Monday, February 11, 2008

साइकल और बदला समय


मेरी पत्नी और मैं सड़क पर चल रहे थे। पास से एक छ-सात साल का बच्चा अपनी छोटी साइकल पर गुजरा। नये तरह की उसकी साइकल। नये तरह का कैरियर। टायर अधिक चौड़े। पीछे रिफ्लेक्टर का शो दार डिजाइन। आगे का डण्डा; सीधा तल के समान्तर नहीं, वरन तिरछा और ओवल क्रास-सेक्शन का। इस प्रकार का कि साइकल लड़कियां भी सरलता से चला सकें। यही साइकल नहीं; आजकल हमने विविध प्रकार की साइकलें देखी हैं। एक से एक लुभावनी।


मुझे अपने बचपन की याद हो आयी। मेरे पिताजी के पास एक साइकल थी – रेले ब्राण्ड की। उसपर वे लगभग २० किलोमीटर दूर अपने दफ्तर जाते थे। सवेरे साढ़े आठ बजे निकलते थे दफ्तर के लिये और वापस आते आते रात के साढ़े आठ बज जाते थे। साइकल मुझे रविवार के दिन ही नसीब होती थी। उस दिन कैंची मार कर साइकल चलाना सीखता था मैं। उसी तरह बड़े साइज की साइकल सीखी। फिर उछल कर पैर दूसरी ओर करना सीखा – जिससे सीट पर बैठा जा सके। बड़े साइज की साइकल होने से पैडल पर पैर पूरे नहीं आते थे। लिहाजा पैर न आने पर भी चलाने का अभ्यास किया।


गरीबी के भी दिन थे और भारत में अलग-अलग लोगों की आवश्यकता के अनुसार उत्पाद भी नहीं बनते थे। बच्चों के मार्केट को टैप करने का कोई अभियान नहीं था। जितनी भी इण्डस्ट्री थीं, वे जरूरत भर की चीजों को सप्लाई करने में ही हांफ रही थीं। ज्यादातर चीजों की ब्लैक हुआ करती थी। कृषि प्रधान देश होने पर भी हम पीएल ४८० का गेहूं खाते थे; और नेहरू जी की समाजवादी नीतियों की जै जैकार किया करते थे।


मुझे पहला ट्रंजिस्टर रेडियो बिट्स पिलानी में जाने के दूसरे वर्ष में मिला; जो मैने अपनी स्कॉलरशिप के पैसे में बचा कर भागीरथ प्लेस की किसी दुकान से लोकल ब्राण्ड का खरीदा था। उसके बाद ही बीबीसी सुनना प्रारम्भ किया। वह सुनना और दिनमान पढ़ने ने मेरे विश्व ज्ञान का वातायन खोला।


लम्बे समय तक किल्लत और तंगी का दौर देखा हमारी पीढ़ी ने। अत: अब बच्चों को नयी नयी प्रकार की साइकलें और नये नये गैजेट्स लिये देख कर लगता है कि कितना कुछ हम पहले मिस कर गये।


आज के बच्चे भी मिस करते होंगे जो हमने किया – देखा। अपने मुहल्ले की रामलीला के लिये कोई पात्र बनने को कितने चक्कर लगाये होगें उन मैनेजर जी के पास। यह अच्छा हुआ कि मैनेजर जी को हमारी शक्ल पसन्द नहीं आयी। स्कूल के डेस्क के उखड़े पटरे से बैट और कपड़े के गोले पर साइकल ट्यूब के छल्लों को चढ़ा कर बनाई गेंद से हम क्रिकेट खेलते थे। स्कूल में नया नया टेलीवीजन आया था। एक पीरियड टेलीवीजन का होता था, जिसमें सारे खिड़की-दरवाजे और लाइटें बंद कर सिनेमा की तरह टीवी दिखाया जाता था! किराने की दुकान वाला किराये पर किताबें भी दिया करता था। वह इधर उधर जाता था तो मैं उसकी दुकान दस पन्द्रह मिनट सम्भाल लिया करता था। लिहाजा सस्ते रेट पर “किस्सा-ए-रहमदिल डाकू” के सभी वाल्यूम मैने पढ़ डाले थे। उस उम्र में मेरे साथी अपनी कोर्स की किताबें मुश्किल से पढ़ते थे। हमारे बचपन में बहुत कुछ था और बहुत कुछ नहीं था। निम्न मध्यवर्गीय माहौल ने अभाव भी दिये और जद्दोजहद करने का जज्बा भी।


समय बदल गया है। भारत की तरक्की ने उत्पादों का अम्बार लगा दिया है। पैसे की किल्लत नहीं, अपनी क्रियेटिविटी की सीमायें तय करने लगी हैं जीवन के रंग। और उत्तरोत्तर यह परिवर्तन तेज हो रहा है।


कोई बच्चा अपनी नयी साइकल पर सामने से गुजर जाता है तो यह अहसास और गहराई से होने लगता है।


वर दे वीणावादिनि वर दे!
वसंत पंचमी शुभ हो!

रविवार का लेख - एक और अंगुलिमाल

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Sunday, February 10, 2008

एक और अंगुलिमाल


स्वामी जगदात्मानन्द ने कन्नड़ भाषा में युवकों को नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की तरफ आकर्षित करने को एक पुस्तक लिखी थी। उसका अन्य भाषाओं में अनुवाद छपा। उनकी इस पुस्तक “जीना सीखो” को अद्वैत आश्रम, कोलकाता ने छापा है। उस पुस्तक में एक प्रसंग एक ऐसे किशोर और ऐसे फादर का है जो हमें बताता है कि कैसे भी अपराधी को सुधरा जा सकता है।

यह पढ़ते हुये मुझे अंगुलिमाल और गौतम बुद्ध की याद हो आई। भगवान बुद्ध ने तो अपने मोहक व्यक्तित्व और एक संक्षिप्त वार्तालाप से ही अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन कर दिया था; पर फादर हम लोगों के अधिक नजदीकी रोल माडल बन सकते हैं।


आप कृपया स्वामी जगदात्मानन्द की पुस्तक के संशोधित अंश पढ़ें:


