Thursday, January 31, 2008

’अनपढ़’ रीता पाण्डेय


और रीता ने अगला टाइपिंग असाइनमेण्ट मुझे बहुत जल्दी दे दिया। सोमवार को दोपहर दफ्तर में मुझे फोन कर बताया कि एक नयी पोस्ट लिख दी है। घर आ कर टाइप कर देना। अगले दिन मैने टाइप किया। फिर बुधवार पंकज अवधिया जी का दिन था। लिहाजा आज वह पारिवारिक पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूं। इसमें पिछले दिनों चले विवाद पर रीता का मत भी स्पष्ट होता है।


कुछ दिन पहले मेरे पति की एक लठैती पोस्ट ब्लॉग पर आयी। बड़ी हांव-हांव मची। सो तो मचनी ही थी – जब लठ्ठ भांजेंगे तो सामने वालों को जोश आ ही जायेगा। इस तरह की लठ्ठमलठ्ठ में कई बार निर्दोष जन भी एक आध लाठी पा ही जाते हैं। सो मुझे भी लपेटा गया। कुछ – कुछ कहा गया। मैने पोस्ट को छपने से पहले भी पढ़ा था और बाद में टिप्पणियां भी कई बार पढ़ी। मैने वह सब सहज ढंग से लिया। बल्कि मजा आया। कई बार मैं सोचती हूं कि औरतें इतनी जल्दी भिन्ना क्यों जाती हैं। जरा सी बात में ’नारी मुक्ति संगठन’ खड़ा हो जाता है। जिन्दाबाद मुर्दाबाद शुरू हो जाता है। खैर, पोस्ट ज्ञान की थी तो मुझ पर कुछ छींटे पड़ने ही थे। आखिर मैं उनकी “बैटर हाफ” जो हूं।

ऐसा हमारे साथ कई बार हुआ है। पर एक वाकया मैं जरूर बताना चाहूंगी। बात काफी पुरानी है। मेरे भाई की शादी और उसके दस दिन बाद ज्ञान की बहन की शादी थी। सब निपटा कर हम रतलाम पंहुचे। पस्त हाल। अण्टी एक दम ढीली थी। पांचवे वेतन आयोग का दूर दूर तक पता नहीं था – निकट भविष्य में माली हालत सुधरने की कोई सम्भावना भी न थी। ऐसे में चक्रवात की तरह बम्बई से खबर आयी कि ज्ञान को तबादले पर बम्बई बुलाया जा रहा था। कुछ साख रही होगी कि तबादले के बारे में इनसे पूंछा जा रहा था। अन्यथा तबादला कर देते तो जाना ही पड़ता। इन्होने पुराना जुमला उछाला – “अपनी पत्नी से पूंछ कर बताऊंगा”। मुझे भी मामला गम्भीर लगा। बम्बई के मित्रों से बात की। बच्चों का एडमीशन, किताब कापी, दूध सब्जी --- सब के खर्चे का आकलन कर लगा कि यह तो तीसरी शादी जितना खर्च होगा! और मैने निर्णय कर लिया कि बम्बई के अलावा और कोई जगह मंजूर है। ज्ञान ने अपने तरीके से अपने वरिष्ठ अधिकारियों को समझाया। एक वरिष्ठ अधिकारी ने गम्भीर मुद्रा में कहा – "लगता है कि इसकी पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं है। इस लिये बम्बई आने में कतराती है। आ जाती तो कुछ तौर तरीका सीख लेती"!

जब मुझे पता चला तो मैने अपना सिर पीटा। कैसा लेबल माथे पर चिपक गया। कुछ देर सोचती रही। फिर हंसी आ गयी। बात आई-गई हो गई।

कुछ साल बाद पश्चिमी क्षेत्र से फिर दबाव बना। इस बार बचना कठिन था। रतलाम में रहते हुये आठ साल हो गये थे। अत: ज्ञान ने बम्बई जा कार पोस्ट ज्वाइन कर ली। अनपढ़ का लेबल हटाने को मैने भी कमर कस ली। इनके बम्बई जाने के एक हफ्ते बाद मैने पूछा – कैसा लग रहा है? बोले – “बहुत अच्छा! चर्चगेट पर शानदार चेम्बर है। चर्चगेट रेस्ट हाउस में दो कमरे की ट्रांजिट रिहायश है। चपरासी, चार इंस्पेक्टर उपलब्ध हैं। हफ्ते भर में तीन बेडरूम का बधवार पार्क, कोलाबा में फ्लैट अलाट होने जा रहा है। और क्या चाहिये बम्बई में”।

लेकिन गोविन्द को कुछ और ही मंजूर होता है। डेढ़ महीने में ही ज्ञान को कोटा, राजस्थान भेज दिया गया; यह कह कर कि आपकी वहां जरूरत है। कोलाबा के फ्लैट की चाभी लौटा दी गयी। और मैं अनपढ़ की अनपढ़ रह गयी! कोई मेट्रो सिटी न देख पायी। हां, अभी कुछ दिन पहले तीन दिन को कोलकाता जरूर गयी। वहां जाते समय लगा कि कामरेडों का भद्र शहर है। कमसे कम शहरियत का प्राइमरी क्रैश कोर्स तो हो ही जायेगा। पर वहां फूफाजी और बुआ (शिव कुमार मिश्र के पेरेण्ट्स) और शिव-पामेला के साथ ही सारा समय सुखद स्वप्न सा बीत गया।

«← फूफाजी बहुत आकर्षक व्यक्तित्व हैं – मोहक वक्ता, बुद्धिमान और नवीन-पुरातन का सही मेल है उनमें। शिव तो हैं ही मस्त जीव। उनकी पत्नी से तो मेरी बहुत जोड़ी जमी। वहां मेट्रो अनुभव की जगह पारिवारिक अनुभव अधिक रहा। फिर भी महानगर के दर्शन तो कर लिये। पढ़ाई में प्राइमरी तो कर लिये।

अगर एक दो और महानगर देख लें तो आठवीं-दसवीं पास का लेबल तो मिल ही जायेगा। पर ग्रेज्युयेशन तो शायद बम्बई जाने पर ही पूरा हो। अगर नीरज भैया अपने खपोली वाले घर में एक-आध महीने टिका लें या यूनुस भाई मेहरबानी करें तो मैं भी "ग्रेज्युयेशन की डिग्री" हासिल कर गर्दन तान कर ब्लैक फिल्म की रानी मुखर्जी की तरह कह सकती हूं कि “जो काम आप लोगों ने 20 वर्ष की उम्र में किया, वह मैने अढ़तालीस वर्ष की उम्र में किया; पर किया तो!”

है न डॉयलाग – तालियां?!

रीता पाण्डेय


कल की पोस्ट पर टिप्पणियों में पाठक पंकज अवधिया जी का ई-मेल पता पूछ रहे थे। पता उनके ब्लॉगर प्रोफाइल पर उपलब्ध है। मेरा ई मेल पता तो इस ब्लॉग पर दांयी ओर "मेरा झरोंखा" में है।


Wednesday, January 30, 2008

बालों की सेहत पर एक पोस्ट


यह श्री पंकज अवधिया की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। इस पोस्ट में अवधिया जी बालों के विषय में मुक्त चर्चा कर रहे हैं। आप वह पढ़ कर लाभान्वित हों। मैं उनके लिये स्थान छोड़ता हूं:


यूं तो पाठकों की समस्याओं पर आधारित दसियों सन्देश लगातार मिल रहे हैं पर चूँकि इसमे बालों की विभिन्न समस्याओं से सबन्धित सन्देश बहुत अधिक हैं, इसलिये इस बार इसी विषय पर चर्चा करते हैं।

आप कही भी बैठे हों; जैसे ही आपने बालो की समस्या की बात छेडी नहीं कि दसियों उपाय बताने की लोगो मे होड़ लग जाती है। आज हमारे पास ढेरो उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं - एक से बढकर एक दावों के साथ कि वे ही बालों की समस्या को दूर कर सकते हैं। बालों के लिये बहुत सारे घरेलू नुस्खे हैं, और आम लोग इन्हे जानते भी हैं। पर कभी आपने यह सोचा है कि फिर भी क्यों सभी बालो की समस्याओं से परेशान हैं? क्यो इतने सारे अनुसन्धान और उत्पाद जमीनी स्तर पर नाकाम साबित हो रहे हैं?

मै तो चिकित्सक नही हूँ। मै देश के विभिन्न भागों मे आम लोगों और विशेषकर पारम्परिक चिकित्सको के पास उपलब्ध पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। एक दशक से भी अधिक समय तक इन लोगों के साथ रहते हुये मैने हजारों वनस्पतियों और उन पर आधारित लाखों दवाओं के विषय मे जाना है। वनस्पति के संग्रहण से लेकर उसके उपयोग और फिर रोगी के ठीक होते तक मैने पूरी प्रक्रिया को देखा और फिर वैज्ञानिक भाषा मे उसका दस्तावेजीकरण किया है।

जब कोई रोगी बालों की समस्या लेकर पारम्परिक चिकित्सकों के पास पहुँचता है तो वे तुरत-फुरत उसे तेल नही देते हैं। वे उससे लम्बे समय तक बात करते हैं और इस समस्या के लिये उत्तरदायी कारणों का पता लगाते हैं। उसके बाद चिकित्सा आरम्भ होती है। चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य रोग की जड तक जाना है। उनका मानना है कि रोग की ज़ड पकडने से मुख्य समस्या के साथ और भी कई प्रकार की समस्याओं का निराकरण हो जाता है। मैने अब तक 5000 से अधिक वनस्पतियो से तैयार किये जाने वाले केश तेलों का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया है। पारम्परिक चिकित्सकों का मानना है कि इन तेलो का चुनाव बडी टेढी खीर है। एक ही तेल अलग-अलग रोगियों पर अलग-अलग प्रभाव दिखा सकता है क्योकि सभी की एक ही समस्या के लिये एक ही तरह के कारक जिम्मेदार नही हैं। यह तो बडी गूढ़ बात लगती है पर आप आधुनिक चिकित्सा ग्रंथो या सन्दर्भ साहित्यों को पढ़ेंगे तो वे भी इस बात का समर्थन करते नजर आयेंगे। यदि यह सही है तो फिर बाजार मे बिकने वाला एक प्रकार का आँवला केश तेल कैसे करोडो लोगो को राहत पहुँचा सकता है? यह सोचने वाली बात है। आयुर्वेद दुनिया को भारत का उपहार है। पर जिस आयुर्वेद को आजकल हम उत्पादों मे खोजते है वह व्यवसायिक आयुर्वेद है। यह व्यवसायिक आयुर्वेद मूल आयुर्वेद के सामने कुछ नही है।

