|| MERI MAANSIK HALCHAL ||
|| मेरी (ज्ञानदत्त पाण्डेय की) मानसिक हलचल ||
|| मन में बहुत कुछ चलता है ||
|| मन है तो मैं हूं ||
|| मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग ||
Sunday, July 6, 2008
पिछले एक महीने में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्टें
पिछले ३० दिनों में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली मेरी ब्लॉग पोस्टें, जैसा फीडबर्नर ने सम्पादित किया है; निम्न हैं:
१. अहिन्दी भाषी श्री जी. विश्वनाथ का परिचय…
२. अशोक पाण्डेय, उत्कृष्टता, खेतीबाड़ी और द…
३. iGoogle से ब्लॉगस्पॉट में पोस्टिंग का ग…
४. मिलिये स्वघोषित भावी प्रधानमन्त्री से!
५. बंदर नहीं बनाते घर - क्या किया जाये?
६. जेफ्री आर्चर, साहित्यकार और ब्लॉगर का व…
७. रेल माल-यातायात का रोचक प्रकार
८. प्रोफेसर गोविंद चन्द्र पाण्डे और ऋग्वेद
९. रविरतलामी से सिनर्जी - "आत्मोन्नति" का …
१०. गालिब या मीर - मुझे तो लोग जमे ब्लॉगरी-…
(मैने अपने मुख्य पृष्ठ का परिवर्तन किया है। अब से वह ताजा दो पोस्टों की बजाय अधिक पोस्टें दिखायेगा। पोस्टें पूरी पढ़ने हेतु आप को "[...आगे पढ़ें]" लिंक पर जाना होगा। इस प्रकार एक पेज पर अधिक पोस्टें दिखाई जा सकेंगी। पहले मैं पेज जल्दी खुलने के लिये मुख्य पृष्ठ पर केवल दो पोस्टें रखा करता था। अब ये दस कर दी हैं। यह परिवर्तन ब्लॉग पोस्ट की बजाय सीधे ब्लॉग यूआरएल के जरीये ब्लॉग पर पंहुचने वालों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से है। अत: पाठकों को अधिक पोस्टें सरलता से दीखनी चाहियें।)
Friday, July 4, 2008
पोरस का राजोचित आत्मविश्वास
बहुत बार पढ़ा है कि हारने के बाद पोरस को सिकन्दर के सामने जंजीरों में जकड़ कर प्रस्तुत किया गया। उस समय सिकन्दर ने प्रश्न किया कि तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये? और पोरस ने निर्भीकता से उत्तर दिया - "वैसा ही, जैसा एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।" यह नेतृत्व की निर्भीक पराकाष्ठा है। अच्छे नेतृत्व में इसके दर्शन होते हैं।
मुझे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी की पुस्तक "कृष्णावतार" का एक प्रसंग याद है। पांचाली का स्वयंवर होने जा रहा है। कृष्ण जानते हैं कि पाण्डव अज्ञातवास के अन्तिम चरण में वहां आ चुके हैं। उनका वचन है कि द्रौपदी का विवाह अर्जुन से हो। उसके लिये जरासंध को किनारे करना आवश्यक है। आधी रात बीत चुकी है। जरासंध को सोते से जगा कर उसे बताना है कि वह वापस लौट जाये। निर्भीक कृष्ण निहत्थे जरासंध के खेमें में पंहुचते हैं। जरासंध को नींद से उठाया जाता है। वह कृष्ण से वैसे की खार खाये है। उनका वध करने को अपनी गदा की मूठ पर हाथ रखता है जरासंध। और कृष्ण पूरी शान्ति और निर्भीकता से कहते हैं कि यह स्वयंवर का समय है। अगर जरासंध उनकी हत्या करता है तो स्वयंवर का नियम भंग होगा और आर्यवर्त के सभी राजा कर्तव्य से बंधे होंगे कि वे स्वयंवर भंग करने वाले जरासंध का वध कर दें। जरासंध किचकिचा कर रह जाता है - कृष्ण का बालबांका नहीं कर पाता। कृष्ण के राजोचित आत्मविश्वास का यह प्रसंग मुझे अद्भुत लगता है।
यह अवश्य है कि सफल नेता होने के लिये हममें यह राजोचित आत्मविश्वास होना चाहिये और यदि नहीं है तो उसको विकसित करने का सतत प्रयास करना चाहिये।
