Saturday, May 31, 2008

सुलेम सराय का इक्का, बैलगाड़ी और डीजल-पेट्रोल के दाम


Friday, May 30, 2008

भोर का सपना


स्वप्न कभी कभी एक नये वैचारिक विमा (डायमेंशन) के दर्शन करा देते हैं हमें। और भोर के सपने महत्वपूर्ण इस लिये होते हैं कि उनका प्रभाव जागने पर भी बना रहता है। उनपर जाग्रत अवस्था में सोचना कभी कभी हमें एक नया मकसद प्रदान करता है। शायद इसी लिये कहते हैं कि भोर का सपना सच होता है।
भोर का सपना सच होता हो चाहे न होता हो, उसका प्रभाव देर तक चलता है। और सवेरे उठते ही आपाधापी न हो - ट्रेने ठीक चल रही हों, सवेरे दो तीन कप चाय धकेलने का इत्मीनान से समय हो; तो उस स्वप्न पर एक दो राउण्ड सोचना भी हो जाता है। मै‍ यह काम सप्ताहान्त पर कर पाता हूं। पता नहीं आप इस सुख की कितनी अनुभूति कर पाते हैं। अव्वल तो इन्सोम्निया (अनिद्रा) के मरीज को यह सुख कम ही मिलता है। पर नींद की गोली और दो-तीन दिन की नींद के बैकलॉग के होने पर कभी कभी नींद अच्छी आती है। रात में ट्रैन रनिंग में कोई व्यवधान न हो तो फोन भी नींद में खलल नहीं डालते। तब आता है भोर का सपना।

Thursday, May 29, 2008

ब्लॉग के शीर्षक का संक्षिप्तीकरण और फुटकर बातें


Gadi  
मिट्टी की खिलौना गाड़ी - एक बच्चे की कल्पना की ऊड़ान

मैने पाया कि लोगों ने मेरे ब्लॉग का संक्षिप्तीकरण समय के साथ कर दिया है - "हलचल" या "मानसिक हलचल"। मेरे ब्लॉग को मेरे नाम से जोड़ने की बजाय वे इन शब्दों से उसे पुकारते रहे हैं। कभी कभी तो इस प्रकार की टिप्पणियां मिली हैं - "हलचल एक्स्प्रेस आज समय पर नहीं आयी"; अर्थात सवेरे मैने नियत समय पर पोस्ट पब्लिश नहीं की।

मेरा अंग्रेजी के ब्लॉग के शीर्षक में शब्द था म्यूजिंग। उसके समीप पड़ता है "मानसिक हलचल"। लिहाजा मैने इस ब्लॉग के शीर्षक संक्षिप्तीकरण में उसे बना दिया है -

Wednesday, May 28, 2008

"भगवान की बुढ़िया" खतम होने के कगार पर


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बीरबहूटी, रेड वेलवेट माइट या भगवान जी की बुढ़िया

ग्रामीण परिवेश से जुडे पाठको ने तो चित्र देखकर ही इसे पहचान लिया होगा पर शहरी पाठकों के लिये इस जीव को जान पाना मुश्किल है। अभी जैसे ही मानसूनी फुहार आरम्भ होगी नदियों के आस-पास नरम मिट्टी मे लाल मखमली चादर फैल जायेगी। असंख्य छोटे-छोटे जीव जमीन के अन्दर से प्रगट हो जायेंगे। आमतौर पर इस जीव को बीरबहूटी कहा जाता है। इसे रेन इंसेक्ट भी कहा जाता है। तकनीकी रुप से इंसेक्ट या कीट कहलाने के लिये छै पैरो का होना जरुरी है। इसके आठ पैर होते है इसलिये इसे मकोडा या माइट कहा जाता है। इसका अंग्रेजी नाम रेड वेलवेट माइट है। मध्य भारत मे इसे रानी कीड़ा कहा जाता है। बच्चो का यह पसन्दीदा जीव है। वे इसे एकत्रकर डिबियो मे रख लेते हैं फिर उससे खेलते हैं। इसे छूने पर आत्म रक्षा मे यह पैरो को सिकोड लेता है। बच्चे पैर सिकोड़े जीवो को एक घेरे मे रख देते हैं और फिर उनके बीच प्रतियोगिता करवाते हैं। जो पहले पैर बाहर निकालकर भागता है उसे विजेता माना जाता है और उसके मालिक बच्चे को भी यही खिताब मिलता है।