बालों की समस्या के लिये जब लोग मुझसे राय माँगते हैं तो वे सोचते है कि मै किसी केश तेल की बात करूंगा। पर मै उनसे "दिन भर वे क्या-क्या खाते है" - इसकी जानकारी माँगता हूँ। इससे मुझे पारम्परिक चिकित्सकों के सानिध्य से सीखे गुर के आधार पर रोग के कारण का अनुमान हो जाता है फिर बहुत ही सरल उपाय भोज्य सामग्री के रूप मे लोगों द्वारा दी गयी भोजन तालिका मे जोड देता हूँ। बाद मे लाभांवित होकर जब वे आते हैं तो उनसे पूछ लेता हूँ कि आपका बवासिर अब कैसा है? माइग्रेन के क्या हाल है? लोग आश्चर्यचकित हो जाते है कि ये तो बताया नही था फिर इन्हे कैसे पता? इसमे मेरा अपना कोई हुनर नही है। यह अपने देश का पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान है। कभी मै सोचता हूँ कि जीवन के कुछ वर्ष आधुनिक चिकित्सा की पढाई मे लगाये जायें और फिर आधुनिक और पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियो के समन्वय से नयी चिकित्सा प्रणाली विकसित की जाये। पर दस्तावेजीकरण के कार्य से मुक्ति ही नहीं मिल पाती है।

आम तौर बालों के लिये जो आधुनिक रसायनों से युक्त उत्पाद हम आकर्षक विज्ञापनो से अभिभूत होकर उपयोग करते है वे ही हमारे लिये अभिशाप बन जाते हैं। केश तेलों का प्रयोग भी सावधानी से करने की जरुरत है। मै आपको छोटा सा उदाहरण देता हूँ। मेरी माताजी ने बाजार से एलो वेरा और कुछ आम वनस्पतियो से तैयार केश तेल लिया और उपयोग किया। आशातीत परिणाम नहीं मिले। मैने सभी वनस्पतियाँ एकत्र की और घर पर पारम्परिक तरीके से वही तेल बनाया। तेल बनाना कठिन नही है। सभी वनस्पतियो को लेकर ताजी अवस्था मे ही आधार तेल जो कि आमतौर पर तिल का तेल होता है, में डुबो कर सूरज के नीचे निश्चित अवधि तक रख दिया जाता है। आम तौर पर यह अवधि चालीस दिनों की होती है। फिर तेल को छानकर उपयोग कर लेते हैं। माताजी को घर पर बने तेल से अच्छे परिणाम मिले। कुछ वर्षो पहले एक वैज्ञानिक सम्मेलन मे एक बडी दवा कम्पनी के मुख्य विशेषज्ञ से मैने पूछा कि क्या आप धूप मे रखकर तेल बनाते हैं तो वे हँसे और बोले किसे फुर्सत है यह सब करने की। हम तो तेल को उबाल लेते हैं और आधे घंटे के अन्दर ही सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है। वे यह भी बोले कि जब अमिताभ बच्चन इसे बेचते है तो यह अपने आप असर करने लगता है। इन तेलो मे उपयोग होने वाली वनस्पतियों की गुणवत्ता पर भी ध्यान नही दिया जाता है। ये वनस्पतियाँ आपके आस-पास आसानी से मिल सकती हैं। भृंगराज का ही उदाहरण ले। सुनने मे तो यह कोई दुर्लभ वनस्पति लगती है पर आम धान के खेतो मे यह खरपतवार की तरह उगती है और किसान इसे उखाडते-उखाडते परेशान हो जाते हैं। यदि आपने गाँव के स्कूल मे पढाई की होगी तो ब्लैक बोर्ड को काला करने के लिये जिस पौधे को घिसा होगा वही तो भृंगराज है।

अत: मै आप सभी को यही सलाह दूंगा कि आप अपने दैनिक भोजन की तालिका भेजें। उसी आधार पर मै आपको नयी तालिका सरल प्रयोगो के साथ वापस लौटा दूंगा। आप आजमायें और लाभांवित हों।

पंकज अवधिया

© इस लेख का सर्वाधिकार पंकज अवधिया का है।


कल मैने अपने दफ्तर (जो सूबेदारगंज में है) की विद्युत व्यवस्था की बात की थी और यह भी बताया था कि छपरा स्टेशन पर भी ऐसी प्रकाश व्यवस्था की गयी है। कई लोगों ने इसे इलाहाबाद स्टेशन की व्यवस्था समझा और इन्द्र जी ने इसको स्पष्ट करने के लिये पूछा भी कि यह व्यवस्था कहां की है?

मैं इलाहाबाद स्टेशन पर या उत्तरमध्य रेलवे के अन्य मुख्य स्टेशनों की प्रकाश व्यवस्था, सौर ऊर्जा के प्रयोग आदि की जानकारी एकत्र कर बाद में बताऊंगा। यात्री सुविधाओं में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं और प्रकाश व्यवस्था उनका प्रमुख अंग है। रेल के प्रति लोगों की उत्सुकता मुझे बहुत सुखद लगती है! धन्यवाद।

Tuesday, January 29, 2008

रोज दीपावली


यह शोध परक पोस्ट नहीं है। विशुद्ध मन और मोबाइल फोन के कैमरे के संयोग से बनी है। मैं शाम होने के बाद दफ्तर से निकला तो प्रांगण में ४० मीटर ऊंचे टावरों से हो रही बिजली की जगमगाहट ने मन मोह लिया। इलाहाबाद जैसे छोटे शहर में यह जगमगाहट! रेलवे "टच एण्ड फील" अवधारणा के अनुसार अपने कई स्टेशनों पर जो सुधार करने जा रही है; उसमें मुख्य अंग बिजली की जगमगाहट के माध्यम से होने जा रहा है।
 
मुझे याद है कि डढ़ साल पहले हम लोग छपरा स्टेशन के आधुनिकीकरण की योजना बना रहे थे। उस समय जगमगाहट करने के लिये स्टेशन परिसर में ये टावर लगाने जा रहे थे। मुझे लगता था कि इससे बिजली का बिल बहुत बढ़ जायेगा। पर आकलन से पता चला कि जितना बिजली खपत उस समय थी, उससे बहुत अंतर नहीं आने वाला था; पर जगमगाहट से जो प्रभाव पड़ने वाला था, वह उस समय की दशा से कई गुणा बेहतर था। छपरा में रेल कर्मी मजाक करते थे कि जहां शहर में बहुधा बिजली नहीं रहती, वहां स्टेशन इतना भव्य लगे तो अटपटा लगेगा। पर जब तक मैं बनारस की अपनी पिछली पोस्ट से निवृत्त हुआ (छपरा बनारस मण्डल का अंग था) तब तक छपरा में स्टेशन पर जगमगाहट आ चुकी थी। और दूर दूर से लोग स्टेशन देखने आने लगे थे।

तरह तरह के उपकरण आ गये हैं प्रकाश करने के क्षेत्र में। और बिजली की खपत में बहुत कमी कर बहुत ज्यादा ल्यूमिनॉसिटी वाले हैं। हम लोग अपनी एक्सीडेण्ट रिलीफ ट्रेनों के साथ जो बिजली के इन्फ्लेटेबल टॉवर रखते हैं, उन्हे देख कर तो एक समय अजूबा लगता था। इन  इन्फ्लेटेबल टॉवरों को लपेट कर रखा जा सकता है। दुर्घटना स्थल पर छोटे होण्डा जेनरेटर से ऐसी जगमगाहट देते हैं, मानो दिन हो गया हो। क्रेन और हाइड्रोलिक जैक्स से काम कर रहे रेल कर्मियों का आत्मविश्वास और कार्य क्षमता कई गुणा बढ़ जाते हैं ऐसी रोशनी में। रेलवे ट्रेक पर कई ऐसे काम जो संरक्षा के दृष्टिकोण से केवल दिन में किये जाते थे, इस प्रकार की बिजली व्यवस्था में अब रात में होने लगे हैं। कई तरह के सोचने-करने के बैरियर टूट रहे हैं बेहतर प्रकाश में।
 
यही बात तकनीकी स्तर पर लिखने में मुझे ज्यादा मेहनत करनी होगी। पर लब्बोलुआब यही है कि अब रोज दीपावली की जगमगाहट का युग है - छोटे शहरों में भी।

और यह देखें पोर्टेबल इन्फ्लेटेबल लाइट टावर्स के चित्र (इण्टरनेट से लिये गये)-

इन्फ्लेटेबल लाइट टावर।
बांई ओर का लपेट कर रखा झोला फूल कर रॉड जैसा हो जाता है - प्रकाश का बड़ा ट्यूब बन जाता है।

80 फिट ऊंचा मूवेबल लाइट टावर

मोड़ कर कहीं भी ले जाया जा सकता है यह टॉवर

1. कल आलोक पुराणिक जी ने कहा कि ब्लॉग में मैं भी खूब खिचड़ी परोसता हूं। खिचड़ी लगता है देशज ब्लॉगरी का प्रतीक बन जायेगी! अगर मैं खिचड़ी परोसता हूं तो उसमें देसी घी की बघार आलोक पुराणिक जी की टिप्पणियां लगाती हैं।
शायद ही कोई दिन गया होगा कि देसी घी का बघार न लगा हो या देसी घी कंजूसी से लगा हो!
2. कल दिनेशराय जी ने एक दक्ष वकील की क्षमताओं का परिचय देते हुये हमारे पक्ष में एक पोस्ट लिखी - "मुहब्बत बनी रहे तो झगड़े में भी आनन्द है"। पर दिन में यह पोस्ट ब्लॉगस्पॉट के एडिट पोस्ट की फॉण्ट साइज की गड़बड़ में डीरेल रही। शाम के समय उन्होंने फॉण्ट सुधार दिया था। हो सके तो देखियेगा।

Monday, January 28, 2008

हिन्दी और अंग्रेजी में ३० गुणा का अंतर


श्रीयुत श्रीलाल शुक्ल जी को पद्मभूषण सम्मान

इस अवसर पर "रागदरबारी" के सभी "वादकों" को बधाई!


अंग्रेजी में एक ब्लॉग है – Get Rich Slowly. ठीक ठाक ब्लॉग है। फीडबर्नर पर उसके ४६००० पाठक हैं। अभी एक पोस्ट में उसने बताया कि १५ अप्रेल २००६ से ५ मार्च २००७ के बीच उसे ३२५ दिन में अपने पहले १,०००,००० विजिटर मिले। उसके बाद अब तक ४,०००,००० और आ चुके हैं।

मेरे ब्लॉग पर भी लगभग ३२५ दिन हुये हैं। उक्त अंग्रेजी वाले ब्लॉग की अपेक्षा पोस्ट पब्लिश करने की मेरी आवृति कुछ कम है। पर बहुत अंतर नहीं है।

मुझे अपनी ३२४ पोस्टों में कुल ३३,००० विजिटर प्राप्त हुये हैं अब तक। अर्थात अंग्रेजी वाले ब्लॉग से १/३० के गणक में लोग आये हैं ब्लॉग पर।

यह अंतर सदा बना रहेगा? कहा नहीं जा सकता। शायद बढ़े। “गेट रिच स्लोली” के पाठक एक्स्पोनेन्शियली (≈ex) बढ़े हैं। हिन्दी में मुझे यह बढ़त लीनियर (≈a.x) लगती है। इस हिसाब से गैप बढ़ता जायेगा। पर यह तो आकलन करना ही होगा कि लिखने का ध्येय क्या है? अगर वह नम्बर ऑफ विजिट्स बढ़ाना है तो शायद हमें बूट्स उतार कर टांग देने चाहियें (दुकान बन्द कर देनी चाहिये)?!