| मैं इस राजोचित आत्मविश्वास का एक और उदाहरण देता हूं। हेल सिलासी इथियोपिया के १९३० से चार दशक तक सम्राट रहे। वे राजवंश में थे पर उनका राजा बनना तय न था। लिज तराफी नामक इस नौजवान ने ऐसा जबरदस्त राजोचित आत्मविश्वास दिखाया कि सम्राट मेनेलिक द्वितीय का विश्वासपात्र बन बैठा। जब सिंहासन के बाकी दावेदार बड़बोले, ईर्ष्यावान और षडयंत्रकारी थे; लिज तराफी शान्त, धैर्य और आत्मनिश्चय से परिपूर्ण रहता था। बाकी दावेदार इस पतले नौजवान को धकियाने का यत्न करते थे पर यह संयत बना रहता था। वह ऐसे दिखाता था जैसे उसे अन्तत: सम्राट बनना ही है। और धीरे धीरे अन्य कई भी ऐसा सोचने लगे। सन १९३६ में इटली ने इथियोपिया पर अधिकार कर लिया था। तराफी (तब हेल सिलासी) देश निकाला झेल रहे थे। उस समय उन्हे लीग ऑफ नेशन्स को अपने देश की आजादी के लिये सम्बोधित करने का अवसर मिला। इतालवी श्रोताओं नें खूब शोर शराबा किया और उन्हे अश्लील गालियां भी दीं। पर हेल सिलासी ने अपना संयम नहीं खोया। अपनी बात पूरी तरह से कही। हेल सिलासी के राजोचित आत्मविश्वास से उनके विरोधी और भी बौने और भद्दे लगे। उनका कद और बढ़ गया। यह होता है राजोचित आत्मविश्वास! (विकीपेडिया पर हेल सिलासी देखें।) |
ई-स्वामी की टिप्पणी में तो जान है! आप सहमत हों या न हों, आप अनदेखा नहीं कर सकते।
(आज मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है, अत: टिप्पणियां मॉडरेशन में देरी सम्भव है। कृपया क्षमा करें।)
Thursday, July 3, 2008
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?!
कोई मुश्किल नही है इसका जवाब देना। आज लिखना बन्द कर दूं, या इर्रेगुलर हो जाऊं लिखने में तो लोगों को भूलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कई लोगों के ब्लॉग के बारे में यह देखा है।
वैसे भी दिख रहा है कि हिन्दी में दूसरे को लिंक करने की प्रथा नहीं है। सब अपना ओरीजनल लिखते हैं और मुग्ध रहते हैं। ज्यादा हुआ तो किसी ऑब्स्क्योर सी साइट को जिसमें कोई जूस वाली चीज छपी हो, को हाइपर लिंकित कर दिया। कुछ घेट्टो वाले ब्लॉग परस्पर लिंकित करते हैं। उनका महन्त सुनिश्चित करता है कि उसके रेवड़ के लोग परस्पर एक दूसरे की मुगली घुट्टी पियें। बाकी इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉगर को तो लोग लिंक भी कम करते हैं, और उसे भुलाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
हमारी दशा गुट निरपेक्ष वाली है। जैसे नॉन अलाइण्ड मूवमेंण्ट का कोई धरणी-धोरी नहीं, वैसे हम जैसे की भी डिस्पेंसिबिलिटी ज्यादा है।
हमारा सर्वाइवल तो हमारे ब्लॉग कण्टेण्ट और हमारी निरंतरता पर ही है।
चलिये "जरूरत" पर एक क्षेपक लिया जाये।
पर जो बात मैं अण्डर लाइन करना चाहता हूं, वह यह है कि अपने कृतित्व से हमें औरों की नजर में अपनी जरूरत बनाये रखनी चाहिये। इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में बचे रहने और आगे बढ़ने का वह एक अच्छा तरीका है।
आपकी इनडिस्पेंसिबिलिटी क्या है मित्र?! या इससे भी मूल सवाल - क्या आप इस बारे में सोचते हैं?
Wednesday, July 2, 2008
एसईजेड कहां से आया बन्धुओं?
हमें लग रहा है कि हम भी कहीं से कुछ पढ़ कर ठेल दें, ताकि सनद रहे कि दखिनहे ही सही, पढ़वैया तो हैं!
ई देखें - चाइना डेली अपने हियां के एसईजेड के कसीदे में बन्दे मातरम कर रहा है। बकिया, एसईजेड के कॉन्सेप्ट को बताता है कि भारत ने सन ८० के पहले इसकी अधकचरी कोशिश की थी। वह तो चीन ही था जिसने इस विचार को चमका कर लागू किया।
यह चाइना डेली के भलमनई (भद्रपुरुष) - यू न्यू जी कहते हैं चीन में भी श्रमिक सम्बन्धों और जमीन के प्रयोग की मुश्किलें हैं जरूर, पर चीन की सरकार बहुत दरियादिल है कम्पन्सेशन और पुनर्वसन के प्रोग्राम में। काश भारत को ऐसी दरियादिल सरकार मिल पाती! अगले चुनाव में भारत की जनता शायद ध्यान रखे!
हम तो यू न्यू जी के विचारों से गदगद हैं। पता नहीं भारत के गदगद पॉलितब्यूरो के क्या विचार हैं?
वैसे, बाई रिमोट चांस, अगर साम्यवादी दल का अगला प्रधानमन्त्री बनता है तो हमारी पसंद - बुद्धदेब भट्टाचारजी!