अमेरिका के फादर एडवर्ड जोसेफ फ्लेनगन (१८८६-१९४८) कैथोलिक प्ररम्परा के एक पुरोहित थे। उन्होने उन किशोर अपराधियों को सुधारने का बीड़ा उठाया जो संगठित अपराधियों के कुसंग में पड़कर हत्या, ऊटपाट, हिंसा तथा क्रूरता जैसे कार्यों में लिप्त हो जाते थे। उनके द्वारा स्थापित ’बालनगर’ में सभी जातियों तथा सम्प्रदायों के अनाथ बालक थे। … फादर फ्लेनगन का विश्वास था बच्चों को झिड़की, गाली या सजा के द्वारा नहीं, बल्कि उनके समक्ष एक अनुकरणीय आदर्श चरित्र प्रदर्शित करके ही उनका दिल जीत कर सुधारा जा सकता है। “बालनगर के फादर फ्लेनगन” नामक पुस्तक में वर्णित निम्न लिखित घटना से पता चलता है कि किस प्रकार उन्हें एक अत्यन्त हिन्सक और क्रूर किशोर को सुधारने में सफलता मिली थी।


एड्डी चार वर्ष की उम्र में ही अनाथ हो गया था। आठ वर्ष की अवस्था में वह एक अपराधी संगठन का नेता बनने की योग्यता हासिल कर चुका था।

इन शब्दों ने एड्डी के मर्मस्थल का स्पर्श किया। क्षण भर वह मौन सोचता रहा। वह मेज के दूसरी ओर खड़े फादर फ्लेनगन के पास गया। फ्लेनगन ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया। एड्डी की आंखों से आंसू फूट कर उसके कपोलों को भिगोने लगे।
यह विचित्र बात थी कि उसके दल में बाकी सभी अपराधी उससे उम्र में बड़े थे। यहां तक कि युवकों ने भी इस बालक को अपना नेता मान लिया था। एड्डी ने हत्यायें की थीं। एक चुराई पिस्तौल की सहायता से उसने अनेक होटलों को लूटा। अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिये उसने अकेले ही बैंक को लूटा था। एक बार जब वह एक वृद्धा की हत्या करने के लिये गोली चलाने जा रहा था, तब उसे सुरक्षा बल के लोगों ने पकड़ लिया।


जब वह फादर फ्लेनगन के बालनगर में आया तो उसे पुलीस का जरा भी भय न था। वह जान बूझ कर बदमाशी करता, धौंस जमाता, लूट खसोट करता और अभद्र भाषा का प्रयोग करता। वह फादर फ्लेनगन जैसे व्यक्ति के लिये भी बुरे शब्दों का प्रयोग करता। हर चीज को घृणा की दृष्टि से देखता। …. बाल नगर में उसे आये छ महीने हो गये पर उसके चेहरे पर न तो कभी हंसी आयी और न कभी एक कतरा आंसू भी बहा। लोगों को लगता था कि उसमें नख से शिख तक विष ही विष भरा है।

एक रात सोते समय एड्डी कराह रहा था। फादर फ्लेनगन देखते ही समझ गये कि उसे तेज बुखार है। यद्यपि वे एड्डी के उपद्रवों से बहुत कष्ट उठा चुके थे, फिर भी पूरे स्नेह-यत्न से उन्होनें एड्डी की सेवा की। बीमारी से उठने के बाद भी फादर फ्लेनगन और सभी शिक्षक-सहपाठी एड्डी की ओर विशेष स्नेह और सद्भाव दिखाते रहे। वरिष्ठ लड़के उसे मनोरंजन के लिये सिनेमा ले जाते। उसके भोजन पर अतिरिक्त ध्यान दिया जाता। पर एड्डी के चेहरे पर मुस्कान का कोई चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं हुआ।


एक दिन एड्डी फादर फ्लेनगन के कार्यालय में सीधा पंहुच कर बोला – “तो आप लोग मुझे अच्छा लड़का बनाना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि आप सफल होंगे? अभी मैं मेट्रन को लात मार कर आ रहा हूं। इस पर आपको क्या कहना है?”

फ्लेनगन ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया – “मुझे अब भी पूरा विश्वास है कि तुम मूलत: एक अच्छे लड़के हो।“

“अभी मैने आपको क्या कहा? इसके बावजूद आप वही झूठ दोहराते जा रहे हैं। आप जानते हैं कि मैं एक अच्छा लड़का नहीं हूं। बारबार झूठ बोल कर आप अपने को झुठ्ठा प्रमाणित नहीं कर रहे?”


फ्लेनगन को लगा कि एड्डी का जीवन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आ गया है। उन्होने एड्डी से पूछा – “बताओ तो एक अच्छे लड़के की क्या पहचान है? यही न कि वह अपने से बड़े का कहना मानता है?”


एड्डी ने हां में सिर हिलाया।


फ्लेनगन ने कहा – “तो वही तो तुम करते रहे हो। परन्तु एड्डी, यहां से पहले तुम्हे अच्छे और भले शिक्षक नहीं मिले। आवारा लोग तुम्हारे मार्ग दर्शक थे। और तुमने उन्ही का कहना माना। तुमने उनका अनुसरण किया और तुम सोचने लगे कि तुम सचमुच बुरे हो। परन्तु तुम अच्छे शिक्षकों का अनुसरण करो तो तुम भी अच्छे बन जाओगे।“

इन शब्दों ने एड्डी के मर्मस्थल का स्पर्श किया। क्षण भर वह मौन सोचता रहा। वह मेज के दूसरी ओर खड़े फादर फ्लेनगन के पास गया। फ्लेनगन ने उसे अपने आलिंगन में भर लिया। एड्डी की आंखों से आंसू फूट कर उसके कपोलों को भिगोने लगे।


दस वर्ष बाद एड्डी उच्च श्रेणी में पास हो कर ग्रेज्यूयेट हो गया। सेना में भर्ती हो कर उसने युद्ध में भाग लिया। उसे विशिष्टता के लिये कई पुरस्कार मिले। अपने मित्र – परिचितों से भी उसे स्नेह - सम्मान मिला। अब वह सबकी नजरों में एक विश्वस्त और ईमानदार व्यक्ति बन चुका था।


ऊपर जो मैने प्रस्तुत किया है; उसमें मुझे दो बातें स्पष्ट होती हैं। एक तो अपना लेखन - फेटीग (writing fatigue )। जो यदा कदा असर करता है - इस समय कर रहा है। और दूसरा यह कि ब्लॉग पर वैल्यू एडीशन के बारे में सोच किसी नतीजे पर पँहुचना जरूरी है। मानवीय मूल्यों को अण्डरस्कोर करना शायद लास्टिंग वैल्यू प्रदान करता है।

पर क्या यह ब्लॉग भी बहुत समय तक रहने वाला है? कौन जाने?!