विजिटर्स बढ़ने से रहे इस चाल से।

वैसे Get Rich Slowly के ब्लॉगर J.D. ने मेरी क्यूरी के एक उद्धरण से अपना ध्येय बताया है ब्लॉग का। उद्धरण है:

You cannot hope to build a better world without improving the individuals. To that end each of us must work for his own improvement, and at the same time share a general responsibility for all humanity, our particular duty being to aid those to whom we think we can be most useful. — Marie Curie (1867-1934)
सो अगर मैडम क्यूरी के कथन का अनुसरण करें तो आत्मोन्नति के लिये और उसके माध्यम से उनके फायदे के लिये, जिन्हे हमसे लाभ हो सकता है, यह लेखन होना चाहिये। मुझे J.D. का कहा (इसलिये नहीं कि अंग्रेजी में कहा है!) पसन्द आया। वही सार्थक प्रयास हम हिन्दी में लिखने वालों को करने चाहियें। पोस्टें धरातल पर हों और पठनीय हों। बाकी; विजिटर्स की संख्या तो बाई-प्रोडक्ट होगी। क्या ख्याल है?
मैने वाह मनी के रीडर्स के आंकड़े देखे। क्या जबरदस्त उछाल है इस महीने। 1500-2300 पेज व्यू प्रति माह से जम्प हो कर जनवरी में 3800 के आस-पास पेज व्यू! सेंसेक्स धड़ाम! वाह मनी उछला!!!

Saturday, January 26, 2008

नजीर मियाँ की खिचड़ी


यह रीता पाण्डेय की अतिथि पोस्ट है। जब पत्नीजी की पोस्ट है तो उसे अतिथि पोस्ट क्या, पारिवारिक पोस्ट कहा जाये! यह उनकी बचपन में हुई धुनाई का बेबाक विवरण है। रीता पाण्डेय ने इसे कागज पर लिखा है। अत: पोस्ट को मैने उतारा है कीबोर्ड पर। 
आप पोस्ट पढ़ें। आपकी प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा की आगे इस प्रकार की पारिवारिक पोस्टें होंगी या नहीं। 

मेरे पति को खिचड़ी बहुत पसंद है। या यूं कहें तो उन्हें खिचड़ी की चर्चा करना बहुत अच्छा लगता है। ऐसी किसी चर्चा पर मुझे नजीर मियां की खिचड़ी की याद आ गयी और उससे जुड़ी बचपन की बहुत सी यादें बादलों की तरह मन में घुमड़ने लगीं।

नजीर मियां मेरे ननिहाल गंगापुर में एक जुलाहा परिवार के थे। गंगापुर बनारस से १५ किलोमीटर दूर इलाहाबाद की ओर जीटी रोड से थोड़ा हट कर है। मेरा बचपन अपनी नानी के साथ बीता है। सो मैं गंगापुर में बहुत रहती थी।

गर्मियों में बच्चों की बड़ी फौज इकठ्ठा होती थी वहां पर। रिश्ते में वे सब मेरे मामा मौसी लगते थे पर थे मेरी उम्र के। उनके साथ समय कैसे बीत जाता था कि पता ही नहीं चलता था। हम बच्चों की कमान मुन्नू मामा के हाथ होती थी, जो मेरे नानाजी के बड़े भाई का सबसे छोटा बेटा था और मुझसे केवल ६ महीने बड़ा था। मैं उनके बीच वी.आई.पी. की तरह रहती थी। हमारा पूरा दिन फार्म (जहां कच्ची चीनी, तेल पिराई और धान कूटने की मशीनें थीं) और लंगड़ा आम के बाग में बीतता था।

नजीर मियां मेरे नाना के लंगड़ा आम के बाग का सीजन का ठेका लेते थे। उनका पूरा परिवार आम की रखवाली के काम में लगा रहता था। जब आम का सीजन नहीं होता था तब नजीर मियां और उनका परिवार साड़ियां बुनता था। औरतें धागे रंगती, सुखाती और चरखी पर चढ़ाती थीं। फिर आदमी लोग उसे करघे पर चढ़ा कर ताना-बाना तैयार करते। बच्चे उनकी मदद करते। चार-पांच करघों पर एक साथ साड़ियां बुनते देखना और करघों की खटर-पटर संगीतमय लगती थी।

जब आम के बौर लगते थे तो बाग का सौदा तय होता था। लगभग ४०० रुपये और दो सैंकड़ा आम पर। नजीर मियां का पूरा परिवार रात में बाग में सोता था। औरतें रात का खाना बना कर घर से ले जाती थीं। उसमें होती थीं मोटी-मोटी रोटियां, लहसुन मिर्च की चटनी और मिर्च मसालों से लाल हुई आलू की सब्जी। दिन में बाग में रहने वाले एक दो आदमी वहीं ईटों का चूल्हा बना, सूखी लकड़ियां बीन, मिट्टी की हांड़ी में खिचड़ी बना लेते थे।

खिचड़ी की सुगंध हम बच्चों को चूल्हे तक खींच लाती थी। पत्तल पर मुन्नू मामा तो अक्सर खिचड़ी खाया करता था। एक आध बार मैने भी स्वाद लिया। पर मुझे सख्त हिदायत के साथ खिचड़ी मिलती थी कि यह दारोगाजी (मेरे नाना – जो पुलीस में अफसर हो गये थे, पर दारोगा ही कहे जाते थे) को पता नहीं चलना चाहिये।

और कभी पता चलता भी नहीं दारोगा जी को; पर एक दिन मेरी और मुन्नू में लड़ाई हो गयी। मुन्नू के मैने बड़े ढ़ेले से मार दिया। घर लौटने पर मुन्नू ने मेरी नानी से शिकायत कर दी। मारने की नहीं। इस बात की कि “चाची बेबी ने नजीर मियां की हंडिया से खिचड़ी खाई है”।

बाप रे बाप! कोहराम मच गया। नानी ने मेरी चोटी पकड़ कर खींचा। दो झापड़ लगाये। और खींच कर आंगन में गड़े हैण्ड पम्प के नीचे मुझे पटक दिया। धाड़ धाड़ कर हैण्ड पम्प चलाने लगीं मुझे नहला कर शुद्ध करने के लिये। चारों तरफ से कई आवाजें आने लगीं – “ननिहाल मे रह कर लड़की बह गयी है। नाक कटवा देगी। इसको तो वापस इसके मां के हवाले कर दो। नहीं तो ससुराल जाने लायक भी नहीं रहेगी!” दूसरी तरफ एक और तूफान खड़ा हुआ। बड़ी नानी मुन्नू मामा को ड़ण्डे से पीटने लगीं – “ये करियवा ही ले कर गया होगा। कलुआ खुद तो आवारा है ही, सब को आवारा कर देगा।“ मुन्नू मामा के दहाड़ दहाड़ कर रोने से घर के बाहर से नानाजी लोग अंदर आये और बीच बचाव किया। पुरुषों के अनुसार तो यह अपराध था ही नहीं।

नजीर के पिताजी, हाजी मियां सम्मानित व्यक्ति थे। हमारे घर में उठना-बैठना था। रात का तूफान रात में ही समाप्त हो गया।

मेरे पास लूडो था और मुन्नू के पास कंचे। सो दोस्ती होने में देर नहीं लगी। अगले ही दिन शाम को हम फिर नजीर मियां के पास बाग में थे। उनकी मोटी रोटी और लहसुन की चटनी की ओर ललचाती नजरों से देखते। … क्या बतायें नजीर मियां की खिचड़ी और लहसुन की चटनी की गंध तो अब भी मन में बसी है।

नजीर मियां ने शिफ़ान की दो साड़ियां मुझे बुन कर दी थीं। उसमें से एक मेरी लड़की वाणी उड़ा ले गयी। एक मेरे पास है। नजीर मियां इस दुनियां में नहीं हैं; पर उनकी बुनी साड़ी और खिचड़ी का स्वाद मन में जरूर है।


रीता पाण्डेय


गांवों में धर्म-जातिगत दीवारें थी और हैं। पर व्यक्ति की अपनी सज्जनता सब पर भारी पड़ती है। और बच्चे तो यह भेद मानते नहीं; अगर उन्हें बारबार मार-पीट कर फण्डामेण्टलिस्ट न बनाया जाये। अच्छा था कि रीता के नाना लोगों में धर्म भेद कट्टर नहीं था। तब से अब तक और भी परिवर्तन हुआ होगा।

हां, अब मुन्नू मामा भी नहीं हैं। दो साल पहले उनका असामयिक निधन हो गया था। रीता तब बहुत दुखी थी। इस पोस्ट से पता चलता है कि कितना गहरा रहा होगा वह दुख।


    


Friday, January 25, 2008

ज्यादा पढ़ने के खतरे(?)!


Books Stackअभय तिवारी ने एक ताजा पोस्ट पर ठेला है कि उनकी पत्नी तनु उनसे ज्यादा किताबें पढ़ती हैं। यह मुझे भीषण भयोत्पादक लगा। इतना कि एक पोस्ट बन गयी उससे। "डर लगे तो पोस्ट लिख के सिद्धांतानुसार"।

मैं अगर दिन भर की सरकारी झिक-झिक के बाद घर आऊं और शाम की चाय की जगह पत्नीजी वेनेजुयेला या इक्वाडोर के किसी कवि की कविता पुस्तक अपनी समीक्षा की कमेण्ट्री के साथ सरकाने लगें तो मन होगा कि पुन:दफ्तर चल दिया जाये। वहां कण्ट्रोल की नाइट शिफ्ट वाले चाय तो पिला ही देंगे और श्रद्धा हुयी तो नुक्कड़ की दुकान के एक रुपये वाले समोसे भी खिला देंगे!

अब यह भी क्या सीन होगा कि सण्डे को सवेरे आप डाइनिंग टेबल पर इडली का इन्तजार कर रहे हैं पर भरतलाल (मेरा भृत्य) और रीता (मेरी पत्नी) का संवाद चल रहा है - "बेबी दीदी, साम्भरवा में कौन कितबिया पड़े? ऊ अंग्रेजी वाली कि जौन कालि फलाने जी लिआइ रहें अउर अपने साइन कई क दइ ग रहें?" (बेबी दीदी, साम्भर में क्या पड़ेगा? वह अंग्रेजी की किताब या कल फलाने जी की आटोग्राफ कर दी गयी नयी पुस्तक)।

भाई जी/बहन जी; इतना पढ़ें तो भोजन बनाने को समय कब मिलेगा? मेरी पत्नी रोज कहेंगी - तुम्हारा बीएमआई वैसे भी बहुत बढ़ गया है। दफ्तर में बहुत चरते हो। ऐसा करो कि आज खाने की बजाय हम पाब्लो नेरूदा के कैप्स्यूल खा लेते हैं। सलाद के लिये साथ में आज नयी आयी चार मैगजीन्स हैं। लो-केलोरी और हाई फाइबर डाइट ठीक रहेगा तुम्हारे लिए।

Booksज्यादा पढ़ने पर जिन्दगी चौपट होना जरूर है - शर्तिया! जो जिन्दगी ठग्गू के लड्डू या कामधेनु मिष्ठान्न भण्डार की बरफी पर चिन्तन में मजे में जा सकती है, वह मोटी मोटी किताबों की चाट चाटने में बरबाद हो - यह कौन सा दर्शन है? कौन सी जीवन प्रणाली?