"हलचल" का मानो या न मानो:दो रेक कोयले के फलाने थर्मल पावर हाउस में खाली नहीं हो रहे। ९-१० घण्टे में खाली होने चाहियें, पर ४८ घण्टे हो गये। कारण - टिपलर (वह संयंत्र जिसपर वैगन पलटा कर कोयला नीचे पिट में गिराया जाता है, फिर वहां से कोयला कन्वेयर बेल्ट से पावर हाउस में जाता है) काम नहीं कर रहे। टिपलर इसलिये काम नहीं कर रहे, क्यूंकि बिजली नहीं आ रही!!! क्या बतायें, बिजली बनाने वाले के पास अपना कोयला उतारने के लिये बिजली नहीं है! |
Tuesday, July 1, 2008
पण्डित नेहरू का मुख्य मंत्रियों को लिखा एक पत्र
यह न केवल गलत है, बल्कि विनाश का मार्ग है...
वास्तव में सही तरीका यही है किसी पिछड़े समूह को प्रोत्साहन देने का, कि हम उसे अच्छी शिक्षा के अवसर उपलब्ध करायें। और अच्छी शिक्षा में तकनीकी शिक्षा भी आती है, जो कि उत्तरोत्तर अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसके अलावा अन्य सभी सहायता किसी न किसी मायने में बैसाखी है जो शरीर के स्वास्थ्य के लिये कोई मदद नहीं करती। हमने हाल ही में दो बड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं: पहला, सब को मुफ्त प्रारम्भिक शिक्षा उपलब्ध कराने का है, जो आधार है; और दूसरा, सभी स्तरों पर प्रतिभाशाली लड़कों-लड़कियों को शिक्षा के लिये वजीफा देने का1; और यह न केवल सामान्य क्षेत्रों के लिये है वरन, कहीं अधिक महत्वपूर्ण रूप में, तकनीकी, वैज्ञानिक और चिकित्सा के क्षेत्रों में ट्रेनिंग के लिये भी है। मुझे पूरा यकीन है कि इस देश में प्रतिभा का विशाल भण्डार है, जरूरत है कि हम उसे सुअवसर प्रदान कर सकें।
पर अगर हम जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण करते हैं तो हम प्रतिभाशाली और योग्य लोगों को दलदल में डाल देंगे और दोयम या तीसरे दर्जे के बने रहेंगे। मुझे इस बात से गहन निराशा है, जिस प्रकार यह वर्ग आर्धारित आरक्षण का काम आगे बढ़ा है। मुझे यह जान कर आश्चर्य होता है कि कई बार पदोन्नतियां भी जाति और वर्ग के आधार पर हो रही हैं। यह न केवल गलत है, वरन विनाश का मार्ग है।
हम पिछड़े समूहों की सब प्रकार से सहायता करें, पर कभी भी कार्यकुशलता की कीमत पर नहीं। हम किस प्रकार से पब्लिक सेक्टर या, कोई भी सेक्टर दोयम दर्जे के लोगों से कैसे बना सकते हैं?
(पण्डित जवाहरलाल नेहरू जी, भारत के प्रधानमंत्री, का २७ जून १९६१ को मुख्यमन्त्रियों को लिखा पत्र, जो अरुण शौरी की पुस्तक - FALLING OVER BACKWARDS में उद्धृत है।)
1. मुझे यह कहना है कि इस निर्णय का ही परिणाम था कि मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर पाया। अगर मुझे राष्ट्रीय छात्रवृत्ति न मिली होती, तो मैं नहीं जानता कि आज मैं किस स्तर पर होता। नेशनल साइंस टेलेण्ट सर्च वाली छात्रवृत्ति भी शायद इसी निर्णय का परिणाम रही हो; पर प्योर साइंस में भविष्य नजर न आने की सोच ने उस विकल्प को नहीं अपनाने दिया। आज लगता है कि वह शायद बेहतर विकल्प होता।