Tuesday, May 27, 2008

ब्लॉग की हॉफ लाइफ


Atom हाफ लाइफ प्योर साइण्टिफिक टर्म है। पहले मैं शीर्षक देना चाहता था "साहित्य की हॉफ लाइफ"। फिर लगा कि ह्यूमैनिटीज के साथ साइंस का घालमेल नहीं होना चाहिये। सो बैक ट्रैक करते हुये यह शीर्षक दिया - ब्लॉग की हॉफ लाइफ।

ब्लॉग रेडियोएक्टिव मेटीरियल की तरह विखण्डनीय फिनॉमिनॉ है। और विखण्डन/टूटन बहुत रेण्डम तरीके से होता है। हमारे खुद के इस ब्लॉग का विखण्डन दो महीने में हो गया था। पर फिर न जाने कैसे यह पुन: संश्लेषित हो गया और आज चारसौ बीस पोस्टों के पार ( ४२७ टु बी प्रिसाइस) चला आया है। फिर भी कह नहीं सकते कि इसका विखण्डन कब होगा।Confused

Monday, May 26, 2008

ब्लॉग सांख्यिकी - चिट्ठाजगत की नयी खिड़की


आजकल एक कारण जिससे में दिन में एक दो बार चिट्ठाजगत का पन्ना खोल लेता हूं, वह है आंकड़ों के बार/पाई चार्ट और उनसे मिलने वाली इनसाइट। आप चार प्रकार के चार्ट पा सकते हैं वहां पर -

  1. आज के प्रकाशित लेखों के पाई चार्ट।
  2. हर घण्टे प्रकाशित होने वाली पोस्टें
  3. हर दिन के एक्टिव ब्लॉग और पोस्टों की संख्या
  4. महीने दर महीने एक्टिव ब्लॉगों और पोस्टों की संख्या

आप जरा चिट्ठाजगत के इन चार्टों का अवलोकन करें -

Sunday, May 25, 2008

लाल कृष्ण अडवानी जी की किताब, बुद्धिमान उल्लू और गोजर


Adwani Bookमेरे दामाद और मेरी बिटिया ने अपनी शादी की साल गिरह पर मुझे अडवानी जी की ऑटोबायोग्राफी - My Country, My Life उपहार में दी है। मुझे पुस्तक से ज्यादा इस विचार से प्रसन्नता है कि वे १००० पेज की मोटी पुस्तक पढ़ने के लिये मुझे सुपात्र मानते हैं। यद्यपि पुस्तक की मोटाई देख कर ही उसे पढ़ने का कम, घूरते चले जाने का मन अधिक करता है!

Saturday, May 24, 2008

काक्रोचित अनुकूलन की दरकार


धरती का वातावरण पलट रहा है। गर्मियां आते ही ग्लोबल वार्मिंग का मन्त्रोच्चार प्रारम्भ हो जाता है। किसी दिन ग्रिड बैठ जाये तो यह मन्त्रोच्चार और भी नादमय हो जाता है। सर्दियों के आगमन पर निकट भविष्य में हिम युग आने की बात पढ़ने में आती है। गंगा मर रही हैं। एक पूरी पीढ़ी देव नदी को मार कर जीवन यापन कर रही है। रसायनों, प्रदूषण, पॉलीथीन, ओजोन परत में छेद, नाभिकीय कचरा... जाने क्या क्या हैं जान के बवाल।

Friday, May 23, 2008

वर्तमान भारत की छ: विनाशक गलतियां



india_flagभारत का राष्ट्र ध्वज
नानी पालकीवाला को आप पढ़ें तो वे कई स्थानों पर कहते नजर आते हैं कि वयस्क मताधिकार को संविधान में स्वीकार कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की। और नानी जो भी कहते हैं उसे यूं ही समझ कर नहीं उड़ाया जा सकता।