किताब किताब और किताब। अभय तिवारी के ब्लॉग पर या तो ओवर हेड ट्रान्समिशन वाले लेखकों के भारी भरकम नाम आते हैं। इन सब के नामों से परिचय की हसरत ले कर जियेंगे और जायेंगे हम दुनियां से। ऑब्स्क्योर (मेरे लिये तो हिट फिल्म भी ऑब्स्क्योर है) सी फिल्मों का वर्णन इस अन्दाज में होता है वहां कि उन्हें नहीं देखा-जाना तो अब तक की जिंदगी तो बरबाद हो चुकी (और लोग हैं कि बचपन में पूप्सी की दूध की बोतल मुंह से लगाये भी देखते रहे हैं इनको!)। पहले भयानक भयानक लेखों की श्रृंखला चली थी ऋग-यजुर-साम-अथर्व पर। वह सब भी हमारे लिये आउट ऑफ कोर्स थी।

भइया, मनई कभौं त जमीनिया पर चले! कि नाहीं? (भैया, आदमी कभी तो जमीन पर चलेगा, या नहीं!)। या इन हाई फाई किताबों और सिद्धांतों के सलीबों पर ही टें बोलेगा?  

मुझे तो लगता है कि बड़े बड़े लेखकों या भारी भरकम हस्ताक्षरों की बजाय भरतलाल दुनिया का सबसे बढ़िया अनुभव वाला और सबसे सशक्त भाषा वाला जीव है। आपके पास फलानी-ढ़िमाकी-तिमाकी किताब, रूसी/जापानी/स्वाहिली भाषा की कलात्मक फिल्म का अवलोकन और ट्रेलर हो; पर अपने पास तो भरत लाल है!

वैसे देशज लण्ठई में भी जबरदस्त प्रतिभा की दरकार होती है। इसे शुद्ध बनारसी गुरुओं और गुण्डों से कंफर्म किया जा सकता है।


और एक सीरियस स्वीकारोक्ति: एक शुष्क सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद लगभग साल भर से हिन्दी ब्लॉगरी में टिका हूं तो अभय तिवारी जैसों की बदौलत। मुझे यह अहसास है कि अभय थ्रू एण्ड थ्रू सज्जन और भद्र व्यक्ति हैं। थोड़ा इण्टेलेक्चुअल चाशनी में रचा-पगा पर संस्कारी सज्जन। बस; अभय की ’कलम की मजदूरी’ छाप बुद्धिजीवी फसाड पर खुन्दक है। उसकी बजाय अगर वे अगले दस साल में करोड़पति बनने की अलानिया इच्छा शक्ति जाहिर करें तो अधिक प्रिय लगें।

अच्छी किताबें ज्यादा पैसे से आती हैं कि नहीं?

और हां, अभय की पत्नी जी से क्षमा याचना सहित। अभय पर "स्माइलीय" पोस्ट कसते समय उनसे कोई रार ठानने का मन नहीं है। बल्कि अगली किसी पोस्ट में अभय अगर यह बतायें कि उनकी पत्नीजी को बहुत बढ़िया खिचड़ी (मेरा सर्वाधिक प्रिय भोजन) बनानी आती है तो मुझे प्रसन्नता होगी!


Thursday, January 24, 2008

वाणी का पर्स


Vani Purseवाणी मेरी बिटिया है। उसका विवाह दो साल पहले हुआ था। पर वह अभी भी बिल्कुल बच्ची लगती है। उसका ससुराल बोकारो के पास एक कोयले की खदान वाले कस्बे में है। उसके विवाह से पहले हमारा झारखण्ड से परिचय न के बराबर था। पर अब वाणी के झारखण्ड मे रहने के कारण झारखण्ड से काफी परिचय हो गया है। वाणीका पति विवेक बोकारो में एक ७५ बिस्तर के अस्पताल का प्रबन्धन देखता है। बिजनेस मैनेजमेण्ट की स्नातकोत्तर डिग्री लिये है पर व्रत-उपवास-कर्मकाण्ड में पी.एच.डी. कर रखी है विवेक ने। मैने तो सबसे लम्बा उपवास ब्रंच से लेट डिनर तक का कर रखा है; पर विवेक ने तो उपवासों का पूरा नवरात्र सम्पन्न किया है कई बार। और वाणी के स्वसुर श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय पूर्णकालिक राजनेता हैं। विवेक और श्री रवीन्द्र जिस प्रकार से सहजता से हमारे सम्बंधी बने - उसे सोच कर मुझे लगता है कि ईश्वर चुन कर लोगों को जोड़ते हैं।

वाणी ऐसी लड़की है जो प्रसन्नता विकीरित करती रहती है।

मुझे कोलकाता में तीन दिन रहना था अन्तर रेलवेसमयसारिणी बैठक के चलते। अत: कोलकाता जाते हुये हम वाणी को भी आसनसोल से साथ कोलकाता लेते आये। वह अपनी मां और भाई के साथ शिवकुमार मिश्र के घर पर रही। सत्रह तारीख को सवेरे मिलते ही उसने प्रसन्नता का पहला उपहार मुझे अपने पर्स के माध्यम से दिया। उसके पर्स के मुंह पर दो पिल्ले बने थे। वे चमकीली आंखों वाले प्यारे जीवों की अनुकृति थे जो अपने चुलबुले स्वरूप से बहुत बात करते प्रतीत होते थे। पहला काम मैने यह किया कि उनका चित्र अपने मोबाइल कैमरे के हवाले किया। इस पोस्ट पर सबसे ऊपर बायें वही चित्र है। मैं देर तक इन (निर्जीव ही सही) पिल्लों को गींजता, उमेठता, दुलराता रहा।

वाणी का पर्स प्रसन्नता की भाषा बोलता लग रहा है! नहीं? उसके मुकाबले उसकी मां का लोंदा जैसा मेरे ब्रीफकेस पर पसरा चितकबरे कुत्ते वाला पर्स (जो वाणी ने ही खरीदा था और जिसका चित्र ऊपर दायें है) कितना दुखी-दुखी सा लग रहा है! वापसी में वाणी यह लोंदा-कुत्ता वाला पर्स भी अपनी मां से झटक ले गयी है। अपने चाचा शिवकुमार मिश्र से गिफ्ट झटकने का कस कर चूना लगाया है - सो अलग!

काश भगवान हमें भी (कुछ दिन के लिये ही सही) वाणी बना देता!


आप कह सकते हैं - यह भी कोई पोस्ट हुयी? पर पोस्ट क्या सूपर इण्टेलेक्चुअल मानस के लिये ही होती है?!
सुभ चिन्तक जी को पसन्द न आये तो क्या कहा जाये? असल में ब्लॉगिंग है ही पर्सनल केमिस्ट्री को स्वर देने के लिये। अब यह आत्मवंचना हो तो हो।
आजकल ब्लॉगर डॉट कॉम मनमानी ज्यादा कर रहा है। विण्डोज लाइवराइटर को अंगूठा दिखा रहा है और कई टिप्पणियां गायब कर जा रहा है! रंजना, शिव कुमार और अनीता जी की टिप्पणियां गायब कर ही चुका है - जितना मुझे मालूम है।
ब्लॉगर डॉट कॉम का तो विकल्प मेरे पास फिलहाल नहीं है पर पोस्ट एडीटर के रूप में कल मैने जोहो राइटर को खोज निकाला है। पावरफुल एडीटर लगता है। यह ऑफलाइन मोड में गूगल गीयर से पावर होता है। गूगल गीयर के इन्वाल्वमेण्ट से लगता है कि गूगल इस जोहो राइटर को ठीक से काम करने देगा। पर अन्तत: गूगल को अपना ऑफलाइन पोस्ट एडीटर लाना ही होगा - ऐसा मेरा सोचना है।
यह पोस्ट जोहो राइटर के माध्यम से पोस्ट कर रहा हूं। बताइयेगा कि देखने में कोई नुक्स है क्या?


Wednesday, January 23, 2008

पारम्परिक चिकित्सा पर वनस्पति विज्ञानी का कथन


अपनी इस बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में वनस्पति विज्ञानी श्री पंकज अवधिया पारम्परिक चिकित्सा पर अपने विचार रख रहे हैं। पारम्परिक चिकित्सा का विषय बहुत कुछ योगिक ज्ञान के विषय सा ही है। कुछ समय से हम आम आदमी में भी योग विषयक हलचल देख रहे हैं। कुछ वैसा की राग पारम्परिक चिकित्सा के विषय में भी जगे - यह आशा की जानी चाहिये। आप पंकज जी का लेख पढ़ें:

इस बार मैं आपको अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणों के दौरान हुये विभिन्न अनुभवों के विषय मे बताना चाहता हूँ जिससे आप भारतीय वनस्पतियों और इनसे सम्बन्धित पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान के विषय मे कुछ जान पायें। कुछ वर्षो पहले मुझे उत्तरी छत्तीसगढ़ के पारम्परिक चिकित्सकों से एक विशेष प्रकार की लकड़ी के विषय मे पता चला। ये पारम्परिक चिकित्सक उच्च रक्तचाप की चिकित्सा करने मे दक्ष हैं। उनके इलाज का तरीका बड़ा ही सरल है। वे रोगी को इस विशेष लकड़ी का टुकडा थमा देते हैं और कस कर पकड़ने को कहते हैं। थोड़ी ही देर मे आश्चर्यजनक रूप से रोगी आराम महसूस करने लगता है और जल्दी ही ठीक हो जाता है। यह सब पारम्परिक चिकित्सको की निगरानी मे होता है। इस लकडी को स्थानीय भाषा मे तेन्गुली कहते है। इसका वृक्ष बहुत बड़ा होता है। जब मैने इसके विषय मे जानकारी एकत्र की तो विश्व साहित्य मे इसके अन्य औषधीय गुणों के विषय मे तो पता चला पर उच्च रक्तचाप मे इस तरह के उपयोग की बात नही मिली। मैने अपने शोध लेखों मे इसका वर्णन किया। बाद मे जब मैं मैदानी क्षेत्र के पारम्परिक चिकित्सकों से मिला तो उन्होने इस प्रयोग मे रूचि दिखायी और बताया कि वे इस बारे मे नही जानते हैं।