» कल घोस्ट बस्टर जी ने मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की। शायद नाराज हो गये। मेरा उन्हे नाराज करने या उनके विचारों से टकराने का कोई इरादा न था, न है। मैं तो एक सम्भावना पर सोच व्यक्त कर रहा था। पर उन्हें यह बुरा लगा हो तो क्षमा याचना करता हूं। उनके जैसा अच्छा मित्र और टिप्पणीकार खोना नहीं चाहता मैं। » कल मैने सोचा कि समय आ गया है जब बिजनेस पेपर बन्द कर सामान्य अंग्रेजी का अखबार चालू किया जाय। और मैने इण्डियन एक्सप्रेस खरीदा। उसमें मुज़ामिल जलील की श्रीनगर डेटलाइन से खबर पढ़ कर लगा कि पैसे वसूल हो गये। उस खबर में था कि तंगबाग के श्री मुहम्मद अब्दुल्ला ने फंसे ३००० अमरनाथ यात्रियों को एक नागरिक कमेटी बना कर न केवल भोजन कराया वरन उनका लोगों के घरों में रात गुजारने का इन्तजाम किया। यह इन्सानियत सियासी चिरकुटई के चलते विरल हो गयी है। सलाम करता हूं तंगबाग के श्री मोहम्मद अब्दुल्ला को! |
Monday, June 30, 2008
गरीबों की पीठ पर विज्ञापन कभी नहीं आयेंगे - घोस्ट बस्टर
घोस्ट बस्टर बड़े शार्प इण्टेलिजेंस वाले हैं। गूगल साड़ी वाली पोस्ट पर सटीक कमेण्ट करते हैं -
मुझे समझ में आता है। गरीब की किडनी निकाली जा सकती है, उसका लेबर एक्स्प्लॉइट किया जा सकता है, पर उसमें अगर इनहेरेण्ट अट्रेक्शन/रिपल्शन वैल्यू (inherent attraction/repulsion value) नहीं है तो उसका विज्ञापनीय प्रयोग नहीं हो सकता।
गरीबी का एक्प्लॉइटेशन चाहे बांगलादेशी-नेपाली लड़कियों का कमाठीपुरा में हो या (भविष्य में) विज्ञापनों में हो, मुझे परम्परावादी या दकियानूसी के टैग लगने के खतरे के बावजूद मुखर बनायेगा उनके खिलाफ। और उसके लिये चाहे धुर दक्षिणपंथी खेमे की जय-जयकार करनी पड़े।
गरीब और गरीबी का विज्ञापनीय शोषण न हो - जैसा घोस्ट बस्टर जी कह रहे हैं; तो अति उत्तम। पर अगर होता है; तो उसकी घोर निंदा होनी चाहिये।
मैं फ्री मार्केट के पक्ष में हूं। पर मार्केट अगर सेनिटी की बजाय सेनसेशन की ओर झुक जाता है तो उससे बड़ा अश्लील दानव भी कोई नहीं!
(जब फ्री हैण्ड लिखा जाता है तो अंग्रेजी के शब्द कुछ ज्यादा ठुंस जाते हैं। आशा है घोस्ट बस्टर जी अंग्रेजी परसेण्टेज की गणना नहीं निकालेंगे; अन्यथा मैं कहूंगा कि उनका नाम १००% अंग्रेजी है!)
उसी पोस्ट पर महामन्त्री-तस्लीम का कमेण्ट - हालत यहाँ तक जरूर पहुंचेंगे, क्योंकि जब इन्सान नीचे गिरता है, तो वह गहराई नहीं देखता है।
Saturday, June 28, 2008
टेलीवीजन विज्ञापन - कहां तक पहुंचेगी यह स्थिति!
मैं टीवी का दर्शक नहीं रहा - कुछ सालों से। मेरे परिवार ने उसका रिमोट मेरे हाथ से छीन लिया और मैने टीवी देखना बन्द कर दिया। बिना रिमोट टीवी क्या देखना? रिमोट की जगह कम्प्यूटर के माउस का धारण कर लिया मैने।टेलीविजन विज्ञापन पर यह पोस्ट मेरे ब्लॉग पर श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ ने बतौर अतिथि पोस्ट लिखी है। वे इतना बढ़िया लिखते और टिपेरते हैं कि मैं उनसे ब्लॉग प्रारम्भ करने का अनुरोध करता हूं। अभी आप अतिथि पोस्ट पढ़ें -
झट से पास में रखा हुआ कोई किताब/पत्रिका/अखबार पढ़ने लगता हूँ। इस प्रकार "मल्टी-टास्किंग" करने में सफ़ल हो जाता हूँ। IPL T20 के मैच देखते देखते कई पत्रिकाएं पढ़ डालीं। आजकल ये "ब्रेक्" १० मिनट तक चलते हैं। काफ़ी है मेरे लिए। लगभग दो या तीन पन्ने पढ़ लेता हूँ इस अवधि में! अब साड़ी पर यह "गूगल" का विज्ञापन देखकर मैं चौंक गया। कहाँ तक ले जाएंगे ये लोग इस आइडिया को? क्या विज्ञापन के लिए प्रिन्ट मीडिया, रेडियो, टीवी, अन्तर्जाल, बड़े बड़े पोस्टर, बस और ट्रेन की दीवारें वगैरह काफ़ी नहीं है? अब हमारे कपडों पर भी हमले होने लगे हैं। मेरे लिए दुनिया में सबसे खूबसूरत दृश्य है रंगीन साड़ी पहनी हुई एक सुन्दर भारतीय नारी। अगर साड़ी पर कोई ज़री, या अन्य "डिजाइन" हो, मुझे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन उसपर कोई