नानी पालकीवाला के एक लेख का संक्षेप प्रस्तुत करता हूं, जिसमें उन्होने इस समय के भारत की छ: विनाशक गलतियों की बात कही है; और वयस्क मताधिकार की अवधारणा की गलती उसमें से पहली है।

Thursday, May 22, 2008

थोड़ा HTML तो जानना होगा ब्लॉगिंग के लिए


मेरी HTML सम्बन्धित पोस्ट पर पाठकों की टिप्पणियां हैं, कि:
  • हमें तो HTML की बेसिक जानकारी नहीं है।
  • यह तकनीकी बात तो सिर से निकल गयी।
  • देखते हैं, कोशिश करते हैं, बाकी अपना फील्ड नहीं है यह!
  • मान गए हजूर कि आप फ़ुल्टू तकनीकी हो, अपन के पल्ले तो पड़ता नई ये सब!
  • आप अपने ब्लॉग में पता नही क्या क्या करते रहते हैं ...
  • यदि समझ आ गया तो रिकॉर्ड स्थापित हो जाएगा।
  • पहले html की abcd सीखनी पड़ेगी।
  • आप लगता है भूल गये कि आपका ..... पत्ता इसीलिये कट गया था क्योंकि आप तकनीकी रूप से सक्षम पाये गये थे।

Wednesday, May 21, 2008

मच्छरों से बचाव में प्रभावी वनस्पतियां


आज की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया मच्छरों से बचाव के लिये अनेक जैविक विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं। ये जैविक विकल्प बहुत आकर्षक लगते हैं। मुझे अपनी ओर से कुछ जोड़ना हो तो बस यही कि आदमी सफाई पसन्द बने तथा पानी को आस-पास सड़ने न दे। बाकी आप अवधिया जी का लेख पढ़ें।   

Tuesday, May 20, 2008

आलोक ९-२-११, फटी बिवाई और फॉयरफॉक्स ३-बीटा


फॉयरफॉक्स पर आलोक ९-२-११ ने फरवरी में लिखी अपनी स्पेशल कबीरपन्थी स्टाइल (यानी जिसे समझने के लिये बराबार का साधक होना अनिवार्य है) में पोस्ट। अपनी समझ में नहीं आयी सो उसपर टिपेरे भी नहीं। यह जरूर याद आता है कि पढ़ी थी और उससे फॉयरफॉक्स के उस पन्ने पर भी गये थे जहां से फॉयरफॉक्स ३ बीटा को डाउनलोड करना था। उस पन्ने पर भी डेवलेपर टेस्टिंग जैसे हाई-टेक शब्द थे और डाउनलोड 7MB का था। लिहाजा हम दबे पांव वापस हो लिये थे।

ट्रैक्टर ट्रॉली का जू-जू


ट्रैक्टर और ट्रॉली का युग्म मुझे हाथी की तरह एक विचित्र जीव नजर आता है। हाथी में हर अंग अलग-अलग प्रकार का नजर आता है - एक लटकती सूंड़, दो तरह के दांत, भीमकाय शरीर और टुन्नी सी आंखें, जरा सी पूंछ। वैसे ही ट्रैक्टर-ट्रॉली में सब कुछ अलग-अलग सा नजर आता है। मानो फॉयरफॉक्स में फुल्ली जस्टीफाइड हिन्दी का लेखन पढ़ रहे हों।@ सारे अक्षर बिखरे बिखरे से।

