक बन सकते हैं? अपने बच्चे का होमवर्क तो करा/कराया नहीं कभी, इन आस्ट्रेलियायी विश्वविद्यालय जाने वाले बच्चों का भला करने लायक बन जायें! homework 
यह खबर पीटीआई की है - मेलबर्न/सिडनी से। पर जब मैने नेट पर सर्च किया तो पाया कि अमेरिका में यह पवित्र कार्य दो साल पहले भी हो रहा था!
अब कौन तेज है - अमरीकन, आस्ट्रेलियायी या भारतीय!


Sunday, July 6, 2008

पिछले एक महीने में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्टें


पिछले ३० दिनों में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली मेरी ब्लॉग पोस्टें, जैसा फीडबर्नर ने सम्पादित किया है; निम्न हैं: 
१. अहिन्दी भाषी श्री जी. विश्वनाथ का परिचय…
२. अशोक पाण्डेय, उत्कृष्टता, खेतीबाड़ी और द…
३. iGoogle से ब्लॉगस्पॉट में पोस्टिंग का ग…
४. मिलिये स्वघोषित भावी प्रधानमन्त्री से!
५. बंदर नहीं बनाते घर - क्या किया जाये?

६. जेफ्री आर्चर, साहित्यकार और ब्लॉगर का व…
७. रेल माल-यातायात का रोचक प्रकार
८. प्रोफेसर गोविंद चन्द्र पाण्डे और ऋग्वेद
९. रविरतलामी से सिनर्जी - "आत्मोन्नति" का …
१०. गालिब या मीर - मुझे तो लोग जमे ब्लॉगरी-…

(मैने अपने मुख्य पृष्ठ का परिवर्तन किया है। अब से वह ताजा दो पोस्टों की बजाय अधिक पोस्टें दिखायेगा। पोस्टें पूरी पढ़ने हेतु आप को "[...आगे पढ़ें]" लिंक पर जाना होगा। इस प्रकार एक पेज पर अधिक पोस्टें दिखाई जा सकेंगी। पहले मैं पेज जल्दी खुलने के लिये मुख्य पृष्ठ पर केवल दो पोस्टें रखा करता था। अब ये दस कर दी हैं। यह परिवर्तन ब्लॉग पोस्ट की बजाय सीधे ब्लॉग यूआरएल के जरीये ब्लॉग पर पंहुचने वालों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से है। अत: पाठकों को अधिक पोस्टें सरलता से दीखनी चाहियें।)

Friday, July 4, 2008

पोरस का राजोचित आत्मविश्वास


बहुत बार पढ़ा है कि हारने के बाद पोरस को सिकन्दर के सामने जंजीरों में जकड़ कर प्रस्तुत किया गया। उस समय सिकन्दर ने प्रश्न किया कि तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये? और पोरस ने निर्भीकता से उत्तर दिया - "वैसा ही, जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।" यह नेतृत्व की निर्भीक पराकाष्ठा है। अच्छे नेतृत्व में इसके दर्शन होते हैं।

मुझे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी की पुस्तक "कृष्णावतार" का एक प्रसंग याद है। पांचाली का स्वयंवर होने जा रहा है। कृष्ण जानते हैं कि पाण्डव अज्ञातवास के अन्तिम चरण में वहां आ चुके हैं। उनका वचन है कि द्रौपदी का विवाह अर्जुन से हो। उसके लिये जरासंध को किनारे करना आवश्यक है। आधी रात बीत चुकी है। जरासंध को सोते से जगा कर उसे बताना है कि वह वापस लौट जाये। निर्भीक कृष्ण निहत्थे जरासंध के खेमें में पंहुचते हैं। जरासंध को नींद से उठाया जाता है। वह कृष्ण से वैसे की खार खाये है। उनका वध करने को अपनी गदा की मूठ पर हाथ रखता है जरासंध। और कृष्ण पूरी शान्ति और निर्भीकता से कहते हैं कि यह स्वयंवर का समय है। अगर जरासंध उनकी हत्या करता है तो स्वयंवर का नियम भंग होगा और आर्यवर्त के सभी राजा कर्तव्य से बंधे होंगे कि वे स्वयंवर भंग करने वाले जरासंध का वध कर दें। जरासंध किचकिचा कर रह जाता है - कृष्ण का बालबांका नहीं कर पाता। कृष्ण के राजोचित आत्मविश्वास का यह प्रसंग मुझे अद्भुत लगता है।