लिखा हुआ सन्देश, या किसी कंपनी का विज्ञापन मैं देखना कतई पसंद नहीं करूँगा। अब आगे चलकर क्या ये लोग सस्ते साड़ियों पर विज्ञापन छापकर उन्हें गरीब औरतों में बाँटेंगे? शायद गरीब नारी को यह मंज़ूर भी होगा। उन्हें क्या मतलब किसी विज्ञापन या कंपनी से। उन्हें बस सस्ते में या नि:शुल्क साड़ियाँ मिल सकती है - यही बहुत अच्छा लगेगा। अगर यह सफ़ल हुआ, तो मर्द भी कहाँ पीछे रहेंगे? अपने छाती और पीठ पर जगह देने के लिए तैयार हो जाएंगे। टी शर्ट सस्ते हो जाएंगे या "फ़्री" हो जाएंगे। बस, पीठ/छाती पर कोई विज्ञापन भर झेलना होगा। जरा सोचिए, लाखों गरीब अगर अपने अपने पीठ दान करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो इन विज्ञापन कंपनियों को कितने लाख वर्ग फ़ुट की एडवर्टिजमेण्ट स्पेस मिल सकता है! सरकार को गरीबी हटाने में सफ़लता भले ही न मिले, कम से कम नंगेपन हटाने में सफ़लता हासिल होगी। अगला कदम होगा, कपडों को छोड़कर, सीधे त्वचा पर हमला करना। अगर औरत, बिन्दी छोड़कर अपने ललाट भी न्योछवर करने के लिए तैयार हो जाती है, तो और भी अवसर मिल जाएंगे इन कंपनियों को। जीवन बीमा निगम (LIC) का "लोगो" वैसे भी बहुत सुन्दर है। जब गरीब खून बेच सकता है, जब अपनी "किड्नी" बेचने कि लिए तैयार हो सकता है तो गरीब नारी बिन्दी त्यागकर अपने ललाट पर किसी कंपनी का "लोगो" गोदवाने (tattoo करने) के लिए भी तैयार हो सकती है। क्या स्थिति यहाँ तक पहुँचेगी? - गोपालकृष्ण विश्वनाथ |
स्थिति यहां तक जरूर पंहुचेगी विश्वनाथ जी, और आगे भी जायेगी! प्रलय में बहुत देर है!
ड्राफ्टब्लॉगर ने ब्लॉगस्पॉट पर कई नई सुविधायें दी हैं। वर्डप्रेस की तरह कमेंट-बॉक्स उनमें से एक है। आप ब्लॉगर इन ड्राफ्ट के ब्लॉग की निम्न पोस्ट पढ़ें -Updates and Bug Fixes for June 26th
Friday, June 27, 2008
वह दौड़
नाइटिंगेल
“छोड़ दो, हट जाओ, तुम हार गये हो”
वे मुझ से चिल्ला कर कहते हैं।
“अब तुम्हारे बस में नहीं है;
इस बार तुम सफल नहीं हो सकते।“
और मैं अपना सिर लटकाने की
मुद्रा में आने लगता हूं।
असफलता मेरे सामने है।
मेरी हताशा पर लगाम लगती है,
मेरी यादों में बसी एक दौड़ से।
मेरी कमजोर इच्छाशक्ति को
आशा की प्राणवायु मिलती है।
उस दौड़ की याद
मेरी नसों में भर देती है जोश!
बच्चों की दौड़, बड़े होते बच्चे,
कितना ठीक ठीक याद है मुझे।
कितना जोश था और कितना भय भी
मुश्किल नहीं है उसकी कल्पना।
एक लकीर पर पांव रखे,
हर बच्चा सोच रहा था।
प्रथम आने की,
नहीं तो कम से कम दूसरे नम्बर पर!
सभी के पिता साइड में खड़े
अपने बच्चे का बढ़ा रहे थे हौसला।
हर बच्चा चाहता था उन्हे बताना
कि वह अव्वल आयेगा।
सीटी बजी, वे सब दौड़ पड़े
उमंग और आशा से भरे।
हर बच्चा जीतना चाहता था,
चाहता था वह हीरो बने।
और एक बच्चा, जिसके पिता,
भीड़ में थे, जोश दिलाते।
सबसे आगे था वह, सोच रहा था –
“कितने खुश होंगे मेरे पिताजी!”
पर जैसे वह मैदान में आगे बढ़ा,
आगे एक छोटा सा गड्ढ़ा था।
वह जो जीतना चाहता था दौड़,
पैर फिसला, गिर पड़ा वह।
न गिरने का पूरा यत्न किया उसने,
हाथ आगे टिकाने की कोशिश की।
पर रोक न सका गिरने से अपने को,
भीड़ में हंसी की लहर चली।
वह गिरा, साथ में उसकी आशा भी,
अब नहीं जीत सकता वह दौड़…
कुछ ऐसा हो, उसने सोचा,
कहीं मुंह छिपा कर खो जाये वह!
पर जैसे वह गिरा, उठे उसके पिता,
उनके चेहरे पर पूरी व्यग्रता थी।
वह व्यग्रता जो बच्चे को कह रही थी –
“उठो, और दौड़ को जीतो!”