Monday, May 19, 2008

ब्लॉग पोस्ट में फोटो सब-टाइटल (कैप्शन) का जुगाड़


सिद्धार्थ जी फोटो पर कैप्शन लगाने के बारे में पूछ रहे थे। मेरी समझ में यह आया कि वे चित्र का विवरण देते शब्द चित्र के साथ चिपकाना चाहते हैं। ब्लॉगस्पॉट के पोस्ट एडीटर में यह सरलता से सम्भव नही। फ्लिकर से आप अपनी फोटो पर डिस्क्रिप्शन फील्ड में विवरण भर कर अगर सीधे ब्लॉग करें तो चित्र के नीचे केप्शन के रूप में डिस्क्रिप्शन आ जाता है। पर वह ब्लॉगिंग का सरल/सुविधायुक्त तरीका नहीं है। मैने विण्डोज लाइवराइटर के साथ कुछ प्रयोग पहले किये थे, जिनका विवरण यहां पर मिल सकता है।

Sunday, May 18, 2008

फीडबर्नर अनुसार मेरी दस सबसे लोकप्रिय पोस्टें


फीडबर्नर कई प्रकार के आंकड़े देता है। एक है अब तक के सर्वाधिक व्यू और क्लिक्स के आधार पर लोकप्रिय पोस्टों के आंकड़े।

Saturday, May 17, 2008

राजाराम मांझी


Dr Kalla
डा. एन के कल्ला
नाम तो ऐसा लग रहा है जैसे कोई स्वतंत्रता सेनानी हो। जैसे तिलका मांझी। मैं इन सज्जन पर न लिखता अगर डा. एन के कल्ला ने एक रेखाचित्र बना कर मेरी ओर न सरकाया होता। डा. कल्ला हमारे चीफ मैडिकल डायरेक्टर हैं। हम उत्तर-मध्य रेलवे की क्षेत्रीय उपभोक्ता सलाहकार समिति की बैठक में समिति के सदस्यों के भाषण सुन रहे थे। ऐसे में इधर उधर कलम चलाने और डॉडल (dawdle - फुर्सत की खुराफात) करने को समय मिल जाता है। उसी में एक अलग से लग रहे चरित्र श्री राजाराम मांझी का रेखाचित्र डा. कल्ला ने बना डाला।

Wednesday, May 14, 2008

जंगली वृक्षों से शहरी पर्यावरण सुधार का नियोजन करें


यह है श्री पंकज अवधिया का बुधवासरीय अतिथि लेख। आप पहले के लेख पंकज अवधिया पर लेबल सर्च से देख सकते हैं। इस पोस्ट में पंकज जी शहरों के पर्यावरण सुधार के लिये भारतीय जंगली वृक्षों के नियोजित रोपण की बात कर रहे हैं।

Tuesday, May 13, 2008

मंगल सिंह का शहरीकरण


मैने उत्तर-मध्य रेलवे की क्षेत्रीय उपभोक्ता सलाहकार समिति की पिछली बैठक पर एक पोस्ट लिखी थी - "जय हिन्द, जय भारत, जय लालू"। यह पोस्ट २५ अक्तूबर २००७ को लिखी गयी थी। उसमें एक ऐसे रस्टिक सज्जन का जिक्र था जो ७७ वर्ष के थे, ठेठ गंवई तरीके से भाषण दे रहे थे। उनके भाषण में पर्याप्त लालूत्व था - हमारे माननीय मन्त्री महोदय की देसी दबंग शैली।

Sunday, May 11, 2008

पोस्टों पर टिप्पणियां करने की इकतरफा शर्तें?!


puzzled एक ब्लॉग मित्र ने कल एक पोस्ट देखने और टिप्पणी देने का ई-मेल किया। मैने पोस्ट देखी। बहुत अच्छी पोस्ट थी। बहुत मेहनत से बनाई - संवारी गयी। जिसे पढ़ कर "वाह" की फीलिंग हो। पर जब मैं टिप्पणी देने लगा तो पाया कि टिप्पणी करने के साथ एक बॉक्स पर "टिक" लगा कर इस पर सहमति देनी थी कि मैं टर्म्स ऑफ यूसेज को स्वीकारता हूं। जब टर्म्स ऑफ यूसेज देखे तो सिद्धन्तत: टिप्पणी न करना उपयुक्त समझा। वे टर्म्स ऑफ यूसेज थे -

Saturday, May 10, 2008

हिन्दी स्लैंग्स बताइये जी!