तीर-धनुष से आज के युग में शिकार करने वाले वनवासियों से मुझे इस वृक्ष मे विषय में एक और जानकारी मिली। वे जब भी जंगल जाते हैं तो इस पेड़ को काटते चलते हैं। छोटा पौधा दिखा नहीं कि वे सब काम छोड़कर इसे काटने मे जुट जाते हैं और काटकर ही दम लेते हैं। ऐसा क्यों? भला ऐसी क्या दुश्मनी? उन्होने बताया कि जब वे निशाना लगाकर तीर चलाते हैं तो यह पेड़ तीर की दिशा बदल देता है। वे इसे चुम्बकीय प्रभाव कहते हैं। चूँकि शिकार ही उनकी आजीविका का मुख्य सहारा है इसलिये वे इस व्यवधान पैदा करने वाले पेड़ को काट देते हैं। मैने एक बार फिर विश्व साहित्य का सहारा लिया पर मुझे इस विषय में कोई जानकारी नही मिली। मैने अपने वैज्ञानिक मित्रो को यह बात बतायी तो उन्होने मजाक उडाया।

मै फिर से उत्तरी छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको से मिला तो उन्होने बताया कि आम लोग जिन्हे उच्च रक्तचाप होने की सम्भावना हो इसकी लकडी की बनी चप्पल प्रयोग कर सकते हैं। साथ ही पुराने रोगी विशेष प्रकार के पलंग का इस्तमाल कर सकते हैं। यह तो बड़ा ही रोचक ज्ञान है। हमारे आस-पास कितने ही रोगी हैं और हम अब तक इस सरल प्रयोग से अंजान रहे। हमारे अपने पारम्परिक चिकित्सक इस ज्ञान को संजोये रहे और हम उन्हे नीम-हकीम कहते रहे। उनका यह ज्ञान असंख्य लोगो को राहत पहुँचाने के अलावा हजारों लोगो को रोजगार दिलवा सकता है। क्यो न इस ज्ञान के आधार पर ग्रामीण स्तर पर उद्योग लगाये जायें और फिर शहर जाकर रोजगार खोज रहे युवाओं को पलन्ग और अन्य उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाये। वे ही इसकी मार्केटिंग करें और इस तरह ग़ाँव के ज्ञान से सीधे गाँव का ही लाभ हो। कितना अच्छा लगता है यह सब सोचना पर जमीनी स्तर पर यह एक असम्भव सा कार्य है।

पहले तो आधुनिक विज्ञान इसे नहीं मानेगा। फिर उसे असर दिखने लगेगा तो वैलीडेशन के नाम पर शोधकर्ता इस ज्ञान को आधुनिक प्रयोगशालाओ मे ले जायेंगे। धीरे-धीरे पारम्परिक चिकित्सको को प्रक्रिया से हटा दिया जायेगा। फिर कुछ महीनों बाद इसे असफल प्रयोग घोषित कर दिया जायेगा। आम लोग भूल जायेंगे। कालान्तर में कुछ वर्षो मे इससे सम्बन्धित पेटेंट का समाचार आप पढेंगे। ज्यादातर लोग तो इसे भूल चुके होंगे पर जिन्हे याद होगा वो फिर ठण्डी आह भरकर कहेंगे कि यह तो हमारा ज्ञान था।

आज ज्ञान जी के चिठ्ठे के माध्यम से मै आप सब से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि आप सभी इस पर विचार कर ऐसे उपाय सुझाये जिससे ग्रामीण हितो की रक्षा हो सके और हम एक माडल बना दे ताकि आगे परेशानी न हो। हमारे देश मे बहुत सी संस्थाए इन जमीन से जुडे लोगों के हित के नाम पर करोड़ों रूपये सरकार से लेती हैं पर उनकी गतिविधियाँ भी कम सन्दिग्ध नही हैं। यदि देश के ज्ञान को बाहर ले जाने का यह थोडा सभ्य तरीका है - कहा जाये तो गलत न होगा। अत: ऐसी संस्थाओ से परहेज ही सही है।

आप विचारें और कृपया अपने विचार बतायें।

पंकज अवधिया

© इस लेख पर सर्वाधिकार पंकज अवधिया का है।


पंकज अवधिया ने इस ब्लॉग पर बहुत पोस्टें कण्ट्रीब्यूट की हैं। उन पोस्टों ने आप सब का ध्यान वनस्पति जगत और पारम्परिक चिकित्सा की अनेक अनजानी विलक्षणताओं के बारे में ध्यान आकर्षित कराया है। समस्या इसके व्यापक प्रसार और औषधियों/उपकरणों को सरलता से उपलब्ध कराने की है। मुझे लगता है कि उसके लिये उपलब्ध मार्केटिंग तकनीकों और निर्माण/प्रबंधन की आधुनिक (पर ईमानदार) सोच और पारम्परिक ज्ञान की सिनर्जी की आवश्यकता है।

यह काम कठिन हो सकता है; पर असम्भव तो हर्गिज नहीं। और जैसा पंकज जी कह रहे हैं - हम नहीं चेते तो इसे बाकी दुनियां के लोग झटक ले जायेंगे। और उसमें देर नहीं लगेगी।

एक और बात - ये छत्तीसगढ़ी ब्लॉगर क्या खाते हैं कि इनमें इतनी ऊर्जा है? मैं सर्वश्री पंकज, संजीत और संजीव की बात कर रहा हूं? कल पहले दोनो की पोस्टें एक के बाद एक देखीं तो विचार मन में आया। इनकी पोस्टों में जबरदस्त डीटेल्स होती हैं। बहुत विशद सामग्री। इन्हीं के इलाके के हमारे इलाहाबाद के मण्डल रेल प्रबंधक जी हैं - दीपक दवे। बहुत काम करते हैं। पता नहीं सोते कब हैं।


Tuesday, January 22, 2008

भारतीय रेलवे की समय सारिणी की कवायद


मैं भारतीय रेलवे की इण्टर रेलवे टाइमटेबल कमेटी की वार्षिक बैठक के सिलसिले में १७-१९ जनवरी को कोलकाता में था। यह वार्षिक बैठक रेलवे के यात्री यातायात के विषय में माघ मेले जैसा होता है। माघ मेले में जैसे संगम पर हिन्दू धर्म की विद्वत परिषद युगों से मिलती और धर्म विषयक निर्णय करती रही है; उसी प्रकार इस बैठक पर भारतीय रेलवे के सभी जोनों के प्रतिनिधि एक स्थान पर एकत्र हो कर यात्री यातायात का समग्र आकलन और नयी गाड़ियां चलाने, डिब्बे कम करने-बढ़ाने, गाड़ियों का रास्ता बदलने अथवा उन्हे आगे तक बढ़ाने आदि विषयों पर गहन चर्चा करते हैं।

यद्यपि रेलगाड़ियां चलाने के विषय में विचार विमर्श तो सतत चलते रहते हैं पर वार्षिक निर्णय के लिये यह बैठक महत्वपूर्ण होती है।

इस बैठक में वातावरण नेगोशियेशन की अनेक विधाओं का प्रगटन कराता है। क्रोध से लेकर हास्य तक के अनेक प्रसंग सामने आते हैं। कभी कभी तो कोई विद्वान अफसर गहन दार्शनिक भाव में भी कुछ भाषण दे जाते हैं।

अगर आप निर्लिप्त भाव से केवल रस लें तो बहुत कुछ देखने सीखने को मिलेगा इस बैठक में। लगभग १००-१२० वरिठ अधिकारी और रेलगाड़ी नियन्त्रक किस प्रोफेशनल एटीट्यूड से अपना पक्ष रखते और दूसरे के तर्कों को कसते हैं - उसे देख कर रेलवे के प्रति आप चलताऊ विचार नहीं रख पायेंगे। रेल परिचालन की अपनी सीमायें हैं पर कुछ स्तरों पर अपने काम के प्रति गम्भीरता और डेडीकेशन काफी सीमा तक इन्स्टीट्यूशनलाइज हो गया है।

इस बैठक के बाद भी कुछ द्विपक्षीय या दुरुह मसलों पर इक्का दुक्का बैठकें होती हैं और अन्तिम निर्णय माननीय रेल मन्त्री की संसद में बजट स्पीच में परिलक्षित होते हैं। पर अधिकांश मामलों में स्थिति काफी सीमा तक (रेलवे के विभागीय स्तर पर) इस बैठक के उपरान्त स्पष्ट हो जाती है। ये निर्णय अगले जुलाई से लागू होने वाले अखिल भारतीय टाइमटेबल को तय करते हैं।

ऐसी एक सालाना बैठक सन १९९७ में उदयपुर में आयोजित हुई थी। मैं उस समय वहां पश्चिम रेलवे के क्षेत्रीय प्रशिक्षण संस्थान का प्रधान था। अत: आयोजन में मेरा बड़ा रोल था। उसके बाद तो मैं किसी न किसी क्षेत्रीय रेलवे के प्रतिनिधि के रूप में मैं तीन ऐसी बैठकों में भाग ले चुका हूं। और इनमें भाग लेना अपने आप में एक विशिष्ट अनुभव होता है। हां; मैं आपको यह नहीं बता सकता कि इस बार वहां चर्चा या निर्णय क्या हुये!

(चित्र कोलकाता में हुई अन्तर रेलवे समय सारिणी बैठक’२००८ के हैं)


Monday, January 21, 2008

मुख्तारमाई, जीवन के उसूल और मुक्ति का रास्ता


मुख्तारमाई पाकिस्तानी कबीलाई बर्बरता से लड़ने वाली सबसे अबला नारी है जो सबसे सबल चरित्र बन कर उभरी। मैने पहले उनके विषय में कभी सजग हो कर पढ़ने का यत्न नहीं किया।
मेरी पाकिस्तानी कबीलाई सभ्यता में रुचि नहीं है। ऊपर से बर्बरता और बलात्कार की कथा पढ़ने का कोई मन नहीं होता। दुनियां में इतने दुख दर्द सामने दिखते हैं कि उनके विषय में और अधिक पढ़ना रुचता नहीं। पर वह तो विचित्र संयोग बना कि रीडर्स डायजेस्ट के जनवरी अंक में मुख्तारमाई के विषय में बोनस पठन छपा और उस दिन मेरे पास विकट बोरियत में पढ़ने को वही सामने पड़ा। और मैं उस बोरियत को धन्यवाद दूंगा। अन्यथा ऐसे सशक्त शख्सियत के विषय में जानने से वंचित ही रहता।

मुख्तारमाई पर बोनस पठन का रीडर्स डायजेस्ट का पन्ना। »