वह तेजी से उठा, अभी कुछ गया नहीं,
“थोड़ा ही पीछे हुआ हूं मैं”,
वह दौड़ पड़ा पूरी ताकत से,
अपने गिरने की भरपाई के लिये।
दौड़ में वापस आने की व्यग्रता,
और जीतने की जद्दोजहद।
उसका दिमाग उसके पैरों से तेज था,
और वह फिर गिर पड़ा।
उसने सोचा कि बेहतर था,
पहली गिरान पर अलग हट जाता।
“मैं कितना खराब दौड़ता हूं,
मुझे हिस्सा नहीं लेना था दौड़ में।“
पर उसने हंसती भीड़ में’
अपने पिता का चेहरा खोजा।
वे देख रहे थे उसे अपलक,
मानो कह रहे हों – “दौड़ो, जीतो!”
और वह फिर कूदा दौडने को,
अन्तिम से दस गज पीछे।
“अगर मुझे जीतना है तो,
और तेज दौड़ना होगा”, उसने सोचा।
पूरी ताकत झोंक दी उसने,
आठ दस गज का फासला कम किया।
पर और तेज दौड़ने की आपाधापी में,
वह फिर फिसला और गिर पड़ा।
उठने की इच्छा मर चुकी थी,
हार! वह चुपचाप पड़ा रहा,
उसकी आंख से एक बूंद टपकी।
“अब कोई फायदा नहीं,
अब तो यत्न करना बेकार है!”
आशा साथ छोड़ गयी थी
इतना पीछे, इतनी गलतियां,
“मैं तो हूं ही फिसड्डी!”
“मैं तो हार चुका हूं, और
हार के साथ जीना होगा मुझे।“
पर उसने अपने पिता के बारे में सोचा,
जिनसे कुछ समय में वह मिलने वाला था।
“उठ्ठो” एक ध्वनि धीमे से सुनी उसने,
“उठो और अपनी जगह लो।“
“तुम यहां हारने को नहीं आये,
चलो, दौड़ो और जीतो!”
सो वह एक बार फिर उठ खड़ा हुआ,
“उधार लो इच्छाशक्ति को”, कहा आवाज ने,
“तुम हारे नहीं हो, बिल्कुल नहीं”
क्यों कि जीतना और कुछ नहीं है,
वह सिर्फ यह है कि गिरो तो उठ खड़े हो!”
एक नये विश्वास के साथ।
उसने निश्चय किया कि जीते या हारे,
वह मैदान नहीं छोड़ेगा।
तीन बार गिरा वह बुरी तरह,
औरों से इतना पीछे था वह,
जितना पीछे हो सकता था।
फिर भी पूरी ताकत लगाई उसने,
वैसे ही दौड़ा जैसे जीतने के लिये हो।
तीन बार वह फिर उठा।
इतना पीछे था वह कि,
जीत नहीं सकता था, पर दौड़ा।
पर जब गिरने वाले बच्चे ने,
जीतने वाले को भीड़ ने तालियां दी,
जिसने पहले लाइन पार की।
ऊंचा सिर, पूरे गर्व से,
न गिरा, न कोई गलती की जिसने।
अन्त में लाइन पार की, तब,
भीड़ ने और जोर से तालियां बजाईं,
उसके दौड़ पूरा करने के लिये।
अपने पिता से वह बोला, दुखी मन से,
वह अन्त में आया, सिर झुकाये,
चुपचाप बिना किसी खुशी के।
पर अगर आप दर्शकों की मानते,
तो कहते कि दौड़ उसने जीती है!
“मैने अच्छा नहीं किया।“
“मेरे लिये तो तुम जीते!”, कहा पिता ने,
“तुम हर बार उठ खड़े हुये, जब भी गिरे!”
पूरी जिन्दगी उस दौड़ जैसी है,
और अब, जब सब कुछ घना, कठिन,
और हताश लगता है,
तब उस छोटे बच्चे की याद मुझे,
आज की दौड़ में बने रहने की ताकत देती है।
सभी ऊंचाइयों और गड्ढों से युक्त।
और जीतने के लिये आपको सिर्फ यह करना है –
जब भी गिरो, उठ खड़े होओ!
--- डी ग्रोबर्ग की एक कविता का अनुवाद। चित्र नाइटिंगेल कॉनेण्ट के उक्त फिल्मांकन के स्टिल्स हैं।
“छोड़ो, हट जाओ, तुम हार गये हो”’
वे आवाजें मेरे मुंह पर अब भी चिल्लाती हैं।
पर मेरे अन्दर एक आवाज अब भी कहती है,
“उठ्ठो, और जीतो इस दौड़ को!”
Thursday, June 26, 2008
दफ्तर बनाम वेटिंग रूम!