jester स्लैंग्स भाषा को समृद्ध करते हैं। शिवकुमार मिश्र का इनफॉर्मल ग्रुप जो स्लैंग्स जनरेट करता है, वह यदा-कदा मैं अपने ब्लॉग पर ठेल दिया करता हूं। उन्होंने एक शब्द बताया था -"खतम"। इसपर मैने एक पोस्ट लिखी थी - आप तो बिल्कुल खतम आदमी हैं। एक अन्य स्लैंग शब्द है "कसवाना", जिसे मुझे उपेंद्र कुमार सिंह जी ने बताया था और जिसपर पोस्ट थी - कहां से कसवाये हो जी?

शिव ने एक और शब्द दिया था "मुद्राभिषेक", जिसपर पोस्ट थी - मुद्राष्टाध्यायी नामक ग्रंथ रचने की गुहार। शिव ने आजकल नये स्लैंग्स बताना बंद कर रखा है। मेरे रेलवे के औपचारिक वातावरण में स्लैंग्स के फलने फूलने की उपयुक्त परिस्थितियां नहीं हैं। लिहाजा नये स्लैंग्स मुझे पता नहीं चलते। कर्मचारीगण गढ़ते भी होंगे तो मुझसे शेयर नहीं करते।

स्लैंग (slang - एक अनौपचारिक शब्दकोश का शब्द, जिसका अर्थ एक समूह या लोग प्रारम्भ करते हैं, और जो सामान्यत: हास्य-व्यंग उपजाता है) बहुत हैं आम बोलचाल में, पर मुझे नहीं मालुम कि उनका कोई अमानक-शब्दकोश (non standard dictionary) बनने का प्रयास किया गया या नहीं। अंग्रेजी में अर्बनडिक्शनरी.कॉम पर स्लैंग्स का संकलन है। उसका एक गूगल गैजेट भी उपलब्ध है, जिसका बटन मैं यहां उपलब्ध कर रहा हूं।»Add to Google

एक विचार - सफल ब्लॉग स्लैंग्स का सफल और सार्थक प्रयोग प्रयोग करते हैं। मिसाल के तौर पर व्यंगकारों के ब्लॉग या फुरसतिया और अज़दक के ब्लॉग।

मेरे विचार से एक कम्यूनिटी ब्लॉग हो सकता है, जिसमें लोग अपनी मर्जी से हिन्दी स्लैंग्स और उसका अर्थ/प्रयोग प्रस्तुत कर सकें। उससे हिन्दी ब्लॉगिंग की भाषा सशक्त बनेगी।

smashed_TV अब आप देखें कि चिरकुट एक स्लैंग ही रहा होगा कुछ समय पहले तक। पता नहीं अब भी मानक शब्दकोश में आ पाया है या नहीं। अरविंद सहज समांतर कोश में तो नहीं मिला। पर "चिरकुट" ने हिंदी ब्लॉगरी को कितना समृद्ध किया है! इसी तरह पिलानी के पास स्थान है - चोमू। जब हम बिट्स, पिलानी में पढ़ते थे तो गंवई लंण्ठ के लिये शब्द प्रयोग करते थे - चोमू। व्यक्ति में चोमुत्व का उत्तरोत्तर कम होते जाना, समाज में देशज मनोरंजन समाप्त कर रहा है। तभी लोग टीवी से चिपकत्व बढ़ा रहे हैं। नेचुरल भाषा क्वाइन करने की (सृजन करने की) प्रतिभा का ह्रास हो रहा है।

मित्रों, आप टिप्पणी में अपने ज्ञात दो-चार अनूठे हिन्दी स्लैंग ठेल दें - प्लीज! और कोई महानुभाव सामुहिक "हिन्दी स्लैंग का ब्लॉग" बनाने की पहल कर सकते हों तो अत्युत्तम!


Applauseरोचक! विण्डोज लाइवराइटर से भविष्य में शिड्यूल दिन/समय पर पोस्ट पब्लिश करने से ब्लॉगर.कॉम पोस्ट तुरन्त पब्लिश नहीं कर रहा। शिड्यूल कर रहा है। एक नया फायदा!