मस्तोई कबीले के नर-पशुओं द्वारा मुख्तार माई का बलात्कार केवल दुख के अलावा कोई अन्य भाव मन में नहीं लाता। पर उसके बाद मौलाल अब्दुल रज्जाक द्वारा मुख्तारमाई का साथ देना - वह भी पाकिस्तान के सामन्ती और कबीलाई वातावरण में, मुख्तारमाई का स्वयम का लड़ने का रिजॉल्व, पांच लाख रुपये की सहायता से घर की विकट गरीबी को दूर करने की बजाय लड़कियों के लिये एक स्कूल खोलने की पवित्र इच्छा और उसे पूरा करने का दृढ़ संकल्प.... इस सबसे मुझे अपने विषय में सोचने का एक नया दृष्टिकोण मिला। अपने परिवेश में बड़े सुविधायुक्त वातावरण में रहते हुये मुझे निरर्थक बातों में परेशान और अवसाद ग्रस्त होना लज्जाजनक लगा।मौलवी रज्जाक के चरित्र ने इस्लाम के विषय में मेरे मन में आदर भाव को जन्म दिया। एक धर्म अगर कुरआन की शिक्षाओं का पालन करने वाले को एक अबला के पक्ष में पूरी दृढ़ता से खड़ा होने की प्रेरणा देता है तो उस धर्म में मजबूती है और वह बावजूद रूढ़िवादिता और इनवर्ड लुकिंग प्रकृति के; वैसे ही जीवन्त और विकसित होगा जैसे मानव सभ्यता।

अल्लाह जब आपको कठिन परिस्थितियां देता है तब उसके साथ आप को उससे जूझने का साहस भी देता है - मुख्तारमाई।

मुख्तारमाई मेरे मन के अवसाद को दूर करने के लिये ईश्वर प्रदत्त प्रतिमान है। सब प्रकार से विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुये वह नारी सफल हो सकती है, तो हमें कौन रोकता है? मुख्तारमाई; जिसपर बर्बर कबीलाई समाज अपनी मर्जी पूरी तरह लादता है और उसे आत्महत्या की सीमा तक आतंकित करता है; कैसे अपने नियम और उसूल बनाती है और उन उसूलों पर चलते हुये कैसे खुद मुक्त हो पाती है। कैसे औरों को मुक्ति का मार्ग दिखा सकने में सक्षम हो पाती है - यह जानना मेरे लिये बहुत महत्वपूर्ण पठन रहा।

मित्रों, मुख्तारमाई के बारे में मुझे ’जोनाथन लिविंग्स्टन सीगल’ (रिचर्ड बक की पुस्तक) की प्रारम्भिक पंक्तियां उधृत करने का मन हो रहा है -

"यह कहानी उनकी है जो अपने स्वप्नों का अनुसरण करते हैं; अपने नियम स्वयम बनाते हैं भले ही उनके लक्ष्य उनके समूह, कबीले या परिवेश के सामान्य आचार विचार से मेल नहीं खाते हों।"

मैं यह तो अपनी कलकता रेल यात्रा के दौरान स्मृति के आधार पर लिख रहा हूं। मुख्तारमाई के बारे में तैयारी से फिर कभी लिखूंगा।
(उक्त पोस्ट मैने अपने कलकत्ता प्रवास के दौरान रेल यात्रा में लिखी थी। वापस इलाहाबाद लौटने पर पब्लिश कर रहा हूं।)


पिछली पोस्ट - हृदय और श्वांस रोगों में पारम्परिक चिकित्सा पर कुछ लोगों ने "कोहा के ग्लास को कैसे ले सकते हैं?" प्रश्न पूछते हुये टिप्पणी की है। पंकज अवधियाजी ने इस बारे में मुझे ई-मेल में स्पष्ट किया कि लोग उनसे अपने केस की डीटेल्स के साथ उनसे सम्पर्क कर सकते है। उसपर वे परम्परागत चिकित्सकों की राय लेकर, जैसा वे कहेंगे, बतायेंगे और अगर परम्परागत चिकित्सक ग्लास के पानी के प्रयोग की बात कहेंगे तो वे अपनी ओर से ग्लास भी भेज देंगे।

डा. अमर ने कुछ और ब्लड थिनर्स की बात की है। आप टिप्पणी में वह देख सकते हैं। अदरक, लहसुन, प्याज, नीम्बू और जल अच्छे ब्लड थिनर हैं। पर जैसा पंकज अवधिया जी ने कहा है कि अगर आप एलोपेथिक दवायें ले रहे हैं तो इन पदार्थों को सामान्य से अधिक लेना डाक्टर की सलाह पर होना चाहिये।


Wednesday, January 16, 2008

हृदय और श्वांस रोगों में पारम्परिक चिकित्सा


यह श्री पंकज अवधिया जी की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। रक्त को पतला करने के विषय में यह पोस्ट उन्होनें मेरी माताजी के रक्त वाहिनी में थक्के के कारण अवरोध और फलस्वरूप हॉस्पीटल में भरती होने के सन्दर्भ में लिखी है। इसके लिये मैं उनका व्यक्तिगत आभारी भी हूं। यह समस्या व्यापक है और खून को प्राकृतिक तरीके से पतला करने के विषय में जानकारी बहुत काम की होगी। आप उनका लेखन पढ़े:


ज्ञान जी की ये पोस्ट तो आपने पढ़ी ही है “कल शाम मेरी माताजी अचानक बीमार हो गयीं। रक्त वाहिनी में थक्का जम जाने से पैर में सूजन और असहनीय दर्द के चलते उन्हें अस्पताल में ले आये। प्राथमिक आपात चिकित्सा से मामला ठीक है।“ इसी सन्दर्भ मे उन्होने मुझसे पूछा था कि क्या कोई वनस्पति है जो माताजी के काम आ सकती है? इस बार की पोस्ट इसी पर केन्द्रित है।

देश भर के पारम्परिक चिकित्सक यूँ तो कई प्रकार की वनस्पतियो का प्रयोग करते है पर कोहा या कौवा और पतंग नाम वृक्षो की लकडियाँ इसके लिये विशेष तौर पर उपयोगी है। कोहा या कौवा को अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है। छत्तीसगढ मे धान के खेतो की मेड़ पर इसके वृक्ष देखे जा सकते है। हृदय रोगो मे इसके विभिन्न भागों का प्रयोग होता है। खून को पतला करने के लिये पारम्परिक चिकित्सक इसकी लकड़ी से गिलास तैयार कर लेते है। मरीज को कहा जाता है कि इस लकडी के गिलास मे पानी भरे और रात भर छोड दे। सुबह इसका पानी पी ले, खाली पेट। एक गिलास औसतन एक महिने चल जाता है।

तीस से 80 रूपये मे एक गिलास मिल जाता है। चतुर व्यापारी अब इस गिलास को सस्ते मे खरीदकर बडे महानगरो मे 1000 रूपयो तक मे बेच रहे हैं। चतुर शब्द का प्रयोग इसलिये किया क्योकि वे ग्राहको को कहते है कि इसका असर एक सप्ताह तक रहता है। इस तरह उनकी बिक्री बढ जाती है। मुझे पारम्परिक चिकित्सको से ही गिलास लेना सही जान पडता है क्योकि उन्हे मालूम होता है कि कैसी लकड़ी अच्छी है और किस रोगी के लिये उपयुक्त है?

हृदय रोगो के अलावा श्वाँस रोगो के लिये यह पानी लाभकर होता है। कोहा की तरह ही पतंग नामक वृक्ष की लकडी का प्रयोग दक्षिण भारत के पारम्परिक चिकित्सक करते हैं। इसमे पानी का रंग सुबह तक लाल हो जाता है। पतंग का वैज्ञानिक नाम Caesalpinia sappan है। आधुनिक विज्ञान ने दोनो प्रयोगों को मान्यता दी है। पर एक मुश्किल अभी भी है और वह यह कि क्या इसका प्रयोग अन्य दवाओं के साथ किया जा सकता है। ज्ञान जी की माताजी एलोपैथिक दवा ले रही है। मैने उनसे इन वनस्पतियो के विषय मे अपने डाक्टर से पूछने कहा है पर मुझे मालूम है कि डाक्टरो के पास इसका जवाब नहीं है क्योकि दो या अधिक प्रणालियो की दवाओ को कैसे एक साथ प्रयोग करे इस पर दुनिया में कम ही शोध हो रहे है। सब मेरी मुर्गी की एक टाँग कहते हुये अपने को अच्छा बताने की होड़ मे लगे है। आम लोग दुविधा मे है और अपनी समझ के अनुसार दवाओं को मिला रहे है जो नुकसानदायक भी हो सकता है। ज्ञान जी का जवाब आते ही मै कोहा का गिलास भिजवा दूंगा। आप भी मुझे लिख सकते हैं। हाँ, पैसे की बात न करें। इसे मेरी ओर से छोटा सा उपहार ही समझे। अब तक दसों गिलास इसी तरह मित्रों को राहत पहुँचा रहे हैं।

जैसा आप जानते हैं मेरी इन पोस्टो पर टिप्पणी कम हो रही है पर निजी मेल बहुत आ रहे है। ये मेल स्वास्थ्य समस्याओ को लेकर है। यथासम्भव मै आपके जवाब इसी स्तम्भ से देने का प्रयास करूंगा।

चलते-चलते

यदि आप बहुत यात्रा करते है और इससे आपका स्वास्थ्य नरम गरम रहता है तो अदरक से दोस्ती कर लीजिये। अदरक किसी भी रूप मे आपकी मदद करेगा। पर सबसे सरल प्रयोग इसके रस का शहद के साथ सेवन ही है। एक चम्मच मे आधी शहद और आधा भाग अदरक का रस एक दिन की खुराक है। आजमायें और लाभ होने पर दूसरो को भी बतायें।

कोहा पर लेखो की कड़ी ईकोपोर्ट पर यहां है।

कोहा के चित्रो की कड़ी ईकोपोर्ट पर यहां है।

पतंग पर लेखो की कड़ी ईकोपोर्ट पर यहां है।

पंकज अवधिया

© लेख पंकज अवधिया के स्वत्वाधिकार में।
यह देखिये - मैने इण्टरनेट पर पाया कि एक कम्पनी अर्जुन के वृक्ष (Terminalia arjuna) का प्रयोग अर्जुन हर्बल चाय बनाने में कर रही है और उसे हृदय रोगों में लाभदायक बता रही है। >>>


मेरी माता जी तो अभी सुबह शाम ब्लड-थिनर के इन्जेक्शन ले रही है। ये इन्जेक्शन काफी मंहगे हैं। रु. ४२५ का एक इन्जेक्शन है। मजे की बात है कि उनमें हिमोग्लोबीन की भी कमी है। और उसको दूर करने के लिये जो भोजन सप्लीमेण्ट लेने को डाक्टर साहब ने कहा है - शाक आदि, वे विटामिन ’के’ के भी स्रोत हैं और रक्त गाढ़ा बनाते हैं!

लगता है कोहा के ग्लास के लिये मुझे पंकज जी के पास रायपुर का चक्कर लगाना ही पड़ेगा!