और, बाबा आमटे को श्रद्धांजलि।


दिल्ली में रेल भवन में सभागार में विभिन्न पुरानी रेलवे के मोनोग्राम के चित्र टंगे हैं। तीन एक साथ टंगे मोनोग्रामों के चित्र का अवलोकन करें। ये साउथ इण्डियन रेलवे, ईस्टर्न रेलवे और साउथ ईस्टर्न रेलवे के मोनोग्राम है। इनमें हाथी, स्टीम इन्जन और बाघ के चित्र हैं। बीच वाले मोनो पर वर्ष लिखा है - १८८४.



Saturday, February 9, 2008

बारनवापारा और पंकज अवधिया के संस्मरण


पंकज अवधिया जी ने अपने ब्लॉग "हमारा पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान" पर बारनवापारा अभयारण्य में अपने अनुभवों के विषय में दो पोस्टें लिखी हैं। पहली पोस्ट में बघेरा, जंगली सूअर, बंदर, चीतल और सांभर आदि के मानव आबादी के संसर्ग में पानी और भोजन की तलाश में आने और उनकी पोचिंग (अवैध शिकार) का जिक्र है। दूसरी पोस्ट में तोतों की विभिन्न प्रजातियों के बारे में वहां के अनुभव हैं। यह दोनो पोस्ट आपको ईकोपोर्ट पर उपलब्ध अंग्रेजी के अवधिया जी के लेखों पर ले जाती हैं। जाहिर है कि पोस्ट और पोस्ट से लिंक पर जा कर अंग्रेजी में पढ़ने की जहमत कोई कोई ही उठाता होगा।
पर आप यह लेख पढ़ें तो आपको हमारे ही देश - प्रान्त में पाई जाने वाली जीव विविधता और उनकी समस्याओं पर संतृप्त जानकारी मिलेगी। टूरिस्टों के आने से जीव असहज होते हैं - यह मैने पढ़ा था। पर उनके आने से जीवों के अवैध शिकार पर लगाम लगती है - यह कोण मुझे इन पोस्टों के माध्यम से पता चला। घर में पाले जा सकने वाले तोतों की नस्ल विकसित करने का विचार उन्होंने लिखा है जो मुझे अनूठा लगता है।
उन्होंने तुइया मिठ्ठू और करन तोते के बारे में लिखा है। यह भी बताया है कि तोता छूटने पर वापस नहीं आता। तभी - "हाथ से तोते उड़ना" का मुहवरा प्रचलन में आया। उन्होंने यह भी बताया है कि पालने वाले तोतों को लोग शहरी पदार्थ खिलाते हैं - जो उनका नैसर्गिक खाद्य नहीं है। पर पारम्परिक चिकित्सक इन तोतों द्वारा खाये जंगली फलों को चिकित्सा में प्रयोग करते हैं।
बहुत लिखा है अवधिया जी नें। ईकोपोर्ट पर निश्चय ही बड़ा शोधकार्यरत पाठक वर्ग इनको पढ़ता होगा। हमरे जैसे सिरफिरे शौकिया लोग तो यदा कदा इन लेखों पर आते होंगे। पर हमारे जैसे शौकिया पाठकों के लिये १५-२० दिन में एक वाकया जीवों के विषय में और इकोपोर्ट से बचाया हुआ एक दो फोटो वे दे दिया करें तो हम अपने ब्लॉग को इन्द्रधनुषी बना सकें। मैं अपनी पोस्ट "पशुओं के सानिध्य में" यह इच्छा जाहिर भी कर चुका हूं।
पंकज मुझसे उम्र में छोटे हैं। लगभग मेरी उम्र के श्री दीपक दवे को वे बड़ा भाई मानते हैं। छोटों से सामान्यत: ईर्ष्या नहीं होती। पर पँकज जी की ऊर्जा देख ईर्ष्या अवश्य होती है।


Thursday, February 7, 2008

उच्च साधकों की निश्छलता की याद


यह रीता पाण्डेय की पारिवारिक पोस्ट है। इसका टाइपिंग भर मेरा है। अनूप शुक्ल जी को स्पष्ट करता हूं कि इसमें मेरा टाइपिंग और चित्र संयोजन के अलावा कोई योगदान नहीं है। :-)
ज्ञान की पोस्ट "महेश चन्द्र जी से मुलाकात" में पंकज अवधिया जी टिप्पणी में कहते हैं कि महेश जी अगर निश्छल मन से कुछ लिख देंगे तो मुश्किल में पड़ जायेंगे।  पता नहीं मुश्किल में पड़ेंगे या नहीं; पर यह टिप्पणी ऐसे लोगों की निश्छलता की यादें मेरे मन में ला गयी।
 
निश्चय ही ये साधक और ज्ञानीजन निश्छल और सरल होते हैं। इनका ज्ञान हमें आतंकित नहीं करता। मुझे रतलाम में श्री अरविन्द आश्रम में होने वाले स्वाध्याय शिविर याद हो आये। इस आश्रम में सन १९९० में श्री अरविन्द के देहांश की समाधि स्थापना की गयी थी। देहांश स्थापना के बाद से वहां प्रतिवर्ष स्वाध्याय शिविर ५ से ९ दिसम्बर को आयोजित होता है।