Friday, May 9, 2008

संतृप्त, मुदित और असंवेदनशील है भारतीय मध्यवर्ग


हर रोज हम लोग लिख रहे हैं। हिन्दी लिखने की मूलभूत समस्या और जद्दोजहद के बावजूद हम लोग लिख रहे हैं। रोज लिखते हैं, छाप देते हैं। मुझे विश्वास है कि अपनी पोस्ट बरम्बार निहारते भी होंगे। और शायद अपनी पोस्ट जितनी बार खोलते हैं, वह औरों की पोस्टें खोलने-पढ़ने से कम नहीं होगा।

पोस्ट - पब्लिश - स्टैटकाउण्टर - टिप्पणी : इन सबके ऊपर नाचता एक मध्यवर्गीय ब्लॉगर है। आत्ममुग्ध और संतृप्त। बावजूद इसके कि जॉर्ज बुश और कॉण्डलिसा राइस की बफूनरी1 (buffoonery) को कोसता दीखता है वह; पर अपने मन के किसी कोने में यह संतुष्टि और मुदिता भी रखे है कि पिछली पीढ़ी से बेहतर टेंजिबल अचीवमेण्ट (ठोस अपलब्धियोंउपलब्धियों) से युक्त है वह। वह संतोष, दया, करुणा, समता, नारी उत्थान और ऐसे ही अनेक गुणों को रोज अपने ब्लॉग पर परोसता है। और जितना परोसा जा रहा है - अगर वह सच है तो भारत में क्यों है असमानता, क्यों है गरीबी और भुखमरी। हजार डेढ़ हजार रुपये महीने की आमदनी को तरसती एक विशाल जनसंख्या क्यों है?

man_with_case हम जितनी अच्छी अच्छी बातें अपने बारे में परोस रहे हैं, उतना अपने में (मिसप्लेस्ड) विश्वास करते जा रहे हैं कि हम नेक इन्सान हैं। जितनी अच्छी "अहो रूपम - अहो ध्वनि" की टिप्पणियां हमें मिलती हैं, उतना हमें यकीन होता जाता है कि हम अपने इनर-कोर (inner core) में सन्त पुरुष हैं। भद्रजन। (बंगाल का मध्यवर्ग कभी इसी मुदिता में ट्रैप्ड रहा होगा, या शायद आज भी हो। वहीं का शब्द है - भद्र!)

पर यही मध्यवर्ग है - जो आज भी अपनी बहुओं को सांसत में डाल रहा है, अपने नौकरों को हेयता से देखता है। यही मध्यवर्ग है जो रिक्शेवाले से दस पांच रुपये के किराये पर झिक-झिक करता पाया जाता है। कल मैं एक बैठक में यह सुन रहा था कि रेलवे मालगोदाम पर श्रमिक जल्दी सवेरे या देर रात को काम नहीं करना चाहते। (इस तर्क से टाई धारी सीमेण्ट और कण्टेनर लदान के भद्र लोग रेलवे को मालगोदाम देर से खोलने और जल्दी बन्द करने पर जोर दे रहे थे।) पर असलियत यह है कि श्रमिक काम चाहता है; लेकिन जल्दी सवेरे या देर रात तक काम कराने के लिये मजदूर को जो पैसा मिलना चाहिये, वह देने की मानसिकता नहीं आयी है इस आत्ममुग्ध, सफल पर मूलत: चिरकुट मध्यवर्ग में। अपनी अर्थिक उन्नति को समाज के अन्य तबकों से बांटने का औदार्य दिखता नहीं। और भविष्य में अगर वह औदार्य आयेगा भी तो नैसर्गिक गुणों के रूप में नहीं - बढ़ते बाजार के कम्पल्शन के रूप मे!