यह अवश्य है कि सफल नेता होने के लिये हममें यह राजोचित आत्मविश्वास होना चाहिये और यदि नहीं है तो उसको विकसित करने का सतत प्रयास करना चाहिये।


मैं इस राजोचित आत्मविश्वास का एक और उदाहरण देता हूं।

हेल सिलासी इथियोपिया के १९३० से चार दशक तक सम्राट रहे। वे राजवंश में थे पर उनका राजा बनना तय न था। लिज तराफी नामक इस नौजवान ने ऐसा जबरदस्त राजोचित आत्मविश्वास दिखाया कि सम्राट मेनेलिक द्वितीय का विश्वासपात्र बन बैठा।  

जब सिंहासन के बाकी दावेदार बड़बोले, ईर्ष्यावान और षडयंत्रकारी थे; लिज तराफी शान्त, धैर्य और आत्मनिश्चय से परिपूर्ण रहता था। बाकी दावेदार इस पतले नौजवान को धकियाने का यत्न करते थे पर यह संयत बना रहता था। वह ऐसे दिखाता था जैसे उसे अन्तत: सम्राट बनना ही है। और धीरे धीरे अन्य कई भी ऐसा सोचने लगे।  

सन १९३६ में इटली ने इथियोपिया पर अधिकार कर लिया था। तराफी (तब हेल सिलासी) देश निकाला झेल रहे थे। उस समय उन्हे लीग ऑफ नेशन्स को अपने देश की आजादी के लिये सम्बोधित करने का अवसर मिला। इतालवी श्रोताओं नें खूब शोर शराबा किया और उन्हे अश्लील गालियां भी दीं। पर हेल सिलासी ने अपना संयम नहीं खोया। अपनी बात पूरी तरह से कही। हेल सिलासी के राजोचित आत्मविश्वास से उनके विरोधी और भी बौने और भद्दे लगे। उनका कद और बढ़ गया।  

यह होता है राजोचित आत्मविश्वास! 
 (विकीपेडिया पर हेल सिलासी देखें।)




ई-स्वामी की टिप्पणी में तो जान है! आप सहमत हों या न हों, आप अनदेखा नहीं कर सकते।
(आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है, अत: टिप्पणियां मॉडरेशन में देरी सम्भव है। कृपया क्षमा करें।)


Thursday, July 3, 2008

आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!


कोई मुश्किल नही है इसका जवाब देना। आज लिखना बन्द कर दूं, या इर्रेगुलर हो जाऊं लिखने में तो लोगों को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कई लोगों के ब्लॉग के बारे में यह देखा है।
वैसे भी दिख रहा है कि हिन्दी में दूसरे को लिंक करने की प्रथा नहीं है। सब अपना ओरीजनल लिखते हैं और मुग्ध रहते हैं। ज्यादा हुआ तो किसी ऑब्स्क्योर सी साइट को जिसमें कोई जूस वाली चीज छपी हो, को हाइपर लिंकित कर दिया। कुछ घेट्टो वाले ब्लॉग परस्पर लिंकित करते हैं। उनका महन्त सुनिश्चित करता है कि उसके रेवड़ के लोग परस्पर एक दूसरे की मुगली घुट्टी पियें। बाकी इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर को तो लोग लिंक भी कम करते हैं, और उसे भुलाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
हमारी दशा गुट निरपेक्ष वाली है। जैसे नॉन अलाइण्ड मूवमेंण्ट का कोई धरणी-धोरी नहीं, वैसे हम जैसे की भी डिस्पेंसिबिलिटी ज्यादा है।
हमारा सर्वाइवल तो हमारे ब्लॉग कण्टेण्ट और हमारी निरंतरता पर ही है।
चलिये "जरूरत" पर एक क्षेपक लिया जाये।
दो घोड़े बोझ लाद कर चल रहे थे। एक ठीक चल रहा था। दूसरा अड़ियल था। बार बार अड़ने पर मालिक ने उसका बोझा धीरे धीरे उतार कर दूसरे पर लाद दिया। अड़ियल वाला प्रसन्न हो गया! उसने आगे वाले को कहा - बेटा, और बनो शरीफ, और लदवाओ बोझ! मुझे देखो, मैं कितने मजे में चल रहा हूं!horse_3
गन्तव्य पर पंहुचने पर मालिक ने सोचा कि "जब बोझ एक ही उठाता है तो दूसरे की क्या जरूरत? बेहतर है कि सारा दाना-पानी मैं एक को ही दे दूं और दूसरे को मार कर उसका मांस और खाल वसूल कर लूं!"
और उसने अपने नेक विचार पर अमल किया! (लेव टॉलस्टॉय की एक कथा से)
खैर, इस क्षेपक का हिन्दी ब्लॉगरी से कोई लेना देना नहीं है। यहां कोई मालिक नहीं और कोई किसी की खाल नहीं उतारने वाला।
पर जो बात मैं अण्डर लाइन करना चाहता हूं, वह यह है कि अपने कृतित्व से हमें औरों की नजर में अपनी जरूरत बनाये रखनी चाहिये। इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में बचे रहने और आगे बढ़ने का वह एक अच्छा तरीका है।
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?! या इससे भी मूल सवाल - क्या आप इस बारे में सोचते हैं?