««« प्रारम्भिक वर्षों में ड़ा. हीरालाल माहेश्वरी श्री अरविन्द के किसी लेखन पर अपने व्याख्यान देते और स्वाध्याय का संचालन करते थे। डा. माहेश्वरी अत्यन्त कुशल वक्ता, आकर्षक व्यक्तित्व और बड़े विद्वान थे। वे पॉण्डिच्चेरी के आश्रम में बहुत वरिष्ठ साधक थे। स्वाध्याय के समय उनका प्रवचन और उन्मुक्त ठहाका पूरे परिसर में गूंजता था। वातावरण कभी बोझिल नहीं होता था। (चित्र - ड़ा. माहेश्वरी क्षेत्रीय प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर में प्रशिक्षुओं को सम्बोधित करते हुये।) 

माहेश्वरी जी ने स्वाध्याय के दौरान कभी यह बताया था कि किस तरह श्री मां पाण्डिच्चेरी आश्रम की देखभाल करती थीं। वे दिन भर आश्रम में घूमती रहती थीं। छोटी छोटी बातों को समझाती थीं। वे रसोईं घर में खास तौर पर वहां जाती थीं, जहां बर्तन धोये जाते थे। श्री मां लोगों को थाली-चम्मच पोंछना सिखाती थीं। श्री मां ने अपनी देखरेख में बर्तन धोने के टैंक बनवाये। उनके बनाये सिस्टम में साबुन पानी, गरम पानी और ठण्डे पानी से गुजरता बर्तन चमचमाता हुआ निकलता था। माहेश्वरी जी कहते थे कि लोगों को यह आश्चर्य होता था कि इतनी उच्च साधिका छोटी-छोटी बातों पर इतना ध्यान देती है।

बाद में माहेश्वरी जी एक बार हमारे पास उदयपुर आये थे। हमारे घर में दो दिन रुके थे। नहाने के बाद वे अपना कपड़ा स्वयम धो लेते थे। धोने के बाद मैने उनसे कपड़े मांगे - लाइये मैं धूप में फैला देती हूं। उन्होंने कहा - आओ मैं तुम्हें धोती फैलाना सिखाता हूं। उन्होंने बड़ी नफासत से धोती फैलाई। वे मुझे बताते भी जा रहे थे। मैं उन्हें अपलक देख और सुन रही थी - दर्शन शास्त्र में डाक्टरेट, सरदार पटेल विश्वविद्यालय मे‍ श्री अरविन्दो चेयर को सुशोभित करने वाले, महान साधक कितनी सरलता और विस्तार से मुझे धोती फैलाना सिखा रहे थे!

पाण्डिच्चेरी में मैं एक बार श्री माधव पण्डित जी से मिली थी। वे श्री मां के अत्यन्त नजदीक थे। उनकी एक पुस्तक के बारे में ज्ञान ने इस ब्लॉग पर लिखा भी है। उन्होनें भी छोटी छोटी बातें बड़े संयम से बताई हैं - किसी को उधार नहीं देना चाहिये, क्योंकि आप तगादा करेंगे तो उसे अप्रिय लगेगा और शत्रुता भी हो सकती है। अगर आप समर्थ हैं तो उपहार में दे दीजिये। नेकी कर दरिया में डाल का रस्ता अपनायें।
 
मैं रतलाम के श्री अरविन्द आश्रम में पण्डित छोटे नारायण शर्मा जी से भी मिली थी। वे आश्रम के कार्यों को ऊडीसा में विस्तार दे रहे थे। रतलाम में उनका ढ़ाई घण्टे का व्याख्यान "कुरुक्षेत्र में कृष्ण की भूमिका" पर था। हम पूरी गम्भीरता से डायरी-कलम ले कर बैठे थे। पर व्याख्यान प्रारम्भ होने पर डायरी-कलम अलग छूट गयी। हम सभी ठहाकों के साथ उन्हें सुनने लगे। इतने गम्भीर विषय पर इतनी सरलता से उन्होंने कहा कि आत्मसात करने में शायद ही कोई कठिनाई हुई हो किसी को।

रतलाम आश्रम के संस्थापक श्री स्वयमप्रकाश उपाध्याय जी ने जब श्री छोटेनारायण शर्मा जी से मेरा परिचय कराया तो छोटे नारायण जी ने मुझे कहा - "स्कूल के बच्चों के बीच मुझे बहुत आनन्द आया। आपका बेटा बहुत तीव्र बुद्धि का है। उसने दो-एक प्रश्न मुझसे किये थे।"

हैं मैने छूटते ही कहा - "सर, वह बहुत लापरवाह है। अपना सामान बहुत अस्त व्यस्त रखता है।" उन्होने मुझसे पूछा - "इस संसार में सबसे व्यवस्थित कौन हुआ है?" फिर स्वयम ही उत्तर दिया - "रावण। भला रावण से ज्यादा व्यवस्थित कौन हो सकता है? वह विद्वान था। चक्रवर्ती सम्राट था। महान धनुर्धर था। ज्योतिषाचार्य था। संगीत विशारद था। और वानर-भालू पेड़ों-जंगलों पर पलने वाले और असभ्य जाति। पर श्री राम ने उनकी सेना बना रावण की चतुरंगिनी सेना से टक्कर ली। सभ्यता और असभ्यता की परिभाषा हमारी छुद्र बुद्धि से नहीं बनती। ईश्वर अपने कार्यों के लिये किसे कैसे चुनते हैं - यह हम नहीं जानते। आखिर कृष्ण अर्जुन से कहते ही हैं कि काम तो मैं किसी से भी कैसे भी करा लूंगा। तेरे समक्ष तो अवसर है - निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन!"