Butter Ludhianaश्री पंकज मिश्र की इस पुस्तक से मुजफ़्फ़रनगर के संस्मरण का मुक्त अनुवाद -

..... जिस मकान में मैं ठहरा था, वह भारत के शहरों में बेतरतीब बने मकानों के समूह में से एक जैसा था। कालोनी में सड़कें कच्ची थीं। बारिश के मौसम में उनका उपयोग कठिन हो जाता है। वहां जंगली घास और बेतरतीब खरपतवार की बहुतायत थी।पाइप लीक कर रहे थे और हर घर के पिछवाड़े कूड़े का अम्बार था।

यह सब पैसे की कमी के कारण नहीं था। मकान बहुत सम्पन्न लोगों के थे। हर घर के आगे पार्क की गयी कार देखी जा सकती थी। छतों पर ढेरों डिश एण्टीना लगे थे। घरों में बेशुमार रईसी बिखरी थी।

..... सार्वजनिक सुविधाओं की दुर्दशा का कारण अचानक आयी दौलत थी। पैसे के साथ साथ लोगों में सिविक एमेनिटीज के प्रति जिम्मेदारी नहीं आयी थी। उल्टे उन लोगों में बड़ा आक्रामक व्यक्तिवाद (aggressive individualism) आ गया था। कालोनी का कोई मतलब नहीं था - जब तक कि वे अपनी जोड़तोड़, रिश्वत या अपने रसूख से बिजली, पानी, फोन कनेक्शन आदि सुविधायें अवैध रूप से जुगाड़ ले रहे थे। मकान किले की तरह थे और हर आदमी अपने किले में अपनी सत्ता का भोग कर रहा था। .....


बड़ा अप्रिय लग सकता है यह सुनना, कि बावजूद सफलताओं के, हममें मानसिक संकुचन, अपने आप को लार्जर देन लाइफ पोज करना, भारत की व्यापक गरीबी के प्रति संवेदन हीन हो जाना और अपनी कमियों पर पर्दा डालना आदि बहुत व्यापक है।

और यह छिपता नहीं; नग्न विज्ञापन सा दिखता है।


priyankarशायद सबसे एम्यूज्ड होंगे प्रियंकर जी, जो पहले मीक, लल्लू, चिरकुट और क्या जैसे लिखने वाले में इस समाजवादी(?!) टर्न अराउण्ड को एक अस्थिर मति व्यक्ति का प्रलाप समझें। पर क्या कहूं, जो महसूस हो रहा है, वह लिख रहा हूं। वैसे भी, वह पुराना लेख १० महीने पुराना है। उस बीच आदमी बदलता भी तो है।

और शायद मध्यवर्गीय ब्लॉगर्स को मध्यवर्गीय समाज से टैग कर इस पोस्ट में देखने पर कष्ट हो कि सब धान बाईस पंसेरी तोल दिया है मैने। पर हम ब्लॉगर्स भी तो उसी वृहत मध्यवर्ग का हिस्सा हैं।

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1. मेरी समझ में नहीं आता कि हम चुक गये बुश जूनियर पर समय बर्बाद करने की बजाय कृषि की उत्पादकता बढ़ाने की बात क्यों नहीं करते? हमारे कृषि वैज्ञानिक चमत्कार क्यों नहीं करते या बीमारू प्रान्त की सरकारें बेहतर कृषि के तरीकों पर जोर क्यों नहीं देतीं? शायद बुश बैशिंग ज्यादा बाइइट्स देती है।


Wednesday, May 7, 2008

वनस्पतियों के सामरिक महत्व की सम्भवनायें


यह है पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट। और यह पढ़कर मुझे लगा कि वनस्पति जगत तिलस्म से कमतर नहीं है! जरा आप पढ़ कर तो देखें।

पंकज जी की पहले की पोस्टों के लिये पंकज अवधिया लेबल पर क्लिक करें।

Tuesday, May 6, 2008

मुंसीपाल्टी का सांड़


Nandi उस दिन दफ्तर से वापस लौटते समय मेरा वाहन अचानक झटके से रुका। मैं किन्ही विचारों में डूबा था। अत: झटका जोर से लगा। मेरा ब्रीफकेस सरक कर सीट से गिरने को हो गया। देखा तो पता चला कि एक सांड़ सड़क क्रॉस करते करते अचानक बीच में खड़ा हो गया था। वाहन उससे टकराते - टकराते बचा।