मेरे कमरे में चपरासी कार्ड पंहुचाता है – इम्प्रेसिव से लगने वाले कार्ड पर किसी फर्म के वरिष्ठ अधिकारी का लिखा नाम। फर्म का नाम पहचाना नहीं है। मेरे पास कोई अर्जेण्ट काम भी नहीं है। लिहाजा कमरे में बुलवाने में कोई हर्जा नहीं।
सज्जन के कमरे में घुसने से पहले उनके शरीर से गमकती इत्र की खुशबू अन्दर आती है। फिर आते हैं अधेड़ से सज्जन। पर्सनालिटी रिपल्सिव नहीं है। मेरे चेहरे पर आधी ओढ़ी और आधी नेचुरल मुस्कान आ जाती है।
मैं कहता हूं; “हां, बतायें साहब!” वे सज्जन बताने से पहले हाथ मिलाने को आगे बढ़ाते हैं। इम्प्रेसिव हाथ। कीरो की माने तो कोनिकल हाथ और लम्बी-पतली उंगलियां। एक कलाकार की होती हैं – वैसी! मैं उन्हे बैठने को कहता हूं।
वे सज्जन बैठ कर इधर उधर की प्रारम्भ करते हैं – सामान्य नेम-ड्रॉपिंग की कोशिश। मुझे उसमें बहुत रुचि नहीं।
मेज पर रिकॉर्दो सेमलर की पुस्तक पड़ी है। उसे देख कर वे मैनेजमेण्ट की पुस्तकों की बात करने लगते हैं। मैं इम्प्रेस होता हूं। पर थोड़ी बात होने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनका प्रबन्धन की पुस्तकों का अध्ययन या ज्ञान उथला है। उस विषय पर बात नहीं बनती। मैं चाहता हूं कि वे मुद्दे पर आयें। अपना अभिप्राय स्पष्ट करें और रुखसत हों।
इस बीच मेरा चपरासी चाय ले आता है। मन में झल्लाहट होती है – मैने चाय को तो कहा नहीं था। अब चाय पीने के दौरान इन सज्जन के साथ मुझे ८-१० मिनट और गुजारने होंगे। खैर!
वे सज्जन चाय को मना नहीं करते। इधर उधर की कहते रहते हैं। मैं बीच में उनके आने का ध्येय जानने के लिये “हां, बतायें साहब!” छाप उच्चरण करता हूं। पर वे इधर उधर की में ही लगे रहते हैं। चाय भी समाप्त हो जाती है। अन्तत: मैं अपनी इम्पेशेंस दिखाता हूं। वे सज्जन इशारा समझ कर कहते हैं – “अच्छा साहब, मैं चलता हूं, जरा फलाने जी से भी मिलना था”।
मेरी ट्यूबलाइट फटाक से जल जाती है। फलाने जी अपने चेम्बर में नहीं थे। उनका इन्तजार करने के लिये ये सज्जन मेरे कमरे और मेरी हॉस्पिटालिटी का प्रयोग कर रहे थे। बाहर गर्मी और उमस झेलने की बजाय कमरे का वातानुकूलन और चाय का लुत्फ उठाया उन्होने। मेरा समय लिया सो अलग।
उनके जाने के बाद मैं चपरासी को पूछता हूं कि वह चाय क्यों लाया? पता चला कि चपरासी की प्रोग्रामिन्ग इसी तरह से हुई है। इस पद पर मेरे से पहले वाले अधिकारी के मित्र थे ये सज्जन; और इनके आते ही चाय पिलाने का दस्तूर था। मैं अपने इन्ट्रोवर्टिज्म और उन सज्जन की सोशल नेटवर्किंग की सोचता रह जाता हूं!
(इस पोस्ट में वर्तमान और लगभग दशक भर पहले की बात का घालमेल है! )
दो दिन से सुश्री वेरोनिका की अंग्रेजी में टिप्पणियां मिल रही हैं मेरे ब्लॉग पर। और वे पोस्ट से असंबद्ध नहीं हैं, अत: मुझे लगता है कि वे पोस्ट गम्भीरता से पढ़ रही हैं। उनके प्रोफाइल से कुछ स्पष्ट नहीं होता सिवाय इसके कि वे २१ वर्ष की हैं और पर्यटन व्यवसाय से सम्बन्ध रखती हैं। प्रोफाइल भी ताजा-ताजा बना लगता है।
वे श्री समीर लाल जी की रेन हार्वेस्टिंग विषयक टिप्पणी पर प्वाइण्टेड सवाल करती हैं कि भारत के शहरों की प्रदूषित अम्लीय वर्षा में रेन हार्वेस्टिंग कैसे उपयोगी है? समीर जी, कुछ कहेंगे?