फिलहाल मुझे अगले तीन दिन प्रवास में रहना है और लगभग १२० घण्टे तक इण्टरनेट से वंचित रहना पड़ेगा। अपनी इस पोस्ट पर टिप्पणियां छापने का काम तो मैं मोबाइल फोन के जीपीआरएस कनेक्शन से कर लूंगा। पर उससे अधिक विशेष नहीं।


Tuesday, January 15, 2008

पाशविकता पहले आती है या उसका उद्दीपन


करीब ८-१० दिन पहले शिवकुमार मिश्र की ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणियों में एक झगड़ा चला है - मुम्बई के पांच सितारा होटल के बाहर भीड़ का नारियों के प्रति बर्बर व्यवहार क्या नारियों के टिटिलेटिंग वस्त्रों या व्यवहार से उत्प्रेरित था या नहीं। वस्त्रों को पहनना या पब्लिक में व्यवहार के अपने मानदण्ड हैं और अपने कानून। उनकी परिधि में कुछ आता होगा तो पुलीस संज्ञान में लेगी। अन्यथा मामला मॉब के व्यवहार का है जो पुलीस अपने तरीके से निपटेगी। पर मैं यहां कानून से इतर चर्चा कर रहा हूं।

मुझे एक घटना याद आ रही है। मैं दूसरे वर्ष के इंजीनियरिंग का छात्र था। हम होली मिलन पर घूम रहे थे एक ८-१० के झुण्ड में। अपने अध्यापकों के घर भी होली मिलन के लिये जा रहे थे। हमारे एक एसोशियेट प्रोफेसर थे, कुछ ही समय पहले मासेचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी से भारत आये थे। उनकी पत्नी उस समय अपने घर पर अकेली थीं। वे बड़े सरल भाव से हम लोगों से मिलीं। गुलाल लगाने की प्रक्रिया में हममें से एक - दो ने कुछ ज्यादा लिबर्टी ले ली। उसपर हम ही में से एक दो संयत और संयमित तत्व गुर्राये। जल्दी से हम लोग वापस लौट आये। उसके बाद वह मस्ती का वातावरण समाप्त हो गया। सभी विचार मंथन की दशा में पंहुच गये थे। कहीं न कहीं हम मान रहे थे कि हमारा ग्रुप व्यवहार सही नहीं था।

नारी के साथ ज्यादती करने की प्रवृत्ति मानव को उसके पशु युग के गुणसूत्रों से मिली है। मॉब या ग्रुप में होने पर वर्जनायें और भी मिट जाती हैं। स्वच्छंदता सीमायें तोड़ने लगती है। कई बार बड़े संयत और प्रबुद्ध लोग भी भीड़ का हिस्सा होने पर गलतियां कर बैठते हैं।

हम सब में पाशविकता है - वह इनेट (innate - जन्मजात) है। पर उसका हिंसात्मक प्रदर्शन मैने तीन कारणों से होते देखा है। पहला भीड़ का हिस्सा होने से हममें व्यक्तिगत संयम टूट जाता है। दूसरे नशीले तत्व हममें सेंस ऑफ प्रोपोर्शन खत्म कर देते हैं। तीसरे, नग्नता या सेक्स के उभार का उद्दीपन (titillation) उसमें ’आग में घी’ का काम करता है। इसमें कौन सही या कौन गलत है की अन्तहीन बहस बहुत ज्यादा फायदेमन्द नहीं होती। पाशविकता या उद्दीपन पर हेयर स्प्लिटिंग मुर्गी पहले आयी या अण्डा जैसी अनरिजॉल्व्ड चर्चा जैसी है।


और दंतनिपोर मेरी पत्नीजी को झांसा दे गया। उसे बुलाया था वाशिंग मशीन ठीक करने के लिये। पूरा भरोसा दिलाया उसने कि उसे वह ठीक करना आता है। "हाल ही में फलानी भाभीजी की वाशिंग मशीन ठीक की है"। उसके बाद मशीन खोल कर देखा कि उसके पानी के पाइप कट गये हैं, उनमें लीकेज है। नये पाइप लाने को २५० रुपये ले कर वह "जानसन गंज गया"। चार दिन हो गये; लौटा नहीं है। वाशिंग मशीन खुली छोड़ गया है।

भरतलाल कयास: गंगा के कछार में दारू बनती-बिकती है। ढ़ाई सौ ठिकाने लगाने में अकेले को ४-५ दिन लगेंगे। दंतनिपोर उसके बाद अवतरित होगा। अभी तो अपने डेरा पर भी नहीं आया था रात में।

भरतलाल ऑब्जर्वेशन: "दंतनिपोर आये। काम त करबइ करे। पर रोवाइ-रोवाइ करे। काहेकी पइसा ओकरे हाथे आइ गबा" (दंतनिपोर आयेगा, काम तो करेगा ही; पर करेगा रुला-रुला कर। उसके हाथ में पैसा जो आ गया है)।

‍दंतनिपोर एक स्वेटर पहन कर आया था वाशिंग मशीन ठीक करने। पूरी बांह का नीला-सफेद और लगभग नया। देख कर भरतलाल का कथन - "वाह, झक्कास! कहीं से मस्त स्वेटर पा गया है दंतनिपोरवा।"


Monday, January 14, 2008

सर एडमण्ड हिलेरी की याद में


सर एडमण्ड हिलेरी के देहावसान पर जब समाचारपत्रों में लेख पढ़े तो पता चला कि उन्होने एवरेस्ट विजय पर अपने साथी जॉर्ज लोवे से यह कहा था - "वी हैव नॉक्ड द बास्टर्ड ऑफ!"

यह भाषा कुछ लोगों को अटपटी लग सकती है हिन्दी में। पर जब मैने यह पढ़ी तो सर हिलेरी के प्रति आदर और जगा। यह विश्व के शिखर पर चढ़ने वाला व्यक्ति बहुत सरल तरीके से कह रहा था अपने पैशन (passion) के बारे में। ऐसे समय में लोग बहुत औपचारिक हो जाते हैं। अपने शब्दों को चुन कर प्रस्तुत करते हैं। यह भी सोचते हैं कि वे जो कह रहे हैं; भविष्य में लम्बे समय तक कोट किया जाता रहेगा।

पर सर हिलेरी की प्रतिक्रिया "जैसी महसूस की; वैसी कही" वाली है। इतना शानदार उपलब्धि करने वाला जब सरलता से स्वयम को व्यक्त करता है तो मुझे उसमें नैसर्गिक महानता नजर आती है।

हम पर्वत शिखरों को नहीं, अपने आपको जीतते हैं। (It is not the mountains we conquer, but ourselves.)

- एडमण्ड हिलेरी

मुझ में सर हिलेरी जैसी विकट जद्दोजहद की क्षमता नहीं है। और मेरा फील्ड ऑफ एक्स्प्लोरेशन भी उनके कृत्यों जैसा नहीं है। वे तो सागरमाथा, दक्षिणी ध्रुव, गंगा की यात्रा (सागर से हिमालय तक) के बड़े अभियानों की सफलता वाले व्यक्ति थे। उनकी इस क्षमता का अंश मात्र भी अगर हमें प्राप्त हो जाये तो बड़ी कृपा हो परमेश्वर की।

उनके और तेनसिंग नोरगे के प्रति मेरे मन में बहुत आदर भाव है। तेनसिंग तो सन 1986 में दिवंगत हो गये थे। अब सर हिलेरी भी नहीं रहे। पर जब भी कुछ बड़ा काम करना होगा तो वे याद आते रहेंगे।


कल से विण्डोज लाइवराइटर के माध्यम से पोस्ट ब्लॉगस्पॉट पर नहीं जा रही। बार बार यत्न के बावजूद। यह एरर बता रहा है - The remote server returned an error: (500) Internal Server Error. क्या बाकी मित्र गण भी यह पा रहे हैं?
अब गूगल मेल और ब्लॉगस्पॉट दान की बछिया हैं। उसके कितने दांत गिनें?

Friday, January 11, 2008

हिन्दी ब्लॉगिंग और सृजनात्मकता


मेरे जैसे अनेक हैं, जो लेखन की दुनियां से पहले कभी जुड़े नहीं रहे। हम पाठक अवश्य रहे। शब्दों के करिश्मे से परिचित अवश्य रहे। पर शब्दों का लालित्य अपने विचारों के साथ देखने का न पहले कभी सुयोग था और न लालसा भी। मैं अपनी कहूं - तो रेलवे के स्टेशनों और यार्ड में वैगनों, कोचों, मालगाड़ियों की संख्या गिनते और दिनो दिन उनके परिचालन में बढ़ोतरी की जुगत लगाते जिंदगी गुजर रही थी। ऐसा नहीं कि उसमें चैलेंज की कमी थी या सृजनात्मकता की गुंजाइश कम थी। फिर भी मौका लगने पर हम जैसों ने ब्लॉगरी का उपयोग किया और भरपूर किया। कुछ इस अन्दाज में भी करने की हसरत रही कि हम कलम के धनी लोगों से कमतर न माने जायें।

असल में यही भावना उस समय भी थी जब हम छात्र जीवन में थे। इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते हमें ह्यूमैनिटीज का एक इलेक्टिव विषय हर सेमेस्टर में लेना होता था। शायद उसमें इंस्टीट्यूट का ध्येय यह था कि हमारा समग्र विकास हो। और उस समय प्रतिस्पर्द्धा इस तरह हुआ करती थी कि ह्यूमैनिटीज के विषयों में भी प्रथम ८-१० स्थान हम इंजीनियरिंग वाले छात्र पाते थे।

स्कूल में हिन्दी के शिक्षक मेरे आदर्श थे। उन्होने हिन्दी के विषय में जोश और उच्च स्वप्न मुझमें भरे थे - जो केवल उस मजबूरी के चलते ध्वस्त हुये जिसमें निम्न मध्य वर्ग की नौकरी के चांस पुख्ता करने को पहली प्राथमिकता माना जाता है।

मैं जानता हूं कि हिन्दी में मुझे कोई लॉरेल मिलने वाले नहीं हैं। हिन्दी पत्रकारिता के लोगों द्वारा भी हमारी सर्जन क्षमता को दोयम दर्जे की माना जाता रहेगा - भले ही कलम का दूषित प्रयोग करने वाले और मेलेशियस या छद्म लेखन वाले इतरा कर अपने को श्रेष्ठ बताने को गाल बजाते रहेंगे।

पर हिंदी ब्लॉगरी से जुड़े लेखन से इतर क्षेत्रों के लोगों की सृजन क्षमता कमतर कदापि नहीं है। और कई मायनों में विविध अनुभवों से परिपक्व होने के कारण उनका लेखन/पोस्ट प्रेजेण्टेशन एक सॉलिड इन्द्रधनुषीय वैविध्य रखता है। और भविष्य में हम लोग अपने कार्य क्षेत्र के काम के दबाव से अपने को ब्लॉलिंग में धीमा भले कर लें; वह धीमा होना हिन्दी के ऑफीशियल लेखन (पढ़ें साहित्यकारी) की चौधराहट की स्वीकारोक्ति और उससे उपजे दैन्य भाव से प्रेरित नहीं होगा।

वैराज्ञ की अन-एक्सेप्टिबिलिटी: कल अभय तिवारी की वैराज्ञ को ले कर टिप्पणी मुझे बहुत जमी। हम जैसे वैकल्पिक लेखन वालों से भी हिज्जे सही होने की अपेक्षा होना बढ़िया है।
पहले मैने सोचा कि ब्लॉग की हिन्दी के नाम पर वैराज्ञ को चलने देता हूं; पर देखा कि इससे कोई प्वॉइण्ट स्कोर नहीं होगा। ब्लॉग पर लेखन में हम हिन्दी के ऑफीशियल(?) लेखन से अलग कपड़े पहन सकते हैं - और पहनेंगे जरूर; पर चीथड़े और चिन्दियां नहीं चलायेंगे वैकल्पिक लेखन के नाम पर!