उसके बाद मैने केवल छुट्टा घूमते सांड़ गिने। वे सड़क के किनारे चल रहे थे। कुछ एक दूसरे से उलझने को उद्धत थे। एक फुंकार कर अपना बायां पैर जमीन पर खुरच रहा था। एक नन्दी के पोज में बैठा जुगाली कर रहा था। अलग-अलग रंग के और अलग-अलग साइज में थे। पर थे सांड़ और शाम के धुंधलके में गिनने पर पूरे बाइस थे। शायद एक आध गिनने में छूट गया हो। या एक आध कद्दावर गाय को सांड़ मानने का भ्रम हुआ हो। पर १५ किलोमीटर की यात्रा में २२ सांड़ दिखाई पड़ना --- मुझे लगा कि वाराणसी ही नहीं इलाहाबाद भी सांड़मय है।

Saturday, May 3, 2008

बेस्ट इंश्योरेंस पॉलिसी


आपका मोबाइल, आपका ई-मेल, आपकी डाक, आपके सामने से गुजरने वाले ढ़ेर सारे विज्ञापन - सभी इंश्योरेंश पॉलिसी बेचने में जुटे हैं। आपकी बहुत सी ऊर्जा इन सब से निपटने में लगती है। आपके फोन पर जबरन चिपके उस इंश्योरेंस कम्पनी वाले लड़के/लड़की को स्नब करने के लिये आपको गुर्राना पड़ता है। उसके बाद कुछ क्षणों के लिये मन खराब रहता है। आप गुर्राना जो नहीं चाहते।

पर आपने कभी सोचा है कि हमारा शारीरिक स्वास्थ्य हमारी बेस्ट इंश्योरेंस पॉलिसी है।

Friday, May 2, 2008

ब्लॉगस्पॉट पोस्ट शिड्यूलिंग


आपने ब्लॉगर डैशबोर्ड खोलते समय ध्यान दिया कि नहीं? अब आप भविष्य के लिये पोस्ट शिड्यूलिंग ड्राफ्ट ब्लॉगर की बजाय ब्लॉगर.कॉम से कर सकते हैं।

आपके ब्लॉगर.कॉम के ब्लॉग के पोस्ट मैनेजमेण्ट पेज पर अब All, Drafts, Scheduled और Published के ऑप्शन मौजूद हैं।

समाचार यहां पर है।

ब्लॉग का चरित्र चिंतन


Gyan D Pandey अब तक हम "मानसिक हलचल" से प्रेरित पोस्टें प्रस्तुत करते रहे। जब जो मन आया वह ठेला। अब समय आ गया है कि ऐसा लिखें, जो इस ब्लॉग को एक चरित्र प्रदान कर सके। यह निश्चय ही न जासूसी दुनियाँ है, न मनोहर कहानियां। हास्य - व्यंग में भी जो महारत आलोक पुराणिक, राजेन्द्र त्यागी या शिव कुमार मिश्र को है, वह हमें नहीं है। कविता ठेलने वाले तो बहुसंख्य हैं, और उनकी पॉपुलेशन में वृद्धि करने में न नफा है न उस लायक अपने में उत्कृष्टता।

Thursday, May 1, 2008

ब्लूमबर्ग : ब्राज़ील और तेल बाजार का बैलेंस


ब्लूमबर्ग ने खबर दी है कि ब्राजील में ऑफशोर ऑयल फील्ड केरिओका (Carioca) में 10 अरब बैरल क्रूड ऑयल का पता चला है। असल में आकलन 33 अरब बैरल का है, पर रिकवरी रेट 30% मान कर 10 अरब बैरल का आंकड़ा बनाया गया है। यह आकलन जोड़ने पर ब्राजील के ऑयल रिजर्व लीबिया से ज्यादा हो जायेंगे। तेल की यह खोज पिछले तीस सालों में सबसे बड़ी खोज है!