
उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है - भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता.
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शेयर बाजार धड़ाम होता है, चढने के लिये. असली चीज आशावाद है. मैं मुन्ना का टानिक लेना छोड़ूंगा नहीं.
(फोटो - २८ फरवरी का गंगा तट पर आशावादी सवेरा)
हिन्दी चिट्ठाकारी में आपका अभिनन्दन है।
ReplyDeleteआपके ब्लाग को पढ़कर आशा की नयी किरणे फूट रही हैं। आपके लेखों को पढ़ने के बाद ऐसा लग रहा है कि आप हिन्दी ब्लागजगत को अर्थ-सम्बन्धी विचारपूर्ण लेखों की भेंट देने में सक्षम हो सकते हैं।
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