ये विद्वान लोग अपने पाण्डित्य से आतंकित नहीं करते थे वरन अपनी सरलता से अकर्षित करते थे।

- रीता पाण्डेय


उक्त वर्णित साधकों की कुछ पुस्तकों का चित्र -


Wednesday, February 6, 2008

वनस्पतियों पर आश्चर्यजनक जानकारियाँ


यह पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। पंकज जी अपने व्यस्त वानस्पतिक अनुसंधान में समय निकाल कर प्रतिसप्ताह हिन्दी में हमारे लिये जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं। उनके पिछले लेख आप पंकज अवधिया के लेबल पर क्लिक कर देख सकते है।

इस बार वे कुछ वनस्पतियों के कुछ विरोधाभासी गुणों पर रोचक और काम की जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं। आप पढ़ें -





इस बार मै आपको अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणों के दौरान एकत्र की गयी कुछ अजीबो-गरीब पर उपयोगी जानकारियों के विषय मे बताने की कोशिश करूंगा।

 

आप सब अमलतास को तो जानते ही होंगे। जल्दी ही आप इसके स्वर्ण पुष्पों को देख पायेंगे। ऐसा लगेगा जैसे कि पूरा वृक्ष सोने से लदा हुआ है। यही कारण है कि इसे जंगल झरना, धनबहेर या धनबोहार भी कहा जाता है। इसके बीजों को खाने से पेट साफ होता है। पर अधिक मात्रा से दस्त होने लगते हैं। इस दस्त को रोकने के लिये उसी पेड की पत्तियो को भूनकर दिया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब (बीज के बिना) पत्तियों को इसी रूप मे खाया जाता है तो इससे दस्त होने लगते हैं। बीजो के प्रयोग के बाद इसके प्रयोग से दस्त का रूकना और सीधे इसके प्रयोग से दस्त का होना बडा ही अजीब करिश्मा है माँ प्रकृति का।


आपने केवाँच का नाम तो सुना ही होगा और बचपन मे हममे से कईयो ने तो होली मे खुजली के लिये शरारतपूर्वक इसका प्रयोग भी किया होगा। जंगल मे जब केवाँच के बीजो का एकत्रण किया जाता है तो पूरे पौधे को जला दिया जाता है और बीज एकत्र कर लिये जाते है पर इससे अधिक ताप के कारण बीजो को नुकसान पहुँच सकता है। पारम्परिक चिकित्सक दूसरा उपाय अपनाते हैं। वे कहते हैं कि जंगल में जहाँ केवाँच उगती है, वहाँ पर एक विशेष प्रकार की वनस्पति अवश्य उगती है। वे इसे स्थानीय भाषा मे ममीरा कहते है। यह असली ममीरा से अलग होती है। केवाँच के बीज एकत्र करने से पहले वे इस वनस्पति को चबा लेते है। आश्चर्यजनक रूप से इससे केवाँच से होने वाली खुजली नही होती है और वे सुगमतापूर्वक यह कार्य कर लेते है।


केवाँच के चित्रों की कड़ी


आप समय-समय पर यह पढते-सुनते रहते है कि सरसो के तेल मे मिलावट से ड्राप्सी नामक बीमारी हो गयी। यह मिलावट सत्यानाशी नामक वनस्पति के बीजों की होती है जो कि सरसो के समान दिखते हैं। यह वनस्पति बेकार जमीन मे अपने आप उगती है। यह कहा जाता है कि यह सरसो के खेत मे उगती है और यहीं पर इसके बीज अपने आप सरसो के साथ मिल जाते है पर वास्तव मे बडे पैमाने पर ग्रामीणों से इसका एकत्रण करवाया जाता है और फिर इसे सरसो मे मिलाया जाता है। देश के पारम्परिक चिकित्सक इस वनस्पति और इसके गलत प्रयोग दोनो ही को जानते हैं। पर वे इस वनस्पति के एक अनोखे गुण को भी जानतहैं। बीजो से निकलने वाले जिस तेल से ड्राप्सी होती है उसी ड्राप्सी को पत्तियो के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है। है न विचित्र बात?


सत्यानाशी के चित्रों की कड़ी

 

सर्पगन्धा नामक भारतीय वनस्पति के दिव्य गुणों से प्रभावित होकर जब आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियो ने उसकी जड़ से रिसर्पिन अलग कर हृदय रोगो मे उपयोग आरम्भ किया तो कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आने लगे। ये दुष्प्रभाव उस समय नही होते जब पारम्परिक चिकित्सा मे इसका प्रयोग इन्ही रोगो की चिकित्सा मे होता है। यह पता लगाने के लिये अध्ययन किये गये तो राज खुला कि जड़ का जब प्रयोग किया जाता है तो उसमे रिसर्पिन के अलावा कई ऐसे प्राकृतिक रसायन होते है जो रिसर्पिन के दुष्प्रभावो को समाप्त कर देते हैं। जबकि अकेले रिसर्पिन नुकसानदायक सिद्ध होता है।


सर्पगन्धा के चित्रों की कड़ी

 

एक और उदाहरण। एलो वेरा की पत्तियों के आधार से एक पीला द्रव निकलता है। यह द्रव त्वचा रोग पैदा करता है। पर यदि पत्तियों के ऊपरी भाग के अन्दर का रस का प्रयोग किया जाये तो इस त्वचा रोग से मुक्ति मिल जाती है।

 

ये निश्चित ही माँ प्रकृति के चमत्कार है। पर मै तो उन देव पुरुषो को भी कम नही मानता हूँ जिन्होने इन गुणों का पता लगाया।

 

@@@@@@@@

 

पिछली पोस्ट मे मैने भोजन तालिकाओ की बात की थी। ये तालिकाएं कैसी होती है यह आप भी जानें। ये तालिकाए एक विशिष्टजन के लिये बनायी गयी हैं।

आप उदाहरण स्वरूप इन्हे इस कडी पर देख सकते है।

 

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया जी का है।


कल मेरे घर पर "मीठा दिन" था। भरतलाल के जन्मदिन के अवसर पर नाश्ते में जलेबी मिली। भरत ने सभी बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद लिया।

दिन में मेरे ससुराल से सूरज पासवान नये गुड़ की पोटली लेकर आया। नया मीठा गुड़।

शाम को बिल्कुल सरप्राइज के रूप में भरतलाल एक अच्छा केक लाया। आनन फानन में एक खूबसूरत मोमबत्ती का इन्तजाम हुआ। भरत ने केक काटा। सब ने ताली बजाई। मां ने भरत को उपहार दिया। आप केक काटते भरत लाल की फोटो देखें।



Tuesday, February 5, 2008

पाब्लो नेरूदा की एक कविता


पाब्लो नेरूदा की कुल एक कविता पुस्तक मेरे पास है - उनकी हिन्दी में दिनेश कुमार शुक्ल द्वारा अनुदित २३ कविताओं का संग्रह। उसमें से यह कविता मुझे प्रिय है।
शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग पर मेरा परिचय है - "हर विषय में प्रश्न करने - उत्तर मिले चाहे न मिले की आदत रखते हैं"। यह कविता उसी आदत के चलते पसंद है!
आखिरकार कब तक?