Wednesday, July 2, 2008

एसईजेड कहां से आया बन्धुओं?



बहुत ठेलाई चल रही है तहलका छाप पत्र-पत्रिकाओं की। एक ठो नन्दी भी बड़े हैण्डी बन गये हैं। ऐसा लग रहा है कि "दास-कैपीटल" के बाद सबसे अथॉरिटेटिव कुछ है तो तहलका है!
हमें लग रहा है कि हम भी कहीं से कुछ पढ़ कर ठेल दें, ताकि सनद रहे कि दखिनहे ही सही, पढ़वैया तो हैं!
ई देखें - चाइना डेली अपने हियां के एसईजेड के कसीदे में बन्दे मातरम कर रहा है। बकिया, एसईजेड के कॉन्सेप्ट को बताता है कि भारत ने सन ८० के पहले इसकी अधकचरी कोशिश की थी। वह तो चीन ही था जिसने इस विचार को चमका कर लागू किया।
यह चाइना डेली के भलमनई (भद्रपुरुष) - यू न्यू जी कहते हैं चीन में भी श्रमिक सम्बन्धों और जमीन के प्रयोग की मुश्किलें हैं जरूर, पर चीन की सरकार बहुत दरियादिल है कम्पन्सेशन और पुनर्वसन के प्रोग्राम में। काश भारत को ऐसी दरियादिल सरकार मिल पाती! अगले चुनाव में भारत की जनता शायद ध्यान रखे!
हम तो यू न्यू जी के विचारों से गदगद हैं। पता नहीं भारत के गदगद पॉलितब्यूरो के क्या विचार हैं?


वैसे, बाई रिमोट चांस, अगर साम्यवादी दल का अगला प्रधानमन्त्री बनता है तो हमारी पसंद - बुद्धदेब भट्टाचारजी!

"हलचल" का मानो या न मानो:

दो रेक कोयले के फलाने थर्मल पावर हाउस में खाली नहीं हो रहे। ९-१० घण्टे में खाली होने चाहियें, पर ४८ घण्टे हो गये। कारण - टिपलर (वह संयंत्र जिसपर वैगन पलटा कर कोयला नीचे पिट में गिराया जाता है, फिर वहां से कोयला कन्वेयर बेल्ट से पावर हाउस में जाता है) काम नहीं कर रहे। टिपलर इसलिये काम नहीं कर रहे, क्यूंकि बिजली नहीं आ रही!!! क्या बतायें, बिजली बनाने वाले के पास अपना कोयला उतारने के लिये बिजली नहीं है! Thumbs-down