वे दूसरे दिन यह कहती हैं कि उन्होंने शिवाजी सावंत की कर्ण (मृत्युंजय?) पढ़ ली है। जी, वेरोनिका जी यह पुस्तक मेरे संकलन में है; और वास्तव में अच्छी पुस्तक है। कर्ण पर मुझे रामधारी सिंह "दिनकर" जी का काव्य "रश्मिरथी" बहुत प्रिय है। एक परदेशी(?) वेरोनिका जी के हिन्दी ब्लॉग पर आने, पढ़ने और टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद!
Wednesday, June 25, 2008
पुस्तकों की बौछार - धड़ाधड़
जैसी वासना, वैसा संग्रह। फाउण्टेन पेन की सदैव ललक है मुझे। दर्जनों इकठ्ठा हो जाते हैं। कल ही मेरी पत्नी स्टेशनरी की दुकान से मुझे घसीटती रहीं। पर तब भी एक तीस रुपये की फाउण्टेन पेन खरीदने में मैं कामयाब रहा। और तब वैसी खुशी हो रही थी जैसी पहली कक्षा के बच्चे को टीचर द्वारा मिला "वैरी गुड" फ्लैश करते होती है।
जब नौकरी ज्वाइन की थी, तब निब वाले कलम से ही लिखता था। उस समय का एक क्लर्क दो दशक बाद मिला तो उसने छूटते ही पूछा - साहब अभी भी फाउण्टेन-पेन से लिखते हैं क्या?
वही हाल पुस्तकों का है। प्रो. गोविन्द चन्द्र पाण्डे की ऋग्वेद पाने की ऐसी तलब थी कि दूसरे दिन पुस्तक मेरे पास थी। उसके अगले दिन विचित्र हुआ। मेरे उज्जैन के एक मित्र प्रोफेसर सुरेन्द्र सोनी अपनी प्रोफेसरी छोड़ दक्षिण में रमण महर्षि के धाम अरुणाचल और श्री अरविन्द आश्रम, पॉण्डिच्चेरी गये थे। वहीं से उन्होने रमण महर्षि पर छ पुस्तकों का एक चयन कूरियर के माध्यम से भेजा। साथ में रमण महर्षि का एक मिढ़ा हुआ (लैमिनेटेड) चित्र भी। पैकेट पाने पर मेरी प्रसन्नता का आप अन्दाज लगा सकते हैं।
मित्रों, मुझे याद नहीं आता कि किसी ने मुझे वुडलैण्ड के जूते, टाई, शर्ट या टी-शर्ट जैसा कोई उपहार दिया हो! कलम किताब देने वाले कई हैं। आजकल ब्लॉग पर अच्छे गीतों को सुन कर मन होता है कि कोई अच्छे गीतों का डिस्क भेंट में दे दे। पर यह वासना जग जाहिर नहीं है। लिहाजा अभी खरीदने के मन्सूबे ही बन रहे हैं। शायद मेरी बिटिया अगली मैरिज एनिवर्सरी पर यह दे दे, अगर वह मेरा ब्लॉग पढ़ती हो!
| मैं तब एक कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी था। मुझे रेलवे सप्ताह में सम्मनित किया गया था। मेरे विभाग के वरिष्टतम अधिकारी के चेम्बर में वर्किंग लंच था। उनके कमरे में अनेक पुस्तकों को देख कर मन ललचा गया। उनसे मैने कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिये मांगी। उन्होंने सहर्ष दे दीं। चार-पांच पुस्तकें ले कर लौटा था। चलते चलते उनका पी.ए. मुझसे बोला - आप पर ज्यादा ही मेहरबान हैं साहब - नहीं तो किसी दूसरे को छूने ही नहीं देते! शायद पुस्तक-वासना की इण्टेंसिटी तीव्र न होती तो मुझे भी न मिलतीं! |
पर यह जरूर है - जैसी वासना, वैसा संग्रह। या और सही कहूं तो जैसी रिवील्ड (जाहिर, प्रकटित) वासना, वैसा संग्रह!
लोग अपनी वासनायें बतायें तो बताया जा सकता है कि वे कैसे व्यक्ति होंगे! वैसे ब्लॉग जगत में अधिकांश तो पुस्तक वासना के रसिक ही होंगे। हां, पुस्तकों में भी अलग-अलग प्रकार की पुस्तकों के रसिक जरूर होंगे।
बहुत महीनों बाद आज ऐसा हुआ है कि बुधवार हो और अपने श्री पंकज अवधिया जी की पोस्ट न हो।
वे अपने जंगल प्रवास और अपनी सामग्री के संकलन में व्यस्त हैं। उन्होने कहा है कि मेरे ब्लॉग पर दिसम्बर में ही लिख पायेंगे। मैं आशा करता हूं कि वे अपनी डेडलाइन प्रीपोन करने में सफल होंगे।
इस बीच श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ जी का कुछ लेखन मेरे ब्लॉग पर यदा-कदा आता रहेगा। मै उन केरळ-तमिळनाडु के अनुभवी सज्जन के हिन्दी लेखन से बहुत प्रभावित हूं। उनका लेखन, निसंशय, सशक्त है ही!