आखिरकार कितना जी पाता है आदमी?

हजार दिन कि एक दिन?

सिर्फ़ एक सप्ताह या कि सदियों तक?

मरते वख्त कितना समय लेता है आदमी?

’हमेशा के लिये’ आखिर इसके मानी क्या हैं?

 

इसी झंझट में डूबा हुआ मैं

जुट जाता हूं उलझन सुलझाने में

 

तलाशा मैने ज्ञानी पुरोहितों को

पूजा ऋचा के बाद मैने उनकी भी सेवा की

टुकुर टुकुर ताकता रहा उन्हें जब

वह जाते थे मिलने

खुदा और शैतान से

 

ऊब गये वह सब भी मेरी जिज्ञासा से

दरअस्ल खुद भी वह

जानते थे कितना कम

पार कर दुनियां जहान घर लौटा मै

बहुत-बहुत ज्यादा बुढ़ाया हुआ

अब मैं किसी से कुछ नहीं पूछता

और दिन ब दिन 

मेरा ज्ञान छीजता जाता है।
उनमें और तहसीलदार में फर्क ही क्या था?

 

दौरान तहकीकात मिला

डाक्टरों से भी मैं

डाक्टर जो हाथ में नश्तर संभाले

दवाओं की गंध में रचे बसे

किस कदर व्यस्त थे

किस्सा कोताह बातों से उनकी

निचोड़ यह निकला –

समस्या यह नहीं कि बीमारी

के कीटाणु नष्ट कैसे किये जायें –

वह तो मनों और टनों रोज

मरते ही रहते हैं – असल यह

समस्या है कि

दो चार जो

बच निकलते हैं उनमें

बच निकलने की खब्त

पैदा कैसे हो जाती है?

 

तो साहब मुझे

ऐसी अचकचाहट में छोड़ गये

बेटे धन्वन्तरि के

घबराकर मैने तलाश शुरू की

कब्र खोदने वालों की

मैं नदियों के तट पर

घूमा शमसानों में

जहां शाप ग्रस्त सम्राटों का

दाह-कर्म होता था

जहां हैजा हजम कर जाता था

पूरे के पूरे शहर

तो ऐसे क्रिया कर्मों के ’विशेषज्ञों’ से

पटे पड़े थे पूरे के पूरे समुद्र तट

पूरे के पूरे देश

 

मिलते ही मौका मैने छोड़ी

सवालों की झड़ी उनपर

प्रत्युत्तर में

वे मेरा ही दाहकर्म करने पर

आमादा हो उठे

और सच पूछो तो उन्हें बस यही

सिर्फ इतना ही, आता था

 

और मेरे अपने देश में

शराबनोशी के संजीदा दौर में

समझदार लोगों ने मुझको

जवाब दिया:

’कोई अच्छी सी औरत तलाश लो

आदमी बनो

और छोड़ो यह बचकानापन’

 

लोगों को इतना खुश

मैने कभी नहीं देखा था

जिन्दगी और मौत के नाम

जाम छलकाते हुये

गाते हुये

इतने

इतने विकराल व्याभिचारी!

 

पार कर दुनियां जहान घर लौटा मैं

बहुत-बहुत ज्यादा बुढ़ाया हुआ

अब मैं किसी से कुछ नहीं पूछता

और दिन ब दिन

मेरा ज्ञान छीजता जाता है।


(पाब्लो नेरूदा की कविता, अनुवादक दिनेश कुमार शुक्ल| उक्त चित्र वाली पुस्तक को अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है।)


Monday, February 4, 2008

अनाधिकृत निर्माण बचाने के उपाय


अनाधिकृत निर्माण बचाने के लिये मंदिर और राज कर रही पार्टी का ध्वज बहुत काम के हैं। आप में इस प्रकार के काम करने की ढ़िठाई पहली शर्त है। आप जरा नीचे चित्र मेयह इमारत देखें। दो मंजिला और बरसाती की निर्माण की अनुमति के स्थान पर यहां चार मंजिलें और बरसाती खड़ी हैं।
इस पोस्ट का यह जोहो राइटर मुझे विण्डोज लाइव राइटर से ज्यादा काम का लग रहा है।

निर्माण तो हो गया, पर वह स्थायी रहे - इसके लिये कगूरे पर एक मंदिर बना दिया गया है। जिससे कोई अगर अवैध निर्माण तोड़े तो पहले मन्दिर तोड़ना पड़े और धार्मिक मामला बन जाये। कोई सरकार इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहेगी। दूसरे उसपर राज कर रहे दल का झण्डा भी फहरा दिया जाये - जिससे निर्माण पोलिटिकली करेक्ट दिखाई दे।
मैं यहां जिस इमारत का चित्र दे रहा हूं वह तो चिर्कुट स्तर का अनाधिकृत निर्माण है। पर यही हथकण्डे और यही मानसिकता हाई-फाई स्तर के अवैध निर्माण और जमीन दाब अभियानों में काम में लाये जाते हैं। बस आपमें अव्वल दर्जे की ढ़िठाई के साथ साथ खुला खेल खेलने के लिये पारंगत होना, लोकल स्तर की अच्छी पोलिटिकल नेटवर्किंग और (ऑफकोर्स) दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिये।


अवैध मंजिलों के साथ मकान निर्माण

अवैध निर्माण को बचाने के लिये लाल वृत्त में मंदिर और नीले वृत्त में राज कर रहे दल का झण्डा