Tuesday, July 1, 2008

पण्डित नेहरू का मुख्य मंत्रियों को लिखा एक पत्र


यह न केवल गलत है, बल्कि विनाश का मार्ग है... ... मैने ऊपर कार्यकुशलता; और परम्परागत लीकों से बाहर निकलने की चर्चा की है। इसके लिये जरूरी है कि हम आरक्षण और किसी विशेष जाति या वर्ग को कुछ विशेष रियायतें/अधिकार देने की पुरानी आदत से निजात पायें। हमने जो हाल ही में बैठक रखी थी, जिसमें मुख्यमन्त्रीगण उपस्थित थे और जिसमें राष्ट्र के एकीकरण की चर्चा की गयी थी; उसमें यह स्पष्ट किया गया था कि सहायता आर्थिक आधार पर दी जानी चाहिये न कि जाति के आधार पर। इस समय हम अनुसूचित जातियों और जन जातियों को सहायता देने के लिये कुछ नियमों और परम्पराओं से बंधे हैं। वे सहायता के हकदार हैं, पर फिर भी मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण, विशेषत: सेवाओं में आरक्षण को पसंद नहीं करता। मुझे उस सब से घोर आपत्ति है जो अ-कार्यकुशलता और दोयम दर्जे के मानक की ओर ले जाये। मैं अपने देश को सब क्षेत्रों में प्रथम श्रेणी का देश देखना चाहता हूं। जैसे ही हम दोयम दर्जे को प्रोत्साहित करते हैं, हम दिग्भ्रमित हो जाते हैं।
वास्तव में सही तरीका यही है किसी पिछड़े समूह को प्रोत्साहन देने का, कि हम उसे अच्छी शिक्षा के अवसर उपलब्ध करायें। और अच्छी शिक्षा में तकनीकी शिक्षा भी आती है, जो कि उत्तरोत्तर अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसके अलावा अन्य सभी सहायता किसी न किसी मायने में बैसाखी है जो शरीर के स्वास्थ्य के लिये कोई मदद नहीं करती। हमने हाल ही में दो बड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं: पहला, सब को मुफ्त प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने का है, जो आधार है; और दूसरा, सभी स्तरों पर प्रतिभाशाली लड़कों-लड़कियों को शिक्षा के लिये वजीफा देने का1; और यह न केवल सामान्य क्षेत्रों के लिये है वरन, कहीं अधिक महत्वपूर्ण रूप में, तकनीकी, वैज्ञानिक और चिकित्सा के क्षेत्रों में ट्रेनिंग के लिये भी है। मुझे पूरा यकीन है कि इस देश में प्रतिभा का विशाल भण्डार है, जरूरत है कि हम उसे सुअवसर प्रदान कर सकें।
पर अगर हम जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण करते हैं तो हम प्रतिभाशाली और योग्य लोगों को दलदल में डाल देंगे और दोयम या तीसरे दर्जे के बने रहेंगे। मुझे इस बात से गहन निराशा है, जिस प्रकार यह वर्ग आर्धारित आरक्षण का काम आगे बढ़ा है। मुझे यह जान कर आश्चर्य होता है कि कई बार पदोन्नतियां भी जाति और वर्ग के आधार पर हो रही हैं। यह न केवल गलत है, वरन विनाश का मार्ग है।
हम पिछड़े समूहों की सब प्रकार से सहायता करें, पर कभी भी कार्यकुशलता की कीमत पर नहीं। हम किस प्रकार से पब्लिक सेक्टर या, कोई भी सेक्टर दोयम दर्जे के लोगों से कैसे बना सकते हैं?
(पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी, भारत के प्रधानमंत्री, का २७ जून १९६१ को मुख्यमन्त्रियों को लिखा पत्र, जो अरुण शौरी की पुस्तक - FALLING OVER BACKWARDS में उद्धृत है।)  



1. मुझे यह कहना है कि इस निर्णय का ही परिणाम था कि मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर पाया। अगर मुझे राष्ट्रीय छात्रवृत्ति न मिली होती, तो मैं नहीं जानता कि आज मैं किस स्तर पर होता। नेशनल साइंस टेलेण्ट सर्च वाली छात्रवृत्ति भी शायद इसी निर्णय का परिणाम रही हो; पर प्योर साइंस में भविष्य नजर न आने की सोच ने उस विकल्प को नहीं अपनाने दिया। आज लगता है कि वह शायद बेहतर विकल्प होता।

» कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो तो क्षमा याचना करता हूं। उनके जैसा अच्छा मित्र और टिप्पणीकार खोना नहीं चाहता मैं।

» कल मैने सोचा कि समय आ गया है जब बिजनेस पेपर बन्द कर सामान्य अंग्रेजी का अखबार चालू किया जाय। और मैने इण्डियन एक्सप्रेस खरीदा। उसमें मुज़ामिल जलील की श्रीनगर डेटलाइन से खबर पढ़ कर लगा कि पैसे वसूल हो गये। उस खबर में था कि तंगबाग के श्री मुहम्मद अब्दुल्ला ने फंसे ३००० अमरनाथ यात्रियों को एक नागरिक कमेटी बना कर न केवल भोजन कराया वरन उनका लोगों के घरों में रात गुजारने का इन्तजाम किया। यह इन्सानियत सियासी चिरकुटई के चलते विरल हो गयी है। सलाम करता हूं तंगबाग के श्री मोहम्मद अब्दुल्ला को!