और इस पोस्ट में भी: सृजन होता है या श्रृजन?! ऑफीशियल लेखक क्या कहते हैं? 

हमारी भाषा में बहुत समय तक हिन्दी से विमुखता या प्रवाह हीनता के कारण अटपटापन हो सकता है। पर वह अटपटापन कमजोरी नहीं वैशिष्ठ्य है। हमारी परिवेश की जानकारी, सोच और विश्लेशण के को प्रस्तुत करने के तरीके में बहुत हाई-फाई पुस्तकों/लेखकों के नामों की बैसाखी भले न लगाई जाये; पर उसके न होने से हमारे विचार न दोयम दर्जे के हो जाते हैं और न हमारी पोस्टें। उनकी ओरिजनालिटी को आप अपने अहं से नकार सकते हैं - उनके गुणावगुण के आधार पर नकारपाना सम्भव नहीं होगा। 

ब्लॉगिंग तकनीक ने हम जैसे लेखन से दूर रहे को अभिव्यक्ति तथा सृजनात्मकता के प्रयोग के अवसर दिये हैं। और वह सृजनात्मकता शुद्ध लेखन से किसी तरह कमतर नहीं है। इसे स्वीकार न करने वालों को अपने को श्रेष्ठतर बताने के लिये केवल वक्तव्य देना पर्याप्त नहीं होगा। कड़ी मेहनत करनी होगी।

(यह समय समय पर हिन्दी भाषा पर एकाधिकारवादियों द्वारा लिखी जा रही पोस्टों के रिस्पॉंस मे पहले लिखा था। उसे कुछ परिवर्धित कर अब पोस्ट कर रहा हूं। यह हाल ही में छपी किसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं है।)        


वैराग्य को कौन ट्रिगर करता है?



रामकृष्ण परमहंस के पैराबल्स (parables - दृष्टान्त) में एक प्रसंग है। एक नारी अपने पति से कहती है - "उसका भाई बहुत बड़ा साधक है। वर्षों से वैराग्य लेने की साधना कर रहा है।" पति कहता है - "उसकी साधना व्यर्थ है। वैरग्य वैसे नहीं लिया जाता।" पत्नी को अपने भाई के विषय में इस प्रकार का कथन अच्छा नहीं लगता। वह पूछती है - "तो फिर कैसे लिया जाता है?" पति उठ कर चल देता है, जाते जाते कहता है - "ऐसे"। और पति लौट कर नहीं आया!

कितना नर्क, कितनी करुणा, कितनी वेदना हम अपने आस-पास देखते हैं। और आसपास ही क्यों; अपने मन को स्थिर कर बैठ जायें तो जगत का फिकलनेस (fickleness - अधीरता, बेठिकाना) हथेली पर दीखता है। शंकर का कथन - "पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनं" मन को मथने लगता है। कितना यह संसार-बहु दुस्तार है। पार उतारो मुरारी!

पर मुरारी मुझे रन-अवे (पलायन) की इजाजत नहीं देते। जब मैं युवा था तब विवेकानंद जी से सम्बन्धित किसी संस्थान के विज्ञापन देखता था। उनको आदर्शवादी युवकों की जरूरत थी जो सन्यासी बन सकें। कई बार मन हुआ कि अप्लाई कर दिया जाये। पर वह नहीं हुआ। मुरारी ने मुझे दुनियांदारी में बड़े गहरे से उतार दिया। वे चाहते तो आश्रम में भी भेज देते।

मित्रों, नैराश्य की स्थितियां - और वे अस्पताल में पर्याप्त देखीं; वैराग्य नहीं उत्पन्न कर पा रहीं मुझमें। यही नहीं, वाराणसी में मैं रेलवे के केंसर अस्पताल में निरीक्षण को जाया करता था। वहां तो वेदना/करुणा की स्थितियों की पराकाष्ठा थी! पर वहां भी वैराग्य नहीं हुआ। ये स्थितियां प्रेरित करती हैं कि कुछ किया जाये। हो सकता है यह सरकारी दृष्टि हो, जैसा इन्द्र जी ने मेरी पिछली पोस्ट पर कहा था। पर जो है सो है।

नित्य प्रति स्थितियां बनती हैं - जो कुछ सामने दीखता है; वह कर्म को प्रेरित करता है। मुझे दिनकर जी की पंक्तियां बार-बार याद आती हैं, जो मेरे छोटे भाई शिवकुमार मिश्र मुझे कई बार एसएमएस कर चुके हैं -
मही नहीं जीवित है मिट्टी से डरने वालों से
ये जीवित है इसे फूंक सोना करने वालों से
ज्वलित देख पंचाग्नि जगत से निकल भागता योगी
धूनी बना कर उसे तापता अनासक्त रस भोगी।
वैराग्य शायद इन्टेन्स जीवन में कर्मों को होम कर देने के बाद जन्म लेता हो, और उसका एक महान ध्येय होता हो। मैं तो अभी न कर्मों को जला पाया हूं और न ही इस बात से सहमत हो पाया हूं कि नैराश्य जनित अवसाद एक ध्येयपूर्ण वैराग्य/सन्यास उपजा सकता है।

आपके विचार शायद अलग हों?।






टाटा की लखटकिया कार टेलीवीजन पर अवलोक कर भरतलाल उवाच - अरे बड़ी नगद लागत बा, मेघा अस! (अरे, बहुत सुन्दर लग रही है - मेढ़क जैसी!)


Thursday, January 10, 2008

अगाध जीवन ऊर्जा के रहस्य


Nargis Stage small

मैं अस्पताल से घर लौटा हूं। कुल चार रातें काटीं मेरी माताजी ने  वहां पर। एक रात में मैं उनके साथ रहा। बाकी तीनों दिन मेरे पिताजी उनके साथ रात में रहे। उनके पास हम एक मोबाइल फोन रख कर आते थे - किसी आपातकालीन संप्रेषण के लिये। मोबाइल फोन उन्हें प्रयोग करना नहीं आता। मैने स्पीड डायल से अपना फोन नम्बर सेट कर दिया और उन्हें बता दिया कि कैसे एक अंक को देर तक दबाये रखने से मेरा फोन डायल हो जायेगा और कैसे वे इनकमिंग कॉल को अटेण्ड और उसे समाप्त कर सकते हैं। तीन दिन में यह कोचिंग कई बार दोहरायी मैने। पर अन्तत: भी वे यह उपकरण ठीक से प्रयोग करने में सफल नहीं रहे।

अपने कार्यकाल में वे एक सिविल इंजीनियर रहे। गैरीजन इंजीनियर के पद से रिटायर हुये। कैसे हो सकता है कि साधारण सा उपकरण प्रयोग करना न आये? यह जानने को मैने उनसे मैने घुमा फिरा कर बात की। वे बोले कि बहुत सी चीजें हैं, जिनमें उन्हे रस ही नहीं आ रहा है।

जीवन के कृत्यों में रस न आना - यह बुढ़ापे की निशानी है - शर्तिया। मैं आस पास जीवन में रत लोगों की तलाश करता हूं। ऊर्जा से लबालब लोग। मुझे दो नर्सें और डाक्टर इस प्रकार के मिलते हैं। वे अपने कार्य में पर्याप्त दक्ष हों; ऐसा नहीं है। पर वे ऊर्जा से भरे हैं - काम कर रहे हैं और उस प्रक्रिया में सीख रहे हैं। अगर मैं अपनी छिद्रान्वेंषण की प्रवृत्ति से छीलने लगूं - तो शायद कई गलतियां गिना सकता हूं उनमें। पर वे इतना जबरदस्त कंसंट्रेटेड पैकेट ऑफ इनर्जी हैं, कि उनपर मैं मुग्ध हुये बिना नहीं रहता। क्या हैं उनकी ऊर्जा के सूत्र?atomic_particle  

रीडर्स डाइजेस्ट के स्पेशल कलेक्शन में पढ़े एक लेख में मुझे इस अगाध ऊर्जा के कुछ सूत्र मिलते हैं।1 वे इस प्रकार हैं -

  1. कभी कभी जीवन में अच्छा कार्य (पढ़ें - नैतिक और परोपकार युक्त कार्य) करते रहें। इसका अर्थ प्रचण्ड शहीदाना कार्य करना नहीं है। किसी की सहायता, कोई गलत को ठीक करना, किसी को क्षमा कर देना जैसे कार्य। ये कार्य ऐसे न हों जो सीधे आपको फायदा पंहुचाते हों। इससे आप ऊर्जा के बड़े स्रोत से स्वत: जुड़ जायेंगे।
  2. अपने आपको उत्साह से एक्स्पोज करते रहें। इमर्सन ने कहा था - "वह आदमी जो अपने कार्यों में उत्साह से परिपूर्ण है, उसे किसी से भयभीत होने की जरूरत नहीं है। दुनियां में सभी अवसर उनकी पंहुच में आने को आतुर हैं जो अपने काम से प्यार करते हैं। बिना उत्साह के कोई महान उपलब्धि नहीं हो सकती।"
  3. अपनी छाया से बाहर निकलें। अर्थात अपने आपको बहुत निर्दयता से न मापें। अपनी कमियों और कमजोरियों का सतत छिद्रान्वेषण न करते रहें। अपनी विशेषताओं के लिये अपने आप को यदा-कदा क्रेडिट देते रहें। अपने आप के प्रति उदारता अपने अन्दर के हीन भाव और अपराधबोध को हटाने में सहायक होते हैं। ये हीन भाव और अपराध बोध आपके अन्दर छिपी ऊर्जा के अवरोधक होते हैं और अवरोध हटाने पर अबाध ऊर्जा प्राप्त होती है।
  4. कोई ऐसा काम ढ़ूंढ़ें, जो किया जाना हो और उसे करने लगें।
  5. ये सभी सूत्र अलग अलग लगते हैं। और भी सूत्र होंगे अगाध ऊर्जा के। पर उन सब के बीच एक उभयनिष्ठ सूत्र है - आप जिन्दगी से प्रेम करें और यह उसी प्रकार आपसे प्रेम करेगी।  

अस्पताल के मननशील माहौल से निकल कर शीघ्र मैं अपने काम में लग जाऊंगा। और तब यदा कदा अवलोकन पर यह पोस्ट ही याद दिलायेगी कि ऊर्जा के अगाध स्रोत को सतत पाया और अपने में कायम रखा जा सकता है!  


1. यह लेख रीडर्स डाइजेस्ट के "बेस्ट ऑफ इन्स्पीरेशन" नामक स्पेशल कलेक्शन में "Aurthur Gordon's Secret of Self-Renewal" शीर्षक से है।