इस पोस्ट को लिखने में प्रयुक्त यह जोहो राइटर मुझे विण्डोज लाइव राइटर से ज्यादा काम का लग रहा है। एक तो ब्लॉगस्पॉट पर पोस्टिंग स्वीकार न करने का झंझट नहीं आ रहा जो विण्डोज लाइवराइटर से बार बार हो रहा था। दूसरे; कम्यूटरों पर गूगल गीयर उपलब्ध होने से पोस्ट एक से दूसरे कम्प्यूटर पर ऑफलाइन आसानी से एडिट कर सकता हूं। और अगर गूगल गीयर न भी हो तो भी इसका ऑनलाइन एडीटर, blogger.com के एडीटर से कहीं ज्यादा फीचर्स वाला है। अभी तो मैं इसमे उपलब्ध फीचर्स के प्रयोग (experiment) कर रहा हूं। ऊपर आप देख सकते हैं - टेबल, चित्र और पुलकोट के प्रयोग।
मेरे "जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले..." के सस्वर पाठ को सुन कर भरतलाल का मेरी मां से सन्दर्भ पुष्टिकरण संवाद - "ई उहई अहइ न दादी? जब सीरियलवा में रमणवा कैलास उठावत रहा। सिवजी अंगुठवा से चाप देहेन। रमणवा जब ओमे चपाइग त मारि लट्ट-पट्ट-कपट-झपट्ट गावइ लाग?" (दादी यह वही है न? जब टीवी सीरियल में रावण कैलाश पर्वत उठा रहा था। शिवजी ने उसे रोकने के लिये अपने अंगूठे से दबा दिया। जब रावण उसमें दब गया तब खूब लट्ट-पट्ट-कपट-झपट्ट गाने लगा?) उल्लेखनीय है कि यह रावण विरचित शिव ताण्डव स्तोत्र है। किसी सीरियल में भरतलाल ने रावण को यह स्तोत्र गाते देखा होगा कभी। वह संदर्भ बताने का यह विशुद्ध भरतलाली अन्दाज था। 

Saturday, February 2, 2008

महेश चंद्रजी से मुलाकात


महेश चन्द्र जी मेरे घर के पास नारायणी आश्रम में रहते हैं। वे इण्डियन टेलीफोन इण्डस्ट्री (आई टी आई) नैनी/मानिकपुर के डायरेक्टर पद से रिटायर हुये। कुछ समय बाद यहां आश्रम में साधक के रूप में आ गये। सम्भवत अपनी पत्नी के निधन के बाद।
उन्हे काम के रूप में अन्य जिम्मेदारियों के अलावा आश्रम के अस्पताल का प्रबन्धन मिला हुआ है। मेरी उनसे जान पहचान अस्पताल के प्रबन्धक के रूप में ही हुई थी। पहचान बहुत जल्दी प्रगाढ़ हो कर आत्मीयता में तब्दील हो गयी।
मेरी मां जब बीमार हुईं तो मुझे महेश जी की याद आयी। पर महेश जी ने फोन उठा कर जब यह कहा कि उनकी एन्जियोप्लास्टी हुयी है और वे स्वयं दिल्ली में अस्पताल में हैं तो मुझे धक्का सा लगा था।
अभी २६ जनवरी को मैं अस्पताल में अपनी अम्मा जी की रिपोर्ट लेने गया तो महेश जी वहां दिखे। हम बड़ी आत्मीयता से गले मिले। महेश जी बहुत दुबले हो गये थे। इस चित्र में जैसे लगते हैं उससे कहीं ज्यादा। मैं उनका हाल पूछ रहा था और वे मेरा-मेरे परिवार का। फिर वे अपनी आगे की योजनाओं के बारे में बताने लगे। उन्होंने कहा कि एन्जियोप्लास्टी एक सिगनल है संसार से वाइण्ड-अप का। पर वाइण्ड-अप का मतलब नैराश्य नहीं, शेष जीवन का नियोजित उपयोग करना है।
उन्होंने कहा कि उन्हे चिकित्सा के बाद कमजोरी है पर ऊर्जा की ऐसी कमी भी नहीं है। वे बताने लगे कि कितनी ऊर्जा है। ट्रेन से वापसी में उनके पास ऊपर की बर्थ थी। नीचे की बर्थ पर एक नौजवान था। उन्होने नौजवान से अनुरोध किया कि उनकी एन्जियोप्लास्टी हुई है, अत वे उनकी सहायता कर बर्थ बदल लें तो कृपा हो। नौजवान ने उत्तर दिया - "नो, आई एम फाइन हियर"। महेश जी ने बताया कि उन्हे यह सुन कर लगा कि उनमें ऊर्जा की ऐसी भी कमी नहीं है। साइड में पैर टेक कर वे ऊपर चढ़ गये अपनी बर्थ पर।
वे नौजवान के एटीट्यूड पर नहीं अपनी ऊर्जा पर बता रहे थे मुझसे। पर मुझे लगा कि कुछ लोगों को इस देश में क्या हो गया है? एक हृदय रोग के आपरेशन के बाद लौट रहे एक वृद्ध के प्रति इतनी भी सहानुभूति नहीं होती!

महेश जी सवेरे ६ बजे लोगों को प्राणायाम और आसन सिखाया करते थे। उन्हे भी हृदय रोग से दो-चार होना पड़ा। कुछ लोग बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि यह प्राणायाम आदि व्यर्थ है - अगर उसके बाद भी ऐसी व्याधियां हो सकती हैं।
पर गले का केंसर रामकृष्ण परमहंस को भी हुआ था।
फिर हृदय रोग से उबरने पर व्यक्ति महेश जी जैसा रहे जिसकी नसें थक कर हार न मान चुकी हों - उसका श्रेय व्यवस्थित जीवन को दिया जाये या नहीं?
शायद कठिन हो उत्तर देना। पर महेश जी जैसा व्यक्तित्व प्रिय लगता है।


Friday, February 1, 2008

हिन्दी ब्लॉगिंग क्या साहित्य का ऑफशूट है? - री पोस्ट


बहुत सी समस्यायें इस सोच के कारण हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग साहित्य का ऑफशूट है। जो व्यक्ति लम्बे समय से साहित्य साधना करते रहे हैं – वे लेखन पर अपना वर्चस्व मानते हैं। दूसरा वर्चस्व मानने वाले पत्रकार लोग हैं। पहले पहल, शायद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में पत्रकारिता भी साहित्य का ऑफशूट थी। वह कालांतर में स्वतंत्र विधा बन गयी। मुझे हिन्दी इतिहास की विशेष जानकारी नहीं है कि साहित्य और पत्रकारिता में घर्षण हुआ या नहीं। हिन्दी साहित्य में स्वयम में घर्षण सतत होता रहा है। अत: मेरा विचार है कि पत्रकारिता पर साहित्य ने वर्चस्व किसी न किसी समय में जताया जरूर होगा। मारपीट जरूर हुई होगी। 

वही बात अब ब्लॉगरी के साथ भी देखने में आ रही है। पर जिस प्रकार की विधा ब्लॉगरी है – अर्थात स्वतंत्र मनमौजी लेखन और परस्पर नेटवर्किंग से जुड़ने की वृत्ति पर आर्धारित - मुझे नहीं लगता कि समतल होते विश्व में साहित्य और पत्रकारिता इसके टक्कर में ठहरेंगे। और यह भी नहीं होगा कि कालजयी लेखन साहित्य के पाले में तथा इब्ने सफी – गुलशन नन्दा छाप कलम घसीटी ब्लॉग जगत के पाले में जायेंगे।

चाहे साहित्य हो या पत्रकारिता या ब्लॉग-लेखन, पाठक उसे अंतत उत्कृष्टता पर ही मिलेंगे। ये विधायें कुछ कॉमन थ्रेड अवश्य रखती हैं। पर ब्लॉग-लेखन में स्वतंत्र विधा के रूप में सर्वाइव करने के गुण हैं। जैसा मैने पिछले कुछ महीनों में पाया है, ब्लॉगलेखन में हर व्यक्ति सेंस ऑफ अचीवमेण्ट तलाश रहा है। अपने आप से, और परस्पर, लड़ रहा है तो उसी सेंस ऑफ अचीवमेण्ट की खातिर। व्यक्तिगत वैमनस्य के मामले बहुत कम हैं। कोई सज्जन अन-प्रिण्टएबल शब्दों में गरिया भी रहे हैं तो अपने अभिव्यक्ति के इस माध्यम की मारक क्षमता या रेंज टेस्ट करने के लिये ही। और लगता है कि मारक क्षमता साहित्य-पत्रकारिता के कंवेंशनल वेपंस (conventional weapons) से ज्यादा है!

मैं यह पोस्ट (और यह विचार) मात्र चर्चा के लिये झोँक रहा हूं। और इसे डिफेण्ड करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी अंतत: हिन्दी ब्लॉगरी में टिकने का अभी क्वासी-परमानेण्ट इरादा भी नहीं बना। और यह भी मुगालता नहीं है कि इसके एडसेंस के विज्ञापनों से जीविका चल जायेगी। पर यह विधा मन और आंखों में जगमगा जरूर रही है - बावजूद इसके कि उत्तरोत्तर लोग बर्दाश्त कम करने लगे हैं।

क्या सोच है आपकी? 



 

हिन्दी ब्लॉगिंग क्या साहित्य का ऑफशूट है?


बहुत सी समस्यायें इस सोच के कारण हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग साहित्य का ऑफशूट है। जो व्यक्ति लम्बे समय से साहित्य साधना करते रहे हैं – वे लेखन पर अपना वर्चस्व मानते हैं। दूसरा वर्चस्व मानने वाले पत्रकार लोग हैं। पहले पहल, शायद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में पत्रकारिता भी साहित्य का ऑफशूट थी। वह कालांतर में स्वतंत्र विधा बन गयी। मुझे हिन्दी इतिहास की विशेष जानकारी नहीं है कि साहित्य और पत्रकारिता में घर्षण हुआ या नहीं। हिन्दी साहित्य में स्वयम में घर्षण सतत होता रहा है। अत: मेरा विचार है कि पत्रकारिता पर साहित्य ने वर्चस्व किसी न किसी समय में जताया जरूर होगा। मारपीट जरूर हुई होगी।

वही बात अब ब्लॉगरी के साथ भी देखने में आ रही है। पर जिस प्रकार की विधा ब्लॉगरी है – अर्थात स्वतंत्र मनमौजी लेखन और परस्पर नेटवर्किंग से जुड़ने की वृत्ति पर आर्धारित - मुझे नहीं लगता कि समतल होते विश्व में साहित्य और पत्रकारिता इसके टक्कर में ठहरेंगे। और यह भी नहीं होगा कि कालजयी लेखन साहित्य के पाले में तथा इब्ने सफी – गुलशन नन्दा छाप कलम घसीटी ब्लॉग जगत के पाले में जायेंगे।

चाहे साहित्य हो या पत्रकारिता या ब्लॉग-लेखन, पाठक उसे अंतत उत्कृष्टता पर ही मिलेंगे। ये विधायें कुछ कॉमन थ्रेड अवश्य रखती हैं। पर ब्लॉग-लेखन में स्वतंत्र विधा के रूप में सर्वाइव करने के गुण हैं। जैसा मैने पिछले कुछ महीनों में पाया है, ब्लॉगलेखन में हर व्यक्ति सेंस ऑफ अचीवमेण्ट तलाश रहा है। अपने आप से, और परस्पर, लड़ रहा है तो उसी सेंस ऑफ अचीवमेण्ट की खातिर। व्यक्तिगत वैमनस्य के मामले बहुत कम हैं। कोई सज्जन अन-प्रिण्टएबल शब्दों में गरिया भी रहे हैं तो अपने अभिव्यक्ति के इस माध्यम की मारक क्षमता या रेंज टेस्ट करने के लिये ही। और लगता है कि मारक क्षमता साहित्य-पत्रकारिता के कंवेंशनल वेपंस (conventional weapons) से ज्यादा है!

मैं यह पोस्ट (और यह विचार) मात्र चर्चा के लिये झोँक रहा हूं। और इसे डिफेण्ड करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। वैसे भी अंतत: हिन्दी ब्लॉगरी में टिकने का अभी क्वासी-परमानेण्ट इरादा भी नहीं बना। और यह भी मुगालता नहीं है कि इसके एडसेंस के विज्ञापनों से जीविका चल जायेगी। पर यह विधा मन और आंखों में जगमगा जरूर रही है - बावजूद इसके कि उत्तरोत्तर लोग बर्दाश्त कम करने लगे हैं।

क्या सोच है आपकी?

कृपया टिप्पणी रीपोस्ट वाले पेज पर देने का कष्ट करें। यह मेरी तकनीकी चूक के कारण है। क्षमा करें।